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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 534 of 1098

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Page 534

५२४ * मत्स्यपुराण *


| यज्ञप्रवर्तनं ह्येवमासीत् स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>तदाप्रभृति यज्ञोऽयं युगैः सह व्यवर्तत॥ ४२ | ही कहा गया है। इस प्रकार स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें यज्ञकी प्रथा प्रारम्भ हुई थी। तबसे यह यज्ञ सभी युगोंके साथ प्रवर्तित हुआ॥ ३५-४२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकल्पे देवर्षिसंवादो नाम त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके मन्वन्तरानुकल्पमें देवर्षिसंवाद नामक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४३॥


एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय

द्वापर और कलियुगकी प्रवृत्ति तथा उनके स्वभावका वर्णन, राजा प्रमतिका वृत्तान्त तथा पुनः कृतयुगके प्रारम्भका वर्णन

| सूत उवाच<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि द्वापरस्य विधिं पुनः।<br>तत्र त्रेतायुगे क्षीणे द्वापरं प्रतिपद्यते॥ १<br>द्वापरादौ प्रजानां तु सिद्धिस्त्रेतायुगे तु या।<br>परिवृत्ते युगे तस्मिस्ततः सा सम्प्रणश्यति॥ २<br>ततः प्रवर्तिते तासां प्रजानां द्वापरे पुनः।<br>लोभोऽधृतिर्वणिग्युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः॥ ३<br>प्रध्वंसश्चैव वर्णानां कर्मणां तु विपर्ययः।<br>याच्ञा वधः पणो दण्डो मानो दम्भोऽक्षमा बलम्॥ ४<br>तथा रजस्तमो भूयः प्रवृत्तिर्द्वापरे स्मृता।<br>आद्ये कृते तु धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रपद्यते॥ ५<br>द्वापरे व्याकुलो भूत्वा प्रणश्यति कलौ पुनः।<br>वर्णानां द्वापरे धर्माः संकीर्यन्ते तथाऽऽश्रमाः॥ ६<br>द्वैधमुत्पद्यते चैव युगे तस्मिञ्छ्रुतौ स्मृतौ।<br>द्वैधाच्छ्रुतेः स्मृतेश्चैव निश्चयो नाधिगम्यते॥ ७<br>अनिश्चयावगमनाद् धर्मतत्त्वं न विद्यते।<br>धर्मतत्त्वे ह्यविज्ञाते मतिभेदस्तु जायते॥ ८<br>परस्परं विभिन्नैस्तैर्दृष्टीनां विभ्रमेण तु।<br>अयं धर्मो ह्ययं नेति निश्चयो नाधिगम्यते॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके बाद अब मैं द्वापरयुगकी विधिको वर्णन कर रहा हूँ। त्रेतायुगके क्षीण हो जानेपर द्वापरयुगकी प्रवृत्ति होती है। द्वापरयुगके प्रारम्भ-कालमें प्रजाओंको त्रेतायुगकी भाँति ही सिद्धि प्राप्त होती है, किंतु जब द्वापरयुगका प्रभाव पूर्णरूपसे व्याप्त हो जाता है, तब वह सिद्धि नष्ट हो जाती है। उस समय प्रजाओंमें लोभ, धैर्यहीनता, वाणिज्य, युद्ध, सिद्धान्तोंकी अनिश्चितता, वर्णोंका विनाश, कर्मोंका उलट-फेर, याच्ञा (भिक्षावृत्ति), संहार, परायापन, दण्ड, अभिमान, दम्भ, असहिष्णुता, बल तथा रजोगुण एवं तमोगुण बढ़ जाते हैं। सर्वप्रथम कृतयुगमें तो अधर्मका लेशमात्र भी नहीं रहता, किंतु त्रेतायुगमें उसकी कुछ-कुछ प्रवृत्ति होती है। पुनः द्वापरयुगमें वह विशेषरूपसे व्याप्त होकर कलियुगमें युग-समाप्तिके समय विनष्ट हो जाता है। द्वापरयुगमें चारों वर्णों तथा आश्रमोंके धर्म परस्पर घुल-मिल जाते हैं। इस युगमें श्रुतियों और स्मृतियोंमें भेद उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार श्रुति और स्मृतिकी मान्यतामें भेद पड़नेके कारण किसी विषयका ठीक निश्चय नहीं हो पाता। अनिश्चितताके कारण धर्मका तत्त्व लुप्त हो जाता है। धर्मतत्त्वका ज्ञान न होनेपर बुद्धिमें भेद उत्पन्न हो जाता है। बुद्धिमें भेद पड़नेके कारण उनके विचार भी भ्रान्त हो जाते हैं और फिर धर्म क्या है और अधर्म क्या है, यह निश्चय नहीं हो पाता॥ १-९॥ |
| एको वेदश्चतुष्पादः त्रेतास्विह विधीयते।<br>संक्षेपादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेष्विह॥ १० | पहले त्रेताके प्रारम्भमें आयुके संक्षेप हो जानेके कारण एक ही वेद ऋक्, यजुः, अथर्वण, साम—चार नामोंसे विभक्त कर दिया जाता है। फिर द्वापरमें विभिन्न |