संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ उत्तरभाग \ ६४३
* उत्तरभाग * ६४३
है एवं वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध जिनके व्यूहरूप शरीर हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। ब्रह्मा, शङ्कर, स्वामिकार्तिकेय, गणेश, नन्दी और भृङ्गीरूपमें भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो बदरिकाश्रममें नर-नारायणरूपसे गन्धमादन पर्वतपर निवास करते हैं, उन भगवान्को नमस्कार है। जो जगदीश्वरपुरीमें जगन्नाथ नाम धारण करते हैं, सेतुबन्धमें रामेश्वर नामसे विख्यात होते हैं तथा द्वारका और वृन्दावनमें श्रीकृष्णरूपसे रहते हैं, उन परमेश्वरको नमस्कार है। जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। प्रभो! आपके चरण, हाथ और नेत्र सभी कमलके समान हैं। आपको नमस्कार है। आप कमला देवीके प्रतिपालक भगवान् केशवको बारम्बार नमस्कार है। सूर्यरूपमें आपको नमस्कार है। चन्द्रमारूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। इन्द्रादि लोकपाल आपके स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। प्रजापतिस्वरूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण प्राणियोंका समुदाय आपका स्वरूप है, आप जीवस्वरूप, तेजोमय, जय, विजयी, नेता, नियम और क्रियारूप हैं; आपको नमस्कार है। निर्गुण, निरीह, नीतिज्ञ तथा निष्क्रियरूप आपको नमस्कार है। बुद्ध और कल्कि—ये दोनों आपके सुप्रसिद्ध अवतार-विग्रह हैं, आप ही क्षेत्रज्ञ जीव तथा अक्षर परमात्मा हैं, आपको नमस्कार है। आप गोविन्द, विश्वम्भर, अनन्त, आदिपुरुष, शार्ङ्गधनुषधारी, शङ्खधारी, गदाधर, चक्रसुदर्शनधारी, खड्गहस्त, शूलपाणि, समस्त शस्त्रास्त्रघाती, शरणदाता, वरणीय तथा सबसे परे परमात्मा हैं, आपको नमस्कार है। आप इन्द्रियोंके स्वामी और विश्वमय हैं। यह सम्पूर्ण जगत् आपका स्वरूप है, आपको नमस्कार है। काल आपकी नाभि है, आप कालस्वरूप हैं, चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र हैं, आपको नमस्कार है। आप सर्वत्र परिपूर्ण, सबके सेव्य तथा परात्पर पुरुष हैं, आपको नमस्कार है। आप इस जगत्के कर्ता, भर्ता तथा धर्ता हैं। यमराज भी आपके ही रूप हैं। आप ही सबको मोह और क्षोभमें डालनेवाले हैं। अजन्मा होते हुए भी इच्छानुसार अनेक रूप धारण करते हैं। आप सर्वश्रेष्ठ विद्वान् हैं; आपको नमस्कार है। भगवन्! हम सब देवता दैत्योंसे सताये हुए हैं और इस समय आपकी शरणमें आये हैं। जगदाधार! आप ऐसी कृपा कीजिये, जिससे हम स्त्री, पुत्र और मित्र आदिके साथ सुखी होकर रह सकें।
दैत्योंसे सताये हुए देवताओंका यह स्तवन सुनकर भगवान् विष्णु मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। स्नेहपूर्ण हृदयवाले देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुका दर्शन करके उन देवताओंने विरोचनका शीघ्र वध करनेके लिये उनसे सादर प्रार्थना की। कार्यसिद्धिका
