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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

About this granth

The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.

This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.

The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.

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  • अध्याय २४५ * | ९३५
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| शौनक उवाच | **शौनकजीने कहा—**राजन्! इस प्रकार अपने |
| इति दैत्यपतिर्धीरः पृष्टः पौत्रेण पार्थिव।<br>चिरं ध्यात्वा जगादैनमसुरेन्द्रं बलिं तदा॥ ४ | पौत्र बलिद्वारा पूछे जानेपर धैर्यशाली दैत्यपति प्रह्लादने बहुत देरतक ध्यानकर उस असुरनायक बलिसे कहा॥ ४॥ |
| प्रह्लाद उवाच | **प्रह्लाद बोले—**दानवराज बलि! इस समय पर्वत |
| चलन्ति गिरयो भूमिर्जहाति सहजां धृतिम्।<br>सर्वे समुद्राः क्षुभिता दैत्या निस्तेजसः कृताः॥ ५ | काँप उठे हैं, पृथ्वीने अपनी स्वाभाविक धीरता छोड़ दी है, सभी समुद्र विक्षुब्ध हो उठे हैं और दैत्यगण तेजोहीन कर दिये गये हैं। ग्रहगण सूर्योदय होनेपर जिस |
| सूर्योदये यथा पूर्वं तथा गच्छन्ति न ग्रहाः।<br>देवानां च परा लक्ष्मीः कारणैरनुमीयते॥ ६ | प्रकार पहले सूर्यका अनुगमन करते थे वैसा अब नहीं कर रहे हैं। कुछ कारणोंसे ऐसा अनुमान होता है कि देवताओंकी विशेष अभ्युन्नति होनेवाली है। महाबाहो! |
| महदेतन्महाबाहो कारणं दानवेश्वर।<br>न ह्यल्पमिति मन्तव्यं त्वया कार्यं सुरार्दन॥ ७ | इसका कोई महान् कारण है। सुरार्दन! तुम्हें इस कार्यको तुच्छ नहीं मानना चाहिये॥ ५—७॥ |
| शौनक उवाच | **शौनकजीने कहा—**परम भक्त असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद |
| इत्युक्त्वा दानवपतिं प्रह्लादः सोऽसुरोत्तमः।<br>अत्यन्तभक्तो देवेशं जगाम मनसा हरिम्॥ ८ | दानवराज बलिसे ऐसा कहकर मन-ही-मन देवेश्वर श्रीहरिकी शरणमें गये। तत्पश्चात् प्रह्लाद परम मनोहर ध्यानयोगका |
| स ध्यानयोगं कृत्वाथ प्रह्लादः सुमनोहरम्।<br>विचारयामास ततो यतो देवो जनार्दनः॥ ९ | आश्रय लेकर देवाधिदेव जनार्दनका ध्यान करने लगे। तब उन्होंने अदितिके उदरमें वामनरूपमें उन |
| स ददर्शोदरेऽदित्याः प्रह्लादो वामनाकृतिम्।<br>अन्तःस्थान् बिभ्रतं सप्त लोकानादिप्रजापतिम्॥ १० | आदिप्रजापतिको देखा जिनके भीतर सातों लोक विराजमान थे। उस समय प्रह्लादने भगवान्‌के भीतर वसु, रुद्र, |
| तदन्तःस्थान् वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा।<br>साध्यान् विश्वांस्तथादित्यान् गन्धर्वोरगराक्षसान्॥ ११ | अश्विनीकुमार, मरुद्गण, साध्यगण, विश्वेदेव, आदित्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, अपना पुत्र विरोचन, असुरराज बलि, |
| विरोचनं स्वतनयं बलिं चासुरनायकम्।<br>जम्भं कुजम्भं नरकं बाणमन्यांस्तथासुरान्॥ १२ | जम्भ, कुजम्भ, नरक, बाण तथा अन्य असुरगण, स्वयं अपने-आप, पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि, समुद्र, |
| आत्मानमुर्वीं गगनं वायुमम्भो हुताशनम्।<br>समुद्रान् वै द्रुमसरित्सरांसि च पशून् मृगान्॥ १३ | वृक्ष, नदियाँ, सरोवर, पशु, मृग, पक्षी, मनुष्य, सर्पादि जीव, सभी लोकोंके सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, शिव, ग्रह, |
| वयोमनुष्यानखिलंस्तथैव च सरीसृपान्।<br>समस्तलोकस्रष्टारं ब्रह्माणं भवमेव च।<br>ग्रहनक्षत्रनागांश्च दक्षाद्यांश्च प्रजापतीन्॥ १४ | नक्षत्र, नाग तथा दक्ष आदि प्रजापतियोंको भी देखा। यह देखकर प्रह्लाद आश्चर्यचकित हो गये। पुनः क्षणभर बाद स्वस्थ होनेपर उन्होंने विरोचन-पुत्र असुरराज बलिसे इस प्रकार कहा॥ ८—१५॥ |
| स पश्यन् विस्मयाविष्टः प्रकृतिस्थः क्षणात् पुनः।<br>प्रह्लादः प्राह दैत्येन्द्रं बलिं वैरोचनिं तदा॥ १५ | |
| प्रह्लाद उवाच | **प्रह्लाद बोले—**वत्स! जिस कारण तुम राक्षसोंके |
| वत्स ज्ञातं मया सर्वं यदर्थं भवतामियम्।<br>तेजसो हानिरुत्पन्ना तच्छृणु त्वमशेषतः॥ १६ | तेजकी यह हानि उत्पन्न हुई है उस सारे रहस्यको मैं जान गया। उसे तुम पूर्णरूपसे सुनो। जो |
| देवदेवो जगद्योनिरयोनिजंगदादिकृत्।<br>अनादिरादिर्विश्वस्य वरेण्यो वरदो हरिः॥ १७ | देवाधिदेव, जगत्के उत्पत्तिस्थान, अजन्मा, जगत्के आदिकर्ता, अनादि, विश्वके आदि, सर्वश्रेष्ठ, वरदायक, |

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९३६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
परावराणां परमः परः परवतामपि।<br>प्रमाणं च प्रमाणानां सप्तलोकगुरोर्गुरुः॥ १८<br>प्रभुः प्रभूणां परमः पराणा-<br>मनादिमध्यो भगवाननन्तः ।<br>त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेष<br>कर्तुं महात्मादितिजोऽवतीर्णः॥ १९<br>न यस्य रुद्रो न च पद्मयोनि-<br>र्नैन्द्रो न सूर्येन्दुमरीचिमुख्याः।<br>जानन्ति दैत्याधिप यत्स्वरूपं<br>स वासुदेवः कलयावतीर्णः॥ २०<br>योऽसौ कलांशेन नृसिंहरूपी<br>जघान पूर्वं पितरं ममेशः।<br>यः सर्वयोगीशमनोनिवासः<br>स वासुदेवः कलयावतीर्णः॥ २१<br>यमक्षरं वेदविदो विदित्वा<br>विशन्ति यज्ज्ञानविधूतपापाः।<br>यस्मिन् प्रविष्टा न पुनर्भवन्ति<br>तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम्॥ २२पापनाशक, परावरोंमें उत्तम, परात्पर, प्रमाणोंके प्रमाण, सातों लोकोंके गुरुके गुरु, प्रभुके प्रभु, पर-से-परे, आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न हैं, वे भगवान् अपने अंशसे त्रिलोकीको सनाथ करनेके लिये अदितिके गर्भसे अवतीर्ण हो रहे हैं। दैत्यपते! जिनके स्वरूपको रुद्र, पद्मयोनि ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, मरीचि प्रभृति महर्षिगण नहीं जानते, वे भगवान् वासुदेव अपनी कलासे उत्पन्न हो रहे हैं। जिन भगवान्ने पूर्वकालमें अपनी एक कलाद्वारा नृसिंहरूपमें अवतीर्ण होकर मेरे पिता (हिरण्यकशिपु)-का वध किया था तथा जो सभी योगिराजोंके मनमें निवास करनेवाले हैं, वे भगवान् वासुदेव अपनी कलासे अवतीर्ण हो रहे हैं। जिनके ज्ञानसे पापमुक्त हुए वेदवेत्ता जिन अव्यय भगवान्को जानकर उनमें प्रवेश करते हैं तथा जिनमें प्रवेश कर पुनः जन्म नहीं धारण करते, उन भगवान् वासुदेवको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ॥ १६—२२॥
भूतान्यशेषाणि यतो भवन्ति<br>यथोर्मयस्तोयनिधेरजस्रम्।<br>लयं च यस्मिन् प्रलये प्रयान्ति<br>तं वासुदेवं प्रणमाम्यचिन्त्यम्॥ २३समस्त प्राणी समुद्रसे लहरोंकी भाँति जिनसे निरन्तर उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुनः जिनमें लय हो जाते हैं, उन अचिन्त्य वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ।
न यस्य रूपं न बलप्रभावौ<br>न यस्य भावः परमस्य पुंसः।<br>विज्ञायते शर्वपितामहाद्यै-<br>स्तं वासुदेवं प्रणमाम्यजस्रम्॥ २४जिन परम पुरुषके स्वरूप, बल, प्रभाव और भावको शिव तथा ब्रह्मा आदि देवगण भी नहीं समझ पाते, उन भगवान् वासुदेवको मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ।
रूपस्य चक्षुर्ग्रहणे त्वगिष्टा<br>स्पर्शे ग्रहीत्री रसना रसस्य।<br>श्रोत्रं च शब्दग्रहणे नराणां<br>घ्राणं च गन्धग्रहणे नियुक्तम्॥ २५<br>येनैकदंष्ट्राग्रसमुद्धृतेयं<br>धराचलान् धारयतीह सर्वान्।<br>यस्मिंश्च शेते सकलं जगच्च<br>तमीशमाद्यं प्रणतोऽस्मि विष्णुम्॥ २६जिन भगवान् वासुदेवने मनुष्योंको स्वरूप देखनेके लिये नेत्र, स्पर्शके लिये चमड़ा, रसास्वादनके लिये जिह्वा, शब्द सुननेके लिये कान तथा सुगन्ध ग्रहण करनेके लिये नासिका दी है, जिन्होंने अपने एक दाँतके अग्रभागपर इस पृथ्वीको, जो सभी पर्वतोंको धारण करती है, धारण किया है, तथा जिनमें यह समस्त जगत् शयन करता है, उन आदिभूत भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ।
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* अध्याय २४५ *९३७

| न घ्राणचक्षुःश्रवणादिभिर्यः<br>सर्वेश्वरो वेदितुमक्षयात्मा।<br>शक्यस्तमीड्यं मनसैव देवं<br>ग्राह्यं नतोऽहं हरिमीशितारम्॥ २७<br>अंशावतीर्णेन च येन गर्भे<br>हतानि तेजांसि महासुराणाम्।<br>नमामि तं देवमनन्तमीश-<br>मशेषसंसारतरोः कुठारम्॥ २८<br>देवो जगद्योनिरयं महात्मा<br>स षोडशांशेन महासुरेन्द्र।<br>स देवमातुर्जठरं प्रविष्टो<br>हतानि वस्तेन बलाद् वपूंषि॥ २९ | जो अक्षयात्मा सर्वेश्वर नासिका, नेत्र और कान आदि इन्द्रियोंद्वारा जाने नहीं जा सकते, जिन्हें केवल मनद्वारा ग्रहण किया जा सकता है उन पूज्य परमेश्वर भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने गर्भमें अपने अंशमात्रसे अवतीर्ण होकर बड़े-बड़े दैत्योंके तेजोंका हरण कर लिया है, जो समस्त संसाररूपी वृक्षके लिये कुठारस्वरूप हैं उन अनन्त परमात्मदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। महासुरेन्द्र! जो ये महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं जगत्के उत्पत्तिस्थान भगवान् विष्णु हैं, ये अपने सोलह अंशोंसे माता अदितिके उदरमें प्रविष्ट हुए हैं, उन्होंने ही बलपूर्वक तुमलोगोंके शरीरको निस्तेज कर दिया है॥ २३—२९॥ |
| बलिरुवाच<br>तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्।<br>सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः॥ ३०<br>विप्रचित्तिः शिविः शङ्कुरायःशङ्कुस्तथैव च।<br>अयःशिराश्चाश्वशिरा भङ्गकारी महाहनुः॥ ३१<br>प्रतापः प्रघसः शुम्भः कुकुरश्च सुदुर्जयः।<br>एते चान्ये च मे सन्ति दैतेया दानवास्तथा॥ ३२<br>महाबला महावीर्या भूभारोद्धरणक्षमाः।<br>एषामेकैकशः कृष्णो न वीर्यार्धेन सम्मितः॥ ३३ | **बलिने कहा—**तात! यह हरि कौन है जिससे हम लोगोंको भय प्राप्त हो गया है? मेरे पास तो उस वासुदेवसे भी अधिक बलवान् सैकड़ों दैत्य हैं। विप्रचित्ति, शिवि, शङ्कु, अयःशङ्कु, अयःशिरा, अश्वशिरा, भङ्गकारी, महाहनु, प्रताप, प्रघस, शुम्भ, अत्यन्त कठिनाईसे जीतने योग्य कुकुर—ये तथा इनके अतिरिक्त और भी दैत्य एवं दानव मेरे अधिकारमें हैं। ये सभी महाबली, महान् पराक्रमी तथा पृथ्वीके भारको उठानेमें समर्थ हैं। इनमेंसे एक-एकके आधे पराक्रमसे भी कृष्णकी कोई समानता नहीं है॥ ३०—३३॥ |
| शौनक उवाच<br>पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादो दैत्यपुंगवः।<br>धिग्धिगित्याह स बलिं वैकुण्ठाक्षेपवादिनम्॥ ३४ | **शौनकजी बोले—**दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद अपने पौत्रकी यह बात सुनकर भगवान्‌की निन्दा करनेवाले उस बलिको धिक्कारते हुए बोले॥ ३४॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>विनाशमुपयास्यन्ति मन्ये दैतेयदानवाः।<br>येषां त्वमीदृशो राजा दुर्बुद्धिरविवेकवान्॥ ३५<br>देवदेवं महाभागं वासुदेवमजं विभुम्।<br>त्वामृते पापसंकल्पः कोऽन्य एवं वदिष्यति॥ ३६<br>य एते भवता प्रोक्ताः समस्ता दैत्यदानवाः।<br>सब्रह्मकास्तथा देवाः स्थावरानन्तभूमयः॥ ३७<br>त्वं चाहं च जगच्चेदं साद्रिद्रुमनदीनदम्।<br>समुद्रद्वीपलोकाश्च न समं केशवस्य हि॥ ३८ | **प्रह्लादने कहा—**मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जिनका तुम-जैसा अविवेकी एवं दुर्बुद्धि राजा है, उन दैत्यों और दानवोंका विनाश हो जायगा। तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन ऐसा पापी होगा जो देवाधिदेव, महाभाग, अजन्मा एवं सर्वव्यापी वासुदेवको ऐसा कहेगा? तुमने जिनका नाम गिनाया है ये सभी दैत्य-दानव, ब्रह्मसहित देवगण, चराचर जगत्, तुम, मैं, पर्वत, वृक्ष, नदी और नदोंसहित यह संसार, समुद्र, द्वीप और लोक—ये सभी भगवान् केशवकी समानता नहीं कर सकते। |

