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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 546 of 1098

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Page 546
५३६* मत्स्यपुराण *

| प्रतिमन्वन्तरं चैव श्रुतिरन्या विधीयते।<br>ऋचो यजूंषि सामानि यथावत्प्रतिदैवतम्॥ ५८<br>विधिहोत्रं तथा स्तोत्रं पूर्ववत् सम्प्रवर्तते।<br>द्रव्यस्तोत्रं गुणस्तोत्रं कर्मस्तोत्रं तथैव च॥ ५९<br>तथैवाभिजनस्तोत्रं स्तोत्रमेवं चतुर्विधम्।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु यथाभेदा भवन्ति हि॥ ६०<br>प्रवर्तयन्ति तेषां वै ब्रह्मस्तोत्रं पुनः पुनः।<br>एवं मन्त्रगुणानां तु समुत्पत्तिश्चतुर्विधम्॥ ६१<br>अथर्वन्नृग्यजुःसाम्नां वेदेष्विह पृथक् पृथक्।<br>ऋषीणां तप्यतां तेषां तपः परमदुश्चरम्॥ ६२<br>मन्त्राः प्रादुर्भवन्त्यादौ पूर्वमन्वन्तरस्य ह।<br>असंतोषाद् भयाद् दुःखान्मोहाच्छोकाच्च पञ्चधा॥ ६३<br>ऋषीणां तारका येन लक्षणेन यदृच्छया।<br>ऋषीणां यादृशत्वं हि तद् वक्ष्यामीह लक्षणम्॥ ६४<br>अतीतानागतानां च पञ्चधा ह्यार्षकं स्मृतम्।<br>तथा ऋषीणां वक्ष्यामि आर्षस्येह समुद्भवम्॥ ६५<br>गुणसाम्येन वर्तन्ते सर्वसम्प्रलये तदा।<br>अविभागेन देवानामनिर्देश्यतमोमये॥ ६६<br>अबुद्धिपूर्वकं तद् वै चेतनार्थं प्रवर्तते।<br>तेनार्षं बुद्धिपूर्वं तु चेतनेनाप्यधिष्ठितम्॥ ६७<br>प्रवर्तते तथा ते तु यथा मत्स्योदकावुभौ।<br>चेतनाधिकृतं सर्वं प्रावर्तत गुणात्मकम्॥<br>कार्यकारणभावेन तथा तस्य प्रवर्तते॥ ६८<br>विषयो विषयित्वं च तथा ह्यर्थपदात्मकौ।<br>कालेन प्रापणीयेन भेदाश्च कारणात्मकाः॥ ६९<br>सांसिद्धिकास्तदा वृत्ताः क्रमेण महदादयः।<br>महतोऽसावहङ्कारस्तस्माद् भूतेन्द्रियाणि च॥ ७०<br>भूतभेदाश्च भूतेभ्यो जज्ञिरे तु परस्परम्।<br>संसिद्धिकारणं कार्यं सद्य एव विवर्तते॥ ७१<br>यथोल्मुकात् तु विटपा एककालाद् भवन्ति हि।<br>तथा प्रवृत्ताः क्षेत्रज्ञाः कालेनैकेन कारणात्॥ ७२ | प्रत्येक मन्वन्तरमें विभिन्न प्रकारकी श्रुतिका विधान होता है, किंतु ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—ये तीनों वेद देवताओंसे संयुक्त रहते हैं। अग्निहोत्रकी विधि तथा स्तोत्र पूर्ववत् चलते रहते हैं। द्रव्यस्तोत्र, गुणस्तोत्र, कर्मस्तोत्र और अभिजनस्तोत्र—ये चार प्रकारके स्तोत्र होते हैं तथा सभी मन्वन्तरोंमें कुछ भेदसहित प्रकट होते हैं। उन्हींसे ब्रह्मस्तोत्रकी बारंबार प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार मन्त्रोंके गुणोंकी समुत्पत्ति चार प्रकारकी होती है, जो अथर्व, ऋक्, यजुः और साम—इन चारों वेदोंमें पृथक्-पृथक् प्राप्त होती है। पूर्व मन्वन्तरके आदिमें परम दुष्कर तपस्यामें लगे हुए उन ऋषियोंके अन्तःकरणमें ये मन्त्र प्रादुर्भूत होते हैं। ये असंतोष, भय, कष्ट, मोह और शोकरूप पाँच प्रकारके कष्टोंसे ऋषियोंकी रक्षा करते हैं। अब ऋषियोंका जैसा लक्षण, जैसी इच्छा तथा जैसा व्यक्तित्व होता है, उसका लक्षण बतला रहा हूँ। भूतकालीन तथा भविष्यकालीन ऋषियोंमें आर्ष शब्दका प्रयोग पाँच प्रकारसे होता है। अब मैं आर्ष शब्दकी उत्पत्ति बतला रहा हूँ। समस्त महाप्रलयोंके समय जब सारा जगत् घोर अन्धकारसे आच्छादित हो जाता है, उस समय देवताओंका कोई विभाग नहीं रह जाता। तीनों गुण अपनी साम्यावस्थामें स्थित हो जाते हैं, तब जो बिना ज्ञानका सहारा लिये चेतनताको प्रकट करनेके लिये प्रवृत्त होता है, उस चेतनाधिष्ठित ज्ञानयुक्त कर्मको आर्ष कहते हैं। वे मत्स्य और उदककी भाँति आधाराधेयरूपसे प्रवृत्त होते हैं। तब सारा त्रिगुणात्मक जगत् चेतनासे युक्त हो जाता है॥ ५७—६७ १/२ ॥<br><br>उस जगत्की प्रवृत्ति कार्य-कारण-भावसे उसी प्रकार होती है, जैसे विषय और विषयित्व तथा अर्थ और पद परस्पर घुले-मिले रहते हैं। प्राप्त हुए कालके अनुसार कारणात्मक भेद उत्पन्न हो जाते हैं। तब क्रमशः महत्तत्त्व आदि प्राकृतिक तत्त्व प्रकट होते हैं। उस महत्तत्त्वसे अहंकार और अहंकारसे भूतेन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है। तत्पश्चात् उन भूतोंसे परस्पर अनेकों प्रकारके भूत उत्पन्न होते हैं। तब प्रकृतिका कारण तुरंत ही कार्य-रूपमें परिणत हो जाता है। जैसे एक ही उल्मुक—मशालसे एक ही साथ अनेकों वृक्ष प्रकाशित हो जाते हैं, उसी प्रकार एक ही कारणसे एक ही समय अनेकों क्षेत्रज्ञ—जीव प्रकट हो जाते हैं। |