मत्स्य महापुराण

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| * अध्याय २४७ * | ९४९ |
|---|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
| एतन्मे शंस तत्त्वेन वाराहं श्रुतिविस्तरम्।<br>यथाहं च समेतानां द्विजातीनां विशेषतः॥ ४<br>शौनक उवाच<br>एतत् ते कथयिष्यामि पुराणं ब्रह्मसम्मितम्।<br>महावराहचरितं कृष्णस्याद्भुतकर्मणः॥ ५<br>यथा नारायणो राजन् वाराहं वपुरास्थितः।<br>दंष्ट्रया गां समुद्रस्थामुज्जहारारिमर्दनः॥ ६<br>छन्दोगीर्भिरुदाराभिः श्रुतिभिः समलङ्कृतः।<br>मनःप्रसन्नतां कृत्वा निबोध विजयाधुना॥ ७<br>इदं पुराणं परमं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।<br>नानाश्रुतिसमायुक्तं नास्तिकाय न कीर्तयेत्॥ ८<br>पुराणं वेदमखिलं सांख्यं योगं च वेद यः।<br>कात्स्न्र्येन विधिना प्रोक्तं सौख्यार्थं वेदयिष्यति॥ ९<br>विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रादित्यास्तथाश्विनौ।<br>प्रजानां पतयश्चैव सप्त चैव महर्षयः॥ १०<br>मनःसंकल्पजाश्चैव पूर्वजा ऋषयस्तथा।<br>वसवो मरुतश्चैव गन्धर्वा यक्षराक्षसाः॥ ११<br>दैत्याः पिशाचा नागाश्च भूतानि विविधानि च।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा म्लेच्छाश्च ये भुवि॥ १२<br>चतुष्पदानि सर्वाणि तिर्यग्योनिशतानि च।<br>जङ्गमानि च सत्त्वानि यच्चान्यज्जीवसंज्ञितम्॥ १३<br>पूर्णे युगसहस्रे तु ब्राह्मेऽहनि तथागते।<br>निर्वाणे सर्वभूतानां सर्वोत्पातसमुद्भवे॥ १४<br>हिरण्यरेतास्त्रिशिखस्ततो भूत्वा वृषाकपिः।<br>शिखाभिर्विधमँल्लोकानशोषयत वह्निना॥ १५ | इसलिये पुराणोंमें कही हुई वाराह-अवतारकी ये सारी बातें मुझे तथा विशेषकर यहाँ आये हुए इन ब्राह्मणोंको तत्त्वपूर्वक बतलाइये॥ १-४॥<br>**शौनकजी बोले—**अर्जुन! मैं तुमसे अद्भुतकर्मा भगवान् श्रीकृष्णके महावाराह-अवतारके चरित्रको, जो पुराणोंमें वर्णित तथा ब्रह्मसम्मित है, कह रहा हूँ। राजन्! जिस प्रकार शत्रुसंहारक भगवान् विष्णुने वराह-रूप धारणकर समुद्र-स्थित पृथ्वीका दाढ़ोंपर रखकर उद्धार किया था तथा जिस प्रकार उदार श्रुतियोंने वैदिक वाणीद्वारा उनका अभिनन्दन किया था, यह सब इस समय मनको प्रसन्न करके सुनो। अर्जुन! यह पुराण परम पुण्यमय, वेदोंद्वारा अनुमोदित तथा अनेकों श्रुतियोंसे सम्पन्न है, इसे नास्तिक व्यक्तिसे नहीं कहना चाहिये। जो सभी पुराणों, वेदों, सांख्य और योगको पूरी विधिके साथ जानता है, उसीसे इसकी कथा कहनी चाहिये; क्योंकि वही इसके अर्थको जान सकेगा। विश्वेदेवगण, साध्यगण, रुद्रगण, आदित्यगण, अश्विनीकुमार, प्रजापतिगण, सातों महर्षि, ब्रह्माके मानसिक संकल्पसे सर्वप्रथम उत्पन्न हुए सनकादि ब्रह्मर्षि, वसुगण, मरुद्गण, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, नाग, विविध प्रकारके जीव, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, म्लेच्छ आदि जितनी जातियाँ पृथ्वीपर हैं, सभी चौपाये, सैकड़ों तिर्यग्योनियाँ, जङ्गम प्राणी तथा अन्य जो जीव नामधारी हैं—इन सभीको एक हजार युग बीतनेके पश्चात् ब्रह्माका दिन आनेपर जब सभी प्रकारके उत्पात होने लगते हैं और सभी प्राणियोंका विनाश हो जाता है, तब हिरण्यरेता भगवान् जो वृषाकपि नामसे विख्यात हैं, तीन अग्निशिखाओंसे युक्त होकर अपनी उग्र ज्वालाओंद्वारा सभी लोकोंका विनाश करते हुए अग्निके प्रभावसे दग्ध कर देते हैं॥ ५-१५॥ |
| दह्यमानास्ततस्तस्य तेजोराशिभिरुद्गतैः।<br>विवर्णवर्णा दग्धाङ्गा हतार्चिष्मद्भिराननैः॥ १६<br>साङ्गोपनिषदो वेदा इतिहासपुरोगमाः।<br>सर्वविद्याः क्रियाश्चैव सर्वधर्मपरायणाः॥ १७<br>ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा प्रभवं विश्वतोमुखम्।<br>सर्वदेवगणाश्चैव त्रयस्त्रिंशत् तु कोटयः॥ १८ | उस दिनके प्राप्त होनेपर निकलती हुई तेजोराशिसे जिनके शरीर जल गये थे तथा झुलसे हुए मुखोंसे जिनका रंग बदल गया था, वे छहों अङ्गोंसहित वेद, उपनिषद्, इतिहास, सभी विद्याएँ, सम्पूर्ण धार्मिक क्रियाएँ और तैंतीस करोड़ सभी देवगण सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थानरूप ब्रह्माको आगे करके |