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९३८* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यस्यातिवन्द्यवन्द्यस्य व्यापिनः परमात्मनः।<br>एकांशेन जगत् सर्वं कस्तमेवं प्रवक्ष्यति॥ ३९<br><br>ऋते विनाशाभिमुखं त्वामेकमविवेकिनम्।<br>कुबुद्धिमजितात्मानं वृद्धानां शासनातिगम्॥ ४०<br><br>शोच्योऽहं यस्य मे गेहे जातस्तव पिताधमः।<br>यस्य त्वमीदृशः पुत्रो देवदेवस्य निन्दकः॥ ४१<br><br>तिष्ठत्वेषा हि संसारसम्भृताघविनाशिनी।<br>कृष्णे भक्तिरहं तावदवेक्ष्यो भवता न किम्॥ ४२जिन सर्वव्यापी एवं वन्दनीयोंके भी वन्दनीय परमात्माके एक अंशसे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, उन्हें अकेले तुम-जैसे अविवेकी, विनाशोन्मुख, कुबुद्धि, अजितात्मा, वृद्धोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवालेके सिवा दूसरा कौन ऐसा कहेगा ? अब तो शोचनीय मैं हुआ, जिसके घरमें तुम्हारा नीच पिता उत्पन्न हुआ, जिसके तुम इस प्रकार देवाधिदेव विष्णुकी निन्दा करनेवाले पुत्र हुए। संसारमें जन्म लेकर उपार्जित किये गये पापोंको नष्ट करनेवाली भगवान् कृष्णके चरणोंमें हमारी भक्ति अक्षुण्ण बनी रहे, भले ही मैं तुम्हारे द्वारा अपमानित क्यों न होऊँ ? ॥ ३५-४२ ॥
न मे प्रियतमः कृष्णादपि देहो महात्मनः।<br>इति जानात्ययं लोको न भवान् दितिजाधम॥ ४३<br><br>जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम।<br>निन्दां करोषि तस्य त्वमकुर्वन् गौरवं मम॥ ४४<br><br>विरोचनस्तव गुरुर्गुरुस्तस्याप्यहं बले।<br>ममापि सर्वजगतां गुरोर्नारायणो गुरुः॥ ४५<br><br>निन्दां करोषि यस्तस्मिन् कृष्णे गुरुगुरोर्गुरौ।<br>यस्मात्तस्मादिहैश्वर्यादचिराद् भ्रंशमेष्यसि॥ ४६<br><br>मम देवो जगन्नाथो बले तावज्जनार्दनः।<br>भवत्वहमुपेक्ष्यस्ते प्रीतिमानस्तु मे गुरुः॥ ४७<br><br>एतावन्मात्रमप्येवं निन्दितस्त्रिजगद्गुरुः।<br>नावेक्षितं त्वया यस्मात् तस्माच्छापं ददामि ते॥ ४८<br><br>यथा मे शिरसश्छेदादिदं गुरुतरं वचः।<br>त्वयोक्तमच्युताक्षेपि राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ४९<br><br>यथा च कृष्णान्न परं परित्राणं भवार्णवे।<br>तथाचिरेण पश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम्॥ ५०दैत्याधम! भगवान् (विष्णु)-से बढ़कर मुझे अपना शरीर भी प्रिय नहीं है, इसे यह संसार जानता है, किंतु तुम्हें विदित नहीं है। मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय भगवान् विष्णुको जानते हुए भी तुम मेरे गौरवकी रक्षा न करते हुए उनकी निन्दा कर रहे हो। बलि! तुम्हारा गुरु विरोचन है और मैं उसका भी गुरु हूँ तथा मेरे एवं समस्त संसारके गुरुके भी गुरु नारायण हैं। चूँकि तुम उन गुरुओंके गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो, इसलिये इस लोकमें शीघ्र ही ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाओगे। बलि! जगदीश्वर जनार्दन मेरे देवता हैं। वे मेरे गुरु मुझपर प्रसन्न रहें, भले ही मैं तुम्हारे द्वारा उपेक्षित हो जाऊँ। (मुझे इसकी परवा नहीं है।) चूँकि तुमने बिना विचारे त्रिलोकीके गुरु भगवान्‌की जो इस प्रकार इतनी निन्दा की है, इसीलिये मैं तुम्हें शाप दे रहा हूँ। जिस प्रकार तुमने मेरा सिर काट लेनेसे भी बढ़कर यह भगवान् अच्युतकी निन्दा करनेवाला वचन कहा है, उसी प्रकार तुम राज्यसे भ्रष्ट होकर (अवनतिके गर्तमें) गिर जाओ। जिस प्रकार इस संसारसागरमें विष्णुसे बढ़कर अन्य कोई शरणदाता नहीं है, (मेरी यह बात सत्य है तो) मैं शीघ्र ही तुम्हें राज्यसे च्युत हुआ देखूँ ॥ ४३-५० ॥
शौनक उवाचशौनकजी बोले—
इति दैत्यपतिः श्रुत्वा गुरोर्वचनमप्रियम्।<br>प्रसादयामास गुरुं प्रणिपत्य पुनः पुनः॥ ५१दैत्यराज बलिने अपने पितामह प्रह्लादकी ऐसी अप्रिय बात सुनकर उन्हें बारम्बार प्रणाम कर सभी प्रकारसे प्रसन्न करते हुए इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ ५१ ॥
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* अध्याय २४५ *९३९

| बलिरुवाच | बलिने कहा— तात! प्रसन्न हो जाइये। अज्ञानसे मारे हुए मुझपर क्रोध मत कीजिये। मैंने बलके गर्वसे उन्मत्त होकर ऐसी बात कह दी है। दैत्यश्रेष्ठ! मेरा सारा ज्ञान मोहसे नष्ट हो गया है, मैं पापी और दुराचारी हूँ। अतः आपने जो मुझे यह शाप दिया है, वह अच्छा ही किया है। तात! मैं राज्यसे च्युत और सम्पत्तिसे रहित हो जाऊँगा—इससे मैं उतना दुःखी नहीं हूँ जितना आपके साथ अविनयपूर्ण व्यवहार करनेसे मुझे कष्ट हो रहा है। त्रिलोकीका राज्य, ऐश्वर्य अथवा अन्य कोई भी वस्तु अत्यन्त दुर्लभ नहीं है, परंतु आपके समान जो गुरुजन हैं, वे विश्वमें अवश्य दुर्लभ हैं। इसलिये दैत्योंके पालक! आप प्रसन्न हो जाइये, मुझपर क्रोध न कीजिये। तात! मैं आपकी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे दुःखी हो रहा हूँ, शापसे नहीं॥ ५२-५६॥ |
| प्रसीद तात मा कोपं कुरु मोहहते मयि।<br>बलावलेपमत्तेन मयैतद् वाक्यमीरितम्॥ ५२<br>मोहोपहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम।<br>यच्छप्तोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता कृतम्॥ ५३<br>राज्यभ्रंशं वसुभ्रंशं सम्प्राप्स्यामीति न त्वहम्।<br>विषण्णोऽस्मि यथा तात तवैवाविनये कृते॥ ५४<br>त्रैलोक्यराज्यमैश्वर्यमन्यद्वा नाति दुर्लभम्।<br>संसारे दुर्लभास्ते तु गुरवो ये भवद्विधाः॥ ५५<br>तत् प्रसीद न मे कोपं कर्तुमर्हसि दैत्यप।<br>त्वत्कोपदृष्ट्या ताताहं परितप्ये न शापतः॥ ५६ | |
| प्रह्लाद उवाच | प्रह्लाद बोले— वत्स! कोपके कारण मुझे मोह उत्पन्न हो गया, जिससे अभिभूत होकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया; क्योंकि मोहने मेरे विवेकको नष्ट कर दिया था। महासुर! यदि मोहके द्वारा मेरा ज्ञान नष्ट न हुआ होता तो भगवान् विष्णुको सर्वव्यापी जानता हुआ मैं शाप क्यों देता? असुरश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें जो यह शाप दिया है, यह तुम्हारे लिये अवश्य घटित होगा, अतः तुम विषाद मत करो। आजसे जो देवेश्वर, कभी च्युत न होनेवाले और शास्ता हैं, उन भगवान् श्रीहरिके प्रति तुम भक्तिमान् हो जाओ। वे ही तुम्हारे रक्षक होंगे। वीर! इस शापके घटित होनेपर तुम मेरा स्मरण करना। तुम जैसे स्मरण करोगे वैसे ही मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि जिससे तुम कल्याणके भागी होओगे। दैत्यराज बलिसे ऐसा कहकर महामतिमान् प्रह्लाद चुप हो गये। उधर भगवान् गोविन्द वामनरूपमें प्रकट हुए। सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी उन जगन्नाथके अवतरित होनेपर देवगण तथा देवमाता अदिति दुःखसे विमुक्त हो गयीं। उस समय सुख-स्पर्शी वायु बहने लगी, आकाश निर्मल हो गया और सभी प्राणियोंकी बुद्धि धर्ममें संलग्न हो गयी। तभीसे राजाओं और राक्षसोंके तथा पृथ्वी, आकाश और स्वर्गमें निवास करनेवाले सभी जीवोंके मनोंमें उद्वेग नहीं हुआ। राजन्! भगवान्‌के उत्पन्न होते ही लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने उनका जातकर्म आदि संस्कार किया। तत्पश्चात् उन देवदेवेश्वर श्रीविष्णुका दर्शन कर वे ऋषियोंके सुनते हुए उनकी स्तुति करने लगे॥ ५७–६६॥ |
| वत्स कोपेन मोहो मे जनितस्तेन ते मया।<br>शापो दत्तो विवेकश्च मोहेनापहतो मम॥ ५७<br>यदि मोहेन मे ज्ञानं नाक्षिप्तं स्यान्महासुर।<br>तत्कथं सर्वगं जानन् हरिं किंचिच्छपाम्यहम्॥ ५८<br>योऽयं शापो मया दत्तो भवतोऽसुरपुङ्गव।<br>भाव्यमेतेन नूनं ते तस्मान्मा त्वं विषीद वै॥ ५९<br>अद्यप्रभृति देवेशे भगवत्यच्युते हरौ।<br>भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति॥ ६०<br>शापं प्राप्याथ मां वीर संस्मरेथाः स्मृतस्त्वया।<br>यथा तथा यतिष्येऽहं श्रेयसा योज्यसे यथा॥ ६१<br>एवमुक्त्वा स दैत्येन्द्रं विरराम महामतिः।<br>अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः॥ ६२<br>अवतीर्णे जगन्नाथे तस्मिन् सर्वार्मरेश्वरे।<br>देवाश्च मुमुचुर्दुःखं देवमातादितिस्तथा॥ ६३<br>ववुर्वाताः सुखस्पर्शा विरजस्कमभून्नभः।<br>धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत॥ ६४<br>नोद्वेगश्चाप्यभूत् तत्र मनुजेन्द्रासुरेष्वपि।<br>तदादि सर्वभूतानां भूम्यम्बरदिवौकसाम्॥ ६५<br>तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>जातकर्मादिकं कृत्वा कृष्णं दृष्ट्वा च पार्थिव।<br>तुष्टाव देवदेवेशमृषीणां चैव शृण्वताम्॥ ६६ | |

