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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 538 of 1098

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Page 538

५२८ * मत्स्यपुराण *

श्लोकअर्थ
प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>स तदा तैः परिवृतो म्लेच्छान् सर्वान्निजघ्निवान्॥ ५३<br>स हत्वा सर्वशश्चैव राजानः शूद्रयोनयः।<br>पाखण्डान् स तदा सर्वान्निःशेषानकरोत् प्रभुः॥ ५४<br>अधार्मिकांश्च ये केचित्तान् सर्वान् हन्ति सर्वशः।<br>औदीच्यान्मध्यदेशांश्च पार्वतीयांस्तथैव च॥ ५५<br>प्राच्यान्प्रतीच्यांश्च तथा विन्ध्यपृष्ठापरान्तिकान्।<br>तथैव दाक्षिणात्यांश्च द्रविडांत्सिंहलैः सह॥ ५६<br>गान्धारान्यारदांश्चैव पह्लवान् यवनाञ्छकान्।<br>तुषारान्बर्बराञ्श्वेतान्हलीकान्दरदान्खसान्॥ ५७<br>लम्पकानान्ध्रकांश्चापि चोरजातींस्तथैव च।<br>प्रवृत्तचक्रो बलवाञ्शूद्राणामान्तकृद् बभौ॥ ५८<br>विद्राव्य सर्वथैतानि चचार वसुधामिमाम्।भ्रमण करता है। उस समय उसके साथ आयुधधारी सैकड़ों-हजारों ब्राह्मण भी रहते हैं। वह सामर्थ्यशाली वीर सभी म्लेच्छोंका विनाश कर देता है तथा शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए राजाओंका सर्वथा संहार करके सम्पूर्ण पाखण्डोंको भी निर्मूल कर देता है। वह सर्वत्र घूम-घूमकर सभी धर्महीनोंका वध कर देता है। शूद्रोंका विनाश करनेवाला वह महाबली राजा उत्तर दिशाके निवासी, मध्यदेशीय, पर्वतीय, पौरस्त्य, पाश्चात्य, विन्ध्याचलके ऊपर तथा तलहटियोंमें स्थित, दाक्षिणात्य, सिंहलोंसहित द्रविड़, गान्धार, पारद, पह्लव, यवन, शक, तुषार, बर्बर, श्वेत, हलीक, दरद, खस, लम्पक, आन्ध्रक तथा चोर जातियोंका संहारकर अपना शासनचक्र प्रवृत्त करता है। वह समस्त अधार्मिक प्राणियोंको खदेड़कर इस पृथ्वीपर विचरण करता हुआ सुशोभित होता है॥ ५०-५८ १/२ ॥
मानवस्य तु वंशे तु नृदेवस्येह जज्ञिवान्॥ ५९<br>पूर्वजन्मनि विष्णुश्च प्रमतिर्नाम वीर्यवान्।<br>स्वतः स वै चन्द्रमसः पूर्वं कलियुगे प्रभुः॥ ६०<br>द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रकान्ते विंशतिं समाः।<br>निजघ्ने सर्वभूतानि मानुषाण्येव सर्वशः॥ ६१<br>कृत्वा बीजावशिष्टां तां पृथिवीं क्रूरेण कर्मणा।<br>परस्परनिमित्तेन कालेनाकस्मिकेन च॥ ६२<br>संस्थिता सहसा या तु सेना प्रमतिना सह।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये सिद्धिं प्राप्ता समाधिना॥ ६३<br>ततस्तेषु प्रनष्टेषु संध्यांशे क्रूरकर्मसु।<br>उत्साद्य पार्थिवान् सर्वांस्तेष्वतीतेषु वै तदा॥ ६४<br>ततः संध्यांशके काले सम्प्राप्ते च युगान्तके।<br>स्थितास्त्वल्पावशिष्टास्तु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित्॥ ६५<br>स्वाप्रदानास्तदा ते वै लोभाविष्टास्तु वृन्दशः।<br>उपहिंसन्ति चान्योन्यं प्रलुम्पन्ति परस्परम्॥ ६६<br>अराजके युगांशे तु संक्षये समुपस्थिते।<br>प्रजास्ता वै तदा सर्वाः परस्परभयार्दिताः॥ ६७पराक्रमी प्रमति पूर्व जन्ममें विष्णु था और इस जन्ममें महाराज मनुके वंशमें भूतलपर उत्पन्न हुआ था। पहले कलियुगमें वह वीर चन्द्रमाका पुत्र था। बत्तीस वर्षकी अवस्था होनेपर उसने बीस वर्षोंतक भूतलपर सर्वत्र घूम-घूमकर सभी धर्महीन मानवों एवं अन्य प्राणियोंका संहार कर डाला। उसने आकस्मिक कालके वशीभूत हो बिना किसी निमित्तके क्रूर कर्मद्वारा उस पृथ्वीको बीजमात्र अवशेष कर दिया। तत्पश्चात् प्रमतिके साथ जो विशाल सेना थी, वह सहसा गङ्गा और यमुनाके मध्यभागमें स्थित हो गयी और समाधिद्वारा सिद्धिको प्राप्त हो गयी। इस प्रकार युगके अन्तमें संध्यांशकालके प्राप्त होनेपर सभी अधार्मिक राजाओंका विनाश होता है। उन क्रूरकर्मियोंके नष्ट हो जानेपर भूतलपर कहीं-कहीं थोड़ी-बहुत प्रजाएँ अवशिष्ट रह जाती हैं। वे लोग अपनी वस्तु दूसरेको देना नहीं चाहते। उनमें लोभकी मात्रा अधिक होती है। वे लोग यूथ-के-यूथ एकत्र होकर परस्पर एक-दूसरेकी वस्तु लूट-खसोट लेते हैं तथा उन्हें मार भी डालते हैं। उस विनाशकारी संध्यांशके उपस्थित होनेपर अराजकता फैल जाती है। उस समय सारी प्रजामें परस्पर भय बना रहता है।