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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

About this granth

The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.

This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.

The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.

१४५- युगानुसार प्राणियोंकी शरीर-स्थिति एवं वर्ण-व्यवस्थाका वर्णन, श्रौत-स्मार्त, धर्म, तप, यज्ञ, क्षमा, शम, दया आदि गुणोंका लक्षण, चातुर्होत्रकी विधि तथा पाँच प्रकारके ऋषियोंका वर्णन

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५२४ * मत्स्यपुराण *


| यज्ञप्रवर्तनं ह्येवमासीत् स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>तदाप्रभृति यज्ञोऽयं युगैः सह व्यवर्तत॥ ४२ | ही कहा गया है। इस प्रकार स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें यज्ञकी प्रथा प्रारम्भ हुई थी। तबसे यह यज्ञ सभी युगोंके साथ प्रवर्तित हुआ॥ ३५-४२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकल्पे देवर्षिसंवादो नाम त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके मन्वन्तरानुकल्पमें देवर्षिसंवाद नामक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४३॥


एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय

द्वापर और कलियुगकी प्रवृत्ति तथा उनके स्वभावका वर्णन, राजा प्रमतिका वृत्तान्त तथा पुनः कृतयुगके प्रारम्भका वर्णन

| सूत उवाच<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि द्वापरस्य विधिं पुनः।<br>तत्र त्रेतायुगे क्षीणे द्वापरं प्रतिपद्यते॥ १<br>द्वापरादौ प्रजानां तु सिद्धिस्त्रेतायुगे तु या।<br>परिवृत्ते युगे तस्मिस्ततः सा सम्प्रणश्यति॥ २<br>ततः प्रवर्तिते तासां प्रजानां द्वापरे पुनः।<br>लोभोऽधृतिर्वणिग्युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः॥ ३<br>प्रध्वंसश्चैव वर्णानां कर्मणां तु विपर्ययः।<br>याच्ञा वधः पणो दण्डो मानो दम्भोऽक्षमा बलम्॥ ४<br>तथा रजस्तमो भूयः प्रवृत्तिर्द्वापरे स्मृता।<br>आद्ये कृते तु धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रपद्यते॥ ५<br>द्वापरे व्याकुलो भूत्वा प्रणश्यति कलौ पुनः।<br>वर्णानां द्वापरे धर्माः संकीर्यन्ते तथाऽऽश्रमाः॥ ६<br>द्वैधमुत्पद्यते चैव युगे तस्मिञ्छ्रुतौ स्मृतौ।<br>द्वैधाच्छ्रुतेः स्मृतेश्चैव निश्चयो नाधिगम्यते॥ ७<br>अनिश्चयावगमनाद् धर्मतत्त्वं न विद्यते।<br>धर्मतत्त्वे ह्यविज्ञाते मतिभेदस्तु जायते॥ ८<br>परस्परं विभिन्नैस्तैर्दृष्टीनां विभ्रमेण तु।<br>अयं धर्मो ह्ययं नेति निश्चयो नाधिगम्यते॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके बाद अब मैं द्वापरयुगकी विधिको वर्णन कर रहा हूँ। त्रेतायुगके क्षीण हो जानेपर द्वापरयुगकी प्रवृत्ति होती है। द्वापरयुगके प्रारम्भ-कालमें प्रजाओंको त्रेतायुगकी भाँति ही सिद्धि प्राप्त होती है, किंतु जब द्वापरयुगका प्रभाव पूर्णरूपसे व्याप्त हो जाता है, तब वह सिद्धि नष्ट हो जाती है। उस समय प्रजाओंमें लोभ, धैर्यहीनता, वाणिज्य, युद्ध, सिद्धान्तोंकी अनिश्चितता, वर्णोंका विनाश, कर्मोंका उलट-फेर, याच्ञा (भिक्षावृत्ति), संहार, परायापन, दण्ड, अभिमान, दम्भ, असहिष्णुता, बल तथा रजोगुण एवं तमोगुण बढ़ जाते हैं। सर्वप्रथम कृतयुगमें तो अधर्मका लेशमात्र भी नहीं रहता, किंतु त्रेतायुगमें उसकी कुछ-कुछ प्रवृत्ति होती है। पुनः द्वापरयुगमें वह विशेषरूपसे व्याप्त होकर कलियुगमें युग-समाप्तिके समय विनष्ट हो जाता है। द्वापरयुगमें चारों वर्णों तथा आश्रमोंके धर्म परस्पर घुल-मिल जाते हैं। इस युगमें श्रुतियों और स्मृतियोंमें भेद उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार श्रुति और स्मृतिकी मान्यतामें भेद पड़नेके कारण किसी विषयका ठीक निश्चय नहीं हो पाता। अनिश्चितताके कारण धर्मका तत्त्व लुप्त हो जाता है। धर्मतत्त्वका ज्ञान न होनेपर बुद्धिमें भेद उत्पन्न हो जाता है। बुद्धिमें भेद पड़नेके कारण उनके विचार भी भ्रान्त हो जाते हैं और फिर धर्म क्या है और अधर्म क्या है, यह निश्चय नहीं हो पाता॥ १-९॥ |
| एको वेदश्चतुष्पादः त्रेतास्विह विधीयते।<br>संक्षेपादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेष्विह॥ १० | पहले त्रेताके प्रारम्भमें आयुके संक्षेप हो जानेके कारण एक ही वेद ऋक्, यजुः, अथर्वण, साम—चार नामोंसे विभक्त कर दिया जाता है। फिर द्वापरमें विभिन्न |

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* अध्याय १४४ *५२५
वेदश्चैकश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु।<br>ऋषिपुत्रैः पुनर्वेदा भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रमैः ॥ ११<br><br>मन्त्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरक्रमविपर्ययैः।<br>संहिता ऋग्यजुःसाम्नां संहन्यन्ते श्रुतर्षिभिः ॥ १२<br><br>सामान्याद् वैकृताच्चैव दृष्टिभिन्नैः क्वचित् क्वचित्।<br>ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि भाष्यविद्यास्तथैव च ॥ १३<br><br>अन्ये तु प्रस्थितास्तान् वै केचित् तान् प्रत्यवस्थिताः।<br>द्वापरेषु प्रवर्तन्ते भिन्नार्थैस्तैः स्वदर्शनैः ॥ १४<br><br>एकमाध्वर्यवं पूर्वमासीद् द्वैधं तु तत्पुनः।<br>सामान्यविपरीतार्थैः कृतं शास्त्राकुलं त्विदम् ॥ १५<br><br>आध्वर्यवं च प्रस्थानैर्बहुधा व्याकुलीकृतम्।<br>तथैवाथर्वणां साम्नां विकल्पैः स्वस्य संक्षयैः ॥ १६<br><br>व्याकुलो द्वापरेष्वर्थः क्रियते भिन्नदर्शनैः।<br>द्वापरे संनिवृत्ते तु वेदा नश्यन्ति वै कलौ ॥ १७<br><br>तेषां विपर्ययोत्पन्ना भवन्ति द्वापरे पुनः।<br>अदृष्टिर्मरणं चैव तथैव व्याध्युपद्रवाः ॥ १८<br><br>वाङ्मनःकर्मभिर्दुःखैर्निर्वेदो जायते ततः।<br>निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ॥ १९<br><br>विचारणायां वैराग्यं वैराग्याद् दोषदर्शनम्।<br>दोषाणां दर्शनाच्चैव ज्ञानोत्पत्तिस्तु जायते ॥ २०विचारवाले ऋषिपुत्रोंद्वारा उन वेदोंका पुनः (शाखा-प्रशाखा आदिमें) विभाजन कर दिया जाता है। वे महर्षिगण मन्त्र-ब्राह्मणों, स्वर और क्रमके विपर्ययसे ऋक्, यजुः और सामवेदकी संहिताओंका अलग-अलग संघटन करते हैं। भिन्न विचारवाले श्रुतर्षियोंने ब्राह्मणभाग, कल्पसूत्र तथा भाष्यविद्या आदिको भी कहीं-कहीं सामान्य रूपसे और कहीं-कहीं विपरीतक्रमसे परिवर्तित कर दिया है। कुछ लोगोंने तो उनका समर्थन और कुछ लोगोंने अवरोध किया है। इसके बाद प्रत्येक द्वापरयुगमें भिन्नार्थदर्शी ऋषिवृन्द अपने-अपने विचारानुसार वैदिक प्रथामें अर्थभेद उत्पन्न कर देते हैं। पूर्वकालमें यजुर्वेद एक ही था, परंतु ऋषियोंने उसे बादमें सामान्य और विशेष अर्थसे कृष्ण और यजुः-रूपमें दो भागोंमें विभक्त कर दिया, जिससे शास्त्रमें भेद हो गया। इस प्रकार इन लोगोंने यजुर्वेदको अनेकों उपाख्यानों तथा प्रस्थानों, खिलांशों-द्वारा विस्तृत कर दिया है। इसी प्रकार अथर्ववेद और सामवेदके मन्त्रोंका भी ह्रास एवं विकल्पोंद्वारा अर्थ-परिवर्तन कर दिया है। इस तरह प्रत्येक द्वापरयुगमें (पूर्वपरम्परासे चले आते हुए) वेदार्थको भिन्नदर्शी ऋषिवृन्द परिवर्तित करते हैं। फिर द्वापरके बीत जानेपर कलियुगमें वे वेदार्थ शनैः-शनैः नष्ट हो जाते हैं। वेदार्थका विपर्यय हो जानेके कारण द्वापरके अन्तमें ही यथार्थ दृष्टिका लोप, असामयिक मृत्यु और व्याधियोंके उपद्रव प्रकट हो जाते हैं। तब मन-वचन-कर्मसे उत्पन्न हुए दुःखोंके कारण लोगोंके मनमें खेद उत्पन्न होता है। खेदाधिक्यके कारण दुःखसे मुक्ति पानेके लिये उनके मनमें विचार जाग्रत् होता है। फिर विचार उत्पन्न होनेपर वैराग्य, वैराग्यसे दोष-दर्शन और दोषोंके प्रत्यक्ष होनेपर ज्ञानकी उत्पत्ति होती है ॥ १०-२० ॥
तेषां मेधाविनां पूर्वं मर्त्ये स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>उत्पत्स्यन्तीह शास्त्राणां द्वापरे परिपन्थिनः ॥ २१<br><br>आयुर्वेदविकल्पाश्च अङ्गानां ज्यौतिषस्य च।<br>अर्थशास्त्रविकल्पाश्च हेतुशास्त्रविकल्पनम् ॥ २२<br><br>प्रक्रियाकल्पसूत्राणां भाष्यविद्याविकल्पनम्।<br>स्मृतिशास्त्रप्रभेदाश्च प्रस्थानानि पृथक्-पृथक् ॥ २३<br><br>द्वापरेष्वभिवर्तन्ते मतिभेदास्तथा नृणाम्।<br>मनसा कर्मणा वाचा कृच्छ्राद् वार्ता प्रसिद्ध्यति ॥ २४इस प्रकार पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरके द्वापरयुगमें उन मेधावी ऋषियोंके वंशमें इस भूतपर शास्त्रोंके विरोधी लोग उत्पन्न होते हैं और उस युगमें आयुर्वेदमें विकल्प, ज्योतिषशास्त्रके अङ्गोंमें विकल्प, अर्थशास्त्रमें विकल्प, हेतुशास्त्रमें विकल्प, कल्पसूत्रोंकी प्रक्रियामें विकल्प, भाष्यविद्यामें विकल्प, स्मृतिशास्त्रोंमें नाना प्रकारके भेद, पृथक्-पृथक् मार्ग तथा मनुष्योंकी बुद्धियोंमें भेद प्रचलित हो जाते हैं। तब मन-वचन-कर्मसे लगे रहनेपर भी बड़ी कठिनाईसे लोगोंकी जीविका सिद्ध हो पाती है।
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५२६ * मत्स्यपुराण *

