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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 955 of 1098

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Page 955
* अध्याय २४६ *९४५

| स चार्घमादाय बलिः प्रोद्भूतपुलकस्तदा ।<br>पूजयामास गोविन्दं प्राह चेदं महासुरः ॥ ४४ | उसी समय रोमाञ्चित शरीरवाले महासुर बलिने अर्घ्य लेकर गोविन्दकी पूजा की और इस प्रकार कहा ॥ ३७-४४ ॥ |
| बलिरुवाच<br>सुवर्णरत्नसंघातं गजाश्वममितं तथा ।<br>स्त्रियो वस्त्राण्यलङ्कारांस्तथा ग्रामांश्च पुष्कलान् ॥ ४५<br>सर्वस्वं सकलामुर्वी भवतो वा यदीप्सितम् ।<br>तद् ददामि वृणुष्व त्वं येनार्थी वामनः प्रियः ॥ ४६ | बलिने कहा— सुवर्ण एवं रत्नोंके समूह, असंख्य हाथी-घोड़े, स्त्रियाँ, वस्त्र, आभूषण, प्रचुर गाँव, सर्वस्व सम्पत्ति तथा सम्पूर्ण पृथ्वी—इनमेंसे जो आपको अभीष्ट हो अथवा जिसके लिये आप वामनरूपसे आये हैं, उसे आप माँगिये। मैं आपको वह प्रदान करूँगा॥ ४५-४६॥ |
| शौनक उवाच<br>इत्युक्तो दैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः ।<br>प्राह सस्मितगम्भीरं भगवान् वामनाकृतिः ॥ ४७ | शौनकजी बोले— दैत्यपति बलिके ऐसा कहनेपर गम्भीररूपसे मुसकराते हुए वामनरूपधारी भगवान् प्रेमभरी वाणीमें बोले ॥ ४७॥ |
| वामन उवाच<br>ममाग्निशरणार्थाय देहि राजन् पदत्रयम् ।<br>सुवर्णग्रामरत्नानि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ॥ ४८ | वामनभगवान्‌ने कहा— राजन्! अग्निस्थापनके लिये मुझे तीन पग पृथ्वी दीजिये। सुवर्ण, ग्राम, रत्न आदि उनके याचकोंको प्रदान कीजिये ॥ ४८ ॥ |
| बलिरुवाच<br>त्रिभिः प्रयोजनं किं ते पादैः पदवतां वर ।<br>शतं शतसहस्त्राणां पदानां मार्गतां भवान् ॥ ४९ | बलिने कहा— पदधारियोंमें श्रेष्ठ! तीन पग पृथ्वीसे आपका क्या काम चलेगा? आप सौ अथवा लाख पदोंके लिये याचना कीजिये ॥ ४९॥ |
| वामन उवाच<br>धर्मबुद्ध्या दैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि तावता ।<br>अन्येषामर्थिनां वित्तमीहितं दास्यते भवान् ॥ ५० | वामनभगवान्‌ने कहा— दैत्यपते! मैं धर्मबुद्धिसे उतनेसे ही कृतार्थ हूँ। आप अन्य याचकोंको उनका अभीष्ट धन प्रदान कीजिये ॥ ५०॥ |
| शौनक उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा तु गदितं वामनस्य महात्मनः ।<br>ददौ तस्मै महाबाहुर्वामनाय पदत्रयम् ॥ ५१<br>पाणौ तु पतिते तोये वामनोऽभूदवामनः ।<br>सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ ५२<br>चन्द्रसूर्यौ च नयने द्यौर्मूर्धा चरणौ क्षितिः ।<br>पादाङ्गुल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गुल्यश्च गुह्यकाः ॥ ५३<br>विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः ।<br>यक्षा नखेषु सम्भूता रेखाश्चाप्सरसस्तथा ॥ ५४<br>दृष्टौ ऋक्षाण्यशेषाणि केशाः सूर्यांशवः प्रभोः ।<br>तारका रोमकूपाणि रोमाणि च महर्षयः ॥ ५५<br>बाहवो विदिशस्तस्य दिशः श्रोत्रे महात्मनः ।<br>अश्विनौ श्रवणे तस्य नासा वायुर्महात्मनः ॥ ५६<br>प्रसादश्चन्द्रमा देवो मनो धर्मः समाश्रितः ।<br>सत्यं तस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ॥ ५७<br>ग्रीवादितिर्देवमाता विद्यास्तद्गलयस्तथा ।<br>स्वर्गद्वारमभून्मैत्रं त्वष्टा पूषा च वै भ्रुवौ ॥ ५८ | शौनकजी बोले— महात्मा वामनकी ऐसी बातें सुनकर महाबाहु बलिने उन वामनको तीन पग भूमि देनेका संकल्प कर लिया। हाथमें संकल्पका जल गिरते ही वामन अवामन हो गये और उन्होंने उसी क्षण अपना सर्वदेवमय रूप प्रकट कर दिया। चन्द्र-सूर्य उनके नेत्र, आकाश मस्तक, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाचगण पैरोंकी अंगुलियाँ, गुह्यक हाथोंकी अंगुलियाँ, विश्वेदेव घुटने, सुरश्रेष्ठ साध्यगण जंघे थे। नखोंमें यक्ष, रेखाओंमें अप्सराएँ, नेत्रज्योतिमें नक्षत्रगण थे। सूर्यकिरणें केश, ताराएँ रोमकूप, महर्षिगण रोमावलि थे। उन महात्माकी भुजाओंमें दिशाओंके कोण और श्रोत्रोंमें दिशाएँ थीं। श्रवणेन्द्रियमें अश्विनीकुमार और नासिकामें वायुका निवास था। प्रसन्नतामें चन्द्रदेव और मनमें धर्म स्थित थे। सत्य उनकी वाणी और सरस्वती देवी जिह्वा हुई। देवमाता अदिति ग्रीवा, विद्याएँ वलय, स्वर्गद्वार मैत्री, त्वष्टा और पूषा दोनों भौंह थे। |