Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 946 of 1098

Read in context
Page 946

९३६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
परावराणां परमः परः परवतामपि।<br>प्रमाणं च प्रमाणानां सप्तलोकगुरोर्गुरुः॥ १८<br>प्रभुः प्रभूणां परमः पराणा-<br>मनादिमध्यो भगवाननन्तः ।<br>त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेष<br>कर्तुं महात्मादितिजोऽवतीर्णः॥ १९<br>न यस्य रुद्रो न च पद्मयोनि-<br>र्नैन्द्रो न सूर्येन्दुमरीचिमुख्याः।<br>जानन्ति दैत्याधिप यत्स्वरूपं<br>स वासुदेवः कलयावतीर्णः॥ २०<br>योऽसौ कलांशेन नृसिंहरूपी<br>जघान पूर्वं पितरं ममेशः।<br>यः सर्वयोगीशमनोनिवासः<br>स वासुदेवः कलयावतीर्णः॥ २१<br>यमक्षरं वेदविदो विदित्वा<br>विशन्ति यज्ज्ञानविधूतपापाः।<br>यस्मिन् प्रविष्टा न पुनर्भवन्ति<br>तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम्॥ २२पापनाशक, परावरोंमें उत्तम, परात्पर, प्रमाणोंके प्रमाण, सातों लोकोंके गुरुके गुरु, प्रभुके प्रभु, पर-से-परे, आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न हैं, वे भगवान् अपने अंशसे त्रिलोकीको सनाथ करनेके लिये अदितिके गर्भसे अवतीर्ण हो रहे हैं। दैत्यपते! जिनके स्वरूपको रुद्र, पद्मयोनि ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, मरीचि प्रभृति महर्षिगण नहीं जानते, वे भगवान् वासुदेव अपनी कलासे उत्पन्न हो रहे हैं। जिन भगवान्ने पूर्वकालमें अपनी एक कलाद्वारा नृसिंहरूपमें अवतीर्ण होकर मेरे पिता (हिरण्यकशिपु)-का वध किया था तथा जो सभी योगिराजोंके मनमें निवास करनेवाले हैं, वे भगवान् वासुदेव अपनी कलासे अवतीर्ण हो रहे हैं। जिनके ज्ञानसे पापमुक्त हुए वेदवेत्ता जिन अव्यय भगवान्को जानकर उनमें प्रवेश करते हैं तथा जिनमें प्रवेश कर पुनः जन्म नहीं धारण करते, उन भगवान् वासुदेवको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ॥ १६—२२॥
भूतान्यशेषाणि यतो भवन्ति<br>यथोर्मयस्तोयनिधेरजस्रम्।<br>लयं च यस्मिन् प्रलये प्रयान्ति<br>तं वासुदेवं प्रणमाम्यचिन्त्यम्॥ २३समस्त प्राणी समुद्रसे लहरोंकी भाँति जिनसे निरन्तर उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुनः जिनमें लय हो जाते हैं, उन अचिन्त्य वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ।
न यस्य रूपं न बलप्रभावौ<br>न यस्य भावः परमस्य पुंसः।<br>विज्ञायते शर्वपितामहाद्यै-<br>स्तं वासुदेवं प्रणमाम्यजस्रम्॥ २४जिन परम पुरुषके स्वरूप, बल, प्रभाव और भावको शिव तथा ब्रह्मा आदि देवगण भी नहीं समझ पाते, उन भगवान् वासुदेवको मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ।
रूपस्य चक्षुर्ग्रहणे त्वगिष्टा<br>स्पर्शे ग्रहीत्री रसना रसस्य।<br>श्रोत्रं च शब्दग्रहणे नराणां<br>घ्राणं च गन्धग्रहणे नियुक्तम्॥ २५<br>येनैकदंष्ट्राग्रसमुद्धृतेयं<br>धराचलान् धारयतीह सर्वान्।<br>यस्मिंश्च शेते सकलं जगच्च<br>तमीशमाद्यं प्रणतोऽस्मि विष्णुम्॥ २६जिन भगवान् वासुदेवने मनुष्योंको स्वरूप देखनेके लिये नेत्र, स्पर्शके लिये चमड़ा, रसास्वादनके लिये जिह्वा, शब्द सुननेके लिये कान तथा सुगन्ध ग्रहण करनेके लिये नासिका दी है, जिन्होंने अपने एक दाँतके अग्रभागपर इस पृथ्वीको, जो सभी पर्वतोंको धारण करती है, धारण किया है, तथा जिनमें यह समस्त जगत् शयन करता है, उन आदिभूत भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ।