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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

उत्तरभाग

  • उत्तरभाग *
    ६०७

जीते-जी यहाँ कहीं यमराजका शासन नहीं चल सकता। ऐसा समझकर आप सब लोगोंको भगवान् गरुडध्वजका स्मरण तथा भगवदर्पणबुद्धिसे कर्म करते हुए उसके द्वारा भगवान् जनार्दनका यजन करते रहना चाहिये। संसारके भोगोंसे ममता हटाकर अपनी-अपनी जातिके लिये विहित कर्मद्वारा भगवान्‌की पूजा करनी चाहिये। इससे आपको अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होगी। प्रजाजनो! यह मैंने पिताजीके मार्गसे एक अधिक मार्ग आपको दिखाया है। ब्रह्मार्पणभावसे कर्ममें संलग्न होकर आप सब लोग ज्ञानमें निपुण हो जायँ। एकादशीके दिन भोजन नहीं करना चाहिये—यह पिताजीका बताया हुआ सनातन मार्ग तो है ही, यह ब्रह्मनिष्ठारूप विशेष मार्ग आपके लिये मैंने बताया है। तत्त्ववेत्ता पुरुषोंको इस ब्रह्मनिष्ठारूप मार्गका अवलम्बन अवश्य करना चाहिये। इससे इस संसारमें पुनः नहीं आना पड़ता।'

इस प्रकार सम्पूर्ण प्रजाको अनुनयपूर्वक बारम्बार आश्वासन देकर धर्माङ्गद उनके पालनमें लगे रहे। वे न तो दिनमें सोते थे और न रातमें ही। वे अपने शौर्यके बलसे पृथ्वीको निष्कण्टक बनाते हुए सर्वत्र भ्रमण करते थे। हाथीके मस्तकपर रखा हुआ उनका नगाड़ा प्रतिदिन बजता और कर्तव्यपालनकी घोषणा इस प्रकार करता रहता था—'लोगो! (एकादशीसंयुक्त) द्वादशीको उपवास करते हुए ममतासे रहित हो जाओ और नाना प्रकारके कार्योंमें देवेश्वर श्रीहरिका चिन्तन करते रहो। भगवान् पुरुषोत्तम ही यज्ञ और श्राद्धके भोक्ता हैं। सूर्यमें, सूने आकाशमें तथा सम्पूर्ण सृष्टिमें वे जगदीश्वर भगवान् विष्णु व्याप्त हो रहे हैं। धर्म, अर्थ और कामरूप त्रिवर्गकी भी इच्छा रखनेवाले सब मनुष्योंको उन्हींका स्मरण करना चाहिये। इसी प्रकार अपने वर्णोचित कर्तव्यकर्मका आचरण करते हुए भी उन्हीं भगवान् माधवका चिन्तन करना चाहिये। वे भगवान् पुरुषोत्तम ही भोक्ता और भोग्य हैं, सब कर्मोंमें उन्हींका विनियोग—उन्हींकी प्रसन्नताके लिये कर्मोंका अनुष्ठान करना उचित है।' इस प्रकार मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे डंका पीटकर श्रेष्ठ ब्राह्मण उपर्युक्त बातें दुहराया करते थे। ब्राह्मणो! इस तरह धर्मका सम्पादन करके धर्माङ्गदके पिताने जब यह जान लिया कि मेरा पुत्र मुझसे भी अधिक कर्तव्यपरायण है तो वे अत्यन्त प्रसन्न हो द्वितीय लक्ष्मीके समान सुशोभित अपनी धर्मपत्नीसे बोले—'सन्ध्यावलि! मैं धन्य हूँ तथा श्रेष्ठ वर्णवाली देवि! तुम भी धन्य हो; क्योंकि हम दोनोंका पैदा किया हुआ पुत्र इस पृथ्वीपर चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कीर्तिसे प्रकाशित हो रहा है। सुन्दरी! यह निश्चय है कि सदाचार और पराक्रमसे सम्पन्न विनयशील एवं प्रतापी पुत्र प्राप्त होनेपर पिताके लिये घरमें ही मोक्ष है। किंतु अब मैं प्रसन्नतापूर्वक शिकार खेलने एवं जंगली पशुओंको मारनेके लिये वनमें जाऊँगा। विशाललोचने! वहाँ स्वच्छन्द विचरते हुए मैं जन-रक्षाका कार्य करूँगा।

६०८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

रानी सन्ध्यावलीका पतिको मृगोंकी हिंसासे रोकना, राजाका वामदेवके आश्रमपर जाना तथा उनसे अपने पारिवारिक सुख आदिका कारण पूछना

