About this granth
The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.
This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.
The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.
१०३२ * मत्स्यपुराण *
| गृहे तु रक्तमुकुटा उत्पलाङ्कुशधारिणी।<br>वरदाभयदा चापि पूजनीया सभर्तृका ॥ ५५<br><br>तपोवनस्थामितरां तां तु सम्पूजयेद् बुधः।<br>देव्या विनायकस्तद्वद् वलभीच्छन्दके शुभः ॥ ५६ | हैं। गृहमें लाल मुकुट धारण करनेवाली, चार हाथोंमें क्रमशः कमल, अङ्कुश, वरदमुद्रा एवं अभयमुद्रासे युक्त देवीका पतिसहित पूजन करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको दूसरी जो तपोवनमें स्थित रहनेवाली देवी हैं, उनकी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। देवीके साथ विनायक (गणेशजी) वलभी और छन्दक प्रासादमें शुभदायक होते हैं॥ ५१—५६॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रासादानुकीर्तनं नामैकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रासादानुकीर्तन नामक दो सौ उनहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६९॥
दो सौ सत्तरवाँ अध्याय
प्रासाद-संलग्न मण्डपोंके नाम, स्वरूप, भेद और उनके निर्माणकी विधि
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि मण्डपानां तु लक्षणम्।<br>मण्डपप्रवरान् वक्ष्ये प्रासादस्यानुरूपतः ॥ १<br>विविधा मण्डपाः कार्या ज्येष्ठमध्यकनीयसः।<br>नामतस्तान् प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमः ॥ २<br>पुष्पकः पुष्पभद्रश्च सुव्रतोऽमृतनन्दनः।<br>कौसल्यो बुद्धिसंकीर्णो गजभद्रो जयावहः ॥ ३<br>श्रीवत्सो विजयश्चैव वास्तुकीर्तिः श्रुतिञ्जयः।<br>यज्ञभद्रो विशालश्च सुश्लिष्टः शत्रुमर्दनः ॥ ४<br>भागपञ्चो नन्दनश्च मानवो मानभद्रकः।<br>सुग्रीवो हरितश्चैव कर्णिकारः शतर्धिकः ॥ ५<br>सिंहश्च श्यामभद्रश्च सुभद्रश्च तथैव च।<br>सप्तविंशतिराख्याता लक्षणं शृणुत द्विजाः ॥ ६<br>स्तम्भा यत्र चतुःषष्टिः पुष्पकः समुदाहृतः।<br>द्विषष्टिः पुष्पभद्रस्तु षष्टिः सुव्रत उच्यते ॥ ७<br>अष्टपञ्चाशकस्तम्भः कथ्यतेऽमृतनन्दनः।<br>कौसल्यः षट् च पञ्चाशच्चतुष्पञ्चाशता पुनः ॥ ८<br>नाम्ना तु बुद्धिसंकीर्णो द्विहीनो गजभद्रकः।<br>जयावहस्तु पञ्चाशच्छ्रीवत्सस्तद् विहीनकः ॥ ९<br>विजयस्तद्द्विहीनः स्याद् वास्तुकीर्तिस्तथैव च।<br>द्वाभ्यामेव प्रहीयेत ततः श्रुतिञ्जयोऽपरः ॥ १० | श्रेष्ठ ऋषिगण! अब मैं प्रासादोंके अनुरूप मण्डपोंका लक्षण बतला रहा हूँ। इस प्रसङ्गमें श्रेष्ठ मण्डपोंका भी वर्णन करूँगा। ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ-भेदोंसे विविध मण्डपोंकी रचना करनी चाहिये। मैं उन सभीका आनुपूर्वी नाम-निर्देशपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। द्विजगण! पुष्पक, पुष्पभद्र, सुव्रत, अमृतनन्दन, कौसल्य, बुद्धिसंकीर्ण, गजभद्र, जयावह, श्रीवत्स, विजय, वास्तुकीर्ति, श्रुतिञ्जय, यज्ञभद्र, विशाल, सुश्लिष्ट, शत्रुमर्दन, भागपञ्च, नन्दन, मानव, मानभद्रक, सुग्रीव, हरित, कर्णिकार, शतर्धिक, सिंह, श्यामभद्र तथा सुभद्र—ये सत्ताईस प्रकारके मण्डप कहे गये हैं। अब आपलोग इनके लक्षणोंको सुनिये। जिस मण्डपमें चौंसठ स्तम्भ लगे हों, उस मण्डपको ‘पुष्पक’ कहते हैं। इसी प्रकार बासठ स्तम्भवालेको ‘पुष्पभद्र’ और साठ स्तम्भवालेको ‘सुव्रत’ कहा गया है। अट्ठावन स्तम्भवाला मण्डप ‘अमृतनन्दन’ कहा जाता है। छप्पन स्तम्भोंवाले मण्डपको ‘कौसल्य’, चौवन स्तम्भवालेको बुद्धिसंकीर्ण, उससे दो स्तम्भ कम अर्थात् बावन स्तम्भवालेको ‘गजभद्रक’, पचास स्तम्भवालेको ‘जयावह’, अड़तालीस स्तम्भोंवाले मण्डपको ‘श्रीवत्स’ तथा छियालीस स्तम्भोंवालेको ‘विजय’ कहते हैं। उसी प्रकार छियालीस स्तम्भोंवाला मण्डप ‘वास्तुकीर्ति’ कहलाता है। चौवालीस स्तम्भोंवाले मण्डपको ‘श्रुतिञ्जय’ कहते हैं॥ १—१०॥ |
* अध्याय २७० * । १०३३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चत्वारिंशद्यज्ञभद्रस्तद्विहीनो विशालकः।<br>षट्त्रिंशच्चैव सुश्लिष्टो द्विहीनः शत्रुमर्दनः ॥ ११<br>द्वात्रिंशद्भागपञ्चस्तु त्रिंशद्भिन्नन्दनः स्मृतः।<br>अष्टाविंशन्मानवस्तु मानभद्रो द्विहीनकः ॥ १२<br>चतुर्विंशस्तु सुग्रीवो द्वाविंशो हरितो मतः।<br>विंशतिः कर्णिकारः स्यादाष्टादश शतर्धिकः ॥ १३<br>सिंहो भवेद् द्विहीनश्च श्यामभद्रो द्विहीनकः।<br>सुभद्रस्तु तथा प्रोक्तो द्वादशस्तम्भसंयुतः ॥ १४<br>मण्डपाः कथितास्तुभ्यं यथावल्लक्षणान्विताः।<br>त्रिकोणं वृत्तमर्धेन्दुमष्टकोणं द्विरष्टकम् ॥ १५<br>चतुष्कोणं तु कर्तव्यं संस्थानं मण्डपस्य तु।<br>राज्यं च विजयश्चैव आयुर्वर्धनमेव च ॥ १६<br>पुत्रलाभः श्रियः पुष्टिस्त्रिकोणादिक्रमाद् भवेत्।<br>एवं तु शुभदाः प्रोक्ताश्चान्यथा त्वशुभावहाः ॥ १७<br>चतुःषष्टिपदं कृत्वा मध्ये द्वारं प्रकल्पयेत्।<br>विस्ताराद् द्विगुणोच्छ्रायं तत्रिभागः कटिर्भवेत् ॥ १८<br>विस्तार्धो भवेद् गर्भो भित्तयोऽन्याः समन्ततः।<br>गर्भपादेन विस्तीर्णं द्वारं त्रिगुणमायतम् ॥ १९<br>तथा द्विगुणविस्तीर्णमुखस्तद्वदुदुम्बरः।