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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 958 of 1098

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Page 958

९४८ * मत्स्यपुराण *


यतो यदुकुले कृष्णो भवतः शत्रुनिग्रहे।<br>सहायभूतः सारथ्यं करिष्यति बलानुजः॥ ९०<br>एतत् सर्वं समाख्यातं वामनस्य च धीमतः।<br>अवतारं महावीर श्रोतुमिच्छोस्त्ववार्जुन ॥ ९१कृष्णरूपसे यदुकुलमें उत्पन्न होकर विराजमान हैं। वे तुम्हारे सम्बन्धी हैं। बलरामके छोटे भाई वे श्रीकृष्ण तुम्हारे शत्रुओंके निग्रहके समय सारथिरूपसे तुम्हारी सहायता करेंगे। महावीर अर्जुन ! बुद्धिमान् वामनके अवतारकी यह सारी कथा मैंने तुमसे वर्णन कर दी, जिसे तुम सुनना चाहते थे॥ ८६—९१॥
अर्जुन उवाच<br>श्रुतवानिह ते पृष्टं माहात्म्यं केशवस्य च।<br>गङ्गाद्वारमितो यास्याम्यनुज्ञां देहि मे विभो॥ ९२अर्जुन बोले—विभो! भगवान् विष्णुके माहात्म्यको, जिसे मैंने पूछा था, उसे मैं आपके मुखसे सुन चुका। अब मैं यहाँसे गङ्गाद्वार (हरिद्वार) जाना चाहता हूँ, इसके लिये आप मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये॥ ९२॥
सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा ययौ पार्थो नैमिषं शौनको गतः।<br>इत्येतद् देवदेवस्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>वामनस्य पठेद् यस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ९३<br>बलिप्रह्लादसंवादं मन्त्रितं बलिशुक्रयोः।<br>बलेर्विष्णोश्च कथितं यः स्मरिष्यति मानवः॥ ९४<br>नाधयो व्याधयस्तस्य न च मोहाकुलं मनः।<br>भविष्यति द्विजश्रेष्ठाः पुंसस्तस्य कदाचन॥ ९५<br>च्युतराज्यो निजं राज्यमिष्टाप्तिं च वियोगवान्।<br>अवाप्नोति महाभागो नरः श्रुत्वा कथामिमाम् ॥ ९६सूतजी कहते हैं—ऋषियो! ऐसा कहकर अर्जुन गङ्गाद्वारको चले गये और महर्षि शौनक नैमिषारण्यकी ओर प्रस्थित हुए। इस प्रकार जो देवाधिदेव भगवान् वामनके इस उत्तम माहात्म्यका पाठ करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजवरो! जो मनुष्य बलि और प्रह्लादके संवाद, बलि और शुक्रकी मन्त्रणा तथा बलि और विष्णुके कथनोपकथनका स्मरण करेगा, उस पुरुषको कभी भी न तो किसी प्रकारकी आधि-व्याधि प्राप्ति होगी और न उसका मन मोहसे व्याकुल होगा। जो महान् भाग्यशाली मनुष्य इस कथाको सुनता है, वह राज्यच्युत हो तो अपने राज्यको और वियोगी हो तो अपने इष्टको प्राप्त कर लेता है ॥ ९३—९६ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावो नाम षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामनप्रादुर्भाव नामक दो सौ छियालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २४६ ॥


दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय

अर्जुनके वाराहावतारविषयक प्रश्न करनेपर शौनकजीद्वारा भगवत्स्वरूपका वर्णन

अर्जुन उवाच<br>प्रादुर्भावान् पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः।<br>सतां कथयतां विप्र वाराह इति नः श्रुतम् ॥ १<br>जाने न तस्य चरितं न विधिं न च विस्तरम्।<br>न कर्म गुणसंख्यानं न चाप्यन्तं मनीषिणः ॥ २<br>किमात्मको वराहोऽसौ किं मूर्तिः कस्य देवता ।<br>किं प्रमाणः किं प्रभावः किं वा तेन पुरा कृतम् ॥ ३अर्जुनने पूछा—विप्रवर! पुराणोंमें संतोंद्वारा अपरिमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके अवतारोंके वर्णनमें हमने वाराह-अवतारकी बात सुनी है, किंतु मैं उन बुद्धिमान् भगवान्के चरित्र, विस्तार, कर्म, गुण और आराधनाविधिको नहीं जानता। वे वाराहभगवान् किस प्रकारके हैं? उनका स्वरूप कैसा है? उनकी देवशक्ति कैसी है? उनका क्या प्रमाण और कितना प्रभाव है? प्राचीनकालमें उन्होंने क्या कार्य किये हैं?