संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उत्तरभाग ६८५
- उत्तरभाग * ६८५
आप पितृस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है। पितरोंके पात्ररूप नारायण! आपको नमस्कार है। आप सबकी मुक्तिके हेतुभूत हैं, आपको नमस्कार है। गयामें साक्षात् जनार्दन ही पितृरूपसे विद्यमान हैं। उन कमलनेत्र श्रीहरिका दर्शन करके मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। तीनों ऋणोंसे मुक्त करनेवाले लक्ष्मीकान्त! आपको नमस्कार है। पितरोंको मोक्ष देनेवाले प्रभो! आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार कमलनयन भगवान् जनार्दनका पूजन करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। पृथ्वीपर बायाँ घुटना गिराकर भगवान् जनार्दनको नमस्कार करे। तत्पश्चात् पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करनेवाला पुरुष भाइयोंसहित विष्णुलोकमें जाता है। शिलाके वाम भागमें प्रेतकूटगिरि स्थित है। प्रेतकूटगिरिको धर्मराजने धारण किया है। वहाँ प्रेतकुण्ड है, जहाँ पदोंके साथ देवता विद्यमान हैं। उसमें स्नान करके श्राद्ध-तर्पण आदि करनेवाला पुरुष पितरोंको प्रेतभावसे मुक्त कर देता है। कीकट प्रदेशमें गया, राजगृह वन, महर्षि च्यवनका आश्रम, पुनपुना नदी, वैकुण्ठ, लोहदण्ड तथा शौणग गिरिकूट—ये सब पवित्र हैं। उनमें श्राद्ध-पिण्डदान आदि करनेवाला पुरुष पितरोंको ब्रह्मधाममें पहुँचा देता है। शिलाके दक्षिण पादमें गृध्रकूटगिरि रखा गया है। धर्मराजने शिलाको स्थिर रखनेके लिये वहाँ उस पर्वतको स्थापित किया है। वह शीघ्र पवित्र करनेवाला है। वहाँ 'गृध्रेश्वर' नामक भगवान् शिव विराजमान हैं। गृध्रेश्वरका दर्शन और उनके समीप स्नान करके मनुष्य शिवधाममें जाता है। ऋणमोक्ष एवं पापमोक्ष नामवाले शिवजीका दर्शन करके मनुष्य शिवलोकमें जाता है। वहाँ विघ्नोंका नाश करनेवाले विघ्नेश्वर गणेशजी गजरूपसे निवास करते हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य विघ्नोंसे मुक्त होता है और पितरोंको भगवान् शिवके लोकमें पहुँचा देता है। स्नान करके गायत्री और गयादित्यका दर्शन करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। प्रथम पादमें विराजमान ब्रह्माजीका दर्शन करके पुरुष अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। जो नाभिमें पिण्ड देता है, वह पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। मुण्डपृष्ठकी शोभाके लिये श्रेष्ठ कमल उत्पन्न हुआ है। मुण्डपृष्ठ और अरविन्द दोनोंका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
जो हाथियों अथवा सर्पोंका अपराध करके मारा गया है; जो परायी स्त्रियोंसे रमण करते समय उनके पतियोंद्वारा मारे गये हैं; जो गौओंको आगमें जलाने या विष देनेवाले हैं, पाखण्डी तथा क्रूर बुद्धिवाले हैं; जो नराधम क्रोधमें आकर प्रायः विष खा लेते, आगमें जल मरते, अपने ऊपर हथियार चला लेते, फाँसी लगाकर मर जाते, पानीमें डूब मरते तथा वृक्ष एवं पर्वतसे नीचे कूदकर प्राण दे देते हैं; जो पाँच प्रकारकी हत्याके अधिकारी हैं तथा जो महापातकी हैं; वे सब-के-सब पतित कहे गये हैं। वे गयाकूपके स्नानसे तथा वहाँकी भस्म रमानेसे अवश्य शुद्ध हो जाते हैं। देवि! इस प्रकार गयातीर्थका उत्तम माहात्म्य सब पापोंको शान्त करनेवाला तथा पितरोंको मुक्ति देनेवाला है। जो मनुष्य इसे प्रतिदिन अथवा श्राद्ध एवं पर्वके दिन भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, वह भी ब्रह्मलोकका भागी होता है। वह कल्याणका आश्रय, पवित्र, धन्य तथा मानवोंको स्वर्गीय गति प्रदान करनेवाला है। यह माहात्म्य यश, आयु तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है।
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अविमुक्त क्षेत्र—काशीपुरीकी महिमा
मान्धाता बोले— भगवन्! मोहिनीने पितरोंका उत्तम गति देनेवाले गया-माहात्म्यको सुनकर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर वसुसे पुनः क्या पूछा?