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९४० * मत्स्यपुराण *

ब्रह्मोवाचब्रह्मा बोले—
जयाद्येश जयाजेय जय सर्वात्मकात्मक।<br>जय जन्मजरापेत जयानन्त जयाच्युत॥ ६७<br><br>जयाजित जयामेय जयाव्यक्तस्थिते जय।<br>परमार्थार्थ सर्वज्ञ ज्ञानज्ञेयात्मनिःसृत॥ ६८<br><br>जयाशेषजगत्साक्षिञ्जगत्कर्तर्जगद्गुरो ।<br>जगतोऽप्यन्तकृद् देव स्थिति पालयितुं जय॥ ६९<br><br>जय शेष जयाशेष जयाखिलहृदिस्थित।<br>जयादिमध्यान्त जय सर्वज्ञाननिधे जय॥ ७०<br><br>मुमुक्षुभिरनिर्देश्य स्वयंदृष्ट जयेश्वर।<br>योगिनां मुक्तिफलद दमादिगुणभूषण॥ ७१<br><br>जयातिसूक्ष्म दुर्ज्ञेय जय स्थूल जगन्मय।<br>जय स्थूलातिसूक्ष्म त्वं जयातीन्द्रिय सेन्द्रिय॥ ७२<br><br>जय स्वमायायोगस्थ शेषभोगशयाक्षर।<br>जयैकदंष्ट्राप्रान्ताग्रसमुद्धृतवसुंधर ॥ ७३आदि परमेश्वर! आपकी जय हो। अजेय! आपकी जय हो। सर्वात्मस्वरूप! आपकी जय हो। आप जन्म एवं वृद्धतासे विमुक्त, अन्तरहित तथा कभी च्युत होनेवाले नहीं हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप अजित, अमेय और अव्यक्त स्थितिवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप परमार्थके प्रयोजनस्वरूप, सर्वज्ञ, ज्ञानद्वारा जानने योग्य और अपनी महिमासे प्रकट होनेवाले हैं, आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण जगत्के साक्षी, जगत्के कर्ता और जगत्के गुरु हैं, आपकी जय हो। देव! आप जगत्की स्थिति, पालन और अन्त करनेवाले हैं, आपकी जय हो। आप शेषरूप, अशेषरूप तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहनेवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप जगत्के आदि, मध्य और अन्त हैं, आपकी जय हो। सर्वज्ञाननिधे! आपकी जय हो। आप मोक्षार्थीजनद्वारा अज्ञात, स्वयंदृष्ट, ईश्वर, योगियोंको मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले और दम आदि गुणोंसे विभूषित हैं, आपकी जय हो। आप अत्यन्त सूक्ष्म, दुर्ज्ञेय, स्थूल, जगन्मय, इन्द्रियवान् और अतीन्द्रिय हैं, आपकी बारंबार जय हो। आप अपनी योगमायामें स्थित रहनेवाले, शेषनागके फणपर शयन करनेवाले और अव्यय हैं, आपकी जय हो। आप एक दाँतके अग्रभागपर वसुंधराको उठाकर रख लेनेवाले (आदिवराह) हैं, आपकी जय हो॥ ६७—७३ ॥
नृकेसरिन् जयारातिवक्षःस्थलविदारण।<br>साम्प्रतं जय विश्वात्मन् जय वामन केशव॥ ७४<br><br>निजमायापटच्छन्न जगन्मूर्ते जनार्दन।<br>जयाचिन्त्य जयानेकस्वरूपैकविध प्रभो॥ ७५<br><br>वर्धस्व वर्धिताशेषविकारप्रकृते हरे।<br>त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः॥ ७६<br><br>न त्वामहं न चेशानो नेन्द्राद्यास्त्रिदशा हरे।<br>न ज्ञातुमीशा मुनयः सनकाद्या न योगिनः॥ ७७<br><br>त्वन्मायापटसंवीतो जगत्यत्र जगत्पते।<br>कस्त्वां वेत्स्यति सर्वेश त्वत्प्रसादं विना नरः॥ ७८<br><br>त्वमेवाराधितो येन प्रसादसुमुख प्रभो।<br>स एव केवलो देव वेत्ति त्वां नेतरे जनाः॥ ७९<br><br>नन्दीश्वरेश्वरेशान प्रभो वर्धस्व वामन।<br>प्रभवायास्य विश्वस्य विश्वात्मन् पृथुलोचन॥ ८०शत्रुके वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले नृसिंह! आपकी जय हो। विश्वात्मन्! इस समय आप वामनरूपमें प्रकट हैं, आपकी जय हो। केशव! आपकी जय हो। जगन्मूर्ति जनार्दन! आप अपनी मायाके आवरणसे छिपे रहते हैं, आपकी जय हो। प्रभो! आप अचिन्त्य, अनेक स्वरूप धारण करनेवाले और एकरूप हैं, आपकी जय हो। हरे! आप सम्पूर्ण प्रकृतिके विकारोंसे युक्त हैं, आपकी वृद्धि हो। आप परमेश्वरमें जगत्की यह धर्ममर्यादा स्थित है। हरे! न मैं, न शंकर, न इन्द्रादि देवगण, न सनकादि मुनिगण और न योगीजन ही आपको जाननेमें समर्थ हैं। जगदीश्वर सर्वेश! इस जगत्में आपकी मायारूपी वस्त्रसे लिपटा हुआ कौन मनुष्य आपकी कृपाके बिना आपको जान सकता है। प्रसन्नतासे सुन्दर मुखवाले देव! जिसने आपकी आराधना की है, केवल वही आपको जानता है, अन्य लोग नहीं। विश्वात्मन्! आप बड़े-बड़े नेत्रोंसे सुशोभित एवं नन्दीश्वरके स्वामी शंकररूप हैं। सामर्थ्यशाली वामन! आप इस विश्वकी उन्नतिके लिये वृद्धिको प्राप्त हों॥ ७४—८०॥
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* अध्याय २४५ * ९४१


शौनक उवाचशौनकजी बोले—
एवं स्तुतो हृषीकेशः स तदा वामनाकृतिः।<br>प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचाब्जसमुद्भवम् ॥ ८१<br>स्तुतोऽहं भवता पूर्वमिन्द्राद्यैः कश्यपेन च।<br>मया च वः प्रतिज्ञातमिन्द्रस्य भुवनत्रयम् ॥ ८२<br>भूयश्चाहं स्तुतोऽदित्या तस्याश्चापि प्रतिश्रुतम्।<br>यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् ॥ ८३<br>सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः।<br>भविष्यति सहस्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः॥ ८४<br>ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान्।<br>यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्मै बृहस्पतिः॥ ८५<br>आषाढमददाद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः।<br>कमण्डलुं वसिष्ठश्च कौशं वेदमथाङ्गिराः ॥ ८६<br>अक्षसूत्रं च पुलहः पुलस्त्यः सितवाससी।<br>उपत्तस्थुश्च तं वेदाः प्रणवस्वरभूषणाः ॥ ८७<br>शास्त्राण्यशेषाणि तथा सांख्ययोगोक्तयश्च याः।<br>स वामनो जटी दण्डी छत्री धृतकमण्डलुः ॥ ८८<br>सर्वदेवमयो भूप बलेरध्वरमभ्यगात्।<br>यत्र यत्र पदं भूयो भूभागे वामनो ददौ ॥ ८९<br>ददाति भूमिविवरं तत्र तत्रातिपीडिता।<br>स वामनो जडगतिर्मृदु गच्छन् सपर्वताम्।<br>साब्धिद्वीपवतीं सर्वां चालयामास मेदिनीम् ॥ ९०राजन्! ब्रह्माद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वामनस्वरूपधारी भगवान् हृषीकेशने उस समय हँसकर कमलजन्मा ब्रह्मासे भावोंसे युक्त गम्भीर वाणीमें कहा—'ब्रह्मन्! प्राचीनकालमें इन्द्रादि देवताओंके साथ कश्यपने तथा आपने मेरी स्तुति की थी, उस समय मैंने आपलोगोंसे इन्द्रको त्रिभुवन दिलानेकी प्रतिज्ञा की थी। पुनः अदितिने भी मेरी स्तुति की थी और मैंने उससे भी प्रतिज्ञा की थी कि इन्द्रको कण्टकरहित त्रिलोकीका राज्य समर्पित करूँगा। वही मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे सहस्राक्ष इन्द्र पुनः जगत्के अधिपति होंगे, यह मैं आपलोगोंसे सत्य कह रहा हूँ।' तदनन्तर ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्णमृगका चर्म दिया। भगवान् बृहस्पतिने उन्हें यज्ञोपवीत प्रदान किया। ब्रह्माके पुत्र महर्षि मरीचिने उन्हें पलाश-दण्ड, वसिष्ठने कमण्डलु, अङ्गिराने कुशासन और वेद, पुलहने अक्षसूत्र तथा पुलस्त्यने दो श्वेत वस्त्र समर्पित किये। फिर प्रणवके स्वरोंसे विभूषित वेद, सम्पूर्ण शास्त्र और सांख्ययोगकी उक्तियाँ उनके निकट उपस्थित हुईं। राजन्! तत्पश्चात् सर्वदेवमय भगवान् वामन जटा, दण्ड, छत्र और कमण्डलु धारण करके बलिके यज्ञकी ओर प्रस्थित हुए। उस समय भगवान् वामन पृथ्वीतलपर जहाँ-जहाँ अपने चरणोंको रखते थे वहाँ-वहाँ अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण पृथ्वीमें दरारें पड़ जाती थीं। इस प्रकार धीरे-धीरे मंद गतिसे चलते हुए भगवान् वामनने पर्वतों, समुद्रों और द्वीपोंसहित समूची पृथ्वीको चलायमान कर दिया ॥ ८१—९० ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावे वामनोत्पत्तिर्नाम पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामन-प्रादुर्भाव-प्रसंगमें वामन-जन्म नामक दो सौ पैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २४५ ॥

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९४२ | मत्स्यपुराण

दो सौ छियालीसवाँ अध्याय

बलि-शुक्र-संवाद, वामनका बलिके यज्ञमें पदार्पण, बलिद्वारा उन्हें तीन डग पृथ्वीका दान, वामनद्वारा बलिका बन्धन और वर प्रदान

| शौनक उवाच<br>सपर्वतवनामुर्वीं दृष्ट्वा संक्षोभितां बलिः।<br>पप्रच्छोशनसं शुद्धं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ १<br>आचार्य क्षोभमायाता साब्धिभूमूर्द्धना मही।<br>कस्माच्चनासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्नयः॥ २<br>इति पृष्टोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वरः।<br>उवाच दैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः॥ ३<br>अवतीर्णो जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरिः।<br>वामनेनेह रूपेण जगदात्मा सनातनः॥ ४<br>स एष यज्ञमायाति तव दानवपुङ्गव।<br>तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही।<br>कम्पन्ते गिरयश्चामी क्षुभितो मकरालयः॥ ५<br>नैनं भूतपतिं भूमिः समर्था वोढुमीश्वरम्।<br>सदेवासुरगन्धर्वयक्षराक्षसकिंनराः ॥ ६<br>अनेनैव धृता भूमिरापोऽग्निः पवनो नभः।<br>धारयत्यखिलान् देवो मन्वादींश्च महासुर॥ ७<br>इयमेव जगद्धेतोर्माया कृष्णस्य गह्बरी।<br>धार्यधारकभावेन यया सम्पीड़ितं जगत्॥ ८<br>तत्संनिधानादसुरा भागार्हा नासुरोत्तम।<br>भुञ्जते नासुरान् भागानमी तेनैव चाग्नयः॥ ९ | शौनकजीने कहा— पर्वतों और काननोंसहित पृथ्वीको क्षुब्ध हुई देख बलिने शुद्धाचारी शुक्राचार्यको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनसे पूछा—‘आचार्य! किस कारण समुद्र, पर्वत और वनोंसहित पृथ्वी संक्षुब्ध हो उठी है और यज्ञोंमें अग्नियाँ आसुरी भागोंको नहीं ग्रहण कर रही हैं?’ बलिद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ महाबुद्धिमान् शुक्राचार्य कुछ देरतक ध्यान करके दैत्यराज बलिसे बोले—‘दानवश्रेष्ठ! जगत्के उत्पत्तिस्थान विश्वात्मा अविनाशी श्रीहरि वामनरूपसे कश्यपके गृहमें अवतीर्ण हुए हैं। वही इस समय तुम्हारे यज्ञमें पधार रहे हैं। उन्हींके पैर रखनेसे संक्षुब्ध होकर यह पृथ्वी डगमगा रही है, ये पर्वत काँप रहे हैं और समुद्र क्षुब्ध हो उठा है। देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरोंसे भरी हुई पृथ्वी समस्त जीवोंके स्वामी इन ईश्वरको वहन करनेमें समर्थ नहीं है। महासुर! इन्हीं परमात्माने पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाशको धारण कर रखा है तथा ये ही देवेश्वर सम्पूर्ण मनु आदिको धारण करते हैं। जगत्के लिये भगवान् विष्णुकी यही दुर्गम माया है, जिसके द्वारा धार्य-धारकभावसे सारा जगत् पीड़ित हो रहा है। असुरोत्तम! उन्हीं भगवान्के समीपस्थ होनेसे असुरगण यज्ञमें अपने भागोंके अधिकारी नहीं रह गये। यही कारण है कि ये अग्नियाँ असुरोंके भागोंको ग्रहण नहीं कर रही हैं’॥ १–९॥ |
| बलिरुवाच<br>धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्।<br>यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान्॥ १०<br>यं योगिनः सदा युक्ताः परमात्मानमव्ययम्।<br>द्रष्टुमिच्छन्ति देवेशं स मेऽध्वरमुपैष्यति॥ ११<br>होता भागप्रदोऽयं च यमुद्गाता च गायति।<br>तमध्वरेश्वरं विष्णुं मत्तः कोऽन्य उपैष्यति॥ १२<br>सर्वेश्वरेश्वरे कृष्णे मदध्वरमुपागते।<br>यन्मया काव्य कर्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि॥ १३ | बलिने कहा— ब्रह्मन्! मैं धन्य और पुण्यात्मा हूँ जो मेरे यज्ञमें साक्षात् भगवान् यज्ञपति उपस्थित हो रहे हैं। अब मुझसे बढ़कर दूसरा कौन पुरुष है? योगाभ्यासमें लगे हुए योगी जिन अविनाशी देवाधिदेव परमात्माको देखनेकी लालसा करते हैं, वे ही भगवान् मेरे यज्ञमें आ रहे हैं। होता जिन्हें यज्ञभाग प्रदान करते हैं और उद्गाता जिनका गान करते हैं, उन यज्ञपति विष्णुके निकट मेरे अतिरिक्त दूसरा कौन जा सकता है। शुक्राचार्यजी! सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुके मेरे यज्ञमें पधारनेपर मेरा जो कर्तव्य हो, उसका मुझे आदेश दीजिये॥ १०–१३॥ |