| द्वापरे सर्वभूतानां कायक्लेशः परः स्मृतः।<br>लोभोऽधृतिर्वणिग्युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः॥ २५<br>वेदशास्त्रप्रणयनं धर्माणां संकरस्तथा।<br>वर्णाश्रमपरिव्ध्वंसः कामद्वेषौ तथैव च॥ २६<br>पूर्णे वर्षसहस्रे द्वे परमायुस्तदा नृणाम्।<br>निःशेषे द्वापरे तस्मिंस्तस्य संध्या तु पादतः॥ २७<br>प्रतिष्ठिते गुणैर्हीना धर्मोऽसौ द्वापरस्य तु।<br>तथैव संध्यापादेन अंशस्तस्यां प्रतिष्ठितः॥ २८<br>द्वापरस्य तु पर्याये पुष्यस्य च निबोधत।<br>द्वापरस्यांशशेषे तु प्रतिपत्तिः कलेरथ॥ २९<br>हिंसा स्तेयानृतं माया वधश्चैव तपस्विनाम्।<br>एते स्वभावाः पुष्यस्य साधयन्ति च ताः प्रजाः॥ ३०<br>एष धर्मः स्मृतः कृत्स्नो धर्मश्च परिहीयते।<br>मनसा कर्मणा वाचा वार्ता सिद्ध्यति वा न वा॥ ३१<br>कलौ प्रमारको रोगः सततं चापि क्षुद्भयम्।<br>अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः॥ ३२<br>न प्रमाणं स्मृतश्चास्ति पुष्ये घोरे युगे कलौ।<br>गर्भस्थो म्रियते कश्चिद्यौवनस्थस्तथापरः॥ ३३<br>स्थविरे मध्यकौमारे म्रियन्ते च कलौ प्रजाः।<br>अल्पतेजोबलाः पापा महाकोपा ह्यधार्मिकाः॥ ३४<br>अनृतव्रतलुब्धाश्च पुष्ये चैव प्रजाः स्थिताः।<br>दुरिष्टैर्दुरधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमैः॥ ३५<br>विप्राणां कर्मदोषैश्च प्रजानां जायते भयम्।<br>हिंसमानस्तथैर्ष्या च क्रोधोऽसूयाक्षमः कृतम्॥ ३६<br>पुष्ये भवन्ति जन्तूनां लोभो मोहश्च सर्वशः।<br>संक्षोभो जायतेऽत्यर्थं कलिमासाद्य वै युगम्॥ ३७<br>नाधीयन्ते तथा वेदा न यजन्ते द्विजातयः।<br>उत्सीदन्ति तथा चैव वैश्यैः सार्धं तु क्षत्रियाः॥ ३८<br>शूद्राणां मन्त्रयोनिस्तु सम्बन्धो ब्राह्मणैः सह।<br>भवतीह कलौ तस्मिञ्शयनासनभोजनैः॥ ३९ | इस प्रकार द्वापरयुगमें सभी प्राणियोंका जीवन भी कष्टसे ही चल पाता है। उस समय जनतामें लोभ, धैर्यहीनता, वाणिज्य-व्यवसाय, युद्ध, तत्त्वोंकी अनिश्चितता, वेदों एवं शास्त्रोंकी मनःकल्पित रचना, धर्मसंकरता, वर्णाश्रम-धर्मका विनाश तथा काम और द्वेषकी भावना आदि दुर्गुणोंका प्राबल्य हो जाता है। उस समय लोगोंकी दो हजार वर्षोंकी पूर्णायु होती है। द्वापरकी समाप्तिके समय उसके चतुर्थांशमें उसकी संध्याका काल आता है। उस समय लोग धर्मके गुणोंसे हीन हो जाते हैं। उसी प्रकार संध्याके चतुर्थ चरणमें संध्यांशका समय उपस्थित होता है॥ २१—२८॥<br><br>अब द्वापरयुगके बाद आनेवाले कलियुगका वृत्तान्त सुनिये। द्वापरकी समाप्तिके समय जब अंशमात्र शेष रह जाता है, तब कलियुगकी प्रवृत्ति होती है। जीव-हिंसा, चोरी, असत्यभाषण, माया (छल-कपट-दम्भ) और तपस्वियोंकी हत्या—ये कलियुगके स्वभाव (स्वाभाविक गुण) हैं। वह प्रजाओंको भलीभाँति चरितार्थ कर देता है। यही उसका अविकल धर्म है। यथार्थ धर्मका तो विनाश हो जाता है। उस समय मन-वचन-कर्मसे प्रयत्न करनेपर भी यह संदेह बना रहता है कि जीविकाकी सिद्धि होगी या नहीं। कलियुगमें विसूचिका, प्लेग आदि महामारक रोग होते हैं। इस घोर कलियुगमें भुखमरी और अकालका सदा भय बना रहता है। देशोंका उलट-फेर तो होता ही रहता है। किसी प्रमाणमें स्थिरता नहीं रहती। कोई गर्भमें ही मर जाता है तो कोई नौजवान होकर, कोई मध्य जवानीमें तो कोई बुढ़ापामें। इस प्रकार लोग कलियुगमें अकालमें ही कालके शिकार बन जाते हैं। उस समय लोगोंका तेज और बल घट जाता है। उनमें पाप, क्रोध और धर्महीनता बढ़ जाती है। वे असत्यभाषी और लोभी हो जाते हैं। ब्राह्मणोंके अनिष्ट-चिन्तन, अल्पाध्ययन, दुराचार और शास्त्र-ज्ञान-हीनता-रूप कर्मदोषोंसे प्रजाओंको सदा भय बना रहता है। कलियुगमें जीवोंमें हिंसा, अभिमान, ईर्ष्या, क्रोध, असूया, असहिष्णुता, अधीरता, लोभ, मोह और संक्षोभ आदि दुर्गुण सर्वथा अधिक मात्रामें बढ़ जाते हैं। कलियुगके आनेपर ब्राह्मण न तो वेदोंका अध्ययन करते हैं और न यज्ञानुष्ठान ही करते हैं। क्षत्रिय भी वैश्योंके साथ (कर्मभ्रष्ट होकर) विनष्ट हो जाते हैं। कलियुगमें शूद्र मन्त्रोंके ज्ञाता हो जाते हैं और उनका शयन, आसन एवं भोजनके समय ब्राह्मणोंके साथ सम्पर्क होता है। |

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* अध्याय १४४ *५२७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राजानः शूद्रभूयिष्ठाः पाखण्डानां प्रवर्तकाः।<br>काषायिणश्च निष्कच्छास्तथा कापालिनश्च ह॥ ४०<br><br>ये चान्ये देवव्रतिनस्तथा ये धर्मदूषकाः।<br>दिव्यवृत्ताश्च ये केचिद् वृत्त्यर्थं श्रुतिलिङ्गिनः॥ ४१<br><br>एवंविधाश्च ये केचिद्भवन्तीह कलौ युगे।<br>अधीयन्ते तदा वेदाञ्शूद्रान् धर्मार्थकोविदाः॥ ४२<br><br>यजन्ति ह्याश्वमेधैस्तु राजानः शूद्रयोनयः।<br>स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वा चैव परस्परम्॥ ४३<br><br>उपहृत्य तथान्योन्यं साधयन्ति तथा प्रजाः।<br>दुःखप्रचुरताल्पायुर्देशोत्सादः सरोगता॥ ४४<br><br>अधर्माभिनिवेशित्वं तमोवृत्तं कलौ स्मृतम्।<br>भ्रूणहत्या प्रजानां च तदा ह्येवं प्रवर्तते॥ ४५<br><br>तस्मादायुर्बलं रूपं प्रहीयन्ते कलौ युगे।<br>दुःखेनाभिप्लुतानां परमायुः शतं नृणाम्॥ ४६<br><br>भूत्वा च न भवन्तीह वेदाः कलियुगेऽखिलाः।<br>उत्सीदन्ते तथा यज्ञाः केवलं धर्महेतवः॥ ४७<br><br>एषा कलियुगावस्था संध्यांशौ तु निबोधत।<br>युगे युगे तु हीयन्ते त्रींस्त्रीन्पादांश्च सिद्धयः॥ ४८<br><br>युगस्वभावाः संध्यासु अवतिष्ठन्ति पादतः।<br>संध्यास्वभावाः स्वांशेषु पादेनैवावतस्थिरे॥ ४९शूद्र ही अधिकतर राजा होते हैं। पाखण्डका प्रचार बढ़ जाता है। शूद्रलोग गेरुआ वस्त्र धारण कर हाथमें नारियलका कपाल लेकर काछ खोले हुए (संन्यासीके वेषमें) घूमते रहते हैं॥ २९—४०॥<br><br>कुछ लोग देवताओंकी पूजा करते हैं तो कुछ लोग धर्मको दूषित करते हैं। कुछ लोगोंके आचार-विचार दिव्य होते हैं तो कुछ लोग जीविकोपार्जनके लिये साधुका वेष बनाये रहते हैं। कलियुगमें अधिकतर इसी प्रकारके लोग होते हैं। उस समय शूद्रलोग धर्म और अर्थके ज्ञाता बनकर वेदोंका अध्ययन करते हैं। शूद्रयोनिमें उत्पन्न नृपतिगण अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं। उस समय लोग स्त्री, बालक और गौओंकी हत्या कर, परस्पर एक-दूसरेको मारकर तथा अपहरण कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। कलियुगमें कष्टका बाहुल्य हो जाता है। प्राणियोंकी आयु थोड़ी हो जाती है। देशोंमें उथल-पुथल होता रहता है। व्याधिका प्रकोप बढ़ जाता है। अधर्मकी ओर लोगोंकी विशेष रुचि हो जाती है। सभीके आचार-विचार तामसिक हो जाते हैं। प्रजाओंमें भ्रूणहत्याकी प्रवृत्ति हो जाती है। इसी कारण कलियुगमें आयु, बल और रूपकी क्षीणता हो जाती है। दुःखोंसे संतप्त हुए लोगोंकी परमायु सौ वर्षकी होती है। कलियुगमें सम्पूर्ण वेद विद्यमान रहते हुए भी नहींके बराबर हो जाते हैं तथा धर्मके एकमात्र कारण यज्ञोंका विनाश हो जाता है। यह तो कलियुगकी दशा बतलायी गयी, अब उसकी संध्या और संध्यांशका वर्णन सुनिये। प्रत्येक युगमें तीन-तीन चरण व्यतीत हो जानेके बाद सिद्धियाँ घट जाती हैं, अर्थात् धर्मका ह्रास हो जाता है। उनकी संध्याओंमें युगका स्वभाव चतुर्थांश मात्र रह जाता है। उसी प्रकार संध्यांशोंमें संध्याका स्वभाव भी चतुर्थांश ही शेष रहता है॥ ४१—४९॥
एवं संध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके।<br>तेषामधर्मिणां शास्ता भृगूणां च कुले स्थितः॥ ५०<br><br>गोत्रेण वै चन्द्रमसो नाम्ना प्रमतिरुच्यते।<br>कलिसंध्यांशभागेषु मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ५१<br><br>समास्त्रिंशत् सम्पूर्णाः पर्यटन् वै वसुन्धराम्।<br>अस्त्रकर्मा स वै सेनां हस्त्यश्वरथसंकुलाम्॥ ५२इस प्रकार स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें कलियुगके अन्तिम समयमें प्राप्त हुए संध्यांशकालमें उन अधर्मियोंका शासन करनेके लिये भृगुवंशमें चन्द्रगोत्रीय प्रमति* नामक राजा उत्पन्न होता है। वह अस्त्रधारी नरेश हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई सेनाको साथ लेकर तीस वर्षोतक पृथ्वीपर

* श्रीविष्णुधर्मोत्तर महापुराणमें भी इस राजाकी विस्तृत महिमा निरूपित है। वासुदेवशरण अग्रवाल आदि इतिहासके अनेक विद्वान् इसे राजा विक्रमादित्यका अपर नाम मानते हैं।

