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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 961 of 1098

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Page 961
  • अध्याय २४७ * । १५१

| ततः संचिन्तयन् कार्यं देवेषु समितिञ्जयः।<br>सम्भवं सर्वलोकस्य विदधाति सतां गतिः॥ ३४<br><br>कर्ता चैव विकर्ता च संहर्ता वै प्रजापतिः।<br>नारायणः परं सत्यं नारायणः परं पदम्॥ ३५<br><br>नारायणः परो यज्ञो नारायणः परा गतिः।<br>स स्वयम्भूरिति ज्ञेयः स स्रष्टा भुवनाधिपः॥ ३६<br><br>स सर्वमिति विज्ञेयो ह्येष यज्ञः प्रजापतिः।<br>यद् वेदितव्यस्त्रिदशैस्तदेष परिकीर्त्यते॥ ३७<br><br>यत्तु वेद्यं भगवतो देवा अपि न तद् विदुः।<br>प्रजानां पतयः सर्वे ऋषयश्च सहामरैः॥ ३८<br><br>नास्यान्तमधिगच्छन्ति विचिन्वन्त इति श्रुतिः।<br>यदस्य परमं रूपं न तत् पश्यन्ति देवताः॥ ३९<br><br>प्रादुर्भावे तु यद् रूपं तदर्चन्ति दिवौकसः।<br>दर्शितं यदि तेनैव तदवेक्षन्ति देवताः॥ ४०<br><br>यन्न दर्शितवानेष कस्तदन्वेष्टुमीहते।<br>ग्रामणीः सर्वभूतानामग्निमारुतयोर्गतिः॥ ४१<br><br>तेजसस्तपसश्चैव निधानममृतस्य च।<br>चतुराश्रमधर्मेशश्चातुर्होत्रफलाशनः ॥ ४२<br><br>चतुःसागरपर्यन्तश्चतुर्युगनिर्वर्तकः ।<br>तदेष संहृत्य जगत् कृत्वा गर्भस्थमात्मनः।<br>मुमोचाण्डं महायोगी धृतं वर्षसहस्रकम्॥ ४३<br><br>सुरासुरद्विजभुजगाप्सरोगणै-<br>र्दुमौषधिक्षितिधरयक्षगुह्यकैः ।<br>प्रजापतिः श्रुतिभिरसंकुलं किल<br>तदासृजज्जगदिदमात्मना प्रभुः॥ ४४ | तत्पश्चात् सत्पुरुषोंके आश्रयरूप एवं रणविजयी भगवान् देवताओंके विषयमें कार्यकी चिन्तना करते हुए सारे लोककी सृष्टि करते हैं। वे ही परमात्मा इस समस्त सृष्टिके कर्ता, विकर्ता, संहर्ता और प्रजापति हैं। नारायण ही परम सत्य, नारायण ही परम पद, नारायण ही परम यज्ञ और नारायण ही परमगति हैं। उन्हें ही स्वयम्भू, सभी भुवनोंका अधीश्वर और स्रष्टा जानना चाहिये। उन्हींको सर्वरूप समझना चाहिये। ये यज्ञस्वरूप और प्रजापति हैं। देवताओंद्वारा जो जाननेयोग्य है, वह ये ही कहे जाते हैं॥ २८—३७॥<br><br>भगवान्‌का जो स्वरूप जाननेयोग्य है, उसे देवगण भी नहीं जानते। सभी प्रजापति, देवतागण और ऋषिगण खोजते रहते हैं, किंतु इनका अन्त नहीं पाते—ऐसी श्रुति है। इस परमात्माका जो परम स्वरूप है, उसे देवतालोग भी नहीं देख पाते। उनके प्रादुर्भावकालमें जिस स्वरूपके दर्शन होते हैं, देवगण उसीकी पूजा करते हैं। यदि उन्होंने स्वयं ही अपने रूपको दिखा दिया तो देवगण उसे देख पाते हैं। वे जिस रूपका दर्शन नहीं कराते, उसकी खोज करनेके लिये कौन तत्पर हो सकता है? जो सभी जीवोंके नायक, अग्नि और वायुकी गति, तेज, तपस्या और अमृतके निधान, चारों आश्रमधर्मोंके स्वामी, चातुर्होत्र यज्ञके फलका भक्षण करनेवाले, चारों समुद्रोंतक व्याप्त और चारों युगोंकी निवृत्ति करनेवाले हैं, वे ही महायोगी भगवान् इस जगत्‌का संहारकर अपने उदरमें रख लेते हैं और हजार वर्षोंतक धारण करनेके पश्चात् उस अण्डको उत्पन्न कर देते हैं। तत्पश्चात् प्रजापति भगवान् अपने शरीरसे सुर, असुर, द्विज, सर्प, अप्सराओंके समूह, समस्त वृक्ष, ओषधि, पर्वत, यक्ष, गुह्य और श्रुतियोंसे युक्त इस जगत्‌की सृष्टि करते हैं॥ ३८—४४॥ |


इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वराहप्रादुर्भावे सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वराहप्रादुर्भाव नामक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४७॥