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* अध्याय २४६ *९४३
शुक्र उवाच<br>यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर ।<br>त्वया तु दानवा दैत्या मखभागभुजः कृताः ॥ १४<br>अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम् ।<br>विसृष्टेरनु चान्नेन स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः ॥ १५<br>त्वत्कृते भविता नूनं देवो विष्णुः स्थितौ स्थितः ।<br>विद्वित्वैतन्महाभाग कुरु यत्नमनागतम् ॥ १६<br>त्वया हि दैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि ।<br>प्रतिज्ञा न हि वोढव्या वाच्यं साम वृथाफलम् ॥ १७<br>नालं दातुमहं देव दैत्य वाच्यं त्वया वचः ।<br>कृष्णस्य देवभूत्यर्थं प्रवृत्तस्य महासुर ॥ १८<br><br>बलिरुवाच<br>ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः ।<br>नास्तीति किमु देवेन संसाराघौघहारिणा ॥ १९<br>व्रतोपवासैर्विविधैः प्रतिसंग्राह्यते हरिः ।<br>स चेद् वक्ष्यति देहीति गोविन्दः किमतोऽधिकम् ॥ २०<br>यदर्थमुपहाराढ्यास्तपःशौचगुणान्वितैः ।<br>यज्ञाः क्रियन्ते देवेशः स मां देहीति वक्ष्यति ॥ २१<br>तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं मम ।<br>यन्मया दत्तमिशेशः स्वयमादास्यते हरिः ॥ २२<br>नास्ति नास्तीत्यहं वक्ष्ये तमप्यागतमीश्वरम् ।<br>यदा वञ्चामि तं प्राप्तं वृथा तज्जन्मनः फलम् ॥ २३<br>यज्ञेऽस्मिन् यदि यज्ञेशो याचते मां जनार्दनः ।<br>निजमूर्द्धानमप्यत्र तद् दास्याम्यविचारितम् ॥ २४<br>नास्तीति यन्मया नोक्तमन्येषामपि याचताम् ।<br>वक्ष्यामि कथमायाते तदनभ्यस्तमच्युते ॥ २५<br>श्लाघ्य एव हि वीराणां दानादापत्समागमः ।<br>नाबाधकारि यद् दानं तदमङ्गलवत् स्मृतम् ॥ २६<br>मद्राज्ये नासुखी कश्चिन्न दरिद्रो न चातुरः ।<br>नाभूषितो न चोद्विग्नो न स्त्रगादिविवर्जितः ॥ २७<br>हृष्टस्तुष्टः सुगन्धिश्च तृप्तः सर्वसुखान्वितः ।<br>जनः सर्वो महाभाग किमुताहं सदा सुखी ॥ २८शुक्रने कहा— असुर! वेदोंके प्रमाणानुसार देवगण ही यज्ञभागके अधिकारी हैं, किंतु तुमने तो दैत्यों और दानवोंको यज्ञभागका अधिकारी बना दिया है। ये सामर्थ्यशाली भगवान् सत्त्वगुणमें स्थित होकर सृष्टिकी उत्पत्ति और पालन करते हैं तथा प्रलयकालमें प्रजाओंको अपना ग्रास बना लेते हैं। महाभाग! वे भगवान् विष्णु तुम्हारे लिये ही भूतलपर अवतीर्ण हुए हैं, अतः इसे जानकर भविष्यके लिये उपाय करो। दैत्याधिपते! तुम उन्हें थोड़ी-सी भी वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा न करना, झूठ-मूठ ही नम्रतापूर्वक कुछ वचन कहना। महासुर! देवताओंकी उन्नतिके लिये प्रवृत्त हुए श्रीविष्णुसे तुम्हें ऐसा वचन कहना चाहिये कि 'देव! मैं आपको कुछ भी देनेमें समर्थ नहीं हूँ'॥ १४—१८॥<br><br>बलिने कहा— ब्रह्मन्! साधारण याचकोंके याचना करनेपर मैंने उन्हें कभी नकारात्मक उत्तर नहीं दिया, फिर संसारके पापसमूहोंको दूर करनेवाले परमात्माद्वारा याचना किये जानेपर मैं कैसे कहूँगा कि मेरे पास नहीं है। भला, जो श्रीहरि विविध व्रतों और उपवासोंद्वारा प्राप्त किये जाते हैं, वे गोविन्द यदि ऐसा कहेंगे कि 'दो' तो इससे बढ़कर और क्या बात होगी? जिनकी प्राप्तिके लिये तप और शौच आदि गुणोंसे युक्त याज्ञिक लोग उपहार-सामग्रियोंसे परिपूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, वे ही देवेश मुझसे 'दो' ऐसी याचना करेंगे। यदि देवाधिदेव श्रीहरि मेरे द्वारा दिये गये दानको स्वयं ग्रहण करेंगे, तब तो मेरे कर्म पुण्यमय हो गये और मेरी तपस्या सफल हो गयी। यदि मैं उन परमेश्वरके आनेपर भी 'नहीं है, नहीं है' ऐसा कहूँ और उन्हें ठगूँ, तब तो मेरे जन्म लेनेका फल ही व्यर्थ है। इसलिये इस यज्ञमें यदि यज्ञेश्वर जनार्दन मुझसे मेरा मस्तक भी माँगेंगे तो मैं उसे बिना हिचकिचाहटके दे डालूँगा। जब मैंने अन्य साधारण याचकोंको 'नहीं है' ऐसा कभी नहीं कहा, तब भला भगवान् अच्युतके आनेपर वह अनभ्यस्त शब्द कैसे कहूँगा? दान देनेसे आनेवाली विपत्तियाँ वीर पुरुषोंके लिये प्रशंसनीय हैं। जो दान देनेके बाद बाधा नहीं पहुँचाता, वह अमङ्गलके समान कहा गया है। महाभाग! मेरे राज्यमें कोई भी प्राणी दुःखी, दरिद्र, आतुर, भूषारहित, उद्विग्न और माला आदिसे रहित नहीं है, प्रत्युत सभी लोग हृष्ट, संतुष्ट, सुगन्धित द्रव्योंसे विभूषित, तृप्त और सभी सुखोंसे सम्पन्न हैं। फिर मैं सदा सुखी हूँ, इसके लिये तो कहना ही क्या है?॥ १९—२८॥
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९४४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतद्विशिष्टपात्रोऽयं दानबीजफलं मम।<br>विदितं भृगुशार्दूल मयैतत् त्वत्प्रसादतः॥ २९भृगुवंशसिंह! मेरे दानरूपी बीजका ही यह फल है, जो मुझे इस प्रकार दान देनेयोग्य विशिष्ट पात्र प्राप्त होगा। यह मुझे आपकी कृपासे ही ज्ञात हुआ है। अतः
एतद् विजानतो दानबीजं पतति चेद् गुरो।<br>जनार्दनमहापात्रे किं च प्राप्तं ततो मया॥ ३०गुरो! यह सब जानते हुए यदि मेरा यह दानबीज जनार्दनरूपी महापात्रमें पड़ जाय तो फिर मुझे क्या नहीं मिला अर्थात् मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। यदि
मत्तो दानमवाप्येशो यदि पुष्णाति देवताः।<br>उपभोगाद् दशगुणं दानं श्लाघ्यतमं मम॥ ३१परमेश्वर मुझसे दान लेकर देवताओंका पालन-पोषण करते हैं तो उनके उपभोगसे मेरा दान दसगुना प्रशंसनीय हो जायगा।
मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत्॥ ३२इसमें सन्देह नहीं कि यज्ञद्वारा आराधित श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हो गये हैं, इसी कारण दर्शन देकर उपकार करनेके लिये यहाँ आ रहे हैं। यदि
अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधिनम्।<br>मां निहन्तुमनाश्रैव वधः श्लाघ्यतरोऽच्युतात्॥ ३३क्रुद्ध होकर देवभागको रोकनेवाले मुझको मार डालनेके विचारसे आ रहे हैं तो भगवान्‌के हाथोंसे मेरा वध भी प्रशंसनीय है!
तन्मयं सर्वमेवेदं नाप्राप्यं यस्य विद्यते।<br>स मां याचितुमभ्येति नानुग्रहमृते हरिः॥ ३४यह सब कुछ उन्हींका स्वरूप है। जिनके लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है, वे ही श्रीहरि यदि मुझसे माँगनेके लिये आ रहे हैं तो यह उनके अनुग्रहके अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
यः सृजत्यात्मभूः सर्वं चेतसैव च संहरेत्।<br>स मां हन्तुं हृषीकेशः कथं यत्नं करिष्यति॥ ३५जो स्वयम्भू परमात्मा सबकी सृष्टि करते हैं और मनकी कल्पनासे ही उसका विनाश कर देते हैं, वे हृषीकेश भला मुझे मारनेके लिये क्यों यत्न करेंगे?
एतद् विदित्वा न गुरो दानविघ्नकरेण च।<br>त्वया भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते॥ ३६गुरो! ऐसा जानकर मेरे यज्ञमें जगन्नाथ गोविन्दके उपस्थित होनेपर आपको मेरे दानमें विघ्न नहीं करना चाहिये॥ २९–३६॥
शौनक उवाच<br>इत्येवं वदतस्तस्य सम्प्राप्तः स जगत्पतिः।<br>सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक्॥ ३७शौनकजी बोले— बलि इस प्रकार कह ही रहे थे कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य एवं मायासे वामनरूपधारी जगदीश्वर वहाँ आ पहुँचे।
तं दृष्ट्वा यज्ञवाटान्‍तःप्रविष्टमसुरैः प्रभुम्।<br>जग्मुः सभासदः क्षोभं तेजसा तस्य निष्प्रभाः॥ ३८यज्ञशालाके भीतर प्रविष्ट हुए उन प्रभुको देखकर सभी सभासद असुरगण क्षुब्ध हो उठे; क्योंकि वामनके तेजसे वे तेजोहीन हो गये थे।
जेपुश्च मुनयस्तत्र ये समेता महाध्वरे।<br>बलिश्‍चैवाखिलं जन्म मेने सफलमात्मनः॥ ३९उस महान् यज्ञमें आये हुए मुनिगण जप करने लगे। बलिने अपना समस्त जीवन सफल मान लिया।
ततः संक्षोभमापन्नो न कश्चित्किंचिदुक्तवान्।<br>प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास चेतसा॥ ४०इसके बाद सभी संक्षुब्ध थे, अतः किसीने भी किसीसे कुछ भी नहीं कहा। सभीने हृदयसे देवदेवेशकी पूजा की।
अथासुरपतिं प्रह्रं दृष्ट्वा मुनिवरांश्च तान्।<br>देवदेवपतिः साक्षी विष्णुर्वामनरूपधृक्॥ ४१तत्पश्चात् देवाधिदेव वामनरूपधारी साक्षात् विष्णुने विनीत बलि और उन मुनिवरोंको देखकर
तुष्टाव यज्ञवह्निं च यजमानमथर्त्विजः।<br>यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसम्पदः॥ ४२यज्ञाग्नि, यज्ञकर्माधिकारी सदस्यों और यजमान, पुरोहित, कर्ममें प्रस्तुत द्रव्य-सम्पत्तियोंकी प्रशंसा की।
ततः प्रसन्नमखिलं वामनं प्रति तत्क्षणात्।<br>यज्ञवाटस्थितं वीरः साधु साध्वित्युदीरयन्॥ ४३तदनन्तर यज्ञशालामें स्थित वामनभगवान्‌को अत्यन्त प्रसन्न देखकर उसी समय सदस्यगण ‘साधु-साधु’ की ध्वनि करने लगे।
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* अध्याय २४६ *९४५