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५२८ * मत्स्यपुराण *

श्लोकअर्थ
प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>स तदा तैः परिवृतो म्लेच्छान् सर्वान्निजघ्निवान्॥ ५३<br>स हत्वा सर्वशश्चैव राजानः शूद्रयोनयः।<br>पाखण्डान् स तदा सर्वान्निःशेषानकरोत् प्रभुः॥ ५४<br>अधार्मिकांश्च ये केचित्तान् सर्वान् हन्ति सर्वशः।<br>औदीच्यान्मध्यदेशांश्च पार्वतीयांस्तथैव च॥ ५५<br>प्राच्यान्प्रतीच्यांश्च तथा विन्ध्यपृष्ठापरान्तिकान्।<br>तथैव दाक्षिणात्यांश्च द्रविडांत्सिंहलैः सह॥ ५६<br>गान्धारान्यारदांश्चैव पह्लवान् यवनाञ्छकान्।<br>तुषारान्बर्बराञ्श्वेतान्हलीकान्दरदान्खसान्॥ ५७<br>लम्पकानान्ध्रकांश्चापि चोरजातींस्तथैव च।<br>प्रवृत्तचक्रो बलवाञ्शूद्राणामान्तकृद् बभौ॥ ५८<br>विद्राव्य सर्वथैतानि चचार वसुधामिमाम्।भ्रमण करता है। उस समय उसके साथ आयुधधारी सैकड़ों-हजारों ब्राह्मण भी रहते हैं। वह सामर्थ्यशाली वीर सभी म्लेच्छोंका विनाश कर देता है तथा शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए राजाओंका सर्वथा संहार करके सम्पूर्ण पाखण्डोंको भी निर्मूल कर देता है। वह सर्वत्र घूम-घूमकर सभी धर्महीनोंका वध कर देता है। शूद्रोंका विनाश करनेवाला वह महाबली राजा उत्तर दिशाके निवासी, मध्यदेशीय, पर्वतीय, पौरस्त्य, पाश्चात्य, विन्ध्याचलके ऊपर तथा तलहटियोंमें स्थित, दाक्षिणात्य, सिंहलोंसहित द्रविड़, गान्धार, पारद, पह्लव, यवन, शक, तुषार, बर्बर, श्वेत, हलीक, दरद, खस, लम्पक, आन्ध्रक तथा चोर जातियोंका संहारकर अपना शासनचक्र प्रवृत्त करता है। वह समस्त अधार्मिक प्राणियोंको खदेड़कर इस पृथ्वीपर विचरण करता हुआ सुशोभित होता है॥ ५०-५८ १/२ ॥
मानवस्य तु वंशे तु नृदेवस्येह जज्ञिवान्॥ ५९<br>पूर्वजन्मनि विष्णुश्च प्रमतिर्नाम वीर्यवान्।<br>स्वतः स वै चन्द्रमसः पूर्वं कलियुगे प्रभुः॥ ६०<br>द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रकान्ते विंशतिं समाः।<br>निजघ्ने सर्वभूतानि मानुषाण्येव सर्वशः॥ ६१<br>कृत्वा बीजावशिष्टां तां पृथिवीं क्रूरेण कर्मणा।<br>परस्परनिमित्तेन कालेनाकस्मिकेन च॥ ६२<br>संस्थिता सहसा या तु सेना प्रमतिना सह।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये सिद्धिं प्राप्ता समाधिना॥ ६३<br>ततस्तेषु प्रनष्टेषु संध्यांशे क्रूरकर्मसु।<br>उत्साद्य पार्थिवान् सर्वांस्तेष्वतीतेषु वै तदा॥ ६४<br>ततः संध्यांशके काले सम्प्राप्ते च युगान्तके।<br>स्थितास्त्वल्पावशिष्टास्तु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित्॥ ६५<br>स्वाप्रदानास्तदा ते वै लोभाविष्टास्तु वृन्दशः।<br>उपहिंसन्ति चान्योन्यं प्रलुम्पन्ति परस्परम्॥ ६६<br>अराजके युगांशे तु संक्षये समुपस्थिते।<br>प्रजास्ता वै तदा सर्वाः परस्परभयार्दिताः॥ ६७पराक्रमी प्रमति पूर्व जन्ममें विष्णु था और इस जन्ममें महाराज मनुके वंशमें भूतलपर उत्पन्न हुआ था। पहले कलियुगमें वह वीर चन्द्रमाका पुत्र था। बत्तीस वर्षकी अवस्था होनेपर उसने बीस वर्षोंतक भूतलपर सर्वत्र घूम-घूमकर सभी धर्महीन मानवों एवं अन्य प्राणियोंका संहार कर डाला। उसने आकस्मिक कालके वशीभूत हो बिना किसी निमित्तके क्रूर कर्मद्वारा उस पृथ्वीको बीजमात्र अवशेष कर दिया। तत्पश्चात् प्रमतिके साथ जो विशाल सेना थी, वह सहसा गङ्गा और यमुनाके मध्यभागमें स्थित हो गयी और समाधिद्वारा सिद्धिको प्राप्त हो गयी। इस प्रकार युगके अन्तमें संध्यांशकालके प्राप्त होनेपर सभी अधार्मिक राजाओंका विनाश होता है। उन क्रूरकर्मियोंके नष्ट हो जानेपर भूतलपर कहीं-कहीं थोड़ी-बहुत प्रजाएँ अवशिष्ट रह जाती हैं। वे लोग अपनी वस्तु दूसरेको देना नहीं चाहते। उनमें लोभकी मात्रा अधिक होती है। वे लोग यूथ-के-यूथ एकत्र होकर परस्पर एक-दूसरेकी वस्तु लूट-खसोट लेते हैं तथा उन्हें मार भी डालते हैं। उस विनाशकारी संध्यांशके उपस्थित होनेपर अराजकता फैल जाती है। उस समय सारी प्रजामें परस्पर भय बना रहता है।
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* अध्याय १४४ *५२९
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्याकुलास्ताः परावृत्तास्त्यक्त्वा देवगृहाणि तु।<br>स्वान् स्वान् प्राणानवेक्षन्तो निष्कारुण्यात्सुदुःखिताः॥ ६८<br><br>नष्टे श्रौतस्मृते धर्मे कामक्रोधवशानुगाः।<br>निर्मर्यादा निरानन्दा निःस्नेहा निरपत्रपाः॥ ६९<br><br>नष्टे धर्मे प्रतिहता ह्रस्वकाः पञ्चविंशकाः।<br>हित्वा दारांश्च पुत्रांश्च विषाद्व्याकुलप्रजाः॥ ७०<br><br>अनावृष्टिहतास्ते वै वार्तामुत्सृज्य दुःखिताः।<br>आश्रयन्ति स्म प्रत्यन्तान् हित्वा जनपदान् स्वकान्॥ ७१<br><br>सरितः सागरानूपान् सेवन्ते पर्वतानपि।<br>चीरकृष्णाजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः॥ ७२<br><br>वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः संकरं घोरमास्थिताः।<br>एवं कष्टमनुप्राप्ता ह्यल्पशेषाः प्रजास्ततः॥ ७३<br><br>जन्तवश्च क्षुधाविष्टा दुःखान्निर्वेदमागमन्।<br>संश्रयन्ति च देशांस्तांश्चक्रवत् परिवर्तनाः॥ ७४<br><br>ततः प्रजास्तु ताः सर्वा मांसाहारा भवन्ति हि।<br>मृगान् वराहान् वृषभान् ये चान्ये वनचारिणः॥ ७५<br><br>भक्ष्यांश्चैवाप्यभक्ष्यांश्च सर्वांस्तान् भक्षयन्ति ताः।<br>समुद्रसंश्रिता यास्तु नदीश्चैव प्रजास्तु ताः॥ ७६<br><br>तेऽपि मत्स्यान् हरन्तीह आहारार्थं च सर्वशः।<br>अभक्ष्याहारदोषेण एकवर्णगताः प्रजाः॥ ७७<br><br>यथा कृतयुगे पूर्वमेकवर्णमभूत् किल।<br>तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूताः प्रजास्तथा* ॥ ७८<br><br>एवं वर्षशतं पूर्णं दिव्यं तेषां न्यवर्तत।<br>षट्त्रिंशच्च सहस्त्राणि मानुषाणि तु तानि वै॥ ७९<br><br>अथ दीर्घेण कालेन पक्षिणः पशवस्तथा।<br>मत्स्याश्चैव हताः सर्वैः क्षुधाविष्टैश्च सर्वशः॥ ८०लोग व्याकुल होकर देवताओं और गृहोंको छोड़कर उनसे मुख मोड़ लेते हैं। सभीको अपने-अपने प्राणोंकी रक्षाकी चिन्ता लगी रहती है। क्रूरताका बोलबाला होनेके कारण लोग अत्यन्त दुःखी रहते हैं। श्रौत एवं स्मार्त धर्म नष्ट हो जाता है। सभी लोग काम और क्रोधके वशीभूत हो जाते हैं। वे मर्यादा, आनन्द, स्नेह और लज्जासे रहित हो जाते हैं। धर्मके नष्ट हो जानेपर वे भी विनष्ट हो जाते हैं। उनका कद छोटा हो जाता है और उनकी आयु पचीस वर्षकी हो जाती है। विषादसे व्याकुल हुए लोग अपनी पत्नी और पुत्रोंको भी छोड़ देते हैं। वे अकालसे पीड़ित होनेके कारण जीविकाके साधनोंका परित्याग कर कष्ट झेलते हैं तथा अपने जनपदोंको छोड़कर निकटवर्ती देशोंकी शरण लेते हैं॥ ६९-७१॥<br><br>कुछ लोग भागकर नदियों, समुद्र-तटवर्ती भागों तथा पर्वतोंका आश्रय ग्रहण करते हैं। वल्कल और काला मृगचर्म ही उनका परिधान होता है। वे क्रियाहीन और परिग्रहरहित हो जाते हैं तथा वर्णाश्रमधर्मसे भ्रष्ट होकर घोर संकर-धर्ममें आस्था करने लगते हैं। उस समय स्वल्प मात्रामें बची हुई प्रजा इस प्रकार कष्ट झेलती है। क्षुधासे पीड़ित जीव-जन्तु दुःखके कारण अपने जीवनसे ऊब जाते हैं, किंतु चक्रकी तरह घूमते हुए पुनः उन्हीं देशोंका आश्रय ग्रहण करते हैं। तदनन्तर वे सारी प्रजाएँ मांसाहारी हो जाती हैं। उनमें भक्ष्याभक्ष्यका विचार लुप्त हो जाता है। वे मृगों, सूकरों, वृषभों तथा अन्यान्य सभी वनचारी जीवोंको खाने लगती हैं। जो प्रजाएँ नदियों और समुद्रोंके तटपर निवास करती हैं, वे भी भोजनके लिये सर्वत्र मछलियोंको पकड़ती हैं। इस प्रकार अभक्ष्य भोजनके दोषके कारण सारी प्रजा एक वर्णकी हो जाती हैं, अर्थात् वर्णधर्म नष्ट हो जाता है। जैसे पहले कृतयुगमें एक ही (हंसनामका) वर्ण था, उसी तरह कलियुगके अन्तमें सारी प्रजाएँ शूद्रवर्णकी हो जाती हैं। इस प्रकार उन प्रजाओंके पूरे एक सौ दिव्य वर्ष तथा मानुष गणनाके अनुसार छत्तीस हजार वर्ष व्यतीत होते हैं। इतने लम्बे समयमें क्षुधासे पीड़ित वे सभी लोग सर्वत्र पशुओं, पक्षियों और मछलियोंको मारकर

* कलियुगका वर्णन अन्य पुराणों, सुभाषितों, गोस्वामीजीके मानसादि काव्यों तथा समर्थरामदासजीके दासबोध आदिमें भी बड़े आकर्षक ढंगसे हुआ है, जिनके अध्ययनसे लोग दोषोंसे बचते हैं। पर मत्स्यपुराण-जितना विस्तृत वर्णन वायु, ब्रह्माण्डादि पुराणों एवं महाभारत-वनपर्वमें भी नहीं हुआ है। तथापि वहाँ भी यह प्रसङ्ग प्रायः कुछ कम इन्हीं श्लोकोंमें मिलता है।

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५३० * मत्स्यपुराण *

| निःशेषेष्वथ सर्वेषु मत्स्यपक्षिपशुष्वथ।<br>संध्यांशे प्रतिपन्ने तु निःशेषास्तु तदा कृताः ॥ ८१<br>ततः प्रजास्तु सम्भूय कन्दमूलमथोऽखनन्।<br>फलमूलाशनः सर्वे अनिकेतास्तथैव च ॥ ८२<br>वल्कला्न्यथ वासांसि अधःशय्याश्च सर्वशः।<br>परिग्रहो न तेष्वस्ति धनं शुद्धिस्तथापि वा ॥ ८३ | खा डालते हैं। इस प्रकार जब संध्यांशके प्रवृत्त होनेपर सारे मछली, पक्षी और पशु मारकर निःशेष कर दिये जाते हैं, तब पुनः लोग कन्द-मूल खोदकर खाने लगते हैं। उस समय वे सभी गृहरहित होकर फल-मूलपर ही जीवन-निर्वाह करते हैं। वल्कल ही उनका वस्त्र होता है। वे सर्वत्र भूमिपर ही शयन करते हैं। उनके परिग्रह (स्त्री-परिवार आदि), अर्थशुद्धि और शौचाचार आदि सब नष्ट हो जाते हैं॥ ७२—८३॥ |
| एवं क्षयं गमिष्यन्ति ह्यल्पशिष्टाः प्रजास्तदा।<br>तासामल्पावशिष्टानामाहाराद् वृद्धिरिष्यते ॥ ८४<br>एवं वर्षशतं दिव्यं संध्यांशस्तस्य वर्तते।<br>ततो वर्षशतस्यान्ते अल्पशिष्टाः स्त्रियः सुताः ॥ ८५<br>मिथुनानि तु ताः सर्वा ह्यन्योन्यं सम्प्रजज्ञिरे।<br>ततस्तास्तु म्रियन्ते वै पूर्वोत्पन्नाः प्रजास्तु याः ॥ ८६<br>जातमात्रेष्वपत्येषु ततः कृतमवर्तत।<br>यथा स्वर्गे शरीराणि नरके चैव देहिनाम् ॥ ८७<br>उपभोगसमर्थानि एवं कृतयुगादिषु।<br>एवं कृतस्य संतानः कलेश्चैव क्षयस्तथा ॥ ८८<br>विचारणात्तु निर्वेदः साम्यावस्थात्मना तथा।<br>ततश्चैवात्मसम्बोधः सम्बोधाद्धर्मशीलता ॥ ८९<br>कलिशिष्टेषु तेष्वेवं जायन्ते पूर्ववत् प्रजाः।<br>भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्तत ॥ ९०<br>अतीतानागतानि स्युर्यानि मन्वन्तरेष्विह।<br>एते युगस्वभावास्तु मयोक्तास्तु समासतः ॥ ९१ | इस प्रकार उस समय थोड़ी बची हुई प्रजाएँ नष्ट हो जाती हैं। उनमें भी जो थोड़ी शेष रह जाती हैं, उनकी आहार-शुद्धिके कारण वृद्धि होती है। इस प्रकार कलियुगका संध्यांश एक सौ दिव्य वर्षोंका होता है। उन सौ वर्षोंके बीत जानेपर जो अल्पजीवी संतानोत्पत्ति होती है और इसके पूर्व जो प्रजाएँ उत्पन्न हुई थीं, वे सभी मर जाती हैं। उन संतानोंके उत्पन्न होनेपर कृतयुगका प्रारम्भ होता है। जैसे (मृत्युके पश्चात् प्राप्त हुए) प्राणियोंके शरीर स्वर्ग और नरकमें उपभोगके योग्य होते हैं, उसी तरह कृतयुग आदि युगोंमें भी होता है। उसी प्रकार वह नूतन संतान कृतयुगकी वृद्धि और कलियुगके विनाशका कारण होता है। आत्माकी साम्यावस्थाके विचारसे विरक्ति उत्पन्न होती है, उससे आत्मज्ञान होता है और ज्ञानसे धर्म-बुद्धि होती है। इसी कारण कलियुगके अन्तमें बचे हुए लोगोंमें भावी प्रयोजनके प्रभावसे पुनः पूर्ववत् प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। तदनन्तर कृतयुगका आरम्भ होता है। उस समय मन्वन्तरोंमें जो भूत एवं भावी कर्म होते रहे हैं, वे सभी आवृत्त होने लगते हैं। इस प्रकार मैंने संक्षेपसे युगोंके स्वभावका वर्णन कर दिया॥ ८४—९१॥ |
| विस्तरेणानुपूर्व्याच्च नमस्कृत्य स्वयम्भुवे।<br>प्रवृत्ते तु ततस्तस्मिन् पुनः कृतयुगे तु वै ॥ ९२<br>उत्पन्नाः कलिशिष्टेषु प्रजाः कार्त्तयुगास्तथा।<br>तिष्ठन्ति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विहरन्ति च ॥ ९३<br>सह सप्तर्षिभिर्ये तु तत्र ये च व्यवस्थिताः।<br>ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा बीजार्थे य इह स्मृताः ॥ ९४<br>तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयन्तीह तेषु च॥<br>वर्णाश्रमाचारयुतं श्रौतस्मार्तविधानतः।<br>एवं तेषु क्रियावत्सु प्रवर्त्तन्तीह वै कृते ॥ ९५ | अब मैं पुनः कृतयुगके प्रवृत्त होनेपर ब्रह्माको नमस्कार करके उसका विस्तारपूर्वक आनुपूर्वी वर्णन कर रहा हूँ। कलियुगके अन्तमें बचे हुए लोगोंमें कृतयुगकी तरह ही संतानोत्पत्ति होती है। उस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियोंके बीजकी रक्षाके लिये जो सिद्धगण अदृष्टरूपसे विचरण करते हुए वर्तमान रहते हैं, वे सभी तथा सप्तर्षियोंके साथ जो अन्य लोग स्थित रहते हैं, वे सभी मिलकर कृतयुगमें क्रियाशील संततियोंके प्रति व्यवस्थाका विधान करते हैं और सप्तर्षिगण उन्हें श्रौत एवं स्मार्त विधिके अनुसार वर्ण एवं आश्रमके आचारसे सम्पन्न |

