संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ उत्तरभाग \ ७५५
* उत्तरभाग * ७५५
'मुझे भीतर जाने दो; नहीं तो मैं अभी तुम्हें भस्म कर दूँगा।' दुर्वासाका वचन सुनकर लक्ष्मणजी घबरा गये। वे मुनिसे भयभीत हो अपने बड़े भाईको उनके आगमनकी सूचना देनेके लिये स्वयं भीतर चले गये। लक्ष्मणको आया देख कालदेव उठे। उनकी मन्त्रणा पूरी हो चुकी थी। वे श्रीरामसे बोले—'आप अपनी प्रतिज्ञाका पालन कीजिये।' ऐसा कहकर श्रीरामसे विदा ले वे चले गये। तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम राजभवनसे निकले और दुर्वासा मुनिको संतुष्ट करके उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें भोजन कराया। भोजन कराकर उन्हें प्रणाम किया और विदा करके लक्ष्मणसे कहा—'भैया लक्ष्मण! धर्मके कारण बड़ा भारी संकट आ गया, क्योंकि तुम मेरे वध्य हो गये। दैव बड़ा प्रबल है। वीर! मैंने तुझे त्याग दिया (यही तुम्हारे लिये वध है)। अब तुम जहाँ चाहो, चले जाओ।' तब सत्य-धर्ममें स्थित रहनेवाले श्रीरामको प्रणाम करके लक्ष्मणजी दक्षिण दिशामें जाकर एक पर्वतके ऊपर तपस्या करने लगे। तदनन्तर भगवान् श्रीराम भी ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे साकेतपुरी और कौसल्या-प्रान्तके समस्त प्राणियोंके साथ शान्तभावसे अपने परमधामको चले गये। उस समय सरयूके गोप्रतारघाटमें श्रीरामका चिन्तन करके जिन लोगोंने गोता लगाया, वे दिव्य शरीर धारण करके योगिदुर्लभ श्रीराम-धाममें चले गये। लक्ष्मणजी कुछ कालतक तपमें लगे रहे; फिर तपस्या एवं योगबलसे युक्त हो श्रीरामका अनुगमन करते हुए अविनाशी धाममें प्रवेश कर गये। सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने उस पर्वतको प्रतिदिन अपने सान्निध्यका वर दिया और उसपर अपना अधिकार रखा; अतः वह लक्ष्मणजीका उत्तम क्षेत्र है। जो मनुष्य लक्ष्मणपर्वतपर भक्तिभावसे लक्ष्मणजीका दर्शन करते हैं, वे कृतार्थ होकर श्रीहरिके धाममें जाते हैं। उस तीर्थमें सुवर्ण, गौ, भूमि तथा अश्वके दानकी प्रशंसा की जाती है। वहाँ किया हुआ दान, होम, जप और पुण्यकर्म सब अक्षय होता है।
सेतु-क्षेत्रके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा
**मोहिनी बोली—**द्विजश्रेष्ठ! आपको बार-बार साधुवाद है! क्योंकि आपने मुझे पूरी रामायणकी कथा सुना दी, जो मनुष्योंके समस्त पापोंका नाश और उनके पुण्यकी वृद्धि करनेवाली है। अब मैं आपसे सेतु (सेतुबन्ध रामेश्वर)-का उत्तम माहात्म्य सुनना चाहती हूँ।
**पुरोहित वसुने कहा—**देवि! सुनो, मैं तुम्हें उस सेतुका उत्तम माहात्म्य बतलाता हूँ, जिसका दर्शन करके मनुष्य संसार-सागरसे मुक्त हो जाता है। सेतुतीर्थका दर्शन परम पुण्यमय है, जहाँ भगवान् रामेश्वर विराजमान हैं। वे दर्शनमात्रसे मनुष्योंको अमरत्व प्रदान करते हैं। जो मनुष्य अपने मनको वशमें करके श्रीरामेश्वरका पूजन करता है, वह समस्त ऐश्वर्योंका भागी होता है। यहाँ दूसरा चक्र-तीर्थ भी है, जो पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान, दान, जप और होम
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करनेपर वह अनन्तगुना हो जाता है। सुभगे! यहाँसे पापविनाशनतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्यके सारे पाप धुल जाते हैं और वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसके बाद सीताकुण्डमें जाकर वहाँ भलीभाँति स्नान करके जो देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। फिर मङ्गलतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पापमुक्त होता है। अमृतवापीतीर्थमें स्नान करके मरणधर्मा मानव अमरत्व प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मकुण्डमें स्नान करनेसे मनुष्यको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। लक्ष्मणतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य योगगति पाता है। हनुमत्-कुण्डमें स्नान करके मनुष्य शत्रुओंके लिये दुर्जय हो जाता है। रामकुण्डमें स्नान करनेवाला मानव श्रीरामका सालोक्य प्राप्त करता है। अग्नितीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। शिवतीर्थमें स्नान करनेसे शिवलोककी प्राप्ति होती है। शङ्खतीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य दुर्गतिमें नहीं पड़ता। कोटितीर्थमें गोता लगाकर मानव सम्पूर्ण तीर्थोंका फल पाता है। धनुष्कोटितीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करनेवाला पुरुष बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। गायत्री तथा सरस्वतीतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष पापसे मुक्त हो जाता है। ऋणमोचनतीर्थ आदिमें स्नान करके मनुष्य सब प्रकारके ऋणसे छूट जाता है। शुभे! इस प्रकार मैंने सेतु (सेतुबन्ध रामेश्वर)-के तीर्थोंका माहात्म्य बताया है, जो पढ़ने और सुननेवाले पुरुषोंके सब पापोंका नाश कर देता है।
नर्मदाके तीर्थोंका दिग्दर्शन तथा उनका माहात्म्य
**मोहिनी बोली—**द्विजश्रेष्ठ! मैंने सेतुतीर्थका उत्तम माहात्म्य सुन लिया। अब नर्मदाके तीर्थ-समुदायका वर्णन सुनना चाहती हूँ।
**पुरोहित वसुने कहा—**मोहिनि! मैं नर्मदाके दोनों तटोंपर विद्यमान तीर्थोंका वर्णन करता हूँ। उत्तर तटपर ग्यारह और दक्षिण तटपर तेईस तीर्थ हैं। नर्मदा और समुद्रके संगमको पैंतीसवाँ तीर्थ कहा गया है। ॐकार-तीर्थके दोनों ओर अमरकण्टक पर्वतसे दो कोस दूरतक सब दिशाओंमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ विद्यमान हैं। एक करोड़ तीर्थ तो कपिलासंगममें हैं। अशोकवनिकामें एक लाख तीर्थ प्रतिष्ठित हैं। अङ्गारगर्तके सौ और कुब्जाके दस हजार तीर्थ कहे गये हैं। वायुसंगममें सहस्र और सरस्वतीसंगममें सौ तीर्थ स्थित हैं। शुक्ल-तीर्थमें दो सौ, विष्णु-तीर्थमें एक हजार तीर्थ हैं। माहिष्मतीमें एक सहस्र और शूलभेद-तीर्थमें दस हजार तीर्थोंकी स्थिति मानी गयी है। देवग्राममें एक सहस्र और उलूक-तीर्थमें सात सौ तीर्थ हैं। मणि नदीके संगममें एक सौ आठ तीर्थ हैं। वैद्यनाथमें एक सौ आठ और घटेश्वरमें भी उतने ही तीर्थ हैं। नर्मदा-समुद्र-संगममें डेढ़ लाख तीर्थोंका निवास बताया गया है। व्यासद्वीपमें अट्ठासी हजार एक सौ तीर्थ हैं। करञ्जासंगममें दस हजार आठ तीर्थ हैं। एरण्डीसंगममें एक सौ आठ तीर्थ हैं। धूतपाप-तीर्थमें अड़सठ और कोकिलमें डेढ़ करोड़ तीर्थ हैं। नरेश्वरि! रोमकेशमें सहस्र, द्वादशार्कमें सहस्र तथा शुक्ल-तीर्थमें आठ लाख दो हजार तीर्थ हैं। सभी संगमोंमें एक सौ आठ तीर्थोंकी स्थिति मानी गयी है। कावेरी-संगम या नन्द-तीर्थमें पाँच सौ अवान्तर तीर्थ हैं। भृगुक्षेत्रमें एक करोड़ और भारभूतमें एक सौ आठ तीर्थ विद्यमान हैं। अक्रूरेश्वरमें डेढ़ सौ और विमलेश्वरमें एक लाख तीर्थ हैं। शुभानने! सूर्यके दस, कपिलके नौ, चन्द्रमाके आठ और नन्दीके एक करोड़ आठ तीर्थ हैं। स्तवकोंमें दो सौ चौदह तीर्थ हैं। ये सब