| स चार्घमादाय बलिः प्रोद्भूतपुलकस्तदा ।<br>पूजयामास गोविन्दं प्राह चेदं महासुरः ॥ ४४ | उसी समय रोमाञ्चित शरीरवाले महासुर बलिने अर्घ्य लेकर गोविन्दकी पूजा की और इस प्रकार कहा ॥ ३७-४४ ॥ |
| बलिरुवाच<br>सुवर्णरत्नसंघातं गजाश्वममितं तथा ।<br>स्त्रियो वस्त्राण्यलङ्कारांस्तथा ग्रामांश्च पुष्कलान् ॥ ४५<br>सर्वस्वं सकलामुर्वी भवतो वा यदीप्सितम् ।<br>तद् ददामि वृणुष्व त्वं येनार्थी वामनः प्रियः ॥ ४६ | बलिने कहा— सुवर्ण एवं रत्नोंके समूह, असंख्य हाथी-घोड़े, स्त्रियाँ, वस्त्र, आभूषण, प्रचुर गाँव, सर्वस्व सम्पत्ति तथा सम्पूर्ण पृथ्वी—इनमेंसे जो आपको अभीष्ट हो अथवा जिसके लिये आप वामनरूपसे आये हैं, उसे आप माँगिये। मैं आपको वह प्रदान करूँगा॥ ४५-४६॥ |
| शौनक उवाच<br>इत्युक्तो दैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः ।<br>प्राह सस्मितगम्भीरं भगवान् वामनाकृतिः ॥ ४७ | शौनकजी बोले— दैत्यपति बलिके ऐसा कहनेपर गम्भीररूपसे मुसकराते हुए वामनरूपधारी भगवान् प्रेमभरी वाणीमें बोले ॥ ४७॥ |
| वामन उवाच<br>ममाग्निशरणार्थाय देहि राजन् पदत्रयम् ।<br>सुवर्णग्रामरत्नानि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ॥ ४८ | वामनभगवान्‌ने कहा— राजन्! अग्निस्थापनके लिये मुझे तीन पग पृथ्वी दीजिये। सुवर्ण, ग्राम, रत्न आदि उनके याचकोंको प्रदान कीजिये ॥ ४८ ॥ |
| बलिरुवाच<br>त्रिभिः प्रयोजनं किं ते पादैः पदवतां वर ।<br>शतं शतसहस्त्राणां पदानां मार्गतां भवान् ॥ ४९ | बलिने कहा— पदधारियोंमें श्रेष्ठ! तीन पग पृथ्वीसे आपका क्या काम चलेगा? आप सौ अथवा लाख पदोंके लिये याचना कीजिये ॥ ४९॥ |
| वामन उवाच<br>धर्मबुद्ध्या दैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि तावता ।<br>अन्येषामर्थिनां वित्तमीहितं दास्यते भवान् ॥ ५० | वामनभगवान्‌ने कहा— दैत्यपते! मैं धर्मबुद्धिसे उतनेसे ही कृतार्थ हूँ। आप अन्य याचकोंको उनका अभीष्ट धन प्रदान कीजिये ॥ ५०॥ |
| शौनक उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा तु गदितं वामनस्य महात्मनः ।<br>ददौ तस्मै महाबाहुर्वामनाय पदत्रयम् ॥ ५१<br>पाणौ तु पतिते तोये वामनोऽभूदवामनः ।<br>सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ ५२<br>चन्द्रसूर्यौ च नयने द्यौर्मूर्धा चरणौ क्षितिः ।<br>पादाङ्गुल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गुल्यश्च गुह्यकाः ॥ ५३<br>विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः ।<br>यक्षा नखेषु सम्भूता रेखाश्चाप्सरसस्तथा ॥ ५४<br>दृष्टौ ऋक्षाण्यशेषाणि केशाः सूर्यांशवः प्रभोः ।<br>तारका रोमकूपाणि रोमाणि च महर्षयः ॥ ५५<br>बाहवो विदिशस्तस्य दिशः श्रोत्रे महात्मनः ।<br>अश्विनौ श्रवणे तस्य नासा वायुर्महात्मनः ॥ ५६<br>प्रसादश्चन्द्रमा देवो मनो धर्मः समाश्रितः ।<br>सत्यं तस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ॥ ५७<br>ग्रीवादितिर्देवमाता विद्यास्तद्गलयस्तथा ।<br>स्वर्गद्वारमभून्मैत्रं त्वष्टा पूषा च वै भ्रुवौ ॥ ५८ | शौनकजी बोले— महात्मा वामनकी ऐसी बातें सुनकर महाबाहु बलिने उन वामनको तीन पग भूमि देनेका संकल्प कर लिया। हाथमें संकल्पका जल गिरते ही वामन अवामन हो गये और उन्होंने उसी क्षण अपना सर्वदेवमय रूप प्रकट कर दिया। चन्द्र-सूर्य उनके नेत्र, आकाश मस्तक, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाचगण पैरोंकी अंगुलियाँ, गुह्यक हाथोंकी अंगुलियाँ, विश्वेदेव घुटने, सुरश्रेष्ठ साध्यगण जंघे थे। नखोंमें यक्ष, रेखाओंमें अप्सराएँ, नेत्रज्योतिमें नक्षत्रगण थे। सूर्यकिरणें केश, ताराएँ रोमकूप, महर्षिगण रोमावलि थे। उन महात्माकी भुजाओंमें दिशाओंके कोण और श्रोत्रोंमें दिशाएँ थीं। श्रवणेन्द्रियमें अश्विनीकुमार और नासिकामें वायुका निवास था। प्रसन्नतामें चन्द्रदेव और मनमें धर्म स्थित थे। सत्य उनकी वाणी और सरस्वती देवी जिह्वा हुई। देवमाता अदिति ग्रीवा, विद्याएँ वलय, स्वर्गद्वार मैत्री, त्वष्टा और पूषा दोनों भौंह थे। |

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९४६ * मत्स्यपुराण *

मुखं वैश्वानरश्चास्य वृषणौ तु प्रजापतिः।<br>हृदयं च परं ब्रह्म पुंस्त्वं वै कश्यपो मुनिः॥ ५९<br>पृष्ठेऽस्य वसवो देवा मरुतः सर्वसंधिषु।<br>सर्वसूक्तानि दशना ज्योतींषि विमलप्रभाः॥ ६०वैश्वानर उनके मुख, प्रजापति अण्डकोष, परब्रह्म हृदय और कश्यप मुनि पुंस्त्व थे। उनके पीठ-भागमें वसुगण और संधिभागोंमें मरुद्गण थे। सभी सूक्त दाँत और निर्मल कान्ति ज्योतिर्गण थे॥ ५९-६०॥
वक्षःस्थले महादेवो धैर्ये चास्य महार्णवाः।<br>उदरे चास्य गन्धर्वाः सम्भूताश्च महाबलाः॥ ६१<br>लक्ष्मीर्मेधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्याश्च वै कटिः।<br>सर्वज्योतींषि जानीहि तस्य तत्परमं महः॥ ६२<br>तस्य देवाधिदेवस्य तेजः प्रोद्भूतमूत्तमम्।<br>स्तनौ कुक्षी च वेदाश्च उदरं च महामखाः॥ ६३<br>इष्टयः पशुबन्धाश्च द्विजानां चेष्टितानि च।<br>तस्य देवमयं रूपं दृष्ट्वा विष्णोर्महाबलाः॥ ६४<br>उपासर्पन्त दैत्येन्द्राः पतङ्गा इव पावकम्।<br>प्रमथ्य सर्वानसुरान् पादहस्ततलैर्विभुः॥ ६५<br>कृत्वा रूपं महाकायं जहाराशु स मेदिनीम्।<br>तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे॥ ६६<br>नाभौ विक्रममाणस्य सक्थिदेशस्थितावुभौ।<br>परं विक्रमतस्तस्य जानुमूले प्रभाकरौ॥ ६७<br>विष्णोरास्तां महीपाल देवपालनकर्मणि।<br>जित्वा लोकत्रयं कृत्स्नं हत्वा चासुरपुङ्गवान्॥ ६८<br>पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः।<br>सुतलं नाम पातालमधस्ताद् वसुधातलात्॥ ६९<br>बलेर्दत्तं भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>अथ दैत्येश्वरं प्राह विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः॥ ७०उनके वक्षःस्थलमें महादेव और धैर्यमें महासागर थे। उनके उदरमें महाबली गन्धर्व उत्पन्न हुए थे। लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति और सभी विद्याएँ उनके कटिप्रदेशमें थीं। सभी ज्योतियोंको उनका परम तेज जानना चाहिये। वहाँ उन देवाधिदेवका अनुपम तेज भासमान हो रहा था। उनके स्तनों और कुक्षियोंमें वेदोंका निवास था तथा उदरमें महायज्ञ, इष्टियाँ, पशुओंके बलिदान और ब्राह्मणोंकी चेष्टाएँ थीं। उन विष्णुके देवमय स्वरूपको देखकर महाबली दैत्यगण अग्निमें पतंगोंकी भाँति उनपर टूट पड़े। तब सर्वव्यापी परमात्माने उन सभी असुरोंको पैरों तथा हाथोंके चपेटसे मसल डाला और शीघ्र ही विशालकाय स्वरूप धारणकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया। भूलोकको नापते समय चन्द्रमा और सूर्य भगवान्‌के स्तनोंके मध्यभागमें थे, अन्तरिक्षलोक नापते समय वे दोनों नाभिप्रदेशमें और उससे ऊपर जाते समय सक्थि भागमें आ गये। उससे भी ऊपर जाते समय वे दोनों प्रकाश फैलानेवाले चन्द्रमा और सूर्य भगवान् विष्णुके घुटनोंके मूलभागमें स्थित हो गये। महीपाल! इस प्रकार लम्बे डगवाले भगवान् विष्णुने देवहितके लिये समूची त्रिलोकीको जीतकर और असुरश्रेष्ठोंका संहार कर तीनों लोकोंका राज्य इन्द्रको सौंप दिया। साथ ही प्रभावशाली भगवान् विष्णुने भूमितलके नीचे सुतल नामक पाताललोकका राज्य बलिको दे दिया। उस समय सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुने दैत्यराज बलिसे इस प्रकार कहा॥ ६१-७०॥
श्रीभगवानुवाचश्रीभगवान् बोले—
यत् त्वया सलिलं दत्तं गृहीतं पाणिना मया।<br>कल्पप्रमाणं तस्मात् ते भविष्यत्यायुरुत्तमम्॥ ७१<br>वैवस्वते तथातीते बले मन्वन्तरे ह्यथ।<br>सावर्णि के तु सम्प्राप्ते भवानिन्द्रो भविष्यति॥ ७२<br>साम्प्रतं देवराजाय त्रैलोक्यं सकलं मया।<br>दत्तं चतुर्युगाणां च साधिका ह्येकसप्ततिः॥ ७३<br>नियन्तव्या मया सर्वे ये तस्य परिपन्थिनः।<br>तेनाहं परया भक्त्या पूर्वमाराधितो बले॥ ७४दैत्यराज बलि! जो तुमने मुझे जलका दान दिया है और मैंने उसे हाथमें ग्रहण कर लिया है, उसके फलस्वरूप तुम एक कल्पतक दीर्घजीवन प्राप्त करोगे और इस वैवस्वत मन्वन्तरके व्यतीत हो जानेपर सावर्णि मन्वन्तरके आनेपर तुम इन्द्र होओगे। इस समय मैंने एकहत्तर चतुर्युगीतकके लिये त्रिलोकीका सम्पूर्ण राज्य देवराज इन्द्रको दे दिया है। साथ ही इन्द्रके जितने शत्रु होंगे, उन सबका भी मुझे नियन्त्रण करना है; क्योंकि इन्द्रने पूर्वकालमें परम भक्तिपूर्वक मेरी आराधना की है।
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* अध्याय २४६ *९४७

| सुतलं नाम पातालं त्वमासाद्य मनोरमम्।<br>वसासुर ममादेशं यथावत् परिपालयन्॥ ७५<br>तत्र दिव्यवनोपेते प्रासादशतसंकुले।<br>प्रोत्फुल्लपद्मसरसि स्रवच्छुद्धसरिद्वरे॥ ७६<br>सुगन्धिधूपस्रग्वस्त्रवराभरणभूषितः ।<br>स्रक्चन्दनादिमुदितो गेयनृत्यमनोरमे॥ ७७<br>पानान्नभोगान् विविधानुपभुङ्क्ष्व महासुर।<br>ममाज्ञया कालमिमं तिष्ठ स्त्रीशतसंवृतः॥ ७८<br>यावत् सुरैश्च विप्रैश्च न विरोधं करिष्यसि।<br>तावदेतान् महाभोगानवाप्स्यसि महासुर॥ ७९<br>यदा च देवविप्राणां विरोधं त्वं करिष्यसि।<br>बन्धिष्यन्ति तदा पाशा वारुणास्त्वामसंशयम्॥ ८०<br>एतद् विदित्वा भवता मयाऽऽज्ञप्तमशेषतः।<br>न विरोधः सुरैः कार्यो विप्रैर्वा दैत्यसत्तम॥ ८१ | असुर! तुम सुतल नामक मनोहर पाताललोकमें जाकर मेरे आदेशका ठीक-ठीक पालन करते हुए निवास करो। महासुर! जो दिव्य वनोंसे युक्त एवं सैकड़ों महलोंसे समन्वित है, जिसके सरोवरोंमें कमल खिले हुए हैं, जहाँ शुद्ध एवं श्रेष्ठ नदियाँ बह रही हैं, जो नाच-गानसे मनको लुभानेवाला है, उस सुतललोकमें तुम सुगन्धित धूप, माला, वस्त्र और उत्तम आभूषणोंसे विभूषित तथा माला और चन्दनादिसे हर्षित होकर विविध प्रकारके अन्न-पान आदिका उपभोग करो और मेरी आज्ञासे सैकड़ों स्त्रियोंके साथ उतने समयतक निवास करो। महासुर! जबतक तुम देवताओं और ब्राह्मणोंसे विरोध नहीं करोगे, तबतक तुम इन सभी महाभोगोंको प्राप्त करते रहोगे। जब तुम देवताओं तथा ब्राह्मणोंका विरोध करोगे, तब तुम्हें वरुणके पाश बाँध लेंगे—इसमें संदेह नहीं है। दैत्यश्रेष्ठ! ऐसा जानकर तुम मेरी आज्ञाओंका पूर्णरूपसे पालन करो! तुम्हें देवताओं अथवा ब्राह्मणोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिये॥ ७५—८१॥ |
| शौनक उवाच<br>इत्येवमुक्तो देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>बलिः प्राह महाराज प्रणिपत्य मुदा युतः॥ ८२ | शौनकजी बोले—महाराज! प्रभावशाली भगवान् विष्णुके द्वारा ऐसा कहे जानेपर बलि प्रमुदित हो प्रणाम करके बोला॥ ८२॥ |
| बलिरुवाच<br>तत्रासतो मे पाताले भगवन् भवदाज्ञया।<br>किं भविष्यत्युपादानमुपभोगोपपादकम्॥ ८३ | बलिने पूछा—भगवन्! आपके आदेशसे उस पाताललोकमें निवास करते समय मेरे लिये सुखभोगोंको प्राप्त करानेवाले कौन-से उपादान कारण होंगे?॥ ८३॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च।<br>हुतान्यश्रद्धया यानि तानि दास्यन्ति ते फलम्॥ ८४<br>अदक्षिणास्तथा यज्ञाः क्रियाश्चाविधिना कृताः।<br>फलानि तव दास्यन्ति अधीतान्यव्रतानि च॥ ८५ | श्रीभगवान्‌ने कहा—जो विधानसे रहित किये गये दान, बिना श्रोत्रिय ब्राह्मणके किये गये श्राद्ध और श्रद्धारहित किये हुए हवन हैं, ये सब तुम्हें अपना फल प्रदान करेंगे। दक्षिणाहीन यज्ञ, बिना विधिके की हुई क्रियाएँ और ब्रह्मचर्य-व्रतसे रहित अध्ययन—ये सभी तुम्हें अपना फल देंगे॥ ८४-८५॥ |
| शौनक उवाच<br>बलेर्वरमिमं दत्त्वा शक्राय त्रिदिवं तथा।<br>व्यापिना तेन रूपेण जगामादर्शनं हरिः॥ ८६<br>प्रशशास यथापूर्वमिन्द्रस्त्रैलोक्यपूजितः।<br>सिषेवे च परान् कामान् बलिः पातालसंस्थितः॥ ८७<br>इहैव देवदेवेन बद्धोऽसौ दानवोत्तमः।<br>देवानां कार्यकारणे भूयोऽपि जगति स्थितः॥ ८८<br>सम्बन्धी ते महाभाग द्वारकायां व्यवस्थितः।<br>दानवानां विनाशाय भारावतरणाय च॥ ८९ | शौनकजीने कहा—बलिको यह वरदान तथा इन्द्रको स्वर्गका राज्य देकर भगवान् विष्णु अपने उस सर्वव्यापक रूपके साथ अदृश्य हो गये। तत्पश्चात् इन्द्र तीनों लोकोंमें पूजित होकर पूर्ववत् शासन करने लगे तथा बलि पातालमें स्थित होकर उत्तम मनोरथोंका सेवन करने लगे। महाभाग! वह दानवराज बलि भगवान् विष्णुद्वारा यहीं बाँधा गया था। वे भगवान् देवताओंका कार्य करनेके लिये फिर इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं, जो दानवोंका विनाश तथा पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये |