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उपाय जाननेवालोंमें श्रेष्ठ श्रीहरिने इन्द्रादि देवताओंकी आवश्यकता सुनकर उन्हें आश्वासन दिया और उन्हें प्रसन्न करके प्रेमपूर्वक विदा किया। देववर्गके चले जानेपर भगवान् विष्णु देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारणकर विरोचनके घर गये और ब्राह्मण-पूजनके समय वहाँ पहुँचे। जो पहले कभी नहीं आये थे, ऐसे ब्राह्मणको आया देख विशालाक्षी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। उसने भक्तिभावसे उनका सत्कार करके उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया। शुभे! ब्राह्मणने उसके दिये हुए आसनको स्वीकार न करके कहा—'देवि! मैं तुम्हारे दिये हुए इस उत्तम आसनको ग्रहण नहीं करूँगा। मानिनि! जो मेरे मनोगत कार्यको समझकर उसे पूर्ण करनेकी स्वीकृति दे, उसीकी पूजा मैं ग्रहण करूँगा।' बूढ़े ब्राह्मणकी यह बात सुनकर बातचीत करनेमें निपुण विशालाक्षी बड़ी प्रसन्न हुई। भगवान् विष्णुकी मायाने उसे मोहित कर लिया था। अपने स्त्री-स्वभावके कारण भी वह इस विषयमें अधिक विचार न कर सकी और बोली।
विशालाक्षीने कहा—ब्रह्मन्! आपका जो मनोगत कार्य है, उसे मैं पूर्ण करूँगी। मेरा दिया हुआ आसन ग्रहण कीजिये और अपना चरणोदक दीजिये।
उसके ऐसा कहनेपर ब्राह्मण बोले—'मैं स्त्रीकी बातपर विश्वास नहीं करता। यदि तुम्हारे पति यह बात कहें तो मुझे विश्वास हो सकता है।' ब्राह्मणका यह वचन सुनकर विरोचनकी गृहस्वामिनीने वहीं उनके समीप पतिको बुलवाया। दूतके मुखसे सब बात सुनकर प्रह्लादपुत्र विरोचन हर्षभरे हृदयसे अन्तःपुरमें आये, जहाँ महारानी विशालाक्षी विराजमान थीं। पतिको आया देख धर्मपरायणा विशालाक्षी उठकर खड़ी हो गयी। उसने उस श्रेष्ठ ब्राह्मणको नमस्कार करके पुनः आसन समर्पित किया। जब उन्होंने आदरपूर्वक दिये हुए उस आसनको ग्रहण नहीं किया, तब उसने अपने पति दैत्यराज विरोचनसे सब हाल कह सुनाया। सब बातें जानकर दैत्यराजने पत्नीके प्रेमसे मुग्ध होकर उस समय ब्राह्मणकी शर्त स्वीकार कर ली। विरोचनके स्वीकार कर लेनेपर ब्राह्मणने प्रसन्नतापूर्वक कहा—'मुझे अपनी आयु समर्पित कर दो।' तब वे दोनों पति-पत्नी स्वनिर्मित शोकसे मोहित हो दो घड़ीतक कुछ चिन्तन करते रहे। फिर उन दम्पत्तिने हाथ जोड़कर ब्राह्मणसे कहा—'विप्रवर! हमारा जीवन ले लीजिये और अपना चरणोदक दीजिये। आपकी कही हुई बात हम सत्य करेंगे। आप प्रसन्न होइये।'
तब ब्राह्मणने प्रसन्नचित्त होकर आसन ग्रहण किया। विशालाक्षीने प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणके दोनों चरण पखारे और उनका चरणोदक पतिसहित अपने मस्तकपर धारण किया। फिर तो वे दोनों दम्पती सहसा (दैत्य-शरीर छोड़) दिव्यरूप धारण करके श्रेष्ठ विमानपर बैठे और भगवान्के वैकुण्ठधाममें चले गये। इस प्रकार देवताओंका कण्टक दूर करके भगवान् अत्यन्त प्रसन्न हुए और सम्पूर्ण देवताओंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए वैकुण्ठलोकको चले गये। देवि! इसी प्रकार मैंने भी जो तुम्हें देनेकी प्रतिज्ञा की है, वह अवश्य दूँगी। देवि! मैं अपने पति महाराज रुक्माङ्गदको सत्यसे विचलित न होने दूँगी; क्योंकि सत्य ही मनुष्योंको उत्तम गति देनेवाला बताया गया है। सत्यसे भ्रष्ट हुए मनुष्यको चाण्डालसे भी नीच माना गया है।
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रानी संध्यावलीका राजाको पुत्रवधके लिये उद्यत करना, राजाका मोहिनीसे अनुनय-विनय, मोहिनीका दुराग्रह तथा धर्माङ्गदका राजाको अपने वधके लिये प्रेरित करना
