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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

उत्तरभाग ६७१

  • उत्तरभाग * ६७१

है। तीरको छोड़कर क्षेत्रमें वास करना चाहिये; क्योंकि तीरपर निवास अभीष्ट नहीं है। दोनों तटोंसे एक योजन विस्तृत भू-भाग क्षेत्रकी सीमा माना गया है। जितने पाप हैं, वे सब-के-सब गङ्गाजीकी सीमा नहीं लाँघते। वे गङ्गाको देखकर उसी प्रकार दूर भागते हैं, जैसे सिंहको देखकर वनमें रहनेवाले दूसरे जीव। महाभागे! जहाँ गङ्गा हैं, जहाँ श्रीराम और श्रीशिवका तपोवन है, उसके चारों ओर तीन योजनतक सिद्धक्षेत्र जानना चाहिये। तीर्थमें कभी दान न ले। पवित्र देव-मन्दिरोंमें भी प्रतिग्रह न ले तथा ग्रहण आदि सभी निमित्तोंमें मनुष्य प्रतिग्रहसे अलग रहे। जो तीर्थमें दान लेता है तथा पुण्यमय देवमन्दिरोंमें भी प्रतिग्रह स्वीकार करता है, उसके पास जबतक प्रतिग्रहका धन है, तबतक उसका तीर्थ-व्रत निष्फल कहा जाता है। देवि! गङ्गाजीमें दान लेना मानो गङ्गाको बेचना है। गङ्गाके विक्रयसे भगवान् विष्णुका विक्रय हो जाता है और भगवान् विष्णुका विक्रय होनेपर तीनों लोकोंका विक्रय हो जाता है। जो गङ्गाजीके तीरकी मिट्टी लेकर अपने मस्तकपर धारण करता है, वह केवल तम (अन्धकार, अज्ञान एवं तमोगुण)-का नाश करनेके लिये मानो सूर्यका स्वरूप धारण करता है। जो मनुष्य गङ्गाजीके तटकी धूलि फैलाकर उसके ऊपर पितरोंके लिये पिण्ड देता है, वह अपने पितरोंको तृप्त करके स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। भद्रे! इस प्रकार मैंने तुम्हें गङ्गाका उत्तम माहात्म्य बताया है। जो मनुष्य इसको पढ़ता अथवा सुनता है, वह भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। विधिनन्दिनि! जो भगवान् विष्णु अथवा शिवका लोक प्राप्त करना चाहते हों, उन्हें प्रतिदिन पवित्रचित्त हो श्रद्धा और भक्तिके साथ इस गङ्गा-माहात्म्यका पाठ करना चाहिये।


गयातीर्थकी महिमा

वसिष्ठजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर पापनाशिनी गङ्गाका यह उत्तम माहात्म्य सुनकर मोहिनीने पुनः अपने पुरोहितसे पूछा।

मोहिनी बोली— भगवन्! आपने मुझे गङ्गाका पुण्यमय आख्यान (माहात्म्य) सुनाया है। अब मैं यह सुनना चाहती हूँ कि संसारमें गयातीर्थ कैसे विख्यात हुआ?

पुरोहित वसुने कहा— गया पितृतीर्थ है। उसे सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ माना गया है, जहाँ देवदेवेश्वर पितामह ब्रह्माजी स्वयं निवास करते हैं। जहाँ याग (श्राद्ध)-की अभिलाषा रखनेवाले पितरोंने यह गाथा गायी है—'बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे एक भी तो गया जायगा अथवा अश्वमेध-यज्ञ करेगा या नीलवृषभका उत्सर्ग करेगा।' देवि! गयाका उत्तम माहात्म्य सारसे भी सारतर वस्तु है। मैं उसका संक्षेपसे वर्णन करूँगा। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है। सुनो, पूर्वकालकी बात है। गयासुर नामसे प्रसिद्ध एक असुर हुआ था, जो बड़ा पराक्रमी था। उसने बड़ा भयंकर तप किया, जो सम्पूर्ण भूतोंको पीड़ित करनेवाला था। उसकी तपस्यासे संतप्त हुए देवता लोग उसके वधके लिये भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। तब भगवान्ने उसको गदासे मार दिया। अतः गदाधर भगवान् विष्णु ही गयातीर्थमें मुक्तिदाता माने गये हैं। भगवान् विष्णुने इस तीर्थकी मर्यादा स्थापित की। जो मनुष्य यहाँ यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान एवं स्नानादि कर्म करता है, वह स्वर्ग अथवा ब्रह्मलोकमें जाता है। गयातीर्थको उत्तम जानकर ब्रह्माजीने वहाँ यज्ञ किया तथा उन्होंने वहाँ सरस्वती नदीकी भी सृष्टि की और समस्त दिशाओंमें व्याप्त होकर उस तीर्थमें निवास