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९४८ * मत्स्यपुराण *


यतो यदुकुले कृष्णो भवतः शत्रुनिग्रहे।<br>सहायभूतः सारथ्यं करिष्यति बलानुजः॥ ९०<br>एतत् सर्वं समाख्यातं वामनस्य च धीमतः।<br>अवतारं महावीर श्रोतुमिच्छोस्त्ववार्जुन ॥ ९१कृष्णरूपसे यदुकुलमें उत्पन्न होकर विराजमान हैं। वे तुम्हारे सम्बन्धी हैं। बलरामके छोटे भाई वे श्रीकृष्ण तुम्हारे शत्रुओंके निग्रहके समय सारथिरूपसे तुम्हारी सहायता करेंगे। महावीर अर्जुन ! बुद्धिमान् वामनके अवतारकी यह सारी कथा मैंने तुमसे वर्णन कर दी, जिसे तुम सुनना चाहते थे॥ ८६—९१॥
अर्जुन उवाच<br>श्रुतवानिह ते पृष्टं माहात्म्यं केशवस्य च।<br>गङ्गाद्वारमितो यास्याम्यनुज्ञां देहि मे विभो॥ ९२अर्जुन बोले—विभो! भगवान् विष्णुके माहात्म्यको, जिसे मैंने पूछा था, उसे मैं आपके मुखसे सुन चुका। अब मैं यहाँसे गङ्गाद्वार (हरिद्वार) जाना चाहता हूँ, इसके लिये आप मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये॥ ९२॥
सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा ययौ पार्थो नैमिषं शौनको गतः।<br>इत्येतद् देवदेवस्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>वामनस्य पठेद् यस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ९३<br>बलिप्रह्लादसंवादं मन्त्रितं बलिशुक्रयोः।<br>बलेर्विष्णोश्च कथितं यः स्मरिष्यति मानवः॥ ९४<br>नाधयो व्याधयस्तस्य न च मोहाकुलं मनः।<br>भविष्यति द्विजश्रेष्ठाः पुंसस्तस्य कदाचन॥ ९५<br>च्युतराज्यो निजं राज्यमिष्टाप्तिं च वियोगवान्।<br>अवाप्नोति महाभागो नरः श्रुत्वा कथामिमाम् ॥ ९६सूतजी कहते हैं—ऋषियो! ऐसा कहकर अर्जुन गङ्गाद्वारको चले गये और महर्षि शौनक नैमिषारण्यकी ओर प्रस्थित हुए। इस प्रकार जो देवाधिदेव भगवान् वामनके इस उत्तम माहात्म्यका पाठ करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजवरो! जो मनुष्य बलि और प्रह्लादके संवाद, बलि और शुक्रकी मन्त्रणा तथा बलि और विष्णुके कथनोपकथनका स्मरण करेगा, उस पुरुषको कभी भी न तो किसी प्रकारकी आधि-व्याधि प्राप्ति होगी और न उसका मन मोहसे व्याकुल होगा। जो महान् भाग्यशाली मनुष्य इस कथाको सुनता है, वह राज्यच्युत हो तो अपने राज्यको और वियोगी हो तो अपने इष्टको प्राप्त कर लेता है ॥ ९३—९६ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावो नाम षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामनप्रादुर्भाव नामक दो सौ छियालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २४६ ॥


दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय

अर्जुनके वाराहावतारविषयक प्रश्न करनेपर शौनकजीद्वारा भगवत्स्वरूपका वर्णन

अर्जुन उवाच<br>प्रादुर्भावान् पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः।<br>सतां कथयतां विप्र वाराह इति नः श्रुतम् ॥ १<br>जाने न तस्य चरितं न विधिं न च विस्तरम्।<br>न कर्म गुणसंख्यानं न चाप्यन्तं मनीषिणः ॥ २<br>किमात्मको वराहोऽसौ किं मूर्तिः कस्य देवता ।<br>किं प्रमाणः किं प्रभावः किं वा तेन पुरा कृतम् ॥ ३अर्जुनने पूछा—विप्रवर! पुराणोंमें संतोंद्वारा अपरिमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके अवतारोंके वर्णनमें हमने वाराह-अवतारकी बात सुनी है, किंतु मैं उन बुद्धिमान् भगवान्के चरित्र, विस्तार, कर्म, गुण और आराधनाविधिको नहीं जानता। वे वाराहभगवान् किस प्रकारके हैं? उनका स्वरूप कैसा है? उनकी देवशक्ति कैसी है? उनका क्या प्रमाण और कितना प्रभाव है? प्राचीनकालमें उन्होंने क्या कार्य किये हैं?
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* अध्याय २४७ *९४९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतन्मे शंस तत्त्वेन वाराहं श्रुतिविस्तरम्।<br>यथाहं च समेतानां द्विजातीनां विशेषतः॥ ४<br>शौनक उवाच<br>एतत् ते कथयिष्यामि पुराणं ब्रह्मसम्मितम्।<br>महावराहचरितं कृष्णस्याद्भुतकर्मणः॥ ५<br>यथा नारायणो राजन् वाराहं वपुरास्थितः।<br>दंष्ट्रया गां समुद्रस्थामुज्जहारारिमर्दनः॥ ६<br>छन्दोगीर्भिरुदाराभिः श्रुतिभिः समलङ्कृतः।<br>मनःप्रसन्नतां कृत्वा निबोध विजयाधुना॥ ७<br>इदं पुराणं परमं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।<br>नानाश्रुतिसमायुक्तं नास्तिकाय न कीर्तयेत्॥ ८<br>पुराणं वेदमखिलं सांख्यं योगं च वेद यः।<br>कात्स्न्र्येन विधिना प्रोक्तं सौख्यार्थं वेदयिष्यति॥ ९<br>विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रादित्यास्तथाश्विनौ।<br>प्रजानां पतयश्चैव सप्त चैव महर्षयः॥ १०<br>मनःसंकल्पजाश्चैव पूर्वजा ऋषयस्तथा।<br>वसवो मरुतश्चैव गन्धर्वा यक्षराक्षसाः॥ ११<br>दैत्याः पिशाचा नागाश्च भूतानि विविधानि च।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा म्लेच्छाश्च ये भुवि॥ १२<br>चतुष्पदानि सर्वाणि तिर्यग्योनिशतानि च।<br>जङ्गमानि च सत्त्वानि यच्चान्यज्जीवसंज्ञितम्॥ १३<br>पूर्णे युगसहस्रे तु ब्राह्मेऽहनि तथागते।<br>निर्वाणे सर्वभूतानां सर्वोत्पातसमुद्भवे॥ १४<br>हिरण्यरेतास्त्रिशिखस्ततो भूत्वा वृषाकपिः।<br>शिखाभिर्विधमँल्लोकानशोषयत वह्निना॥ १५इसलिये पुराणोंमें कही हुई वाराह-अवतारकी ये सारी बातें मुझे तथा विशेषकर यहाँ आये हुए इन ब्राह्मणोंको तत्त्वपूर्वक बतलाइये॥ १-४॥<br>**शौनकजी बोले—**अर्जुन! मैं तुमसे अद्भुतकर्मा भगवान् श्रीकृष्णके महावाराह-अवतारके चरित्रको, जो पुराणोंमें वर्णित तथा ब्रह्मसम्मित है, कह रहा हूँ। राजन्! जिस प्रकार शत्रुसंहारक भगवान् विष्णुने वराह-रूप धारणकर समुद्र-स्थित पृथ्वीका दाढ़ोंपर रखकर उद्धार किया था तथा जिस प्रकार उदार श्रुतियोंने वैदिक वाणीद्वारा उनका अभिनन्दन किया था, यह सब इस समय मनको प्रसन्न करके सुनो। अर्जुन! यह पुराण परम पुण्यमय, वेदोंद्वारा अनुमोदित तथा अनेकों श्रुतियोंसे सम्पन्न है, इसे नास्तिक व्यक्तिसे नहीं कहना चाहिये। जो सभी पुराणों, वेदों, सांख्य और योगको पूरी विधिके साथ जानता है, उसीसे इसकी कथा कहनी चाहिये; क्योंकि वही इसके अर्थको जान सकेगा। विश्वेदेवगण, साध्यगण, रुद्रगण, आदित्यगण, अश्विनीकुमार, प्रजापतिगण, सातों महर्षि, ब्रह्माके मानसिक संकल्पसे सर्वप्रथम उत्पन्न हुए सनकादि ब्रह्मर्षि, वसुगण, मरुद्गण, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, नाग, विविध प्रकारके जीव, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, म्लेच्छ आदि जितनी जातियाँ पृथ्वीपर हैं, सभी चौपाये, सैकड़ों तिर्यग्योनियाँ, जङ्गम प्राणी तथा अन्य जो जीव नामधारी हैं—इन सभीको एक हजार युग बीतनेके पश्चात् ब्रह्माका दिन आनेपर जब सभी प्रकारके उत्पात होने लगते हैं और सभी प्राणियोंका विनाश हो जाता है, तब हिरण्यरेता भगवान् जो वृषाकपि नामसे विख्यात हैं, तीन अग्निशिखाओंसे युक्त होकर अपनी उग्र ज्वालाओंद्वारा सभी लोकोंका विनाश करते हुए अग्निके प्रभावसे दग्ध कर देते हैं॥ ५-१५॥
दह्यमानास्ततस्तस्य तेजोराशिभिरुद्गतैः।<br>विवर्णवर्णा दग्धाङ्गा हतार्चिष्मद्भिराननैः॥ १६<br>साङ्गोपनिषदो वेदा इतिहासपुरोगमाः।<br>सर्वविद्याः क्रियाश्चैव सर्वधर्मपरायणाः॥ १७<br>ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा प्रभवं विश्वतोमुखम्।<br>सर्वदेवगणाश्चैव त्रयस्त्रिंशत् तु कोटयः॥ १८उस दिनके प्राप्त होनेपर निकलती हुई तेजोराशिसे जिनके शरीर जल गये थे तथा झुलसे हुए मुखोंसे जिनका रंग बदल गया था, वे छहों अङ्गोंसहित वेद, उपनिषद्, इतिहास, सभी विद्याएँ, सम्पूर्ण धार्मिक क्रियाएँ और तैंतीस करोड़ सभी देवगण सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थानरूप ब्रह्माको आगे करके
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९५० * मत्स्यपुराण *