वसिष्ठजी कहते हैं—पतिका यह वचन सुनकर विशाल नेत्रोंवाली रानी सन्ध्यावलीने कहा—‘राजन्! आपने पुत्रपर सातों द्वीपोंके पालनका भार रख दिया। अब यह मृगोंकी हिंसा छोड़कर यज्ञोंद्वारा भगवान् जनार्दनकी आराधना कीजिये और भोगोंकी अभिलाषा त्यागकर देवनदी गङ्गाका सेवन कीजिये। आपके लिये अब यही न्यायोचित कर्तव्य है; मृगोंके प्राण लेना न्यायकी बात नहीं है। पुराणोंमें कहा गया है कि ‘अहिंसा परम धर्म है। जो हिंसामें प्रवृत्त होता है, उसका सारा धर्म व्यर्थ हो जाता है। राजन्! विद्वानोंने जीव-हिंसा छः प्रकारकी बतायी है। पहला हिंसक वह है, जो हिंसाका अनुमोदन करता है। दूसरा वह है, जो जीवको मारता है। जो विश्वास पैदा करके जीवको फँसाता है, वह तीसरे प्रकारका हिंसक है। मारे हुए जीवका मांस खानेवाला चौथा हिंसक है; उस मांसको पकाकर तैयार करनेवाला पाँचवाँ हिंसक है तथा राजन्! जो यहाँ उसका बँटवारा करता है, वह छठा हिंसक है। विद्वान् पुरुषोंने हिंसायक्त धर्मको अधर्म ही माना है। धर्मात्मा राजाओंमें भी मृगोंके प्रति दयाभावका होना ही श्रेष्ठ माना गया है। मैंने आपके हितकी भावनासे ही बार-बार आपको मृगयासे रोकनेका प्रयत्न किया है।'

ऐसी बातें कहती हुई अपनी धर्मपत्नीसे राजा रुक्माङ्गदने कहा—‘देवि! मैं मृगोंकी हत्या नहीं करूँगा। मृगयाके बहाने हाथमें धनुष लेकर वनमें विचरण करूँगा। वहाँ जो प्रजाके लिये कण्टकरूप हिंसक जन्तु हैं, उन्हींका वध करूँगा। जनपदमें मेरा पुत्र रहे और वनमें मैं। वरानने! राजाको हिंसक जन्तुओं और लुटेरोंसे प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये। शुभे! अपने शरीरसे अथवा पुत्रके द्वारा प्रजाकी रक्षा करना अपना धर्म है। जो राजा प्रजाकी रक्षा नहीं करता, वह धर्मात्मा होनेपर भी नरकमें जाता है; अतः प्रिये! मैं हिंसाभावका परित्याग करके जन-रक्षाके उद्देश्यसे वनमें जाऊँगा!'

रानी सन्ध्यावलीसे ऐसा कहकर राजा रुक्माङ्गद अपने उत्तम अश्वपर आरूढ़ हुए। वह घोड़ा पृथ्वीका आभूषण, चन्द्रमाके समान धवल वर्ण और अश्वसम्बन्धी दोषोंसे रहित था। रूपमें उच्चैःश्रवाके समान और वेगमें वायुके समान था। राजा रुक्माङ्गद पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से चले। वे नृपश्रेष्ठ अनेक देशोंको पार करते हुए वनमें जा पहुँचे। उनके घोड़ेके वेगसे तिरस्कृत हो कितने ही हाथी, रथ और घोड़े पीछे छूट जाते थे। वे राजा रुक्माङ्गद एक सौ आठ योजन भूमि लाँघकर सहसा मुनियोंके उत्तम आश्रमपर पहुँच गये। घोड़ेसे उतरकर उन्होंने आश्रमकी रमणीय भूमिमें प्रवेश किया, जहाँ केलेके बगीचे आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। अशोक, वकुल (मौलसिरी), पुन्नाग (नागकेसर) तथा सरल (अर्जुन) आदि वृक्षोंसे वह स्थान घिरा हुआ था। राजाने उस आश्रमके भीतर जाकर द्विजश्रेष्ठ महर्षि वामदेवका दर्शन किया, जो अग्निके समान तेजस्वी जान पड़ते थे। उन्हें बहुत-से शिष्योंने घेर रखा था। राजाने मुनिको देखकर उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया। उन महर्षिने भी अर्घ्य, पाद्य आदिके द्वारा राजाका सत्कार किया। वे कुशके आसनपर बैठकर हर्षभरी वाणीसे बोले—‘मुने! आज मेरा पातक नष्ट हो गया। भलीभाँति ध्यानमें तत्पर रहनेवाले आप-जैसे महात्माके युगल चरणारविन्दोंका दर्शन करके मैंने समस्त पुण्य-कर्मोंका फल प्राप्त