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किया। तदनन्तर ब्राह्मणोंके प्रार्थना करनेपर ब्रह्माजीने वहाँ अनेक तीर्थ निर्माण किये और कहा—ब्राह्मणो! गयामें श्राद्ध करनेसे पवित्र हुए लोग ब्रह्मलोकगामी होंगे और जो लोग तुम्हारा पूजन और सत्कार करेंगे, उनके द्वारा सदा मैं पूजित होऊँगा। ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशालामें प्राप्त होनेवाली मृत्यु तथा कुरुक्षेत्रमें निवास—यह मनुष्योंके लिये चार प्रकारकी मुक्ति (-के साधन) हैं। ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी और गुरुपत्नीगमन तथा इन सबके संसर्गसे होनेवाला पाप—ये सब-के-सब गयाश्राद्धसे नष्ट हो जाते हैं। मरनेपर जिनका दाह-संस्कार नहीं हुआ है, जो पशुओंद्वारा मारे गये हैं अथवा जिन्हें सर्पने डँस लिया है, वे सब लोग गयाश्राद्धसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं।

देवि! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास सुना जाता है। त्रेतायुगमें विशाल नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो विशालापुरीमें रहते थे। वे अपने सद्गुणोंके कारण धन्य समझे जाते थे। उनमें धैर्यका विलक्षण गुण था। उन्होंने श्रेष्ठ तीर्थ गयाशिरमें आकर पितृयाग प्रारम्भ किया। उन्होंने विधिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान दिया। इतनेमें ही उन्होंने आकाशमें उत्तम आकृतिसे युक्त तीन पुरुषोंको देखा, जो क्रमशः श्वेत, लाल और काले रंगके थे। उन्हें देखकर राजाने पूछा—'आपलोग कौन हैं?'

सित (श्वेत)-ने कहा—राजन्! मैं तुम्हारा पिता सित हूँ। मेरा नाम तो सित है ही, मेरे शरीरका वर्ण भी सित (श्वेत) है । साथ ही मेरे कर्म भी सित (उज्ज्वल) हैं और ये जो लाल रंगके पुरुष दिखायी देते हैं, ये मेरे पिता हैं। इन्होंने बड़े निष्ठुर कर्म किये हैं। वे ब्रह्महत्यारे और पापाचारी रहे हैं और इनके बाद ये जो तीसरे सज्जन हैं, ये तुम्हारे प्रपितामह हैं। ये नामसे तो कृष्ण हैं ही, कर्म और वर्णसे भी कृष्ण हैं। इन्होंने पूर्वजन्ममें अनेक प्राचीन ऋषियोंका वध किया है। ये दोनों पिता और पुत्र अवीचि नामक नरकमें पड़े हुए हैं, अतः ये मेरे पिता और ये दूसरे इनके पिता, जो दीर्घकालतक काले मुखसे युक्त हो नरकमें रहे हैं और मैं, जिसने अपने शुद्ध कर्मके प्रभावसे इन्द्रका परम दुर्लभ सिंहासन प्राप्त किया था, तुझ मन्त्रज्ञ पुत्रके द्वारा गयामें पिण्डदान करनेसे हम तीनों ही बलात् मुक्त हो गये।