Sanskrit ShlokasHindi Translation
तस्मिन्नहनि सम्प्राप्ते तं हंसं महदक्षरम्।<br>प्रविशन्ति महात्मानं हरिं नारायणं प्रभुम्॥ १९<br>तेषां भूयः प्रवृत्तानां निधनेात्पत्तिरुच्यते।<br>यथा सूर्यस्य सततमुदयास्तमने इह॥ २०<br>पूर्णे युगसहस्रान्ते कल्पो निःशेष उच्यते।<br>यस्मिन् जीवकृतं सर्वं निःशेषं समतिष्ठत॥ २१<br>संहृत्य लोकानखिलान् सदेवासुरमानुषान्।<br>कृत्वा सुसंस्थां भगवानास्त एको जगद्गुरुः॥ २२<br>स स्रष्टा सर्वभूतानां कल्पान्तेषु पुनः पुनः।<br>अव्ययः शाश्वतो देवो यस्य सर्वमिदं जगत्॥ २३<br>नष्टार्ककिरणे लोके चन्द्रग्रहविवर्जिते।<br>त्यक्तधूमाग्निपवने क्षीणयज्ञवषट्क्रिये॥ २४<br>अपक्षिगणसम्पाते सर्वप्राणिहरे पथि।<br>अमर्यादाऽऽकुले रौद्रे सर्वतस्तमसावृते॥ २५<br>अदृश्ये सर्वलोकेऽस्मिन्नभावे सर्वकर्मणाम्।<br>प्रशान्ते सर्वसम्पाते नष्टे वैरपरिग्रहे॥ २६<br>गते स्वभावसंस्थाने लोके नारायणात्मके।<br>परमेष्ठी हृषीकेशः शयनायोपचक्रमे॥ २७<br>पीतवासा लोहिताक्षः कृष्णो जीमूतसन्निभः।<br>शिखासहस्रविकचजटाभारं समुद्वहन्॥ २८<br>श्रीवत्सलक्षणधरं रक्तचन्दनभूषितम्।<br>वक्षो बिभ्रन्महाबाहुः सविद्युदिव तोयदः॥ २९<br>पुण्डरीकसहस्रेण स्रगस्य शुशुभे शुभा।<br>पत्नी चास्य स्वयं लक्ष्मीर्देहमावृत्य तिष्ठति॥ ३०<br>ततः स्वपिति शान्तात्मा सर्वलोकशुभावहः।<br>किमप्यमितयोगात्मा निद्रायोगमुपागतः॥ ३१<br>ततो युगसहस्रे तु पूर्णे स पुरुषोत्तमः।<br>स्वयमेव विभुर्भूत्वा बुध्यते विबुधाधिपः॥ ३२<br>ततश्चिन्तयते भूयः सृष्टिं लोकस्य लोककृत्।<br>नरान् देवगणांश्चैव पारमेष्ठ्येन कर्मणा॥ ३३हंसस्वरूप उन भगवान् विष्णुमें, जो सर्वोत्कृष्ट, अविनाशी, महान् आत्मबलसे सम्पन्न और जलशायी हैं, प्रविष्ट हो जाते हैं। उनका पुनः प्रकट होना उसी प्रकार जन्म-मृत्यु कहा जाता है, जैसे इस लोकमें सूर्यका निरन्तर उदय और अस्त होता रहता है। एक हजार युग पूर्ण होनेपर कल्पकी समाप्ति कही जाती है, जिसमें सभी जीवोंके कार्य भी समाप्त हो जाते हैं। उस समय अकेले जगद्गुरु भगवान् विष्णु देवता, असुर और मानवसहित सभी लोकोंका संहारकर और उन्हें अपनेमें समाविष्ट कर विद्यमान रहते हैं। यह सारा जगत् जिनका अंशरूप है, वे सनातन अविनाशी भगवान् प्रत्येक कल्पकी समाप्तिपर बारंबार सभी जीवोंकी सृष्टि करते हैं। जब लोकमें सूर्यकी किरणें नष्ट हो जाती हैं, चन्द्रमा और ग्रह लुप्त हो जाते हैं, धूम, अग्नि और पवन दूर हो जाते हैं, यज्ञोंमें वषट्कारकी ध्वनि अस्त हो जाती है, पक्षिगणोंका उड़ना बंद हो जाता है, मार्गमें सभी प्राणियोंका अपहरण होने लगता है, भीषणता मर्यादाकी सीमाके बाहर पहुँच जाती है, चारों ओर निविड़ अन्धकार छा जाता है, सारा लोक अदृश्य हो जाता है, सभी कर्मोंका अभाव हो जाता है, सारी उत्पत्ति प्रशान्त हो जाती है, वैरभाव नष्ट हो जाता है और सब कुछ नारायणरूपी लोकमें विलीन हो जाता है, उस समय इन्द्रियोंके स्वामी परमेष्ठी शयनके लिये उद्यत होते हैं॥ १६—२७॥<br><br>उस समय महाबाहु भगवान् पीताम्बरधारी, लाल नेत्रोंसे युक्त, काले मेघकी-सी कान्तिसे सम्पन्न, हजारों शिखाओंसे युक्त जटाभारको वहन करनेवाले, श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित एवं लाल चन्दनसे विभूषित वक्षःस्थलको धारण करते हुए बिजलीसहित मेघकी भाँति शोभायमान होते हैं। हजारों कमल-पुष्पोंकी बनी हुई सुन्दर माला उनकी शोभा बढ़ाती है। उनकी पत्नी स्वयं लक्ष्मी उनके शरीरको आच्छादित करके विद्यमान रहती हैं। तत्पश्चात् शान्तात्मा, सभी लोकोंके कल्याणकारी और परम योगी भगवान् कुछ योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते हैं। फिर एक हजार युग व्यतीत होनेपर देवेश्वर भगवान् पुरुषोत्तम सर्वव्यापी होकर अपने-आप ही जागते हैं। तदनन्तर लोककर्ता भगवान् ब्रह्माके कर्मद्वारा मनुष्यों और देवताओंकी सृष्टिके विषयमें पुनः विचार करते हैं।
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  • अध्याय २४७ * । १५१

| ततः संचिन्तयन् कार्यं देवेषु समितिञ्जयः।<br>सम्भवं सर्वलोकस्य विदधाति सतां गतिः॥ ३४<br><br>कर्ता चैव विकर्ता च संहर्ता वै प्रजापतिः।<br>नारायणः परं सत्यं नारायणः परं पदम्॥ ३५<br><br>नारायणः परो यज्ञो नारायणः परा गतिः।<br>स स्वयम्भूरिति ज्ञेयः स स्रष्टा भुवनाधिपः॥ ३६<br><br>स सर्वमिति विज्ञेयो ह्येष यज्ञः प्रजापतिः।<br>यद् वेदितव्यस्त्रिदशैस्तदेष परिकीर्त्यते॥ ३७<br><br>यत्तु वेद्यं भगवतो देवा अपि न तद् विदुः।<br>प्रजानां पतयः सर्वे ऋषयश्च सहामरैः॥ ३८<br><br>नास्यान्तमधिगच्छन्ति विचिन्वन्त इति श्रुतिः।<br>यदस्य परमं रूपं न तत् पश्यन्ति देवताः॥ ३९<br><br>प्रादुर्भावे तु यद् रूपं तदर्चन्ति दिवौकसः।<br>दर्शितं यदि तेनैव तदवेक्षन्ति देवताः॥ ४०<br><br>यन्न दर्शितवानेष कस्तदन्वेष्टुमीहते।<br>ग्रामणीः सर्वभूतानामग्निमारुतयोर्गतिः॥ ४१<br><br>तेजसस्तपसश्चैव निधानममृतस्य च।<br>चतुराश्रमधर्मेशश्चातुर्होत्रफलाशनः ॥ ४२<br><br>चतुःसागरपर्यन्तश्चतुर्युगनिर्वर्तकः ।<br>तदेष संहृत्य जगत् कृत्वा गर्भस्थमात्मनः।<br>मुमोचाण्डं महायोगी धृतं वर्षसहस्रकम्॥ ४३<br><br>सुरासुरद्विजभुजगाप्सरोगणै-<br>र्दुमौषधिक्षितिधरयक्षगुह्यकैः ।<br>प्रजापतिः श्रुतिभिरसंकुलं किल<br>तदासृजज्जगदिदमात्मना प्रभुः॥ ४४ | तत्पश्चात् सत्पुरुषोंके आश्रयरूप एवं रणविजयी भगवान् देवताओंके विषयमें कार्यकी चिन्तना करते हुए सारे लोककी सृष्टि करते हैं। वे ही परमात्मा इस समस्त सृष्टिके कर्ता, विकर्ता, संहर्ता और प्रजापति हैं। नारायण ही परम सत्य, नारायण ही परम पद, नारायण ही परम यज्ञ और नारायण ही परमगति हैं। उन्हें ही स्वयम्भू, सभी भुवनोंका अधीश्वर और स्रष्टा जानना चाहिये। उन्हींको सर्वरूप समझना चाहिये। ये यज्ञस्वरूप और प्रजापति हैं। देवताओंद्वारा जो जाननेयोग्य है, वह ये ही कहे जाते हैं॥ २८—३७॥<br><br>भगवान्‌का जो स्वरूप जाननेयोग्य है, उसे देवगण भी नहीं जानते। सभी प्रजापति, देवतागण और ऋषिगण खोजते रहते हैं, किंतु इनका अन्त नहीं पाते—ऐसी श्रुति है। इस परमात्माका जो परम स्वरूप है, उसे देवतालोग भी नहीं देख पाते। उनके प्रादुर्भावकालमें जिस स्वरूपके दर्शन होते हैं, देवगण उसीकी पूजा करते हैं। यदि उन्होंने स्वयं ही अपने रूपको दिखा दिया तो देवगण उसे देख पाते हैं। वे जिस रूपका दर्शन नहीं कराते, उसकी खोज करनेके लिये कौन तत्पर हो सकता है? जो सभी जीवोंके नायक, अग्नि और वायुकी गति, तेज, तपस्या और अमृतके निधान, चारों आश्रमधर्मोंके स्वामी, चातुर्होत्र यज्ञके फलका भक्षण करनेवाले, चारों समुद्रोंतक व्याप्त और चारों युगोंकी निवृत्ति करनेवाले हैं, वे ही महायोगी भगवान् इस जगत्‌का संहारकर अपने उदरमें रख लेते हैं और हजार वर्षोंतक धारण करनेके पश्चात् उस अण्डको उत्पन्न कर देते हैं। तत्पश्चात् प्रजापति भगवान् अपने शरीरसे सुर, असुर, द्विज, सर्प, अप्सराओंके समूह, समस्त वृक्ष, ओषधि, पर्वत, यक्ष, गुह्य और श्रुतियोंसे युक्त इस जगत्‌की सृष्टि करते हैं॥ ३८—४४॥ |


इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वराहप्रादुर्भावे सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वराहप्रादुर्भाव नामक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४७॥

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९५२* मत्स्यपुराण *

दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय

वराहभगवान्‌का प्रादुर्भाव, हिरण्याक्षद्वारा रसातलमें ले जायी गयी पृथ्वीदेवीद्वारा यज्ञवराहका स्तवन और भगवान्‌द्वारा उनका उद्धार

संस्कृतहिन्दी
शौनक उवाच<br>जगदण्डमिदं पूर्वमासीद् दिव्यं हिरण्मयम्।<br>प्रजापतेरियं मूर्तिरितियं वैदिकी श्रुतिः॥ १<br>तत्तु वर्षसहस्रान्ते बिभेदोर्ध्वमुखं विभुः।<br>लोकसर्जनहेतोस्तु बिभेदाधोमुखं पुनः॥ २<br>भूयोऽष्टधा बिभेदाण्डं विष्णुर्वै लोकजन्मकृत्।<br>चकार जगतश्चात्र विभागं स विभागकृत्॥ ३<br>यच्छिद्रमूर्ध्वमाकाशं विवराकृतितां गतम्।<br>विहितं विश्वयोगेन यदधस्तद्रसातलम्॥ ४<br>यदण्डमकरोत् पूर्वं देवो लोकचिकीर्षया।<br>तत्र यत् सलिलं स्कन्नं सोऽभवत् काञ्चनो गिरिः॥ ५<br>शैलैः सहस्त्रैर्महती मेदिनी विषमाभवत्॥ ६<br>तैश्च पर्वतजालौघैर्बहुयोजनविस्तृतैः।<br>पीडिता गुरुभिर्देवी व्यथिता मेदिनी तदा॥ ७<br>महामते भूरिबलं दिव्यं नारायणात्मकम्।<br>हिरण्मयं समुत्सृज्य तेजो वै जातरूपिणम्॥ ८<br>अशक्ता वै धारयितुमधस्तात् प्राविशत् तदा।<br>पीड्यमाना भगवतस्तेजसा तस्य सा क्षितिः॥ ९<br>पृथ्वीं विशन्तीं दृष्ट्वा तु तामधो मधुसूदनः।<br>उद्धारार्थं मनश्चक्रे तस्या वै हितकाम्यया॥ १०शौनकजीने कहा— अर्जुन! यह जगत् पहले दिव्य हिरण्मय अण्डके रूपमें था। यह प्रजापतिकी मूर्ति है—ऐसी वैदिकी श्रुति है। एक हजार वर्ष व्यतीत होनेपर सर्वव्यापी एवं लोकोंके जन्मदाता विष्णुने उस अण्डके ऊर्ध्व मुखका भेदन किया और पुनः लोकसृष्टिके लिये उसके अधोमुखको भी फोड़ दिया। फिर उस अण्डको आठ भागोंमें विभक्त कर दिया। तत्पश्चात् विभागकर्ता विष्णुने जगत्‌का भी विभाजन किया। विश्वस्रष्टा भगवान्‌द्वारा किया गया जो ऊपरका छिद्र था, वह विवरके आकारवाला आकाश और जो नीचेका छिद्र था, वह रसातल हुआ। भगवान्‌ने पूर्वकालमें लोकसृष्टिकी कामनासे जिस अण्डको उत्पन्न किया था, उससे जो जल टपका था, वह स्वर्णमय सुमेरु पर्वत हुआ और हजारों पर्वतोंके संयोगसे विशाल पृथ्वी विषमा अर्थात् ऊँची-नीची हो गयी। उस समय अनेकों योजन विस्तृत उन भारी पर्वतसमूहोंसे पीड़ित हुई पृथ्वी व्याकुल हो गयी। महामते! तब पृथ्वी जो स्वर्णमय तेजसे युक्त, महान् बलसे सम्पन्न और नारायणस्वरूप था, उस दिव्य हिरण्मय अण्डको धारण करनेमें असमर्थ होकर उसे त्यागकर नीचेकी ओर जाने लगीं; क्योंकि वह उन भगवान्‌के तेजसे पीड़ित हो रही थी। तब भगवान् मधुसूदनने पृथ्वीको नीचे प्रवेश करती हुई देखकर लोककल्याण-भावनासे उसके उद्धारका विचार किया॥ १—१०॥
श्रीभगवानुवाच<br>मत्तेज एषा वसुधा समासाद्य तपस्विनी।<br>रसातलं प्रविशति पङ्के गौरिव दुर्बला॥ ११श्रीभगवान्‌ने कहा— यह तपस्विनी पृथ्वी मेरे तेजको प्राप्तकर (धारण करनेमें असमर्थ हो) कीचड़में फँसी हुई दुबली गौकी भाँति रसातलमें प्रवेश कर रही है॥ ११॥
पृथिव्युवाच<br>त्रिविक्रमायामितविक्रमाय<br>महावराहाय सुरोत्तमाय।<br>श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय<br>नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद॥ १२पृथ्वीने कहा— जो तीन पगमें पृथ्वीको नाप लेनेवाले वामनरूप, अमित पराक्रमी महावराहरूप, सुरश्रेष्ठ तथा लक्ष्मी, धनुष, चक्र, खड्ग और गदा धारण करनेवाले हैं, ऐसे आपको नमस्कार है। देवश्रेष्ठ! आप मुझपर प्रसन्न हो जाइये।
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* अध्याय २४८ *९५३