वसिष्ठजी कहते हैं—भूपते! तदनन्तर देवी संध्यावलीने पतिके दोनों चरण पकड़कर धर्माङ्गदके विनाशसे सम्बन्ध रखनेवाली बात कही—'महाराज! आपकी ही भाँति मैंने भी इसे बहुत समझाया है; किंतु इस मोहरूपा मोहिनीको इस समय दूसरी कोई बात अच्छी ही नहीं लगती। इसका एक ही आग्रह है, एकादशीके दिन राजा भोजन करें अथवा अपने पुत्रका वध कर डालें। नाथ! धर्म छोड़नेकी अपेक्षा तो पुत्रका वध ही श्रेष्ठ है। राजन्! गर्भ धारण करनेमें माताको ही अधिक क्लेश सहना पड़ता है और बालकपर उसीका स्नेह भी अधिक होता है। खेद और स्नेह जैसा माताका होता है, वैसा पिताका नहीं हो सकता। राजेन्द्र! इस भूतलपर पिताको बीज-वपन करनेवाला कहा गया है, माता उसको धारण करनेवाली है; अतः उसके पालन-पोषणमें अधिक क्लेश उसीको उठाना पड़ता है। पुत्रपर पितासे सौगुना स्नेह माताका होता है। उसके स्नेहकी अधिकतापर ही दृष्टि रखकर गौरवमें माताको पितासे बड़ी माना गया है, किंतु नृपश्रेष्ठ! आज मैं माता होकर भी सत्यके पालनसे परलोकको जीतनेकी इच्छा रखकर पुत्र-स्नेहको तिलाञ्जलि दे चुकी हूँ। भूपाल! स्नेहको दूर करके पुत्रका वध कीजिये। राजन्! वे आपत्तियाँ भी धन्य हैं, जो सत्यका पालन करानेवाली हैं। सत्यका संरक्षण करानेवाली होनेसे वे मनुष्योंके लिये मोक्षदायिनी हैं। अतः पृथ्वीपते! संत्रस्त होनेसे कोई लाभ नहीं, आप सत्यकी रक्षा कीजिये। राजन्! सत्यके पालनसे भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त होता है। देवताओंने आपकी परीक्षाके लिये इस मोहिनीको कसौटीके रूपमें उत्पन्न किया है। अतः भूपाल! आप दृढ़ होकर प्रिय पुत्रका वध कीजिये। अपने सत्य-पालनके उद्देश्यसे मोहिनीके वचनकी पूर्ति कीजिये।'
वसिष्ठजी कहते हैं—राजन्! पत्नीकी यह बात सुनकर महाराज रुक्माङ्गदने मोहिनीके समीप रानी संध्यावलीसे इस प्रकार कहा—'प्रिये! पुत्रकी हत्या बहुत बड़ी हत्या है। वह ब्रह्महत्यासे भी बढ़कर है। कहाँ-से-कहाँ मैं मन्दराचलपर गया और न जाने कहाँसे यह मोहिनी मुझे वहाँ मिली। देवि! यह स्त्री नहीं, धर्माङ्गदका नाश करनेके लिये साक्षात् कालप्रिया काली है। धर्माङ्गद धर्मज्ञ, विनयशील तथा प्रजाको प्रसन्न रखनेवाला है, अभीतक उसे कोई संतान भी नहीं हुई है। ऐसे पुत्रको मारकर मेरी क्या गति होगी? देवि! कुपुत्रको भी मारनेसे पिताके मनमें दुःख होता है, फिर जो धर्मशील तथा गुरुजनोंका सेवक है, उसके मरनेसे कितना दुःख होगा। वरवर्णिनि! इस समय तुम्हारे पुत्रके प्रतापसे ही मैंने सातों द्वीपोंके राज्यका उपभोग किया है। अपना यह पुत्र धर्माङ्गद इस पृथ्वीपर सबसे श्रेष्ठ है। मनोहराङ्गी! वह मेरे समूचे कुलका सम्मान बढ़ानेवाला है। सुन्दरि! मोहिनी मोहमें डूबकर केवल मुझे दुःख दे रही है, तुम पुनः शुभ वचनोंद्वारा उसे समझाओ।'
अपनी प्रिय पत्नी संध्यावलीसे ऐसा कहकर राजा उस समय मोहिनीसे इस प्रकार बोले—'शुभे! मैं एकादशीको भोजन नहीं करूँगा और पुत्रकी हत्या भी नहीं कर सकूँगा। अपनेको और संध्यावली देवीको आरेसे चीर सकता हूँ अथवा तुम्हारे कहनेसे कोई और भी भयंकर कर्म कर सकता हूँ। सुभ्रू! पुत्रके सम्बन्धमें यह दुष्टतापूर्ण आग्रह छोड़ दो। बताओ, पुत्र धर्माङ्गदको मार