एक बार गया जाना और एक बार वहाँ पितरोंको पिण्ड देना भी दुर्लभ है; फिर नित्य वहीं रहनेका अवसर मिले, इसके लिये तो कहना ही क्या है! देश-कालके प्रमाणानुसार कहीं-कहीं मृत्युकालसे एक वर्ष बीतनेके बाद अपने भाई-बन्धु पतित पुरुषोंके लिये गयाकूपमें पिण्डदान करते हैं। एक समय किसी प्रेतराजने एक वैश्यसे अपनी मुक्तिके लिये अनुरोध करते हुए कहा—तुम गयातीर्थका दर्शन करके स्नान कर लेना और पवित्र होकर मेरा नाम ले मेरे लिये पिण्डदान करना। वहाँ पिण्ड देनेसे मैं अनायास ही प्रेतभावसे मुक्त हो सम्पूर्ण दाताओंको प्राप्त होनेवाले शुभ लोकोंमें चला जाऊँगा। वैश्यसे ऐसा कहकर अनुयायियोंसहित प्रेतराजने एकान्तमें विधिपूर्वक अपने नाम आदि अच्छी तरह बताये। वैश्य धनोपार्जन करके परम उत्तम गयातीर्थ नामक तीर्थमें गया। उस महाबुद्धि वैश्यने वहाँ पहले अपने पितरोंको पिण्ड आदि देकर फिर सब प्रेतोंके लिये क्रमशः पिण्डदान और धनदान किया। उसने अपने पितरों तथा अन्य कुटुम्बीजनोंके लिये भी पिण्डदान किया था। वैश्यद्वारा इस प्रकार पिण्ड दिये जानेपर वे सभी प्रेत प्रेतभावसे छूटकर द्विजत्वको प्राप्त हो ब्रह्मलोकमें चले गये। गयामें किये हुए श्राद्ध, जप, होम और तप अक्षय होते हैं। यदि पिताकी क्षयाह-तिथिको पुत्रोंद्वारा ये कर्म किये जायँ तो वे मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले

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होते हैं। पितृगण नरकके भयसे पीड़ित हो पुत्रकी अभिलाषा करते हैं और सोचते हैं—जो कोई पुत्र गया जायगा, वह हमें तार देगा।

गयामें धर्मपृष्ठ, ब्रह्मसभा, गयाशीर्ष तथा अक्षयवटके समीप पितरोंके लिये जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय होता है। ब्रह्मारण्य, धर्मपृष्ठ और धेनुकारण्य—इनका दर्शन करके वहाँ पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य अपनी बीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। महान् कल्पपर्यन्त किया हुआ पाप गयामें पहुँचनेपर नष्ट हो जाता है। गोतीर्थ और गृध्रवटतीर्थमें किया हुआ श्राद्धदान महान् फल देनेवाला होता है। वहाँ सब मनुष्य मतङ्गके आश्रमका दर्शन करते हैं और सब लोकोंके समक्ष ‘धर्मसर्वस्व’ की घोषणा करते हैं*। वहाँ पवित्र पङ्कजवन नामक तीर्थ है, जो पुण्यात्मा पुरुषोंसे सेवित है, जिसमें पिण्डदान दिया जाता है। वह सबके लिये दर्शनीय तीर्थ है। तृतीयातीर्थ, पादतीर्थ, निःक्षीरामण्डलतीर्थ, महाह्रद तथा कौशिकीतीर्थ—इन सबमें किया हुआ श्राद्ध महान् फल देनेवाला होता है। मुण्डपृष्ठमें परम बुद्धिमान् महादेवजीने अपना पैर दे रखा है। अन्य तीर्थोंमें अनेक सौ वर्षोंतक जो दुष्कर तपस्या की जाती है, उसके समान फल यहाँ थोड़े ही समयके तीर्थसेवनसे प्राप्त हो जाता है। धर्मपरायण मनुष्य इस तीर्थमें आकर अपनी समस्त पापराशिको तत्काल दूर कर देता है, ठीक उसी तरह जैसे साँप पुरानी केंचुलको त्याग देता है। वहीं मुण्डपृष्ठतीर्थके उत्तर भागमें कनकनन्दा नामसे विख्यात तीर्थ है, जहाँ ब्रह्मर्षिगण निवास करते हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य अपने शरीरके साथ स्वर्गलोकको जाते हैं। वहाँ किया हुआ श्राद्ध, दान सदा अक्षय कहा गया है। सुलोचने! वहाँ निःक्षीरामें तीन दिनतक स्नान करके मानसरोवरमें नहाकर श्राद्ध करे। उत्तरमानसमें जाकर मनुष्य परम उत्तम सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो अपनी शक्ति और बलके अनुसार वहाँ श्राद्ध करता है, वह दिव्य भोगों और मोक्षके सम्पूर्ण उपायोंको प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर ब्रह्मसरोवरतीर्थमें जाय, जो ब्रह्मयूपसे सुशोभित है। वहाँ श्राद्ध करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। सुभगे! तदनन्तर लोकविख्यात धेनुकतीर्थमें जाय। वहाँ एक रात रहकर तिलमयी धेनुका दान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो निश्चय ही चन्द्रलोकमें जाता है। तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् महादेवजीके गृध्रवट नामक स्थानको जाय। वहाँ भगवान् शङ्करके समीप जाकर अपने अङ्गोंमें भस्म लगावे। देवि! ऐसा करनेसे ब्राह्मणोंको तो बारह वर्षोंतक किये जानेवाले व्रतका पुण्य प्राप्त होता है और अन्य वर्णके लोगोंका सारा पाप नष्ट हो जाता है।

