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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 962 of 1098

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Page 962
९५२* मत्स्यपुराण *

दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय

वराहभगवान्‌का प्रादुर्भाव, हिरण्याक्षद्वारा रसातलमें ले जायी गयी पृथ्वीदेवीद्वारा यज्ञवराहका स्तवन और भगवान्‌द्वारा उनका उद्धार

संस्कृतहिन्दी
शौनक उवाच<br>जगदण्डमिदं पूर्वमासीद् दिव्यं हिरण्मयम्।<br>प्रजापतेरियं मूर्तिरितियं वैदिकी श्रुतिः॥ १<br>तत्तु वर्षसहस्रान्ते बिभेदोर्ध्वमुखं विभुः।<br>लोकसर्जनहेतोस्तु बिभेदाधोमुखं पुनः॥ २<br>भूयोऽष्टधा बिभेदाण्डं विष्णुर्वै लोकजन्मकृत्।<br>चकार जगतश्चात्र विभागं स विभागकृत्॥ ३<br>यच्छिद्रमूर्ध्वमाकाशं विवराकृतितां गतम्।<br>विहितं विश्वयोगेन यदधस्तद्रसातलम्॥ ४<br>यदण्डमकरोत् पूर्वं देवो लोकचिकीर्षया।<br>तत्र यत् सलिलं स्कन्नं सोऽभवत् काञ्चनो गिरिः॥ ५<br>शैलैः सहस्त्रैर्महती मेदिनी विषमाभवत्॥ ६<br>तैश्च पर्वतजालौघैर्बहुयोजनविस्तृतैः।<br>पीडिता गुरुभिर्देवी व्यथिता मेदिनी तदा॥ ७<br>महामते भूरिबलं दिव्यं नारायणात्मकम्।<br>हिरण्मयं समुत्सृज्य तेजो वै जातरूपिणम्॥ ८<br>अशक्ता वै धारयितुमधस्तात् प्राविशत् तदा।<br>पीड्यमाना भगवतस्तेजसा तस्य सा क्षितिः॥ ९<br>पृथ्वीं विशन्तीं दृष्ट्वा तु तामधो मधुसूदनः।<br>उद्धारार्थं मनश्चक्रे तस्या वै हितकाम्यया॥ १०शौनकजीने कहा— अर्जुन! यह जगत् पहले दिव्य हिरण्मय अण्डके रूपमें था। यह प्रजापतिकी मूर्ति है—ऐसी वैदिकी श्रुति है। एक हजार वर्ष व्यतीत होनेपर सर्वव्यापी एवं लोकोंके जन्मदाता विष्णुने उस अण्डके ऊर्ध्व मुखका भेदन किया और पुनः लोकसृष्टिके लिये उसके अधोमुखको भी फोड़ दिया। फिर उस अण्डको आठ भागोंमें विभक्त कर दिया। तत्पश्चात् विभागकर्ता विष्णुने जगत्‌का भी विभाजन किया। विश्वस्रष्टा भगवान्‌द्वारा किया गया जो ऊपरका छिद्र था, वह विवरके आकारवाला आकाश और जो नीचेका छिद्र था, वह रसातल हुआ। भगवान्‌ने पूर्वकालमें लोकसृष्टिकी कामनासे जिस अण्डको उत्पन्न किया था, उससे जो जल टपका था, वह स्वर्णमय सुमेरु पर्वत हुआ और हजारों पर्वतोंके संयोगसे विशाल पृथ्वी विषमा अर्थात् ऊँची-नीची हो गयी। उस समय अनेकों योजन विस्तृत उन भारी पर्वतसमूहोंसे पीड़ित हुई पृथ्वी व्याकुल हो गयी। महामते! तब पृथ्वी जो स्वर्णमय तेजसे युक्त, महान् बलसे सम्पन्न और नारायणस्वरूप था, उस दिव्य हिरण्मय अण्डको धारण करनेमें असमर्थ होकर उसे त्यागकर नीचेकी ओर जाने लगीं; क्योंकि वह उन भगवान्‌के तेजसे पीड़ित हो रही थी। तब भगवान् मधुसूदनने पृथ्वीको नीचे प्रवेश करती हुई देखकर लोककल्याण-भावनासे उसके उद्धारका विचार किया॥ १—१०॥
श्रीभगवानुवाच<br>मत्तेज एषा वसुधा समासाद्य तपस्विनी।<br>रसातलं प्रविशति पङ्के गौरिव दुर्बला॥ ११श्रीभगवान्‌ने कहा— यह तपस्विनी पृथ्वी मेरे तेजको प्राप्तकर (धारण करनेमें असमर्थ हो) कीचड़में फँसी हुई दुबली गौकी भाँति रसातलमें प्रवेश कर रही है॥ ११॥
पृथिव्युवाच<br>त्रिविक्रमायामितविक्रमाय<br>महावराहाय सुरोत्तमाय।<br>श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय<br>नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद॥ १२पृथ्वीने कहा— जो तीन पगमें पृथ्वीको नाप लेनेवाले वामनरूप, अमित पराक्रमी महावराहरूप, सुरश्रेष्ठ तथा लक्ष्मी, धनुष, चक्र, खड्ग और गदा धारण करनेवाले हैं, ऐसे आपको नमस्कार है। देवश्रेष्ठ! आप मुझपर प्रसन्न हो जाइये।