| तव देहाज्जगज्जातं पुष्करद्वीपमुत्थितम्।<br>ब्रह्माणमिह लोकानां भूतानां शाश्वतं विदुः॥ १३<br>तव प्रसादाद् देवोऽयं दिवं भुङ्क्ते पुरन्दरः।<br>तव क्रोधाद्द्वि बलवान् जनार्दन जितो बलिः॥ १४<br>धाता विधाता संहर्ता त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।<br>मनुः कृतान्तोऽधिपतिर्ज्वलनः पवनो घनः॥ १५<br>वर्णाश्चाश्रमधर्माश्च सागरास्तरवोऽचलाः।<br>नद्यो धर्मश्च कामश्च यज्ञा यज्ञस्य च क्रियाः॥ १६<br>विद्या वेद्यं च सत्त्वं च ह्रीः श्रीः कीर्तिर्धृतिः क्षमा।<br>पुराणं वेदवेदाङ्गं सांख्ययोगौ भवाभवौ॥ १७<br>जङ्गमं स्थावरं चैव भविष्यं च भवच्च यत्।<br>सर्वं तच्च त्रिलोकेषु प्रभावोपहितं तव॥ १८<br>त्रिदशोदारफलदः स्वर्गस्त्रीचारुपल्लवः।<br>सर्वलोकमनःकान्तः सर्वसत्त्वमनोहरः॥ १९<br>विमानानेकविटपस्तोयदाम्बुमधुस्रवः ।<br>दिव्यलोकमहास्कन्धः सत्यलोकप्रशाखवान्॥ २०<br>सागराकारनिर्‍यासो रसातलजलाश्रयः।<br>नागेन्द्रपादपोपेतो जन्तुपक्षिनिषेवितः॥ २१ | प्रभो! आपके शरीरसे जगत् उत्पन्न हुआ है, पुष्कर द्वीपकी उत्पत्ति हुई है और ब्रह्मा प्रकट हुए हैं, आप सभी लोकों और प्राणियोंके सनातन पुरुष माने जाते हैं। आपकी कृपासे ये देवराज इन्द्र स्वर्गका उपभोग कर रहे हैं। जनार्दन! आपके क्रोधसे बलवान् बलि जीता गया है। आप धाता, विधाता और संहर्ता हैं। आपमें समस्त जगत् प्रतिष्ठित है। मनु, प्रजापति, यम, अग्नि, पवन, मेघ, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, समुद्र, वृक्ष, पर्वत, नदियाँ, धर्म, काम, यज्ञ; यज्ञकी क्रियाएँ, विद्या, जाननेयोग्य अन्य बातें, जीवगण, लज्जा, ह्री, श्री, कीर्ति, धैर्य, क्षमा, पुराण, वेद, वेदाङ्ग, सांख्य, योग, जन्म, मरण, जंगम, स्थावर, भूत और भविष्यत्—ये सभी तीनों लोकोंमें आपके प्रभावसे आच्छादित हैं। आप देवताओंको उत्तम फल देनेवाले, स्वर्गकी रमणियोंके लिये सुन्दर पल्लवरूप, सभी लोगोंके मनको प्रिय लगनेवाले, सभी जीवोंके मनके हरणकर्ता, विमानरूपी अनेक वृक्षोंसे युक्त, मेघोंके जलरूप मधु टपकानेवाले, दिव्य लोकरूप महान् स्कन्धवाले, सत्यलोकरूप शाखाओंसे युक्त, सागररूप रस, रसातलकी तरह जलके आश्रयस्थान, ऐरावतरूप वृक्षसे युक्त तथा जन्तुओं और पक्षियोंसे सुसेवित हैं॥ १२—२१॥ |
| शीलाचारार्यगन्धस्त्वं सर्वलोकमयोद्रुमः।<br>द्वादशार्कमयद्वीपो रुद्रैकादशपत्तनः॥ २२<br>वस्वष्टाचलसंयुक्तस्त्रैलोक्याम्भोमहोदधिः ।<br>सिद्धसाध्योर्मिकलिलः सुपर्णानिलसेवितः॥ २३<br>दैत्यलोकमहाग्राहो रक्षोरगझषाकुलः।<br>पितामहमहाधैर्यः स्वर्गस्त्रीरत्नभूषितः॥ २४<br>धीश्रीह्रीकान्तिभिर्नित्यं नदीभिरुपशोभितः।<br>कालयोगमहापर्वप्रयागगतिवेगवान् ॥ २५ | आप शील, सदाचार और श्रेष्ठ गन्धसे युक्त, सर्वलोकमय वृक्ष, बारह आदित्योंसे युक्त द्वीप, ग्यारह रुद्ररूप नगर, आठों वसुरूप पर्वत, त्रिलोकीरूप जलसे परिपूर्ण महासागर, सिद्ध और साध्यरूप लहरोंसे युक्त, गरुडरूप वायुसे सेवित, दैत्यसमूहरूप महान् ग्राह, राक्षस और नागरूपी मछलियोंसे व्याप्त, ब्रह्मारूप महान् धैर्यसम्पन्न, स्वर्गकी अप्सरारूप रत्नसे विभूषित हैं। आप बुद्धि, लक्ष्मी, लज्जा और कान्तिरूपी नदियोंसे नित्य सुशोभित तथा कालके योगसे उत्पन्न होनेवाले महापर्वके समय वेगपूर्वक प्रयागमें गमन करनेवाले हैं। |
| त्वं स्वयोगमहावीर्यो नारायण महार्णवः।<br>कालो भूत्वा प्रसन्नाभिरद्भिर्ह्लादयसे पुनः॥ २६ | नारायण! आप अपने योगरूपी महापराक्रमसे सम्पन्न महासागर हैं और पुनः आप ही काल बनकर निर्मल जलसे जगत्को आह्लादित करते हैं। |
| त्वया सृष्टास्त्रयो लोकास्त्वयैव प्रतिसंहृताः।<br>विशन्ति योगिनः सर्वे त्वामेव प्रतियोगिताः॥ २७ | आपने तीनों लोकोंकी सृष्टि की है और आपसे ही उनका संहार होता है। आपके द्वारा नियुक्त किये गये सभी योगी आपमें ही प्रविष्ट होते हैं। |
| युगे युगे युगान्ताग्निः कालमेघो युगे युगे।<br>मम भारावताराय देव त्वं हि युगे युगे॥ २८ | देव! आप प्रत्येक युगमें प्रलयाग्नि और प्रत्येक युगमें प्रलयकालीन मेघ हैं तथा मेरा भार उतारनेके लिये आप प्रत्येक युगमें अवतीर्ण होते हैं। |

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९५४* मत्स्यपुराण *

| त्वं हि शुक्लः कृतयुगे त्रेतायां चम्पकप्रभः।<br>द्वापरे रक्तसंकाशः कृष्णः कलियुगे भवान्॥ २९<br>वैवर्ण्यमभिधत्से त्वं प्राप्तेषु युगसंधिषु।<br>वैवर्ण्यं सर्वधर्माणामुत्पादयसि वेदवित्॥ ३०<br>भासि वासि प्रतपसि त्वं च पासि विचेष्टसे।<br>क्रुद्ध्यसि क्षान्तिमायासि त्वं दीपयसि वर्षसि॥ ३१<br>त्वं हास्यसि न निर्यासि निर्वापयसि जाग्रसि।<br>निःशेषयसि भूतानि कालो भूत्वा युगक्षये॥ ३२<br>शेषमात्मानमालोक्य विशेषयसि त्वं पुनः।<br>युगान्ताग्न्यवलीढेषु सर्वभूतेषु किञ्चन॥ ३३<br>यातेषु शेषो भवसि तस्माच्छेषोऽसि कीर्तितः।<br>च्यवनोत्पत्तियुक्तेषु ब्रह्मेन्द्रवरुणादिषु॥ ३४<br>यस्मान्न च्यवसे स्थानात्तस्मात् संकीर्त्यसेऽच्युतः।<br>ब्रह्माणमिन्द्रं च यमं रुद्रं वरुणमेव च॥ ३५<br>निगृह्य हरसे यस्माद् तस्माद्धरिरिहोच्यसे।<br>संतानयसि भूतानि वपुषा यशसा श्रिया॥ ३६<br>परेण वपुषा देव तस्माच्चासि सनातनः।<br>यस्माद् ब्रह्मादयो देवा मुनयश्चोग्रतेजसः॥ ३७<br>न तेऽन्तं त्वधिगच्छन्ति तेनानन्तस्त्वमुच्यसे।<br>न क्षीयसे न क्षरसे कल्पकोटिशतैरपि॥ ३८<br>तस्मात् त्वमक्षरत्वाच्च अक्षरश्च प्रकीर्तितः।<br>विष्टब्धं यत्त्वया सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ३९<br>जगद्विष्टम्भनाच्चैव विष्णुरेवेति कीर्त्यसे।<br>विष्टभ्य तिष्ठसे नित्यं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४०<br>यक्षगन्धर्वनगरं सुमहद्भूतपन्नगम्।<br>व्याप्तं त्वयैव विशता त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४१<br>तस्माद् विष्णुरिति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा।<br>नारा इत्युच्यते ह्यापो हृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ४२<br>अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।<br>युगे युगे प्रनष्टां गां विष्णो विन्दसि तत्त्वतः॥ ४३<br>गोविन्देति ततो नाम्ना प्रोच्यसे ऋषिभिस्तथा।<br>हृषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्तत्त्वज्ञानविशारदाः॥ ४४<br>ईशिता च त्वमेतेषां हृषीकेशस्तथोच्यसे। | आप कृतयुगमें श्वेतवर्ण, त्रेतामें चम्पक-पुष्प-सदृश पीतवर्ण, द्वापरमें रक्तवर्ण और कलियुगमें श्यामवर्ण हो जाते हैं। वेदज्ञ! युग-संधियोंके प्राप्त होनेपर आप विवर्णताको धारण करते हैं और सभी धर्मोंमें विपरीतता उत्पन्न कर देते हैं। आप प्रकाशित होते, प्रवाहित होते, तपते, रक्षा करते और चेष्टा करते हैं। आप क्रोध करते, शान्ति धारण करते, उद्दीप्त करते और वर्षा करते हैं। आप हँसते, स्थिर रहते, मारते और जागते रहते हैं तथा प्रलयकालमें काल बनकर सभी जीवोंको निःशेष कर देते हैं॥ २२—३२॥<br><br>फिर अपनेको शेष बचा हुआ देखकर पुनः आप उसकी वृद्धि करते हैं। युगान्तकी अग्निमें सभी भूतोंके दग्ध हो जानेपर एकमात्र आप शेष रहते हैं, इसलिये आप 'शेष' नामसे पुकारे जाते हैं। ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण आदि देवता उत्पत्ति और पतनसे युक्त हैं, किंतु आप अपने स्थानसे च्युत नहीं होते, इसलिये 'अच्युत' कहलाते हैं। चूँकि आप ब्रह्मा, इन्द्र, यम, रुद्र और वरुणका निग्रहपूर्वक हरण करते हैं, इसलिये यहाँ 'हरि' कहे जाते हैं। देव! आप अपने शरीर, यश, श्री और विराट् शरीरद्वारा सभी जीवोंका विस्तार करते हैं, इसलिये 'सनातन' हैं। चूँकि ब्रह्मा आदि देवगण और उग्र तेजस्वी मुनिगण आपका अन्त नहीं जान पाते, इसीलिये आप 'अनन्त' कहे जाते हैं। सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी न तो आप क्षीण होते हैं और न नष्ट होते हैं, इसलिये विनाशरहित होनेके कारण आप 'अक्षर' कहे गये हैं। आप सम्पूर्ण चराचर जगत्को स्तम्भित किये रहते हैं, इसीलिये जगत्का विष्टम्भन करनेके कारण 'विष्णु' कहे जाते हैं। आप सचराचर त्रिलोकीको नित्य अवरुद्ध करके स्थित रहते हैं तथा आप ही यक्षों एवं गन्धर्वोंके नगरोंसे सम्पन्न और महान् नागोंसे युक्त चराचरसहित त्रिलोकीमें प्रवेश करके उसे व्याप्त किये रहते हैं, इसीलिये स्वंय ब्रह्माने आपको 'विष्णु' नामसे अभिहित किया है। तत्त्वदर्शी ऋषियोंने जलका नाम 'नारा' कहा है और वह पूर्वकालमें आपका निवासस्थान था, इसीसे आप 'नारायण' कहे जाते हैं। विष्णो! प्रत्येक युगमें नष्ट हुई गोरूपिणी पृथ्वीको तत्त्वतः आप ही प्राप्त करते हैं, इसीलिये ऋषिगण आपको 'गोविन्द' नामसे पुकारते हैं। तत्त्वज्ञानमें निपुणजन इन्द्रियोंको हृषीक कहते हैं और आप उन इन्द्रियोंके शासक हैं, अतः 'हृषीकेश' कहे जाते हैं॥ ३३—४४ ½॥ |