तत्पश्चात् उदयगिरि पर्वतपर जाय; जहाँ दिव्य संगीतकी ध्वनि गूँजती रहती है। वहाँ सावित्रीदेवीका परम पुण्यदायक पदचिह्न दृष्टिगोचर होता है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण वहाँ संध्योपासना करे। इससे बारह वर्षोंतक संध्योपासना करनेका फल प्राप्त होता है। विधिनन्दिनि! वहीं योनिद्वार है। वहाँ जानेसे मनुष्य योनि-संकटसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंमें गयातीर्थमें निवास करता है, वह अपने कुलकी सात पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है। सुभगे! तदनन्तर महान् फलदायक धर्मपृष्ठ


* अग्निपुराणमें ‘धर्मसर्वस्व’ की घोषणाका स्वरूप इस प्रकार स्पष्ट किया गया है। मतङ्गवापीमें स्नान करके श्राद्धकर्ता पुरुष वहाँ पिण्डदान करे और मतङ्गेश्वरको, जो सुसिद्धोंके अधीश्वर हैं, नमस्कार करके इस प्रकार कहे—'सब देवता प्रमाण देनेवाले और समस्त लोकपाल भी साक्षी रहें, मैंने इस मतङ्गतीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार किया है' (देखिये अग्निपुराण अध्याय ११५ श्लोक ३४-३५)।

६७४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


नामक तीर्थमें जाय, जहाँ पितृलोकका पालन करनेवाले साक्षात् धर्मराज विराजमान हैं। वहाँ जानेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। तदनन्तर मनुष्य परम उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाय, वहाँ ब्रह्माजीके समीप जानेसे राजसूय-यज्ञका फल मिलता है। तदनन्तर फल्गुतीर्थमें जाय। वह प्रचुर फल-मूलसे सम्पन्न और विख्यात है। वहीं कौशिकी नदी है, जहाँ किया हुआ श्राद्ध अक्षय माना गया है। वहाँसे उस पर्वतपर जाय, जो परम पुण्यात्मा, धर्मज्ञ राजर्षि गयके द्वारा सुरक्षित रहा है। वहीं गयशिर नामका सरोवर है, जहाँ पुण्यसलिला महानदी विद्यमान हैं। ऋषियोंसे सेवित परम पुण्यमय ब्रह्मसरोवर नामक तीर्थ भी वहीं है, जहाँ भगवान् अगस्त्य वैवस्वत यमसे मिले थे और जहाँ सनातन धर्मराज निरन्तर निवास करते हैं। वहाँ सब सरिताओंका उद्गम दिखायी देता है और पिनाकपाणि महादेव वहाँ नित्य निवास करते हैं। लोकविख्यात अक्षयवट भी वहीं है। पूर्वकालमें यजमान राजा गयने वहाँ यज्ञ किया था। वहाँ प्रकट हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा गयके यज्ञोंमें सुरक्षित थीं। मुण्डपृष्ठ, गया, रैवत, देवगिरि, तृतीय, क्रौञ्चपाद—इन सबका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। शिवनदीमें शिवकरका, गयामें गदाधरका और सर्वत्र परमात्माका दर्शन करके मनुष्य पापराशिसे मुक्त हो जाता है। काशीमें विशालाक्षी, प्रयागमें ललितादेवी, गयामें मङ्गलादेवी तथा कृतशौचतीर्थमें सैंहिकादेवीका दर्शन करनेसे भी उक्त फलकी प्राप्ति होती है। गयामें रहकर मनुष्य जो कुछ दान करता है, वह सब अक्षय होता है। उसके उत्तम कर्मसे पितर प्रसन्न होते हैं। पुत्र गयामें स्थित होकर जो अन्नदान करता है, उसीसे पितर अपनेको पुत्रवान् मानते हैं।