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* अध्याय १४४ *
५३१

| श्रौतस्मार्तस्थितानां तु धर्मे सप्तर्षिदर्शिते ।<br>ते तु धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठन्तीह कृते युगे ॥ ९६<br>मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति ऋषयस्तु ते ।<br>यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्वेवापरं तृणम् ॥ ९७<br>वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु सम्भवः ।<br>एवं युगाद्युगानां वै संतानस्तु परस्परम् ॥ ९८<br>प्रवर्तते ह्यविच्छेदाद् यावन्मन्वन्तरक्षयः ।<br>सुखमायुर्बलं रूपं धर्मार्थौ काम एव च ॥ ९९<br>युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रयः पादाः क्रमेण तु ।<br>इत्येष प्रतिसंधिर्वः कीर्तितस्तु मया द्विजाः ॥ १०० | धर्मका उपदेश देते हैं। इस प्रकार सप्तर्षियोंद्वारा प्रदर्शित धर्ममार्गपर चलती हुई सारी प्रजा श्रौत एवं स्मार्त विधिका पालन करती है। वे सप्तर्षि धर्मकी व्यवस्था करनेके लिये कृतयुगमें स्थित रहते हैं। वे ही ऋषिगण मन्वन्तरोंके कार्यकालतक स्थित रहते हैं। जैसे वनोंमें दावाग्निसे जली हुई घासोंकी जड़में प्रथम वृष्टि होनेपर पुनः अङ्कुर उत्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार मन्वन्तरकी समाप्तिपर्यन्त एकसे दूसरे युगमें अविच्छिन्नरूपसे प्रजाओंमें परस्पर संतानकी परम्परा चलती रहती है। सुख, आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ, काम—ये सब क्रमशः आनेवाले युगोंमें तीन चरणसे हीन हो जाते हैं। द्विजवरो ! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे युगकी प्रतिसंधिका वर्णन किया॥ ९२-१००॥ |
| चतुर्युगाणां सर्वेषामेतदेव प्रसाधनम् ।<br>एषां चतुर्युगाणां तु गणिता ह्येकसप्ततिः ॥ १०१<br>क्रमेण परिवृत्तास्ता मनोरन्तरमुच्यते ।<br>युगाख्यासु तु सर्वासु भवतीह यदा च यत् ॥ १०२<br>तदेव च तदन्यासु पुनस्तद्वै यथाक्रमम् ।<br>सर्गे सर्गे यथा भेदा ह्युत्पद्यन्ते तथैव च ॥ १०३<br>चतुर्दशसु तावन्तो ज्ञेया मन्वन्तरेष्विह ।<br>आसुरी यातुधानी च पैशाची यक्षराक्षसी ॥ १०४<br>युगे युगे तदा काले प्रजा जायन्ति ताः शृणु ।<br>यथाकल्पं युगैः सार्धं भवन्ते तुल्यलक्षणाः ॥ १०५<br>इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै यथाक्रमम् ।<br>मन्वन्तराणां परिवर्तनानि<br>चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात् ।<br>क्षणं न संतिष्ठति जीवलोकः<br>क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः ॥ १०६<br>एते युगस्वभावा वः परिक्रान्ता यथाक्रमम् ।<br>मन्वन्तराणि यान्यस्मिन् कल्पे वक्ष्यामि तानि च ॥ १०७ | यही नियम सभी-चारों युगोंके लिये हैं। ये चारों युग जब क्रमशः इकहत्तर बार बीत जाते हैं, तब उसे एक मन्वन्तरका समय कहा जाता है। एक मन्वन्तरके युगोंमें जैसा कार्यक्रम होता है, वैसा ही अन्य मन्वन्तरके युगोंमें भी क्रमशः होता रहता है। प्रत्येक सर्गमें जैसे भेद उत्पन्न होते हैं, वैसे ही चौदहों मन्वन्तरोंमें समझना चाहिये। प्रत्येक युगमें समयानुसार असुर, यातुधान, पिशाच, यक्ष और राक्षस स्वभाववाली प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। अब उनके विषयमें सुनिये। कल्पानुसार युगोंके साथ-साथ उन्हींके अनुरूप लक्षणोंवाली प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार क्रमशः युगोंका यह लक्षण बतलाया गया। मन्वन्तरोंका यह परिवर्तन युगोंके स्वभावानुसार चिरकालसे चला आ रहा है। इसलिये यह जीवलोक उत्पत्ति और विनाशके चक्करमें फँसा हुआ क्षणमात्र भी स्थिर नहीं रहता। इस प्रकार आपलोगोंको ये युगस्वभाव क्रमशः बतलाये जा चुके। अब इस कल्पमें जितने मन्वन्तर हैं, उनका वर्णन करूँगा ॥ १०१-१०७ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकीर्तनयुगवर्तनं नाम चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्वन्तरानुकीर्तनयुगवर्तन नामक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १४४ ॥

१४६- वज्राङ्गकी उत्पत्ति, उसके द्वारा इन्द्रका बन्धन, ब्रह्मा और कश्यपद्वारा समझाये जानेपर इन्द्रको बन्धनमुक्त करना, वज्राङ्गका विवाह, तप तथा ब्रह्माद्वारा वरदान

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५३२ * मत्स्यपुराण *


एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय

युगानुसार प्राणियोंकी शरीर-स्थिति एवं वर्ण-व्यवस्थाका वर्णन, श्रौत-स्मार्त, धर्म, तप, यज्ञ, क्षमा, शम, दया आदि गुणोंका लक्षण, चातुर्होत्रकी विधि तथा पाँच प्रकारके ऋषियोंका वर्णन

सूत उवाच<br><br>मन्वन्तराणि यानि स्युः कल्पे कल्पे चतुर्दश।<br>व्यतीतानागतानि स्युर्यानि मन्वन्तरेष्विह॥ १<br>विस्तरेणानुपूर्व्याच्च स्थितिं वक्ष्ये युगे युगे।<br>तस्मिन् युगे च सम्भूतिर्यासां यावच्च जीवितम्॥ २<br>युगमात्रं तु जीवन्ति न्यूनं तत् स्याद् द्वयेन च।<br>चतुर्दशसु तावन्तो ज्ञेया मन्वन्तरेष्विह॥ ३<br>मनुष्याणां पशूनां च पक्षिणां स्थावरैः सह।<br>तेषामायुरुपक्रान्तं युगधर्मेषु सर्वशः॥ ४<br>तथैवायुः परिक्रान्तं युगधर्मेषु सर्वशः।<br>अस्थितिं च कलौ दृष्ट्वा भूतानामायुषश्च वै॥ ५<br>परमायुः शतं त्वेतन्मानुषाणां कलौ स्मृतम्।<br>देवासुरमनुष्याश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः॥ ६<br>परिणाहोच्छ्रये तुल्या जायन्तेह कृते युगे।<br>षण्णवत्यङ्गुलोत्सेधो ह्यष्टानां देवयोनिनाम्॥ ७<br>नवाङ्गुलप्रमाणेने निष्पन्नेन तथाष्टकम्।<br>एतत्स्वाभाविकं तेषां प्रमाणमधिकुर्वताम्॥ ८<br>मनुष्या वर्तमानास्तु युगसंध्यांशकेष्विह।<br>देवासुरप्रमाणं तु सप्तसप्ताङ्गुलं क्रमात्॥ ९<br>चतुराशीतिकैश्चैव कलिजैरङ्गुलैः स्मृतम्।सूतजी कहते हैं—ऋषियो! प्रत्येक कल्पमें जो चौदह मन्वन्तर होते हैं, उनमें जो बीत चुके हैं तथा जो आनेवाले हैं, उन मन्वन्तरोंके प्रत्येक युगमें प्रजाओंकी जैसी उत्पत्ति और स्थिति होती है तथा जितना उनका आयु-प्रमाण होता है, इन सबका विस्तारपूर्वक आनुपूर्वीक्रमसे वर्णन कर रहा हूँ। उनमें कुछ प्राणी तो युगपर्यन्त जीवित रहते हैं और कुछ उनसे कम समयतक ही जीते हैं। दोनों प्रकारकी बातें देखी जाती हैं। ऐसी ही विधि चौदहों मन्वन्तरोंमें जाननी चाहिये। सर्वत्र युगधर्मानुसार मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों और स्थावरोंकी आयु घटती जाती है। कलियुगमें युगधर्मानुसार सर्वत्र प्राणियोंकी आयुकी अस्थिरता देखकर मनुष्योंकी परमायु सौ वर्षकी बतलायी गयी है। कृतयुगमें देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व और राक्षस—ये सभी एक ही विस्तार और ऊँचाईके शरीरवाले उत्पन्न होते हैं। उनमें आठ प्रकारकी देवयोनियोंमें उत्पन्न होनेवाले देवोंके शरीर छानबे अंगुल ऊँचे और नौ अंगुल विस्तृत निष्पन्न होते हैं, यह उनकी आयुका स्वाभाविक प्रमाण है। अन्य देवताओं तथा असुरोंके शरीरका विस्तार क्रमशः सात-सात अंगुलका होता है। कलियुगके संध्यांशमें उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंके शरीर कलियुगोत्पन्न मानवोंके अंगुलप्रमाणसे चौरासी अंगुलके होते हैं॥ १-९ १/२ ॥
आपादतो मस्तकं तु नवतालो भवेत्तु यः॥ १०<br>संहत्याजानुबाहुश्च दैवतैरभिपूज्यते।<br>गवां च हस्तिनां चैव महिषस्थावरात्मनाम्॥ ११<br>क्रमेणैतेन विज्ञेये ह्रासवृद्धी युगे युगे।<br>षट्सप्तत्यङ्गुलोत्सेधः पशुराककुदो भवेत्॥ १२<br>अङ्गुलानामहष्टशतमुत्सेधो हस्तिनां स्मृतः।<br>अङ्गुलानां सहस्रं तु द्विचत्वारिंशदङ्गुलम्॥ १३<br>शतार्धमङ्गुलानां तु ह्युत्सेधः शाखिनां परः।<br>मानुषस्य शरीरस्य संनिवेशस्तु यादृशः॥ १४जिसका शरीर पैरसे लेकर मस्तकपर्यन्त नौ बित्ता-(एक सौ आठ अंगुल)-का होता है तथा भुजाएँ जानुतक लम्बी होती हैं, उसका देवतालोग भी आदर करते हैं। प्रत्येक युगमें गौओं, हाथियों, भैंसों और स्थावर प्राणियोंके शरीरोंका ह्रास एवं वृद्धि इसी क्रमसे जाननी चाहिये। पशु अपने कुकुद् (मौर)-तक छिहत्तर अंगुल ऊँचा होता है। हाथियोंके शरीरकी ऊँचाई एक सौ आठ अंगुलकी बतलायी जाती है। वृक्षोंकी अधिक-से-अधिक ऊँचाई एक हजार बानबे अंगुलकी होती है। मनुष्यके शरीरका जैसा आकार-प्रकार होता है,
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  • अध्याय १४५ *
    ५३३
तल्लक्षणं तु देवानां दृश्यतेऽन्वयदर्शनात्।<br>बुद्ध्यातिशयसंयुक्तो देवानां काय उच्यते॥ १५<br>तथा नातिशयश्चैव मानुषः काय उच्यते।<br>इत्येव हि परिक्रान्ता भावा ये दिव्यमानुषाः॥ १६<br>पशूनां पक्षिणां चैव स्थावराणां च सर्वशः।<br>गावोऽजाश्वाश्च विज्ञेया हस्तिनः पक्षिणो मृगाः॥ १७<br>उपयुक्ताः क्रियास्वेते यज्ञियास्तिवह सर्वशः।<br>यथाक्रमोपभोगाश्च देवानां पशुमूर्तयः॥ १८<br>तेषां रूपानुरूपैश्च प्रमाणैः स्थिरजङ्गमाः।<br>मनोज्ञैस्तत्र तैर्भोगैः सुखिनो ह्युपपेदिरे॥ १९वही लक्षण वंशपरम्परावश देवताओंमें भी देखा जाता है। देवताओंका शरीर केवल बुद्धिकी अतिशयतासे युक्त बतलाया जाता है। मानव-शरीरमें बुद्धिकी उतनी अधिकता नहीं रहती। इस प्रकार देवताओं और मानवोंके शरीरोंमें उत्पन्न हुए जो भाव हैं, वे पशुओं, पक्षियों और स्थावर प्राणियोंके शरीरोंमें भी पाये जाते हैं। गौ, बकरा, घोड़ा, हाथी, पक्षी और मृग—इनका सर्वत्र यज्ञीय कर्मोंमें उपयोग होता है तथा ये पशुमूर्तियाँ क्रमशः देवताओंके उपभोगमें प्रयुक्त होती हैं। उन उपभोक्ता देवताओंके रूप और प्रमाणके अनुरूप ही उन चर-अचर प्राणियोंकी मूर्तियाँ होती हैं। वे उन मनोज्ञ भोगोंका उपभोग करके सुखका अनुभव करते हैं॥ १०—१९॥
अथ सन्तः प्रवक्ष्यामि साधूनथ ततश्च वै।<br>ब्राह्मणाः श्रुतिशब्दाश्च देवानां व्यक्तमूर्तयः।<br>सम्पूज्या ब्रह्मणा होतास्तेन सन्तः प्रचक्षते॥ २०अब मैं संतों तथा साधुओंका वर्णन कर रहा हूँ। ब्राह्मण ग्रन्थ और श्रुतियोंके शब्द—ये भी देवताओंकी निर्देशिका-मूर्तियाँ हैं। अन्तःकरणमें इनके तथा ब्रह्मका संयोग बना रहता है, इसलिये ये संत कहलाते हैं।
सामान्येषु च धर्मेषु तथा वैशेषिकेषु च।<br>ब्रह्मक्षत्रविशो युक्ताः श्रौतस्मार्तेन कर्मणा॥ २१<br>वर्णाश्रमेषु युक्तस्य सुखोदर्कस्य स्वर्गंतौ।<br>श्रौतस्मार्तो हि यो धर्मो ज्ञानधर्मः स उच्यते॥ २२ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सामान्य एवं विशेष धर्मोंमें सर्वत्र श्रौत एवं स्मार्त विधिके अनुसार कर्मका आचरण करते हैं। वर्णाश्रम-धर्मोंके पालनमें तत्पर तथा स्वर्ग-प्राप्तिमें सुख माननेवाले लोगोंद्वारा आचरित जो श्रुति एवं स्मृतिसम्बन्धी धर्म है, उसे ज्ञानधर्म कहा जाता है।
दिव्यानां साधनात् साधुर्ब्रह्मचारी गुरोर्हितः।<br>कारणात् साधनाच्चैव गृहस्थः साधुरुच्यते॥ २३<br>तपसश्च तथारण्ये साधुर्वैखानसः स्मृतः।<br>यतमानो यतिः साधुः स्मृतो योगस्य साधनात्॥ २४दिव्य सिद्धियोंकी साधनामें संलग्न तथा गुरुका हितैषी होनेके कारण ब्रह्मचारीको साधु कहते हैं। (अन्य आश्रमोंकी जीविकाका) निमित्त तथा स्वयं साधनामें निरत होनेके कारण गृहस्थ भी साधु कहलाता है। वनमें तपस्या करनेवाला साधु वैखानस नामसे अभिहित होता है। योगकी साधनामें प्रयत्नशील संन्यासीको भी साधु कहते हैं।
धर्मो धर्मगतिः प्रोक्तः शब्दो ह्येष क्रियात्मकः।<br>कुशलाकुशलौ चैव धर्माधर्मौ ब्रवीत् प्रभुः॥ २५<br>अथ देवाश्च पितरः ऋषयश्चैव मानुषाः।<br>अयं धर्मो ह्ययं नेति ब्रुवते मौनमूर्तयः॥ २६<br>धर्मेति धारणे धातुर्महत्त्वे चैव उच्यते।<br>अधारणेऽमहत्त्वे वाधर्मः स तु निरुच्यते॥ २७<br>तत्रेष्टप्रापको धर्म आचार्यैरुपदिश्यते।<br>अधर्मश्चानिष्टफलं आचार्यैर्नोपदिश्यते॥ २८'धर्म' शब्द क्रियात्मक है और यह धर्माचरणमें ही प्रयुक्त होनेवाला कहा गया है। सामर्थ्यशाली भगवान्ने धर्मको कल्याणकारक और अधर्मको अनिष्टकारक बतलाया है तथा देवता, पितर, ऋषि और मानव 'यह धर्म है और यह धर्म नहीं है' ऐसा कहकर मौन धारण कर लेते हैं। 'धृ' धातु धारण करने तथा महत्त्वके अर्थमें प्रयुक्त होती है। अधारण एवं अधर्म शब्दका अर्थ इसके विपरीत है। आचार्यलोग इष्टकी प्राप्ति करानेवाले धर्मका ही उपदेश करते हैं। अधर्म अनिष्ट-फलदायक होता है, इसलिये आचार्यगण उसका उपदेश नहीं करते।
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५३४* मत्स्यपुराण *

