Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 541 of 1098

Read in context
Page 541

* अध्याय १४४ *
५३१

| श्रौतस्मार्तस्थितानां तु धर्मे सप्तर्षिदर्शिते ।<br>ते तु धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठन्तीह कृते युगे ॥ ९६<br>मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति ऋषयस्तु ते ।<br>यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्वेवापरं तृणम् ॥ ९७<br>वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु सम्भवः ।<br>एवं युगाद्युगानां वै संतानस्तु परस्परम् ॥ ९८<br>प्रवर्तते ह्यविच्छेदाद् यावन्मन्वन्तरक्षयः ।<br>सुखमायुर्बलं रूपं धर्मार्थौ काम एव च ॥ ९९<br>युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रयः पादाः क्रमेण तु ।<br>इत्येष प्रतिसंधिर्वः कीर्तितस्तु मया द्विजाः ॥ १०० | धर्मका उपदेश देते हैं। इस प्रकार सप्तर्षियोंद्वारा प्रदर्शित धर्ममार्गपर चलती हुई सारी प्रजा श्रौत एवं स्मार्त विधिका पालन करती है। वे सप्तर्षि धर्मकी व्यवस्था करनेके लिये कृतयुगमें स्थित रहते हैं। वे ही ऋषिगण मन्वन्तरोंके कार्यकालतक स्थित रहते हैं। जैसे वनोंमें दावाग्निसे जली हुई घासोंकी जड़में प्रथम वृष्टि होनेपर पुनः अङ्कुर उत्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार मन्वन्तरकी समाप्तिपर्यन्त एकसे दूसरे युगमें अविच्छिन्नरूपसे प्रजाओंमें परस्पर संतानकी परम्परा चलती रहती है। सुख, आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ, काम—ये सब क्रमशः आनेवाले युगोंमें तीन चरणसे हीन हो जाते हैं। द्विजवरो ! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे युगकी प्रतिसंधिका वर्णन किया॥ ९२-१००॥ |
| चतुर्युगाणां सर्वेषामेतदेव प्रसाधनम् ।<br>एषां चतुर्युगाणां तु गणिता ह्येकसप्ततिः ॥ १०१<br>क्रमेण परिवृत्तास्ता मनोरन्तरमुच्यते ।<br>युगाख्यासु तु सर्वासु भवतीह यदा च यत् ॥ १०२<br>तदेव च तदन्यासु पुनस्तद्वै यथाक्रमम् ।<br>सर्गे सर्गे यथा भेदा ह्युत्पद्यन्ते तथैव च ॥ १०३<br>चतुर्दशसु तावन्तो ज्ञेया मन्वन्तरेष्विह ।<br>आसुरी यातुधानी च पैशाची यक्षराक्षसी ॥ १०४<br>युगे युगे तदा काले प्रजा जायन्ति ताः शृणु ।<br>यथाकल्पं युगैः सार्धं भवन्ते तुल्यलक्षणाः ॥ १०५<br>इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै यथाक्रमम् ।<br>मन्वन्तराणां परिवर्तनानि<br>चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात् ।<br>क्षणं न संतिष्ठति जीवलोकः<br>क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः ॥ १०६<br>एते युगस्वभावा वः परिक्रान्ता यथाक्रमम् ।<br>मन्वन्तराणि यान्यस्मिन् कल्पे वक्ष्यामि तानि च ॥ १०७ | यही नियम सभी-चारों युगोंके लिये हैं। ये चारों युग जब क्रमशः इकहत्तर बार बीत जाते हैं, तब उसे एक मन्वन्तरका समय कहा जाता है। एक मन्वन्तरके युगोंमें जैसा कार्यक्रम होता है, वैसा ही अन्य मन्वन्तरके युगोंमें भी क्रमशः होता रहता है। प्रत्येक सर्गमें जैसे भेद उत्पन्न होते हैं, वैसे ही चौदहों मन्वन्तरोंमें समझना चाहिये। प्रत्येक युगमें समयानुसार असुर, यातुधान, पिशाच, यक्ष और राक्षस स्वभाववाली प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। अब उनके विषयमें सुनिये। कल्पानुसार युगोंके साथ-साथ उन्हींके अनुरूप लक्षणोंवाली प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार क्रमशः युगोंका यह लक्षण बतलाया गया। मन्वन्तरोंका यह परिवर्तन युगोंके स्वभावानुसार चिरकालसे चला आ रहा है। इसलिये यह जीवलोक उत्पत्ति और विनाशके चक्करमें फँसा हुआ क्षणमात्र भी स्थिर नहीं रहता। इस प्रकार आपलोगोंको ये युगस्वभाव क्रमशः बतलाये जा चुके। अब इस कल्पमें जितने मन्वन्तर हैं, उनका वर्णन करूँगा ॥ १०१-१०७ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकीर्तनयुगवर्तनं नाम चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्वन्तरानुकीर्तनयुगवर्तन नामक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १४४ ॥