गयामें प्रथम और द्वितीय दिनके कृत्यका वर्णन, प्रेतशिला आदि तीर्थोंमें पिण्डदान आदिकी विधि और उन तीर्थोंकी महिमा

**पुरोहित वसु कहते हैं—**मोहिनी! सुनो, अब मैं प्रेतशिलाका पवित्र माहात्म्य बतलाता हूँ, जहाँ पिण्डदान करके मनुष्य अपने पितरोंका उद्धार करता है। प्रभासात्रिने शिलाके चरणप्रान्तको आच्छादित कर रखा है। मुनियोंसे संतुष्ट हुए प्रभास शिलाके अङ्गुष्ठभागसे प्रकट हुए। अङ्गुष्ठभागमें ही भगवान् शङ्कर स्थित हैं। इसलिये वे प्रभासेश कहे गये हैं। शिलाके अङ्गुष्ठका जो एक देश है, उसीमें प्रभासेशकी स्थिति है और वहीं प्रेतशिलाकी स्थिति है। वहाँ पिण्डदान करनेसे मनुष्य प्रेतयोनिसे मुक्त हो जाता है, इसीलिये उसका नाम 'प्रेतशिला' है। महानदी तथा प्रभासात्रिके सङ्गममें स्नान करनेवाला पुरुष साक्षात् वामदेव (शिव)-स्वरूप हो जाता है। इसीलिये उक्त सङ्गमको 'वामतीर्थ' कहा गया है। देवताओंके प्रार्थना करनेपर भगवान् श्रीरामने जब महानदीमें स्नान किया, तभीसे वहाँ सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाला 'रामतीर्थ' प्रकट हुआ। मनुष्य अपने सहस्रों जन्मोंमें जो पापराशि संग्रह करते हैं, वह सब रामतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाती है। जो मनुष्य—

राम राम महाबाहो देवानांमभयंकर॥
त्वां नमस्ये तु देवेश मम नश्यतु पातकम्।
(ना० उत्तर० ४५। ८-९)

'महाबाहु राम! देवताओंको अभय देनेवाले श्रीराम! आपको नमस्कार करता हूँ। देवेश! मेरा पातक नष्ट हो जाय।'

—इस मन्त्रद्वारा रामतीर्थमें स्नान करके श्राद्ध एवं पिण्डदान करता है, वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। प्रभासेश्वरको नमस्कार करके भासमान शिवके समीप जाना चाहिये और उन भगवान्