| वृद्धाश्चालोलुपाश्चैव आत्मवन्तो ह्यदाम्भिकाः ।<br>सम्यग्विनीता मृदवस्तानाचार्यान् प्रचक्षते ॥ २९<br><br>धर्मज्ञैर्विहितो धर्मः श्रौतस्मार्तो द्विजातिभिः ।<br>दाराग्निहोत्रसम्बन्धमिज्या श्रौतस्य लक्षणम् ॥ ३०<br>स्मार्तो वर्णाश्रमाचारो यमैश्च नियमैर्युतः । | जो वृद्ध, निर्लोभ, आत्मज्ञानी, निष्कपट, अत्यन्त विनम्र तथा मृदुल स्वभाववाले होते हैं, उन्हें आचार्य कहा जाता है। धर्मके ज्ञाता द्विजातियोंद्वारा श्रौत एवं स्मार्त-धर्मका विधान किया गया है। इनमें दारसम्बन्ध (विवाह), अग्निहोत्र और यज्ञ—ये श्रौत-धर्मके लक्षण हैं तथा यम और नियमोंसे युक्त वर्णाश्रमका आचरण स्मार्त-धर्म कहलाता है॥ २९—३० १/२ ॥ |
| पूर्वेभ्यो वेदयित्वेह श्रौतं सप्तर्षयोऽब्रुवन् ॥ ३१<br>ऋचो यजूंषि सामानि ब्रह्मणोऽङ्गानि वै श्रुतिः ।<br>मन्वन्तरस्यातीतस्य स्मृत्वा तन्मनुरब्रवीत् ॥ ३२<br>तस्मात्स्मार्तः स्मृतो धर्मो वर्णाश्रमविभागशः ।<br>एवं वै द्विविधो धर्मः शिष्टाचारः स उच्यते ॥ ३३<br>शिषेर्धातोरच निष्ठान्ताच्छिष्टशब्दं प्रचक्षते ।<br>मन्वन्तरेषु ये शिष्टा इह तिष्ठन्ति धार्मिकाः ॥ ३४<br>मनुः सप्तर्षयश्चैव लोकसन्तानकारिणः ।<br>तिष्ठन्तीह च धर्मार्थं ताञ्छिष्टान् सम्प्रचक्षते ॥ ३५<br>तैः शिष्टैश्चलितो धर्मः स्थाप्यते वै युगे युगे ।<br>त्रयी वार्ता दण्डनीतिः प्रजावर्णाश्रमेप्सया ॥ ३६<br>शिष्टैराचर्यते यस्मात्पुनश्चैव मनुक्षये ।<br>पूर्वैः पूर्वैर्मतत्वाच्च शिष्टाचारः स शाश्वतः ॥ ३७<br>दानं सत्यं तपोऽलोभो विद्येज्या पूजनं दमः ।<br>अष्टौ तानि चरित्राणि शिष्टाचारस्य लक्षणम् ॥ ३८<br>शिष्टा यस्माच्चरन्त्येनं मनुः सप्तर्षयश्च ह ।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु शिष्टाचारस्ततः स्मृतः ॥ ३९<br>विज्ञेयः श्रवणाच्छ्रौतः स्मरणात् स्मार्त उच्यते ।<br>इज्यावेदात्मकः श्रौतः स्मार्तो वर्णाश्रमात्मकः ॥ ४० | सप्तर्षियोंने पूर्ववर्ती ऋषियोंसे श्रौत-धर्मका ज्ञान प्राप्त करके पुनः उसका उपदेश किया था। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—ये ब्रह्माके अङ्ग हैं। व्यतीत हुए मन्वन्तरके धर्मोंका स्मरण करके मनुने उनका उपदेश किया है। इसलिये वर्णाश्रमके विभागानुसार प्रयुक्त हुआ धर्म स्मार्त कहलाता है। इस प्रकार श्रौत एवं स्मार्तरूप द्विविध धर्मको शिष्टाचार कहते हैं। ‘शिष्’ धातुसे निष्ठासंज्ञक ‘क्त’ प्रत्ययका संयोग होनेसे ‘शिष्ट’ शब्द निष्पन्न होता है। प्रत्येक मन्वन्तरमें इस भूतलपर जो धार्मिकलोग वर्तमान रहते हैं, उन्हें शिष्ट कहा जाता है। इस प्रकार लोककी वृद्धि करनेवाले सप्तर्षि और मनु इस भूतलपर धर्मका प्रचार करनेके लिये स्थित रहते हैं, अतः वे शिष्ट शब्दसे अभिहित होते हैं। वे शिष्टगण प्रत्येक युगमें मार्ग-भ्रष्ट हुए धर्मकी पुनः स्थापना करते हैं। इसीलिये शिष्टगण दूसरे मन्वन्तरमें प्रजाओंके वर्णाश्रम-धर्मकी सिद्धिके लिये पुनः वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषिव्यापार) और दण्डनीतिका आचरण करते हैं। इस प्रकार पूर्वके युगोंमें उपस्थित पूर्वजोंद्वारा अभिमत होनेके कारण यह शिष्टाचार सनातन होता है। दान, सत्य, तपस्या, निर्लोभता, विद्या, यज्ञानुष्ठान, पूजन और इन्द्रियनिग्रह—ये आठ आचरण शिष्टाचारके लक्षण हैं। चूँकि मनु और सप्तर्षि आदि शिष्टगण सभी मन्वन्तरोंमें इस लक्षणके अनुसार आचरण करते हैं, इसलिये इसे शिष्टाचार कहा जाता है। इस प्रकार पूर्वानुक्रमसे श्रवण किये जानेके कारण श्रुतिसम्बन्धी धर्मको श्रौत जानना चाहिये और स्मरण होनेके कारण स्मृति-प्रतिपादित धर्मको स्मार्त कहा जाता है। श्रौतधर्म यज्ञ और वेदस्वरूप है तथा स्मार्तधर्म वर्णाश्रमधर्म-नियामक है॥ ३१—४०॥ |
| प्रत्यङ्गानि प्रवक्ष्यामि धर्मस्येह तु लक्षणम् ॥ ४१ | अब मैं धर्मके प्रत्येक अङ्गका लक्षण बतला रहा हूँ। |
| दृष्टानुभूतमर्थं च यः पृष्टो न विगूहते ।<br>यथाभूतप्रवादस्तु इत्येतत् सत्यलक्षणम् ॥ ४२ | देखे तथा अनुभव किये हुए विषयके पूछे जानेपर उसे न छिपाना, अपितु घटित हुएके अनुसार यथार्थ कह देना—यह सत्यका लक्षण है। |

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  • अध्याय १४५ * <div align="right">५३५</div>
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्मचर्यं तपो मौनं निराहारत्वमेव च।<br>इत्येतत् तपसो रूपं सुघोरं तु दुरासदम्॥ ४३<br><br>पशूनां द्रव्यहविषामृक्सामयजुषां तथा।<br>ऋत्विजां दक्षिणायाश्च संयोगो यज्ञ उच्यते॥ ४४<br><br>आत्मवत्सर्वभूतेषु यो हिताय शुभाय च।<br>वर्तते सततं हृष्टः क्रिया श्रेष्ठा दया स्मृता॥ ४५<br><br>आक्रुष्टोऽभिहतो यस्तु नाक्रोशेत्प्रहरेदपि।<br>अदुष्टो वाङ्मनःकायैस्तितिक्षा सा क्षमा स्मृता॥ ४६<br><br>स्वामिना रक्ष्यमाणानामुत्सृष्टानां च सम्भ्रमे।<br>परस्वानामनादानमलोभ इति संज्ञितः॥ ४७<br><br>मैथुनस्यासमाचारो जल्पनाच्चिन्तनात्तथा।<br>निवृत्तिर्ब्रह्मचर्यं च तदेतच्छमलक्षणम्॥ ४८ब्रह्मचर्य, तपस्या, मौनावलम्बन और निराहार रहना—ये तपस्याके लक्षण हैं, जो अत्यन्त भीषण एवं दुष्कर हैं। जिसमें पशु, द्रव्य, हवि, ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, ऋत्विज् तथा दक्षिणाका संयोग होता है, उसे यज्ञ कहते हैं। जो अपनी ही भाँति समस्त प्राणियोंके प्रति उनके हित तथा मङ्गलके लिये निरन्तर हर्षपूर्वक व्यवहार करता है, उसकी वह श्रेष्ठ क्रिया दया कहलाती है। जो निन्दित होनेपर बदलेमें निन्दककी निन्दा नहीं करता तथा आघात किये जानेपर भी बदलेमें उसपर प्रहार नहीं करता, अपितु मन, वचन और शरीरसे प्रतीकारकी भावनासे रहित हो उसे सहन कर लेता है, उसकी उस क्रियाको क्षमा कहते हैं। स्वामीद्वारा रक्षाके लिये दिये गये तथा घबराहटमें छूटे हुए परकीय धनको न ग्रहण करना निर्लोभ नामसे कहा जाता है। मैथुनके विषयमें सुनने, कहने तथा चिन्तन करनेसे निवृत्त रहना ब्रह्मचर्य है और यही शमका लक्षण है॥ ४१—४८॥
आत्मार्थे वा परार्थे वा इन्द्रियाणीह यस्य वै।<br>विषये न प्रवर्तन्ते दमस्यैतत्तु लक्षणम्॥ ४९जिसकी इन्द्रियाँ अपने अथवा परायेके हितके लिये विषयोंमें नहीं प्रवृत्त होतीं, यह दमका लक्षण है।
पञ्चात्मके यो विषये कारणे चाष्टलक्षणे।<br>न क्रुध्येत प्रतिहतः स जितात्मा भविष्यति॥ ५०जो पाँच कर्मेन्द्रियोंके विषयों तथा आठ प्रकारके कारणोंमें बाधित होनेपर भी क्रोध नहीं करता, वह जितात्मा कहलाता है।
यद्यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनैवागतं च यत्।<br>तत्तद् गुणवते देयमित्येतद् दानलक्षणम्॥ ५१जो-जो पदार्थ अपनेको अभीष्ट हों तथा न्यायद्वारा उपार्जित किये गये हों, उन्हें गुणी व्यक्तिको दे देना—यह दानका लक्षण है।
श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितो धर्मो वर्णाश्रमात्मकः।<br>शिष्टाचारप्रवृद्धश्च धर्मोऽयं साधुसम्मतः॥ ५२जो धर्म श्रुतियों एवं स्मृतियोंद्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रमके आचारसे युक्त तथा शिष्टाचारद्वारा परिवर्धित होता है, वही साधु-सम्मत धर्म कहलाता है।
अप्रद्वेष्यो ह्यनिष्टेषु इष्टं वै नाभिनन्दति।<br>प्रीतितापविषादानां विनिवृत्तिर्विरक्तता॥ ५३अनिष्टके प्राप्त होनेपर उससे द्वेष न करना, इष्टकी प्राप्तिपर उसका अभिनन्दन न करना तथा प्रेम, संताप और विषादसे विशेषतया निवृत्त हो जाना—यह विरक्ति (वैराग्य)-का लक्षण है।
संन्यासः कर्मणां न्यासः कृतानामकृतैः सह।<br>कुशलाकुशलाभ्यां तु प्रहाणं न्यास उच्यते॥ ५४किये हुए कर्मोंका न किये गये कर्मोंके साथ त्याग कर देना अर्थात् कृत-अकृत दोनों प्रकारके कर्मोंका त्याग संन्यास कहलाता है तथा कुशल (शुभ) और अकुशल (अशुभ)—दोनोंके परित्यागको न्यास कहते हैं।
अव्यक्तादिविशेषान्तद् विकारोऽस्मिन्निवर्तते।<br>चेतनाचेतनं ज्ञात्वा ज्ञाने ज्ञानी स उच्यते॥ ५५जिस ज्ञानके प्राप्त होनेपर अव्यक्तसे लेकर विशेषपर्यन्त सभी प्रकारके विकार निवृत्त हो जाते हैं तथा चेतन और अचेतनका ज्ञान हो जाता है, उस ज्ञानसे युक्त प्राणीको ज्ञानी कहते हैं।
प्रत्यङ्गानि तु धर्मस्य चेत्येतल्लक्षणं स्मृतम्।<br>ऋषिभिर्धर्मतत्त्वज्ञैः पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ५६स्वायम्भुव मन्वन्तरमें धर्मतत्त्वके ज्ञाता पूर्वकालीन ऋषियोंने धर्मके प्रत्येक अङ्गका यही लक्षण बतलाया है॥ ४९—५६॥
अत्र वो वर्णयिष्यामि विधिं मन्वन्तरस्य तु।<br>तथैव चातुर्होत्रस्य चातुर्वर्ण्यस्य चैव हि॥ ५७अब मैं आपलोगोंसे मन्वन्तरमें होनेवाले चारों वर्णोंके चातुर्होत्रकी विधिका वर्णन कर रहा हूँ।
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५३६* मत्स्यपुराण *