<br>विस्तारपादप्रतिमं बाहुल्यं शाखयोः स्मृतम् ॥ २० | 'यज्ञभद्र'-मण्डपमें चालीस, विशालकमें उससे दो स्तम्भ न्यून अर्थात् अड़तीस, 'सुश्लिष्ट' में छत्तीस और 'शत्रुमर्दन' में उससे दो स्तम्भ न्यून अर्थात् चौंतीस, 'भागपञ्च' में बत्तीस और 'नन्दन' में तीस स्तम्भ माने गये हैं। अट्ठाईस स्तम्भोंका 'मानव', छब्बीसका 'मानभद्र', चौबीसका 'सुग्रीव', बाईसका 'हरित', बीसकी 'कर्णिका', अठारहका 'शतधिक', सोलहका 'सिंह', चौदहका 'श्यामभद्र' और बारहका 'सुभद्र' कहा गया है। इस प्रकार मैंने लक्षणोंसहित मण्डपोंके नाम तुम्हें बतला दिया। इन मण्डपोंकी स्थापना त्रिकोण, गोलाकार, अर्धचन्द्राकार, अष्टकोण, दशकोण अथवा चतुष्कोणरूपमें करनी चाहिये। इन त्रिकोणादिकोंकी स्थापनासे क्रमशः राज्य, विजय, आयुकी वृद्धि, पुत्र-लाभ, लक्ष्मी और पुष्टिकी प्राप्ति होती है। इस प्रकारके मण्डप मङ्गलदायक तथा इनसे विपरीत अमङ्गलकारक होते हैं। गृहके मध्यमें चौंसठ पदोंकी कल्पनाकर मध्यमें द्वार बनाना चाहिये। चौड़ाईसे ऊँचाई दुगुनी होनी चाहिये और उसके कटिभागको तृतीयांशके बराबर बनाना चाहिये। चौड़ाईका आधा मध्यभाग होना चाहिये। उसके चारों ओर दूसरी दीवारें रहेंगी। मध्यभागके चतुर्थांशसे तिगुना लम्बा और दूना विस्तृत द्वार होना चाहिये, जो गूलरका बना हुआ हो। दोनों शाखाओंका विस्तार द्वारके विस्तारका चतुर्थांश हो॥ ११-२०॥ |
| त्रिप्रञ्चसप्तनवभिः शाखाभिर्द्वारमिष्यते।<br>कनिष्ठमध्यमं ज्येष्ठं यथायोगं प्रकल्पयेत् ॥ २१<br>अङ्गुलानां शतं सार्धं चत्वारिंशत्तथोन्नतम्।<br>त्रिंशद्विंशोत्तरं चान्यद्वान्यमुत्तममेव च ॥ २२<br>शतं चाशीतिसहितं वातनिर्गमने भवेत्।<br>अधिकं दशभिस्तद्वत् तथा षोडशभिः शतम् ॥ २३<br>शतमानं तृतीयं च नवत्याशीतिभिस्तथा।<br>दश द्वाराणि चैतानि क्रमेणोक्तानि सर्वदा ॥ २४<br>अन्यानि वर्जनीयानि मानसोद्वेगदानि तु।<br>द्वारवेधं प्रयत्नेन सर्ववास्तुषु वर्जयेत् ॥ २५<br>वृक्षकोणभ्रमिद्वारस्तम्भकूपध्वजादिभिः ।<br>कुड्यश्वभ्रेण वा विद्धं द्वारं न शुभदं भवेत् ॥ २६ | मण्डप-द्वार, तीन, पाँच, सात अथवा नौ शाखाओंसे युक्त बनते हैं, जो क्रमशः कनिष्ठ, मध्यम और ज्येष्ठ कहलाते हैं। एक सौ साढ़े चालीस अंगुल ऊँचा द्वार धनप्रद एवं उत्तम होता है। अन्य दो एक सौ तीस तथा एक सौ बीस अंगुलके होते हैं। शुद्ध वायुके आने-जानेके लिये एक सौ अस्सी अंगुल ऊँचा द्वार होना चाहिये। उसी प्रकार एक सौ दस, एक सौ सोलह, एक सौ नब्बे तथा अस्सी अंगुलके द्वार होने चाहिये। सर्वदा क्रमशः ये दस प्रकारके द्वार कहे गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्य प्रकारके द्वार वर्जित हैं; क्योंकि वे चित्तको उद्विग्न करनेवाले होते हैं। सभी वास्तुओंमें प्रयत्नपूर्वक द्वारवेधसे बचना चाहिये। सामनेकी ओर वृक्ष, कोण, भ्रमि, द्वार, स्तम्भ, कूप, ध्वज, दीवाल और गङ्ढा—इन सबसे विद्ध किया हुआ द्वार मंगलकारी नहीं |