वसिष्ठजी बोले— राजन्! सुनो, मोहिनीने पुनः जो प्रश्न किया, वह बतलाता हूँ।
मोहिनीने कहा— लोकोद्धारपरायण द्विजश्रेष्ठ! आपको बारम्बार साधुवाद है, आप बड़े दयालु हैं। ब्रह्मन्! मैंने गयाजीका परम उत्तम पवित्र माहात्म्य सुना, जो परम गोपनीय और पितरोंको सद्गति देनेवाला है। विप्रेन्द्र! अब काशीका उत्तम माहात्म्य बताइये।
वसिष्ठजी कहते हैं— मोहिनीका यह कथन सुनकर उसके पुरोहित वसु बोले—सुनो।
पुरोहित वसुने कहा— कल्याणमयी काशीपुरी धन्य है। भगवान् महेश्वर भी धन्य हैं, जो मुक्तिदायिनी वैष्णवपुरी काशीको श्रीहरिसे माँगकर निरन्तर उसका सेवन करते हैं। सनातनदेव भगवान् शङ्कर श्रीहरिके क्षेत्रमें ही विद्यमान हैं। वे भगवान् हृषीकेशकी पूजा करते हुए स्वयं भी देवता आदिसे पूजित होते हैं। काशीपुरी तीनों लोकोंका सार है। उस रमणीय नगरीका यदि सेवन किया जाय तो वह मनुष्योंको उत्तम गति देनेवाली है। नाना प्रकारके पापकर्म करनेवाले मनुष्य भी यहाँ आकर अपने पापोंका नाश करके रजोगुणरहित तथा शुद्ध अन्तःकरणके प्रकाशसे युक्त हो जाते हैं। इसे ‘वैष्णवक्षेत्र’ तथा ‘शैवक्षेत्र’ भी कहते हैं। यह सब प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला है। महापातकी मनुष्य भी जब भगवान् शिवकी नगरी काशीपुरीमें आता है, तब उसका शरीर संसारके सुदृढ़ बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। जो पुण्यात्मा मनुष्य भगवान् विष्णु या भगवान् शिवके भक्त होकर सबको प्रतिदिन आदरबुद्धिसे देखते हुए इस क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे शुद्ध संत पुरुष भगवान् शङ्करके समान हैं। वे भय, दुःख और पापसे रहित हो जाते हैं। उनके कर्मकलाप पूर्णतः शुद्ध होते हैं और वे जन्म-मृत्युके गहन जालका भेदन करके परम मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। काशीका विस्तार पूर्वसे पश्चिमकी ओर ढाई योजनतक है और दक्षिणसे उत्तरकी ओर असीसे वरणातक आधे योजनका विस्तार है। शुभे! असी शुष्क नदी है। भगवान् शिवने इस क्षेत्रका यही विस्तार बताया है। काशीमें जो तिमिचण्डेश्वर नामक शिवलिङ्ग है, उससे उत्तरायण जानना चाहिये और शंकुकर्णको दक्षिणायन। वह ॐकारमें स्थित है। तदनन्तर पिङ्गला नामक तीर्थ आग्नेय कोणमें स्थित बताया गया है। सूखी हुई नदी जो असी नामसे प्रसिद्ध है, उसीको पिङ्गला नाड़ी समझना चाहिये। उसीके आस-पास लोलार्कतीर्थ विद्यमान है। इडा नामकी नाड़ी सौम्या कही गयी है। उसीको वरणाके नामसे जानना चाहिये, जहाँ भगवान् केशवका स्थान है। इन दोनोंके बीचमें सुषुम्णा नाड़ीकी स्थिति कही गयी है। मत्स्योदरीको ही सुषुम्णा जानना चाहिये। इस महाक्षेत्रको भगवान् शिव और भगवान् विष्णुने कभी विमुक्त (परित्यक्त) नहीं किया है और न भविष्यमें भी करेंगे। इसीलिये इसका नाम ‘अविमुक्त’ है। शुभे! प्रयाग आदि दुस्तर (दुर्लभ) तीर्थसे भी काशीका माहात्म्य अधिक है, क्योंकि वहाँ सबको अनायास ही मोक्षकी प्राप्ति होती है।
निषिद्ध कर्म करनेवाले जो नाना वर्णके लोग हैं तथा महान् पातकों और पापोंसे परिपूर्ण शरीरवाले जो घृणित चाण्डाल आदि हैं, उन सबके लिये विद्वानोंने अविमुक्तक्षेत्रको उत्तम औषध माना है। वहाँ दुष्ट, अन्धे, दीन, कृपण, पापी और दुराचारी सबको भगवान् शिव अपनी कृपाशक्तिके द्वारा