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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 535 of 1098

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Page 535
* अध्याय १४४ *५२५
वेदश्चैकश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु।<br>ऋषिपुत्रैः पुनर्वेदा भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रमैः ॥ ११<br><br>मन्त्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरक्रमविपर्ययैः।<br>संहिता ऋग्यजुःसाम्नां संहन्यन्ते श्रुतर्षिभिः ॥ १२<br><br>सामान्याद् वैकृताच्चैव दृष्टिभिन्नैः क्वचित् क्वचित्।<br>ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि भाष्यविद्यास्तथैव च ॥ १३<br><br>अन्ये तु प्रस्थितास्तान् वै केचित् तान् प्रत्यवस्थिताः।<br>द्वापरेषु प्रवर्तन्ते भिन्नार्थैस्तैः स्वदर्शनैः ॥ १४<br><br>एकमाध्वर्यवं पूर्वमासीद् द्वैधं तु तत्पुनः।<br>सामान्यविपरीतार्थैः कृतं शास्त्राकुलं त्विदम् ॥ १५<br><br>आध्वर्यवं च प्रस्थानैर्बहुधा व्याकुलीकृतम्।<br>तथैवाथर्वणां साम्नां विकल्पैः स्वस्य संक्षयैः ॥ १६<br><br>व्याकुलो द्वापरेष्वर्थः क्रियते भिन्नदर्शनैः।<br>द्वापरे संनिवृत्ते तु वेदा नश्यन्ति वै कलौ ॥ १७<br><br>तेषां विपर्ययोत्पन्ना भवन्ति द्वापरे पुनः।<br>अदृष्टिर्मरणं चैव तथैव व्याध्युपद्रवाः ॥ १८<br><br>वाङ्मनःकर्मभिर्दुःखैर्निर्वेदो जायते ततः।<br>निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ॥ १९<br><br>विचारणायां वैराग्यं वैराग्याद् दोषदर्शनम्।<br>दोषाणां दर्शनाच्चैव ज्ञानोत्पत्तिस्तु जायते ॥ २०विचारवाले ऋषिपुत्रोंद्वारा उन वेदोंका पुनः (शाखा-प्रशाखा आदिमें) विभाजन कर दिया जाता है। वे महर्षिगण मन्त्र-ब्राह्मणों, स्वर और क्रमके विपर्ययसे ऋक्, यजुः और सामवेदकी संहिताओंका अलग-अलग संघटन करते हैं। भिन्न विचारवाले श्रुतर्षियोंने ब्राह्मणभाग, कल्पसूत्र तथा भाष्यविद्या आदिको भी कहीं-कहीं सामान्य रूपसे और कहीं-कहीं विपरीतक्रमसे परिवर्तित कर दिया है। कुछ लोगोंने तो उनका समर्थन और कुछ लोगोंने अवरोध किया है। इसके बाद प्रत्येक द्वापरयुगमें भिन्नार्थदर्शी ऋषिवृन्द अपने-अपने विचारानुसार वैदिक प्रथामें अर्थभेद उत्पन्न कर देते हैं। पूर्वकालमें यजुर्वेद एक ही था, परंतु ऋषियोंने उसे बादमें सामान्य और विशेष अर्थसे कृष्ण और यजुः-रूपमें दो भागोंमें विभक्त कर दिया, जिससे शास्त्रमें भेद हो गया। इस प्रकार इन लोगोंने यजुर्वेदको अनेकों उपाख्यानों तथा प्रस्थानों, खिलांशों-द्वारा विस्तृत कर दिया है। इसी प्रकार अथर्ववेद और सामवेदके मन्त्रोंका भी ह्रास एवं विकल्पोंद्वारा अर्थ-परिवर्तन कर दिया है। इस तरह प्रत्येक द्वापरयुगमें (पूर्वपरम्परासे चले आते हुए) वेदार्थको भिन्नदर्शी ऋषिवृन्द परिवर्तित करते हैं। फिर द्वापरके बीत जानेपर कलियुगमें वे वेदार्थ शनैः-शनैः नष्ट हो जाते हैं। वेदार्थका विपर्यय हो जानेके कारण द्वापरके अन्तमें ही यथार्थ दृष्टिका लोप, असामयिक मृत्यु और व्याधियोंके उपद्रव प्रकट हो जाते हैं। तब मन-वचन-कर्मसे उत्पन्न हुए दुःखोंके कारण लोगोंके मनमें खेद उत्पन्न होता है। खेदाधिक्यके कारण दुःखसे मुक्ति पानेके लिये उनके मनमें विचार जाग्रत् होता है। फिर विचार उत्पन्न होनेपर वैराग्य, वैराग्यसे दोष-दर्शन और दोषोंके प्रत्यक्ष होनेपर ज्ञानकी उत्पत्ति होती है ॥ १०-२० ॥
तेषां मेधाविनां पूर्वं मर्त्ये स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>उत्पत्स्यन्तीह शास्त्राणां द्वापरे परिपन्थिनः ॥ २१<br><br>आयुर्वेदविकल्पाश्च अङ्गानां ज्यौतिषस्य च।<br>अर्थशास्त्रविकल्पाश्च हेतुशास्त्रविकल्पनम् ॥ २२<br><br>प्रक्रियाकल्पसूत्राणां भाष्यविद्याविकल्पनम्।<br>स्मृतिशास्त्रप्रभेदाश्च प्रस्थानानि पृथक्-पृथक् ॥ २३<br><br>द्वापरेष्वभिवर्तन्ते मतिभेदास्तथा नृणाम्।<br>मनसा कर्मणा वाचा कृच्छ्राद् वार्ता प्रसिद्ध्यति ॥ २४इस प्रकार पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरके द्वापरयुगमें उन मेधावी ऋषियोंके वंशमें इस भूतपर शास्त्रोंके विरोधी लोग उत्पन्न होते हैं और उस युगमें आयुर्वेदमें विकल्प, ज्योतिषशास्त्रके अङ्गोंमें विकल्प, अर्थशास्त्रमें विकल्प, हेतुशास्त्रमें विकल्प, कल्पसूत्रोंकी प्रक्रियामें विकल्प, भाष्यविद्यामें विकल्प, स्मृतिशास्त्रोंमें नाना प्रकारके भेद, पृथक्-पृथक् मार्ग तथा मनुष्योंकी बुद्धियोंमें भेद प्रचलित हो जाते हैं। तब मन-वचन-कर्मसे लगे रहनेपर भी बड़ी कठिनाईसे लोगोंकी जीविका सिद्ध हो पाती है।