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देनेसे तुम्हें क्या फल मिलेगा ? मुझे एकादशीको भोजन करा देनेसे तुम्हारा क्या लाभ होगा ? वरानने ! मैं तुम्हारा दास हूँ, सेवक हूँ और सर्वथा तुम्हारे अधीन हूँ। सौभाग्यशालिनि ! मैं तुम्हारी शरणमें आया हूँ। सुन्दरि ! कोई दूसरा वर माँग लो। देवि ! मुझपर कृपा करो। पुत्रकी भिक्षा दे दो। गुणवान् पुत्र दुर्लभ है और एकादशीका व्रत भी दुर्लभ है। इस पृथ्वीपर गङ्गाजीका जल दुर्लभ है, भगवान् विष्णुका पूजन दुर्लभ है तथा स्मृतियोंका संग्रह भी दुर्लभ है एवं भगवान् विष्णुका स्मरण एवं चिन्तन भी अत्यन्त दुर्लभ है। साधु पुरुषोंका सङ्ग दुर्लभ है तथा भगवान्की भक्ति भी दुर्लभ ही बतायी गयी है। वरवर्णिनि ! मृत्युकालमें भगवान् विष्णुका स्मरण भी दुर्लभ ही है, ऐसा समझकर मेरा धर्मरक्षाविषयक वचन स्वीकार करो। मैंने सब विषय भोग लिये, निष्कण्टक राज्य भी कर लिया; किंतु मेरे पुत्रने तो अभी संसारके विषयोंका सुख देखा ही नहीं, अतः उसकी हत्या कदापि नहीं करूँगा। मोहिनी ! अपने ही हाथसे अपने पुत्रका वध ! ओह ! इससे बढ़कर पाप और क्या होगा ?'
मोहिनीने कहा—राजन् ! मैंने तो पहले ही कह दिया है, एकादशीको भोजन करो और इच्छानुसार बहुत वर्षोंतक पृथ्वीका शासन करते रहो। मैं पुत्रका वध नहीं कराऊँगी। एकादशीको तुम्हारे भोजन कर लेनेमात्रसे ही मेरा प्रयोजन सिद्ध हो जायगा। पृथ्वीपते ! तुम्हारे पुत्रकी मृत्युसे मेरा कोई मतलब नहीं है। राजन् ! यदि पुत्र प्रिय है तो एकादशीके दिन भोजन करो। महीपाल ! इस धर्मविरोधी विलापसे क्या लाभ ? मेरी बात मानो और यत्नपूर्वक सत्यकी रक्षा करो।
राजन् ! मोहिनी जब ऐसी बात कह रही थी, उसी समय धर्माङ्गद वहाँ आ गये और मोहिनीकी ओर देखकर उसे प्रणाम करके सामने खड़े हो विनीतभावसे बोले—'भामिनि ! तुम यही लो (मेरे वधरूपी वरको ही ग्रहण करो); इसके विषयमें तनिक भी शङ्का न करो।' ऐसा कहकर उन्होंने राजाके आगे एक चमकती हुई तलवार रख दी और अपने-आपको भी समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् सत्य-धर्ममें स्थित हो पितासे कहा—'पिताजी ! अब आपको मुझे मारनेमें विलम्ब नहीं करना चाहिये। महाराज ! आपने मेरी माता मोहिनीके समक्ष जो प्रतिज्ञा की है, उसे सत्य कर दिखाइये। आपके हितके लिये मेरा मरना मुझे अक्षय गति देनेवाला है और अपने वचनके पालनसे आपको भी तेजस्वी लोक प्राप्त होंगे। अतः पुत्रके मारे जानेका जो महान् दुःख है, उसको त्यागकर अपने धर्मका पालन कीजिये। इस मर्त्यशरीरका त्याग करनेपर मेरे भावी जीवनका आरम्भ अमर देहमें होगा। वह मेरा दिव्य शरीर सब प्रकारके रोगोंसे रहित होगा। प्रभो ! जो पुत्र पिता अथवा माताके हितके लिये मारे जाते हैं तथा राजन् ! जो गाय, ब्राह्मण, स्त्री, भूमि, राजा, देवता, बालक तथा आर्तजनोंके लिये प्राण त्याग करते हैं, वे अत्यन्त प्रकाशमय लोकोंमें जाते हैं। अतः शोक-संतापसे कोई लाभ नहीं, आप श्रेष्ठ तलवारसे मेरा वध कीजिये। राजेन्द्र ! सत्यका पालन कीजिये और एकादशीको भोजन न कीजिये। मैंने अपने शरीरके वधके लिये जो बात कही है, उसे सत्य कीजिये। महाराज ! आपने मोहिनीको दाहिना हाथ देकर जो वचन दिया है, उसका पालन न करनेसे असत्यका दोष लगेगा। उस भयंकर असत्य-भाषणके पापसे अपनेको बचाइये।