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शिवको नमस्कार करके यमराजको बलि दे और इस प्रकार कहे—'देवेश ! आप ही जल हैं तथा आप ही ज्योतियोंके अधिपति हैं। आप मेरे मन, वचन, शरीर और क्रियाद्वारा उत्पन्न हुए समस्त पापोंका शीघ्र नाश कीजिये।' शिलाके जघन प्रदेशको यमराजने दबा रखा है। धर्मराजने पर्वतसे कहा—'न गच्छ' (गमन न करो—हिलो-डुलो मत), इसलिये पर्वतको 'नग' कहते हैं। यमराजको बलि देनेके पश्चात् उनके दो कुत्तोंको भी अन्नकी बलि या पिण्ड देना चाहिये। उस समय इस प्रकार कहे—'वैवस्वतकुलमें उत्पन्न जो दो श्याम और सबल नामवाले कुत्ते हैं, उनके लिये मैं पिण्ड दूँगा। ये दोनों हिंसा न करें।' तत्पश्चात् प्रेतशिला आदि तीर्थमें घृतयुक्त चरुके द्वारा पिण्ड बनावे और पितरोंका आवाहन करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उनके लिये पिण्ड दे। प्रेतशिलापर पवित्रचित्त हो जनेऊको अपसव्य करके दक्षिण दिशाकी ओर मुँह किये हुए पितरोंका ध्यान एवं स्मरण करे—'कव्यवाहक, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् और सोमपा—ये सब पितृ-देवता हैं। हे महाभाग पितृदेवताओ! आप यहाँ पधारें और आपके द्वारा सुरक्षित मेरे पितर एवं मेरे कुलमें उत्पन्न हुए जो भाई-बन्धु हों, वे भी यहाँ आवें। मैं उन सबको पिण्ड देनेके लिये इस गयातीर्थमें आया हूँ। वे सब-के-सब इस श्राद्ध-दानसे अक्षय तृप्तिलाभ करें।'

तत्पश्चात् आचमन करके पञ्चाङ्ग-न्यासपूर्वक यत्नतः प्राणायाम करे; फिर देश-काल आदिका उच्चारण करके 'अस्मत् पितॄणां पुनरावृत्तिरहित-ब्रह्मलोकाप्तिहेतवे गयाश्राद्धमहं करिष्ये' (अपने पितरोंको पुनरावृत्तिरहित ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेके लिये मैं गयाश्राद्ध करूँगा) ऐसा संकल्प करके शास्त्रोक्त क्रमसे विधिपूर्वक श्राद्ध करे। पहले श्राद्धके स्थानको पृथक्-पृथक् पञ्चगव्यसे सींचकर पितरोंका आवाहन-पूजन करे। तत्पश्चात् मन्त्रोंद्वारा पिण्डदान करे। पहले सपिण्ड पितरोंको श्राद्धका पिण्ड देकर उनके दक्षिण भागमें कुश बिछाकर उनके लिये एक बार तिल और जलकी अञ्जलि दे। अञ्जलिमें तिल और जल लेकर यत्नपूर्वक पितृतीर्थसे उनके लिये अञ्जलि देनी चाहिये; फिर एक मुट्ठी सत्तूसे अक्षय्य पिण्ड दे। पिण्डद्रव्योंमें तिल, घी, दही और मधु आदि मिलाना चाहिये। सम्बन्धियोंका तिल आदिके द्वारा कुशोंपर आवाहन करना चाहिये। श्राद्धमें माता, पितामही और प्रपितामहीके लिये जो तीन मन्त्र-वाक्य बोले जाते हैं, उनमें यथास्थान स्त्रीलिङ्गका उच्चारण करना चाहिये। सम्बन्धियोंके लिये भी पूर्ववत् पितरोंका आवाहन करते हुए पहलेकी ही भाँति पिण्ड दे। अपने गोत्रमें या पराये गोत्रमें पति-पत्नीके लिये पिण्ड देते समय यदि पृथक्-पृथक् श्राद्ध, पिण्डदान और तर्पण नहीं किया गया तो वह व्यर्थ है। पिण्डपात्रमें तिल देकर उसे शुभ जलसे भर दे और मन्त्रपाठपूर्वक उस जलसे प्रदक्षिणक्रमसे उन सब पिण्डोंको तीन बार सींचे। तत्पश्चात् प्रणाम करके क्षमा-प्रार्थना करे। तदनन्तर पितरोंका विसर्जन करके आचमन करनेके पश्चात् साक्षी देवताओंको सुना दे। मोहिनी! सब स्थानोंमें इसी प्रकार पिण्डदान करना चाहिये।