| प्रतिमन्वन्तरं चैव श्रुतिरन्या विधीयते।<br>ऋचो यजूंषि सामानि यथावत्प्रतिदैवतम्॥ ५८<br>विधिहोत्रं तथा स्तोत्रं पूर्ववत् सम्प्रवर्तते।<br>द्रव्यस्तोत्रं गुणस्तोत्रं कर्मस्तोत्रं तथैव च॥ ५९<br>तथैवाभिजनस्तोत्रं स्तोत्रमेवं चतुर्विधम्।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु यथाभेदा भवन्ति हि॥ ६०<br>प्रवर्तयन्ति तेषां वै ब्रह्मस्तोत्रं पुनः पुनः।<br>एवं मन्त्रगुणानां तु समुत्पत्तिश्चतुर्विधम्॥ ६१<br>अथर्वन्नृग्यजुःसाम्नां वेदेष्विह पृथक् पृथक्।<br>ऋषीणां तप्यतां तेषां तपः परमदुश्चरम्॥ ६२<br>मन्त्राः प्रादुर्भवन्त्यादौ पूर्वमन्वन्तरस्य ह।<br>असंतोषाद् भयाद् दुःखान्मोहाच्छोकाच्च पञ्चधा॥ ६३<br>ऋषीणां तारका येन लक्षणेन यदृच्छया।<br>ऋषीणां यादृशत्वं हि तद् वक्ष्यामीह लक्षणम्॥ ६४<br>अतीतानागतानां च पञ्चधा ह्यार्षकं स्मृतम्।<br>तथा ऋषीणां वक्ष्यामि आर्षस्येह समुद्भवम्॥ ६५<br>गुणसाम्येन वर्तन्ते सर्वसम्प्रलये तदा।<br>अविभागेन देवानामनिर्देश्यतमोमये॥ ६६<br>अबुद्धिपूर्वकं तद् वै चेतनार्थं प्रवर्तते।<br>तेनार्षं बुद्धिपूर्वं तु चेतनेनाप्यधिष्ठितम्॥ ६७<br>प्रवर्तते तथा ते तु यथा मत्स्योदकावुभौ।<br>चेतनाधिकृतं सर्वं प्रावर्तत गुणात्मकम्॥<br>कार्यकारणभावेन तथा तस्य प्रवर्तते॥ ६८<br>विषयो विषयित्वं च तथा ह्यर्थपदात्मकौ।<br>कालेन प्रापणीयेन भेदाश्च कारणात्मकाः॥ ६९<br>सांसिद्धिकास्तदा वृत्ताः क्रमेण महदादयः।<br>महतोऽसावहङ्कारस्तस्माद् भूतेन्द्रियाणि च॥ ७०<br>भूतभेदाश्च भूतेभ्यो जज्ञिरे तु परस्परम्।<br>संसिद्धिकारणं कार्यं सद्य एव विवर्तते॥ ७१<br>यथोल्मुकात् तु विटपा एककालाद् भवन्ति हि।<br>तथा प्रवृत्ताः क्षेत्रज्ञाः कालेनैकेन कारणात्॥ ७२ | प्रत्येक मन्वन्तरमें विभिन्न प्रकारकी श्रुतिका विधान होता है, किंतु ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—ये तीनों वेद देवताओंसे संयुक्त रहते हैं। अग्निहोत्रकी विधि तथा स्तोत्र पूर्ववत् चलते रहते हैं। द्रव्यस्तोत्र, गुणस्तोत्र, कर्मस्तोत्र और अभिजनस्तोत्र—ये चार प्रकारके स्तोत्र होते हैं तथा सभी मन्वन्तरोंमें कुछ भेदसहित प्रकट होते हैं। उन्हींसे ब्रह्मस्तोत्रकी बारंबार प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार मन्त्रोंके गुणोंकी समुत्पत्ति चार प्रकारकी होती है, जो अथर्व, ऋक्, यजुः और साम—इन चारों वेदोंमें पृथक्-पृथक् प्राप्त होती है। पूर्व मन्वन्तरके आदिमें परम दुष्कर तपस्यामें लगे हुए उन ऋषियोंके अन्तःकरणमें ये मन्त्र प्रादुर्भूत होते हैं। ये असंतोष, भय, कष्ट, मोह और शोकरूप पाँच प्रकारके कष्टोंसे ऋषियोंकी रक्षा करते हैं। अब ऋषियोंका जैसा लक्षण, जैसी इच्छा तथा जैसा व्यक्तित्व होता है, उसका लक्षण बतला रहा हूँ। भूतकालीन तथा भविष्यकालीन ऋषियोंमें आर्ष शब्दका प्रयोग पाँच प्रकारसे होता है। अब मैं आर्ष शब्दकी उत्पत्ति बतला रहा हूँ। समस्त महाप्रलयोंके समय जब सारा जगत् घोर अन्धकारसे आच्छादित हो जाता है, उस समय देवताओंका कोई विभाग नहीं रह जाता। तीनों गुण अपनी साम्यावस्थामें स्थित हो जाते हैं, तब जो बिना ज्ञानका सहारा लिये चेतनताको प्रकट करनेके लिये प्रवृत्त होता है, उस चेतनाधिष्ठित ज्ञानयुक्त कर्मको आर्ष कहते हैं। वे मत्स्य और उदककी भाँति आधाराधेयरूपसे प्रवृत्त होते हैं। तब सारा त्रिगुणात्मक जगत् चेतनासे युक्त हो जाता है॥ ५७—६७ १/२ ॥<br><br>उस जगत्की प्रवृत्ति कार्य-कारण-भावसे उसी प्रकार होती है, जैसे विषय और विषयित्व तथा अर्थ और पद परस्पर घुले-मिले रहते हैं। प्राप्त हुए कालके अनुसार कारणात्मक भेद उत्पन्न हो जाते हैं। तब क्रमशः महत्तत्त्व आदि प्राकृतिक तत्त्व प्रकट होते हैं। उस महत्तत्त्वसे अहंकार और अहंकारसे भूतेन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है। तत्पश्चात् उन भूतोंसे परस्पर अनेकों प्रकारके भूत उत्पन्न होते हैं। तब प्रकृतिका कारण तुरंत ही कार्य-रूपमें परिणत हो जाता है। जैसे एक ही उल्मुक—मशालसे एक ही साथ अनेकों वृक्ष प्रकाशित हो जाते हैं, उसी प्रकार एक ही कारणसे एक ही समय अनेकों क्षेत्रज्ञ—जीव प्रकट हो जाते हैं। |

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* अध्याय १४५ *५३७
यथान्धकारे खद्योतः सहसा सम्प्रदृश्यते।<br>तथा निवृत्तो ह्याव्यक्तः खद्योत इव सञ्ज्वलन्॥ ७३<br>स महात्मा शरीरस्थस्तत्रैव परिवर्तते।<br>महत्तस्तमसः पारे वैलक्षण्याद् विभाव्यते॥ ७४<br>तत्रैव संस्थितो विद्वांस्तपसोऽन्त इति श्रुतम्।<br>बुद्धिर्विवर्धतस्तस्य प्रादुर्भूता चतुर्विधा॥ ७५<br>ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं धर्मश्चेति चतुष्टयम्।<br>सांसिद्धिकान्यथैतानि अप्रतीतानि तस्य वै॥ ७६<br>महात्मनः शरीरस्य चैतन्यात् सिद्धिरुच्यते।<br>पुरि शेते यतः पूर्वं क्षेत्रज्ञानं तथापि च॥ ७७<br>पुरे शयानात् पुरुषः ज्ञानात् क्षेत्रज्ञ उच्यते।<br>यस्माद् धर्मात् प्रसूते हि तस्माद् वै धार्मिकः स्मृतः॥ ७८<br>सांसिद्धिके शरीरे च बुद्ध्याव्यक्तस्तु चेतनः।<br>एवं विवृत्तः क्षेत्रज्ञः क्षेत्रं ह्यनभिसंधितः॥ ७९<br>निवृत्तिसमकाले तु पुराणं तदचेतनम्।<br>क्षेत्रज्ञेन परिज्ञातं भोग्योऽयं विषयो मम॥ ८०जैसे घने अन्धकारमें सहसा जुगनू चमक उठता है, वैसे ही जुगनूकी तरह चमकता हुआ अव्यक्त प्रकट हो जाता है। वह महात्मा अव्यक्त शरीरमें ही स्थित रहता है और महान् अन्धकारको पार करके बड़ी विलक्षणतासे जाना जाता है। वह विद्वान् अव्यक्त अपनी तपस्याके अन्त समयतक वहीं स्थित रहता है, ऐसा सुना जाता है। वृद्धिको प्राप्त होते हुए उस अव्यक्तके हृदयमें चार प्रकारकी बुद्धि प्रादुर्भूत होती है। उन चारोंके नाम हैं—ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य और धर्म। उस अव्यक्तके ये प्राकृतिक कर्म अगम्य हैं। महात्मा अव्यक्तके शरीरके चैतन्यसे सिद्धिका प्रादुर्भाव बतलाया जाता है। चूँकि वह पहले-पहल शरीरमें शयन करता है तथा उसे क्षेत्रका ज्ञान प्राप्त रहता है, इसलिये वह शरीरमें शयन करनेसे पुरुष और क्षेत्रका ज्ञान होनेसे क्षेत्रज्ञ कहलाता है। चूँकि वह धर्मसे उत्पन्न होता है, इसलिये उसे धार्मिक भी कहते हैं। प्राकृतिक शरीरमें बुद्धिका संयोग होनेसे वह अव्यक्त चेतन कहलाता है तथा क्षेत्रसे कोई प्रयोजन न होनेपर भी उसे क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। निवृत्तिके समय क्षेत्रज्ञ उस अचेतन पुराणपुरुषको जानता है कि यह मेरा भोग्य विषय है॥ ६८–८० ॥
ऋषिर्हिंसागतौ धातुर्विद्या सत्यं तपः श्रुतम्।<br>एष संनिचयो यस्मात् ब्रह्मणस्तु ततस्त्वृषिः॥ ८१<br>निवृत्तिसमकालाच्च बुद्ध्याव्यक्त ऋषिस्त्वयम्।<br>ऋषते परमं यस्मात् परमर्षिस्ततः स्मृतः॥ ८२<br>गत्यर्थाद् ऋषतेर्धातार्नामनिवृत्तिकारणम्।<br>यस्मादेष स्वयम्भूतस्तस्माच्च ऋषिता मता॥ ८३<br>सेश्वराः स्वयमुद्भूता ब्रह्मणो मानसाः सुताः।<br>निवर्तमानैस्तैर्बुद्ध्या महान् परिगतः परः॥ ८४<br>यस्मादृषिर्महत्त्वेन ज्ञेयास्तस्मान्महर्षयः।<br>ईश्वराणां सुतास्तेषां मानसाश्चौरसाश्च वै॥ ८५<br>ऋषिस्तस्मात् परत्वेन भूतादिऋषयस्ततः।<br>ऋषिपुत्रा ऋषीकास्तु मैथुनाद् गर्भसम्भवाः॥ ८६<br>परत्वेन ऋषन्ते वै भूतादीन् ऋषिकास्ततः।<br>ऋषीकाणां सुता ये तु विज्ञेया ऋषिपुत्रकाः॥ ८७'ऋषि' धातुका हिंसा और गति-अर्थमें प्रयोग होता है। इसीसे 'ऋषि' शब्द निष्पन्न हुआ है। चूँकि उसे ब्रह्मासे विद्या, सत्य, तप, शास्त्र-ज्ञान आदि समूहोंकी प्राप्ति होती है, इसलिये उसे ऋषि कहते हैं। यह अव्यक्त ऋषि निवृत्तिके समय जब बुद्धि-बलसे परमपदको प्राप्त कर लेता है, तब वह परमर्षि कहलाता है। गत्यर्थक* 'ऋषी' धातुसे ऋषिनामकी निष्पत्ति होती है तथा वह स्वयं उत्पन्न होता है, इसलिये उसकी ऋषिता मानी गयी है। ब्रह्माके मानस पुत्र ऐश्वर्यशाली वे ऋषि स्वयं उत्पन्न हुए हैं। निवृत्तिमार्गमें लगे हुए वे ऋषि बुद्धिबलसे परम महान् पुरुषको प्राप्त कर लेते हैं। चूँकि वे ऋषि महान् पुरुषत्वसे युक्त रहते हैं, इसलिये महर्षि कहे जाते हैं। उन ऐश्वर्यशाली महर्षियोंको जो मानस एवं औरस पुत्र हुए, वे ऋषिपरक होनेके कारण प्राणियोंमें सर्वप्रथम ऋषि कहलाये। मैथुनद्वारा गर्भसे उत्पन्न हुए ऋषि-पुत्रोंको ऋषीक कहा जाता है। चूँकि ये जीवोंको ब्रह्मपरक बनाते हैं, इसलिये इन्हें ऋषिक कहा जाता है। ऋषिकके पुत्रोंको ऋषि-पुत्र जानना

