मत्स्य महापुराण

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५३८ * मत्स्यपुराण *
| श्रुत्वा ऋषं परत्वेन श्रुतास्तस्माच्छ्रुतर्षयः।<br>अव्यक्तात्मा महात्मा वाहङ्कारात्मा तथैव च॥ ८८<br>भूतात्मा चेन्द्रियात्मा च तेषां तज्ज्ञानमुच्यते। | चाहिये। वे दूसरेसे ऋषिधर्मको सुनकर ज्ञानसम्पन्न होते हैं, इसलिये श्रुतर्षि कहलाते हैं। उनका वह ज्ञान अव्यक्तात्मा, महात्मा, अहंकारात्मा, भूतात्मा और इन्द्रियात्मा कहलाता है॥ ८१—८८ १/२॥ |
| इत्येवमृषिजातिस्तु पञ्चधा नाम विश्रुता॥ ८९<br>भृगुर्मरीचिरत्रिश्च अङ्गिराः पुलहः क्रतुः।<br>मनुर्दक्षो वसिष्ठश्च पुलस्त्यश्चापि ते दश॥ ९०<br>ब्रह्मणो मानसा ह्येते उत्पन्नाः स्वयमीश्वराः।<br>परत्वेनर्षयो यस्मान्मतास्तस्मान्महर्षयः॥ ९१<br>ईश्वराणां सुतास्तेषामृष्यस्तान् निबोधत।<br>काव्यो बृहस्पतिश्चैव कश्यपश्च्यवनस्तथा॥ ९२<br>उतथ्यो वामदेवश्च अगस्त्यः कौशिकस्तथा।<br>कर्दमो बालखिल्यश्च विश्रवाः शक्तिवर्धनः॥ ९३<br>इत्येते ऋषयः प्रोक्तास्तपसा ऋषितां गताः।<br>तेषां पुत्रानृषीकांस्तु गर्भोत्पन्नान् निबोधत॥ ९४<br>वत्सरो नग्नहूश्चैव भरद्वाजश्च वीर्यवान्।<br>ऋषिर्दीर्घतमाश्चैव बृहदुक्षः शरद्वतः॥ ९५<br>वाजिस्रवाः सुचिन्तश्च शावश्च सपराशरः।<br>शृङ्गी च शङ्खपाच्चैव राजा वैश्रवणस्तथा॥ ९६<br>इत्येते ऋषिकाः सर्वे सत्येन ऋषितां गताः।<br>ईश्वरा ऋषयश्चैव ऋषीका ये च विश्रुताः॥ ९७ | इस प्रकार ऋषिजाति पाँच प्रकारसे विख्यात है। भृगु, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, मनु, दक्ष, वसिष्ठ और पुलस्त्य—ये दस ऐश्वर्यशाली ऋषि ब्रह्माके मानस पुत्र हैं और स्वयं उत्पन्न हुए हैं। ये ऋषिगण ब्रह्म-परत्वसे युक्त हैं, इसलिये महर्षि माने गये हैं। अब इन ऐश्वर्यशाली महर्षियोंके पुत्ररूप जो ऋषि हैं, उन्हें सुनिये। काव्य (शुक्राचार्य), बृहस्पति, कश्यप, च्यवन, उतथ्य, वामदेव, अगस्त्य, कौशिक, कर्दम, बालखिल्य, विश्रवा और शक्तिवर्धन—ये सभी ऋषि कहलाते हैं, जो अपने तपोबलसे ऋषिताको प्राप्त हुए हैं। अब इन ऋषियोंद्वारा गर्भसे उत्पन्न हुए ऋषीक नामक पुत्रोंको सुनिये। वत्सर, नग्नहू, पराक्रमी भरद्वाज, दीर्घतमा, बृहदुक्षा, शरद्वान्, वाजिस्रवा, सुचिन्त, शाव, पराशर, शृङ्गी, शङ्खपाद और राजा वैश्रवण—ये सभी ऋषीक हैं और सत्यके प्रभावसे ऋषिताको प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार जो ईश्वर (परमर्षि एवं महर्षि), ऋषि और ऋषीक नामसे विख्यात हैं, उनका वर्णन किया गया॥ ८९—९७॥ |
| एवं मन्त्रकृतः सर्वे कृत्स्नश्च निबोधत।<br>भृगुः काश्यः प्रचेता च दधीचो ह्यात्मवानपि॥ ९८<br>ऊर्वोऽथ जमदग्निश्च वेदः सारस्वतस्तथा।<br>आर्ष्टिषेणश्च्यवनश्च वीतहव्यः सवेधसः॥ ९९<br>वैण्यः पृथुर्दिवोदासो ब्रह्मवान् गृत्सशौनकौ।<br>एकोनविंशतिर्ह्येते भृगवो मन्त्रकृत्तमाः॥ १००<br>अङ्गिराश्चैव त्रितश्च भरद्वाजोऽथ लक्ष्मणः।<br>कृतवाचस्तथा गर्गः स्मृतिसङ्कृतिरेव च॥ १०१<br>गुरूवीतश्च मान्धाता अम्बरीषस्तथैव च।<br>युवनाश्वः पुरुकुत्सः स्वश्रवस्तु सदस्यवान्॥ १०२<br>अजमीढोऽस्वहार्यश्च ह्युत्कलः कविरेव च।<br>पृषदश्वो विरूपश्च काव्यश्चैवाथ मुद्गलः॥ १०३<br>उतथ्यश्च शरद्वांश्च तथा वाजिस्रवा अपि।<br>अपस्यौषः सुचित्तिश्च वामदेवस्तथैव च॥ १०४ | इसी प्रकार अब सभी मन्त्रकर्ता ऋषियोंका नाम पूर्णतया सुनिये। भृगु, काश्यप, प्रचेता, दधीचि, आत्मवान्, ऊर्व, जमदग्नि, वेद, सारस्वत, आर्ष्टिषेण, च्यवन, वीतिहव्य, वेधा, वैण्य, पृथु, दिवोदास, ब्रह्मवान्, गृत्स और शौनक—ये उन्नीस भृगुवंशी ऋषि मन्त्रकर्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। अङ्गिरा, त्रित, भरद्वाज, लक्ष्मण, कृतवाच, गर्ग, स्मृति, संकृति, गुरूवीत, मान्धाता, अम्बरीष, युवनाश्व, पुरुकुत्स, स्वश्रव, सदस्यवान्, अजमीढ, अस्वहार्य, उत्कल, कवि, पृषदश्व, विरूप, काव्य, मुद्गल, उतथ्य, शरद्वान्, वाजिस्रवा, अपस्यौष, सुचित्ति, वामदेव, |