गयामें पिण्डदानके लिये समय एवं मुहूर्त्तका विचार नहीं करना चाहिये। मलमास हो, जन्मदिन हो, गुरु और शुक्र अस्त हों, अथवा बृहस्पति सिंहराशिपर स्थित हों तो भी गयाश्राद्ध नहीं छोड़ना चाहिये। संन्यासी गयामें जाकर दण्ड दिखावे, पिण्डदान न करे। वह विष्णुपदमें दण्ड रखकर पितरोंसहित मुक्त हो जाता है। गयामें खीर, सत्तू, आटा, चरु अथवा चावल आदिसे भी पिण्डदान किया जाता है। शुभगे! गयाजीका दर्शन करके महापापी और पातकी भी पवित्र एवं श्राद्ध-कर्मका

६७६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


अधिकारी हो जाता है और श्राद्ध करनेपर वह ब्रह्मलोकका भागी होता है। फल्गुतीर्थमें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य जिस फलको पाता है, उसे जो एक लाख अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करता है, वह भी नहीं पाता। मनुष्यको गयामें जाकर अवश्य पिण्डदान करना चाहिये। वहाँके पिण्ड पितरोंको अत्यन्त प्रिय हैं। इस कार्यमें न तो विलम्ब करना चाहिये और न विघ्न डालना चाहिये।

(श्राद्धकर्ताको गयामें इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—) पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, मातामहके पिता प्रमातामह आदि (अर्थात् वृद्धप्रमातामह, मातामही, प्रमातामही और वृद्धप्रमातामही)—इन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्डदान अक्षय होकर प्राप्त हो। मेरे कुलमें जो मरे हैं, जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। मेरे भाई-बन्धुओंके कुलमें जो लोग मरे हैं और जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो फाँसीपर लटककर मरे हैं, जहर खाने या शस्त्रोंके आघातसे जिनकी मृत्यु हुई है और जो आत्मघाती हैं, उनके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। जो यमदूतोंके अधीन होकर सब नरकोंमें यातनाएँ भोगते हैं, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्डदान करता हूँ। जो पशुयोनिमें पड़े हैं, पक्षी, कीट एवं सर्पका शरीर धारण कर चुके हैं अथवा जो वृक्षोंकी योनिमें स्थित हैं, उन सबके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। द्युलोक, अन्तरिक्ष और पृथ्वीपर स्थित जो पितर और भाई-बन्धु आदि हैं तथा संस्कारहीन अवस्थामें जिनकी मृत्यु हुई है, उनके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। जो मेरे भाई-बन्धु हों अथवा न हों या दूसरे जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षय होकर मिले। जो मेरे पिताके कुलमें मरे हैं, जो माताके कुलमें मरे हैं, जो गुरु, श्वशुर तथा बन्धु-बान्धवोंके कुलमें मरे हैं एवं इनके सिवा जो दूसरे भाई-बन्धु मृत्युको प्राप्त हुए हैं, मेरे कुलमें जिनका पिण्डदान-कर्म नहीं हुआ है, जो स्त्री-पुत्रसे रहित हैं, जिनके श्राद्धकर्मका लोप हो गया है, जो जन्मसे अन्धे और पङ्गु रहे हैं, जो विकृतरूपवाले या कच्चे गर्भकी दशामें मरे हैं, मेरे कुलमें मरे हुए जो लोग मेरे परिचित या अपरिचित हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षयभावसे प्राप्त हो। ब्रह्मा और शिव आदि सब देवता साक्षी रहें। मैंने गयामें आकर पितरोंका उद्धार किया है। देव गदाधर! मैं पितृकार्य (श्राद्ध)-के लिये गयामें आया हूँ। भगवन्! आप ही इस बातके साक्षी हैं। मैं तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया*।


* साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मोशानादयस्तथा। मया गयां समासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता ॥
आगतोऽस्मि गयां देव पितृकार्ये गदाधर। त्वमेव साक्षी भगवन्नृणोऽहमृणत्रयात् ॥
(ना० उत्तर० ४५।५८-५९)