* गतिके ज्ञान, मोक्ष और गमन यहाँ तीनों अर्थ विवक्षित हैं।

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५३८ * मत्स्यपुराण *

श्रुत्वा ऋषं परत्वेन श्रुतास्तस्माच्छ्रुतर्षयः।<br>अव्यक्तात्मा महात्मा वाहङ्कारात्मा तथैव च॥ ८८<br>भूतात्मा चेन्द्रियात्मा च तेषां तज्ज्ञानमुच्यते।चाहिये। वे दूसरेसे ऋषिधर्मको सुनकर ज्ञानसम्पन्न होते हैं, इसलिये श्रुतर्षि कहलाते हैं। उनका वह ज्ञान अव्यक्तात्मा, महात्मा, अहंकारात्मा, भूतात्मा और इन्द्रियात्मा कहलाता है॥ ८१—८८ १/२॥
इत्येवमृषिजातिस्तु पञ्चधा नाम विश्रुता॥ ८९<br>भृगुर्मरीचिरत्रिश्च अङ्गिराः पुलहः क्रतुः।<br>मनुर्दक्षो वसिष्ठश्च पुलस्त्यश्चापि ते दश॥ ९०<br>ब्रह्मणो मानसा ह्येते उत्पन्नाः स्वयमीश्वराः।<br>परत्वेनर्षयो यस्मान्मतास्तस्मान्महर्षयः॥ ९१<br>ईश्वराणां सुतास्तेषामृष्यस्तान् निबोधत।<br>काव्यो बृहस्पतिश्चैव कश्यपश्च्यवनस्तथा॥ ९२<br>उतथ्यो वामदेवश्च अगस्त्यः कौशिकस्तथा।<br>कर्दमो बालखिल्यश्च विश्रवाः शक्तिवर्धनः॥ ९३<br>इत्येते ऋषयः प्रोक्तास्तपसा ऋषितां गताः।<br>तेषां पुत्रानृषीकांस्तु गर्भोत्पन्नान् निबोधत॥ ९४<br>वत्सरो नग्नहूश्चैव भरद्वाजश्च वीर्यवान्।<br>ऋषिर्दीर्घतमाश्चैव बृहदुक्षः शरद्वतः॥ ९५<br>वाजिस्रवाः सुचिन्तश्च शावश्च सपराशरः।<br>शृङ्गी च शङ्खपाच्चैव राजा वैश्रवणस्तथा॥ ९६<br>इत्येते ऋषिकाः सर्वे सत्येन ऋषितां गताः।<br>ईश्वरा ऋषयश्चैव ऋषीका ये च विश्रुताः॥ ९७इस प्रकार ऋषिजाति पाँच प्रकारसे विख्यात है। भृगु, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, मनु, दक्ष, वसिष्ठ और पुलस्त्य—ये दस ऐश्वर्यशाली ऋषि ब्रह्माके मानस पुत्र हैं और स्वयं उत्पन्न हुए हैं। ये ऋषिगण ब्रह्म-परत्वसे युक्त हैं, इसलिये महर्षि माने गये हैं। अब इन ऐश्वर्यशाली महर्षियोंके पुत्ररूप जो ऋषि हैं, उन्हें सुनिये। काव्य (शुक्राचार्य), बृहस्पति, कश्यप, च्यवन, उतथ्य, वामदेव, अगस्त्य, कौशिक, कर्दम, बालखिल्य, विश्रवा और शक्तिवर्धन—ये सभी ऋषि कहलाते हैं, जो अपने तपोबलसे ऋषिताको प्राप्त हुए हैं। अब इन ऋषियोंद्वारा गर्भसे उत्पन्न हुए ऋषीक नामक पुत्रोंको सुनिये। वत्सर, नग्नहू, पराक्रमी भरद्वाज, दीर्घतमा, बृहदुक्षा, शरद्वान्, वाजिस्रवा, सुचिन्त, शाव, पराशर, शृङ्गी, शङ्खपाद और राजा वैश्रवण—ये सभी ऋषीक हैं और सत्यके प्रभावसे ऋषिताको प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार जो ईश्वर (परमर्षि एवं महर्षि), ऋषि और ऋषीक नामसे विख्यात हैं, उनका वर्णन किया गया॥ ८९—९७॥
एवं मन्त्रकृतः सर्वे कृत्स्नश्च निबोधत।<br>भृगुः काश्यः प्रचेता च दधीचो ह्यात्मवानपि॥ ९८<br>ऊर्वोऽथ जमदग्निश्च वेदः सारस्वतस्तथा।<br>आर्ष्टिषेणश्च्यवनश्च वीतहव्यः सवेधसः॥ ९९<br>वैण्यः पृथुर्दिवोदासो ब्रह्मवान् गृत्सशौनकौ।<br>एकोनविंशतिर्ह्येते भृगवो मन्त्रकृत्तमाः॥ १००<br>अङ्गिराश्चैव त्रितश्च भरद्वाजोऽथ लक्ष्मणः।<br>कृतवाचस्तथा गर्गः स्मृतिसङ्कृतिरेव च॥ १०१<br>गुरूवीतश्च मान्धाता अम्बरीषस्तथैव च।<br>युवनाश्वः पुरुकुत्सः स्वश्रवस्तु सदस्यवान्॥ १०२<br>अजमीढोऽस्वहार्यश्च ह्युत्कलः कविरेव च।<br>पृषदश्वो विरूपश्च काव्यश्चैवाथ मुद्गलः॥ १०३<br>उतथ्यश्च शरद्वांश्च तथा वाजिस्रवा अपि।<br>अपस्यौषः सुचित्तिश्च वामदेवस्तथैव च॥ १०४इसी प्रकार अब सभी मन्त्रकर्ता ऋषियोंका नाम पूर्णतया सुनिये। भृगु, काश्यप, प्रचेता, दधीचि, आत्मवान्, ऊर्व, जमदग्नि, वेद, सारस्वत, आर्ष्टिषेण, च्यवन, वीतिहव्य, वेधा, वैण्य, पृथु, दिवोदास, ब्रह्मवान्, गृत्स और शौनक—ये उन्नीस भृगुवंशी ऋषि मन्त्रकर्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। अङ्गिरा, त्रित, भरद्वाज, लक्ष्मण, कृतवाच, गर्ग, स्मृति, संकृति, गुरूवीत, मान्धाता, अम्बरीष, युवनाश्व, पुरुकुत्स, स्वश्रव, सदस्यवान्, अजमीढ, अस्वहार्य, उत्कल, कवि, पृषदश्व, विरूप, काव्य, मुद्गल, उतथ्य, शरद्वान्, वाजिस्रवा, अपस्यौष, सुचित्ति, वामदेव,

१४७- ब्रह्माके वरदानसे तारकासुरकी उत्पत्ति और उसका राज्याभिषेक

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* अध्याय १४५ *५३९

| ऋषिजो बृहच्छुक्लश्च ऋषिर्दीर्घतमा अपि।<br>कक्षीवांश्च त्रयस्त्रिंशत् स्मृता ह्यङ्गिरसां पराः॥ १०५<br>एते मन्त्रकृतः सर्वे काश्यपांस्तु निबोधत।<br>कश्यपः सहवत्सारो नैध्रुवो नित्य एव च॥ १०६<br>असितो देवलश्चैव षडेते ब्रह्मवादिनः।<br>अत्रिरर्ध्वस्वनश्चैव शावास्योऽथ गविष्ठिरः॥ १०७<br>कर्णकश्च ऋषिः सिद्धस्तथा पूर्वातित्थिश्च यः॥ १०८<br>इत्येते त्वत्रयः प्रोक्ता मन्त्रकृत् षण्महर्षयः।<br>वसिष्ठश्चैव शक्तिश्च तृतीयश्च पराशरः॥ १०९<br>ततस्तु इन्द्रप्रमितः पञ्चमस्तु भरद्वसुः।<br>षष्ठस्तु मित्रवरुणः सप्तमः कुण्डिनस्तथा॥ ११०<br>इत्येते सप्त विज्ञेया वासिष्ठा ब्रह्मवादिनः।<br>विश्वामित्रश्च गाधेयो देवरातस्तथा बलः॥ १११<br>तथा विद्वान् मधुच्छन्दा ऋषिश्चान्योऽघमर्षणः।<br>अष्टको लोहितश्चैव भृतकीलस्तथाम्बुधिः॥ ११२<br>देवश्रवा देवरातः पुराणश्च धनञ्जयः।<br>शिशिरश्च महातेजाः शालङ्कायन एव च॥ ११३<br>त्रयोदशैते विज्ञेया ब्रह्मिष्ठाः कौशिका वराः।<br>अगस्त्योऽथ दृढद्युम्नो इन्द्रबाहुस्तथैव च॥ ११४<br>ब्रह्मिष्ठागस्तयो ह्येते त्रयः परमकीर्तयः।<br>मनुर्वैवस्वतश्चैव ऐलो राजा पुरूरवाः॥ ११५<br>क्षत्रियाणां वरौ ह्येतौ विज्ञेयौ मन्त्रवादिनौ।<br>भलन्दकश्च वासाश्वः संकीलश्चैव ते त्रयः॥ ११६<br>एते मन्त्रकृतो ज्ञेया वैश्यानां प्रवरां सदा।<br>इति द्विनवतिः प्रोक्ता मन्त्रा यैश्च बहिष्कृताः॥ ११७<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या ऋषिपुत्रान् निबोधत।<br>ऋषीकाणां सुता ह्येते ऋषिपुत्राः श्रुतर्षयः॥ ११८ | ऋषिषिज, बृहच्छुक्ल, दीर्घतमा और कक्षीवान्—ये तैंतीस श्रेष्ठ ऋषि अङ्गिरागोत्रीय कहे जाते हैं। ये सभी मन्त्रकर्ता हैं। अब कश्यपवंशमें उत्पन्न होनेवाले ऋषियोंके नाम सुनिये। कश्यप, सहवत्सार, नैध्रुव, नित्य, असित और देवल—ये छः ब्रह्मवादी ऋषि हैं। अत्रि, अर्धस्वन, शावास्य, गविष्ठिर, सिद्धर्षि कर्णक और पूर्वातिथि—ये छः मन्त्रकर्ता महर्षि अत्रिवंशोत्पन्न कहे गये हैं। वसिष्ठ, शक्ति, तीसरे पराशर, इन्द्रप्रमित, पाँचवें भरद्वसु, छठे मित्रावरुण तथा सातवें कुण्डिन—इन सात ब्रह्मवादी ऋषियोंको वसिष्ठवंशोत्पन्न जानना चाहिये॥९८—११० १/२॥<br><br>गाधि-नन्दन विश्वामित्र, देवरात, बल, विद्वान् मधुच्छन्दा, अघमर्षण, अष्टक, लोहित, भृतकील, अम्बुधि, देवपरायण देवरात, प्राचीन ऋषि धनञ्जय, शिशिर तथा महान् तेजस्वी शालंकायन—इन तेरहोंको कौशिकवंशोत्पन्न ब्रह्मवादी ऋषि समझना चाहिये। अगस्त्य, दृढद्युम्न तथा इन्द्रबाहु—ये तीनों परम यशस्वी ब्रह्मवादी ऋषि अगस्त्य-कुलमें उत्पन्न हुए हैं। विवस्वान्-पुत्र मनु तथा इला-नन्दन राजा पुरूरवा—क्षत्रिय-कुलमें उत्पन्न हुए इन दोनों राजर्षियोंको मन्त्रवादी जानना चाहिये। भलन्दक, वासाश्व और संकील—वैश्योंमें श्रेष्ठ इन तीनोंको मन्त्रकर्ता समझना चाहिये। इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-कुलमें उत्पन्न हुए बानबे ऋषियोंका वर्णन किया गया, जिन्होंने मन्त्रोंको प्रकट किया है। अब ऋषि-पुत्रोंके विषयमें सुनिये। ये ऋषिपुत्र जो श्रुतर्षि कहलाते हैं, ऋषियोंके पुत्र हैं॥ १११—११८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरकल्पवर्णनो नाम पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्वन्तरकल्पवर्णन नामक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४५॥

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५४० * मत्स्यपुराण *


एक सौ छियालीसवाँ अध्याय

वज्राङ्गकी उत्पत्ति, उसके द्वारा इन्द्रका बन्धन, ब्रह्मा और कश्यपद्वारा समझाये जानेपर इन्द्रको बन्धनमुक्त करना, वज्राङ्गका विवाह, तप तथा ब्रह्माद्वारा वरदान

ऋषय ऊचुः<br>कथं मत्स्येन कथितस्तारकस्य वधो महान्।<br>कस्मिन् काले विनिर्वृत्ता कथेयं सूतनन्दन॥ १<br><br>त्वन्मुखक्षीरसिन्धूत्था कथेयममृतात्मिका।<br>कर्णाभ्यां पिबतां तृप्तिरस्माकं न प्रजायते।<br>इदं मुने समाख्याहि महाबुद्धे मनोगतम्॥ २**ऋषियोंने पूछा—**सूतनन्दन! मत्स्यभगवान्‌ने तारकासुरके वधरूप महान् कार्यका वर्णन किस प्रकार किया था? यह कथा किस समय कही गयी थी? मुने! आपके मुखरूपी क्षीरसागरसे उद्भूत हुई इस अमृतरूपिणी कथाका दोनों कानोंद्वारा पान करते हुए भी हमलोगोंको तृप्ति नहीं हो रही है। अतः महाबुद्धिमान् सूतजी! आप हमलोगोंके इस मनोऽभिलषित विषयका वर्णन कीजिये॥ १-२॥
सूत उवाच<br>पृष्टस्तु मनुना देवो मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>कथं शरवणे जातो देवः षड्वदनो विभो॥ ३<br><br>एतत्त वचनं श्रुत्वा पार्थिवस्यामितौजसः।<br>उवाच भगवान् प्रीतो ब्रह्मसूनुर्महामतिम्॥ ४**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (प्राचीन कालकी बात है) राजर्षि मनुने मत्स्यरूपधारी भगवान् विष्णुसे प्रश्न किया—'विभो! षडानन स्वामिकार्तिकका जन्म सरपतके वनमें कैसे हुआ था?' उन अमिततेजस्वी राजर्षि मनुका प्रश्न सुनकर महातेजस्वी ब्रह्मपुत्र भगवान् मत्स्य प्रसन्नतापूर्वक बोले॥ ३-४॥
मत्स्य उवाच<br>वज्राङ्गो नाम दैत्योऽभूत् तस्य पुत्रस्तु तारकः।<br>सुरानुद्वासयामास पुरेभ्यः स महाबलः॥ ५<br><br>ततस्ते ब्रह्मणोऽभ्याशं जग्मुर्भयनिपीडिताः।<br>भीतांश्च त्रिदशान् दृष्ट्वा ब्रह्मा तेषामुवाच ह॥ ६<br><br>संत्यजध्वं भयं देवाः शंकरस्यात्मजः शिशुः।<br>तुहिनाचलदौहित्रस्तं हनिष्यति दानवम्॥ ७<br><br>ततः काले तु कस्मिंश्चिद् दृष्ट्वा वै शैलजां शिवः।<br>स्वरेतो वह्निवदने व्यसृजत् कारणान्तरे॥ ८<br><br>तत् प्राप्तं वह्निवदने रेतो देवानतर्पयत्।<br>विदार्य जठराण्येषामजीर्णं निर्गतं मुने॥ ९**मत्स्यभगवान्‌ने कहा—**राजन्! (बहुत पहले) वज्राङ्ग नामका एक दैत्य उत्पन्न हुआ है, उसके पुत्रका नाम तारक था। उस महाबली तारकने देवताओंको उनके नगरोंसे निकालकर खदेड़ दिया। तब भयभीत हुए वे सभी देवगण ब्रह्माके निकट गये। उन देवताओंको डरा देखकर ब्रह्माने उनसे कहा—'देववृन्द! भय छोड़ दो। (शीघ्र ही) भगवान् शंकरके एक औरस पुत्र हिमाचलका दौहित्र (नाती) उत्पन्न होगा, जो उस दानवका वध करेगा।' तदनन्तर किसी समय पार्वतीको देखकर शिवजीका वीर्य स्खलित हो गया, तब उन्होंने उसे किसी भावी कारणवश अग्निके मुखमें गिरा दिया। अग्निके मुखमें पड़े हुए उस वीर्यने देवताओंको तृप्त कर दिया, किंतु पच न सकनेके कारण वह उनके उदरको फाड़कर बाहर निकल पड़ा

१४८- तारकासुरकी तपस्या और ब्रह्माद्वारा उसे वरदानप्राप्ति, देवासुरसंग्रामकी तैयारी तथा दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन

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* अध्याय १४६ *५४१

| पतितं तत् सरिद्वरां ततस्तु शरकानने।<br>तस्मात्तु स समुद्भूतो गुहो दिनकरप्रभः॥ १०<br><br>स सप्तदिवसो बालो निजघ्ने तारकासुरम्।<br>एवं श्रुत्वा ततो वाक्यं तमूचुर्ऋषिसत्तमाः॥ ११ | और नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गामें जा गिरा। फिर वहाँ वह बहते हुए सरपतके वनमें जा लगा। उसीसे सूर्यके समान तेजस्वी गुह उत्पन्न हुए। उसी सात दिवसीय बालकने तारकासुरका वध किया। ऐसी अद्भुत बात सुनकर उन श्रेष्ठ ऋषियोंने पुनः सूतजीसे प्रश्न किया॥५—११॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>अत्याश्चर्यवती रम्या कथेयं पापनाशिनी।<br>विस्तरेण हि नो ब्रूहि याथातथ्येन शृण्वताम्॥ १२<br><br>वज्राङ्गो नाम दैत्येन्द्रः कस्य वंशोद्भवः पुरा।<br>यस्याभूत् तारकः पुत्रः सुरप्रमथनो बली॥ १३<br><br>निर्मितः को वधे चाभूत् तस्य दैत्येश्वरस्य तु।<br>गुहजन्म तु कार्त्स्न्येन अस्माकं ब्रूहि मानद॥ १४ | ऋषियोंने पूछा—सबको मान देनेवाले सूतजी! यह कथा तो अत्यन्त आश्चर्यसे परिपूर्ण, रमणीय और पापनाशिनी है। हमलोग इसे सुनना चाहते हैं, अतः आप हमलोगोंको इसे यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक बतलाइये। पूर्वकालमें देवताओंका मान मर्दन करनेवाला महाबली तारक जिसका पुत्र था, वह दैत्यराज वज्राङ्ग किसके वंशमें उत्पन्न हुआ था? उस दैत्यराजके वधके लिये कौन-सा कारण निर्मित हुआ था? यह सब तथा गुहके जन्मकी कथा हमलोगोंको पूर्णरूपसे बतलाइये॥ १२—१४॥ |
| सूत उवाच<br>मानसो ब्रह्मणः पुत्रो दक्षो नाम प्रजापतिः।<br>षष्टिं सोऽजनयत् कन्या वीरिण्यामेव नः श्रुतम्॥ १५<br><br>ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये॥ १६<br><br>द्वे वै बाहुकपुत्राय द्वे वै चाङ्गिरसे तथा।<br>द्वे कृशाश्वाय विदुषे प्रजापतिसुतः प्रभुः॥ १७<br><br>अदितिर्दितिर्दिनुर्विश्वा हारिष्टा सुरसा तथा।<br>सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा॥ १८<br><br>कद्रूर्मुनिश्श्व लोकस्य मातरो गोषु मातरः।<br>तासां सकाशाल्लोकानां जङ्गमस्थावरात्मनाम्॥ १९<br><br>जन्म नानाप्रकाराणां ताभ्योऽन्ये देहिनः स्मृताः।<br>देवेन्द्रोपेन्द्रपूषाद्याः सर्वे तेऽदितिजा मताः॥ २०<br><br>दितेः सकाशाल्लोकास्तु हिरण्यकशिपादयाः।<br>दानवाश्च दनोः पुत्रा गावश्च सुरभीसुताः॥ २१ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! ब्रह्माके मानस पुत्र प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न की थीं, ऐसा हमने सुना है। उन ब्रह्मपुत्र सामर्थ्यशाली दक्षने उन कन्याओंमेंसे दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो बाहुक-पुत्रको, दो अङ्गिराको तथा दो विद्वान् कृशाश्वको समर्पित कर दी थीं। अदिति, दिति, दनु, विश्वा, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि—ये तेरह लोकमाताएँ कश्यपकी पत्नियाँ थीं। इन्हींसे पशुओंकी भी उत्पत्ति हुई है। इन्हींसे स्थावर-जङ्गमस्वरूप नाना प्रकारके प्राणियोंका जन्म हुआ है। देवेन्द्र, उपेन्द्र और सूर्य आदि सभी देवता अदितिसे उत्पन्न माने जाते हैं। दितिके गर्भसे हिरण्यकशिपु आदि दैत्यगण उत्पन्न हुए। दनुके दानव |

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५४२ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी
पक्षिणो विनतापुत्रा गरुडप्रमुखाः स्मृताः।<br>नागाः कद्रूसुता ज्ञेयाः शेषाश्चान्येऽपि जन्तवः ॥ २२<br><br>त्रैलोक्यनाथं शक्रं तु सर्वामरगणप्रभुम्।<br>हिरण्यकशिपुश्चक्रे जित्वा राज्यं महाबलः ॥ २३<br><br>ततः केनापि कालेन हिरण्यकशिपादयः।<br>निहता विष्णुना संख्ये शेषाश्चेन्द्रेण दानवाः ॥ २४<br><br>ततो निहतपुत्राभूत् दितिर्वरमयाचत।<br>भर्तारं कश्यपं देवं पुत्रमन्यं महाबलम् ॥ २५<br><br>समरे शक्रहन्तारं स तस्या अददात् प्रभुः ॥ २६<br><br>नियमे वर्त हे देवि सहस्रं शुचिमानसा।<br>वर्षाणां लप्स्यसे पुत्रमित्युक्ता सा तथाकरोत् ॥ २७<br><br>वर्तन्त्या नियमे तस्याः सहस्त्राक्षः समाहितः।<br>उपासामाचरत् तस्याः सा चैनमन्वमन्यत ॥ २८<br><br>दशवत्सरशेषस्य सहस्रस्य तदा दितिः।<br>उवाच शक्रं सुप्रीता वरदा तपसि स्थिता ॥ २९और गौ आदि पशु सुरभीके संतान हुए। गरुड आदि पक्षी विनताके पुत्र कहे जाते हैं। नागों तथा अन्य रेंगनेवाले जन्तुओंको कद्रूकी संतति समझना चाहिये। कुछ समय बाद हिरण्यकशिपु समस्त देवगणोंके स्वामी त्रिलोकीनाथ इन्द्रको जीतकर राज्य करने लगा। तदनन्तर कुछ समय बीतनेपर हिरण्यकशिपु आदि दैत्यगण भगवान् विष्णुके हाथों मारे गये तथा शेष दानवोंका इन्द्रने युद्धस्थलमें सफाया कर दिया। इस प्रकार जब दितिके सभी पुत्र मार डाले गये, तब उसने अपने पतिदेव महर्षि कश्यपसे युद्धमें इन्द्रका वध करनेवाले अन्य महाबली पुत्रकी याचना की। तब सामर्थ्यशाली कश्यपजीने उसे वर प्रदान करते हुए कहा—'देवि! तुम एक हजार वर्षतक पवित्र मनसे नियमका पालन करो तो तुम्हें वैसा पुत्र प्राप्त होगा।' पतिद्वारा ऐसा कही जानेपर वह नियममें तत्पर हो गयी। जिस समय वह नियममें संलग्न थी, उस समय सहस्रनेत्रधारी इन्द्र उसके निकट आकर सावधानीपूर्वक उसकी सेवा करने लगे। यह देखकर उसने इन्द्रपर विश्वास कर लिया। जब एक सहस्र वर्षकी अवधिमें दस वर्ष शेष रह गये, तब तपस्यामें निरत वरदायिनी दिति परम प्रसन्न होकर इन्द्रसे बोली ॥ १५—२९ ॥
दितिरुवाच<br><br>पुत्रोत्तीर्णव्रतां प्रायो विद्धि मां पाकशासन।<br>भविष्यति च ते भ्राता तेन सार्धमिमां श्रियम् ॥ ३०<br><br>भुङ्क्ष्व वत्स यथाकामं त्रैलोक्यं हतकण्टकम्।<br>इत्युक्त्वा निद्रयाऽऽविष्टा चरणाक्रान्तमूर्धजा ॥ ३१<br><br>स्वयं सुष्वप नियता भाविनोऽर्थस्य गौरवात्।<br>तत्तु रन्ध्रं समासाद्य जठरं पाकशासनः ॥ ३२<br><br>चकार सप्तधा गर्भं कुलिशेन तु देवराट्।<br>एकैकं तु पुनः खण्डं चकार मघवा ततः ॥ ३३**दितिने कहा—**पुत्र! अब तुम ऐसा समझो कि मैंने प्रायः अपने व्रतको पूर्ण कर लिया है। पाकशासन! (व्रतकी समाप्तिपर) तुम्हारे एक भाई उत्पन्न होगा। वत्स! उसके साथ तुम इस राजलक्ष्मी तथा निष्कण्टक त्रिलोकीके राज्यका इच्छानुसार उपभोग करना। ऐसा कहकर स्वयं दिति निद्राके वशीभूत हो सो गयी। उस समय भावी कार्यके गौरवके कारण वह अपने नियमसे च्युत हो गयी थी; क्योंकि (सोते समय) उसके खुले हुए बाल चरणोंसे दबे हुए थे। ऐसी त्रुटिपर अवसर पाकर देवराज इन्द्र दितिके उदरमें प्रविष्ट हो गये और अपने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर दिये। तत्पश्चात् इन्द्रने क्रुद्ध होकर पुनः प्रत्येक टुकड़ेको काटकर
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* अध्याय १४६ *५४३

| सप्तधा सप्तधा कोपात्प्राबुध्यत ततो दितिः।<br>विबुध्योवाच मा शक्र घातयेथाः प्रजां मम॥ ३४<br><br>तच्छ्रुत्वा निर्गतः शक्रः स्थित्वा प्राञ्जलिरग्रतः।<br>उवाच वाक्यं संत्रस्तो मातुर्वै वदनेरितम्॥ ३५<br><br>शक्र उवाच<br><br>दिवास्वप्नपरा मातः पादाक्रान्तशिरोरुहा।<br>सप्तसप्तभिरेवातस्तव गर्भः कृतो मया॥ ३६<br><br>एकोनपञ्चाशत्कृता भागा वज्रेण ते सुताः।<br>दास्यामि तेषां स्थानानि दिवि दैवतपूजिते॥ ३७<br><br>इत्युक्ता सा तदा देवी सैवमस्त्वित्यभाषत।<br>पुनश्च देवी भर्त्तारमुवाचासितलोचना॥ ३८<br><br>पुत्रं प्रजापते देहि शक्रजेतारमूर्जितम्।<br>यो नास्त्रशस्त्रैर्वध्यत्वं गच्छेत् त्रिदिववासिनाम्॥ ३९<br><br>इत्युक्तः स तथोवाच तां पत्नीमतिदुःखिताम्।<br>दशवर्षसहस्राणि तपः कृत्वा तु लप्स्यसे॥ ४०<br><br>वज्रसारमयैरङ्गैरच्छेद्यैरायसैर्दृढैः।<br>वज्राङ्गो नाम पुत्रस्ते भविता पुत्रवत्सले॥ ४१<br><br>सा तु लब्धवरा देवी जगाम तपसे वनम्।<br>दशवर्षसहस्राणि सा तपो घोरमाचरत्॥ ४२<br><br>तपसोऽन्ते भगवती जनयामास दुर्जयम्।<br>पुत्रमप्रतिकर्माणमजेयं वज्रदुश्छिदम्॥ ४३<br><br>स जातमात्र एवाभूत् सर्वशस्त्रास्त्रपारगः।<br>उवाच मातरं भक्त्या मातः किं करवाण्यहम्॥ ४४<br><br>तमुवाच ततो हृष्टा दितिर्दैत्याधिपं च सा।<br>बहवो मे हताः पुत्राः सहस्राक्षेण पुत्रक॥ ४५<br><br>तेषां त्वं प्रतिकर्तुं वै गच्छ शक्रवधाय च।<br>बाढमित्येव तामुक्त्वा जगाम त्रिदिवं बली॥ ४६ | सात-सात भागोंमें विभक्त कर दिया। इतनेमें ही दितिकी निद्रा भंग हो गयी। तब वह सचेत होकर बोली—'अरे इन्द्र! मेरी संततिका विनाश मत कर।' यह सुनकर इन्द्र दितिके उदरसे बाहर निकल आये और अपनी उस विमाताके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये। फिर डरते-डरते मन्द स्वरमें यह वचन बोले—॥ ३०—३५॥<br><br>**इन्द्रने कहा—**माँ! आप दिनमें सो रही थीं और आपके बाल पैरोंके नीचे दबे हुए थे, इस नियम-व्युतिके कारण मैंने आपके गर्भको सात भागोंमें, पुनः प्रत्येकको सात भागोंमें विभक्त कर दिया है। इस प्रकार मैंने आपके पुत्रोंको उनचास भागोंमें बाँट दिया है। अब मैं उन्हें देवताओंद्वारा पूजित स्वर्गलोकमें स्थान प्रदान करूँगा। तब ऐसा उत्तर पानेपर देवी दितिने कहा—'अच्छा, ऐसा ही हो।' तदनन्तर कजरारे नेत्रोंवाली दिति देवीने पुनः अपने पति महर्षि कश्यपसे याचना की—'प्रजापते! मुझे एक ऐसा ऊर्जस्वी पुत्र प्रदान कीजिये, जो इन्द्रको पराजित करनेमें समर्थ हो तथा स्वर्गवासी देवगण अपने शस्त्रास्त्रोंसे जिसका वध न कर सकें।' इस प्रकार कहे जानेपर महर्षि कश्यप अपनी उस अत्यन्त दुखिया पत्नीसे बोले—'पुत्रवत्सले! दस हजार वर्षतक तपस्या करनेके उपरान्त तुम्हें पुत्रकी प्राप्ति होगी। तुम्हारे गर्भसे वज्राङ्ग नामका पुत्र उत्पन्न होगा। उसके अङ्ग वज्रके सार-तत्त्वके समान सुदृढ़ और लौहनिर्मित शस्त्रास्त्रोंद्वारा अच्छेद्य होंगे।' इस प्रकार वरदान पाकर दिति देवी तपस्या करनेके लिये वनमें चली गयीं। वहाँ उन्होंने दस हजार वर्षोतक घोर तप किया। तपस्या समाप्त होनेपर ऐश्वर्यवती दितिने एक ऐसे पुत्रको उत्पन्न किया, जो दुर्जय, अद्भुतकर्मा और अजेय था तथा जिसके अङ्ग वज्रद्वारा अच्छेद्य थे। वह जन्म लेते ही समस्त शस्त्रास्त्रोंका पारगामी विद्वान् हो गया। उसने भक्तिपूर्वक अपनी माता दितिसे कहा—'माँ! मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?' तब हर्षित हुई दितिने उस दैत्यराजसे कहा—'बेटा! इन्द्रने मेरे बहुत-से पुत्रोंको मार डाला है, अतः उनका बदला लेनेके लिये तुम जाओ और इन्द्रका वध करो।' तब 'बहुत अच्छा' ऐसा मातासे कहकर महाबली वज्राङ्ग स्वर्गलोकमें जा पहुँचा। |