१०३४ * मत्स्यपुराण *
| क्षयश्च दुर्गतिश्चैव प्रवासः क्षुद्भयं तथा।<br>दौर्भाग्यं बन्धनं रोगो दारिद्र्यं कलहं तथा॥ २७<br>विरोधश्चार्थनाशश्च सर्वं वेधाद् भवेत् क्रमात्।<br>पूर्वेण फलिनो वृक्षाः क्षीरवृक्षास्तु दक्षिणे॥ २८<br>पश्चिमेन जलं श्रेष्ठं पद्मोत्पलविभूषितम्।<br>उत्तरे सरलैस्तालैः शुभा स्यात् पुष्पवाटिका॥ २९<br>सर्वतस्तु जलं श्रेष्ठं स्थिरमस्थिरमेव च।<br>पार्श्वतश्चापि कर्तव्यं परिवारादिकालयम्॥ ३०<br>याम्ये तपोवनस्थानमुत्तरे मातृकागृहम्।<br>महानसं तथाऽऽग्नेये नैर्ऋत्येऽथ विनायकम्॥ ३१<br>वारुणे श्रीनिवासस्तु वायव्ये गृहमालिका।<br>उत्तरे यज्ञशाला तु निर्माल्यस्थानमुत्तरे॥ ३२<br>वारुणे सोमदैवत्ये बलिनिर्वपणं स्मृतम्।<br>पुरतो वृषभस्थानं शेषे स्यात् कुसुमायुधः॥ ३३<br>जलवापी तथेशाने विष्णुस्तु जलशय्यपि।<br>एवमायतनं कुर्यात् कुण्डमण्डपसंयुतम्॥ ३४<br>घण्टावितानकसतोरणचित्रयुक्तं<br>नित्योत्सवप्रमुदितेन जनेन सार्धम्।<br>यः कारयेत् सुरगृहं विविधं ध्वजाङ्कं<br>श्रीस्तं न मुञ्चति सदा दिवि पूज्यते च॥ ३५<br>एवं गृहार्चनविधावपि शक्तितः स्यात्<br>संस्थापनं सकलमन्त्रविधानयुक्तम्।<br>गोवस्त्रकाञ्चनहिरण्यधराप्रदानं<br>देयं गुरुद्विजवरेषु तथान्नदानम्॥ ३६ | होता। इन द्वारवेधसे क्रमशः क्षय, दुर्गति, प्रवास, क्षुधाका भय, दुर्भाग्य, बन्धन, रोग, दरिद्रता, कलह, विरोध, धनहानि—ये सब कुपरिणाम होते हैं। घरके पूर्व दिशामें फलदार वृक्ष, दक्षिण दिशामें दूधवाले वृक्ष, पश्चिम दिशामें विविध भाँतिके कमलोंसे सुशोभित जल तथा उत्तर दिशामें चीड़ और ताड़के वृक्षोंसे युक्त पुष्पवाटिका मङ्गलदायिनी होती है॥ २१—२९॥<br><br>जल सभी दिशाओंमें श्रेष्ठ है, चाहे वह (नदी आदिका) बहता हुआ हो अथवा (कूप, सरोवर आदिका) अचल। मुख्य भवनके दोनों पार्श्वोंमें परिवार-वर्गका निवासस्थान बनाना चाहिये। दक्षिणकी ओर तपोवन अथवा तपस्याका स्थान, उत्तरमें मातृकाओंका भवन, अग्निकोणमें पाकशाला, नैर्ऋत्यकोणमें गणेशका निवास, पश्चिममें लक्ष्मीका निवास, वायव्यकोणमें गृहमालिका, उत्तरमें यज्ञशाला और निर्माल्यका स्थान होना चाहिये। पश्चिमकी ओर चन्द्रादि देवताओंके लिये बलिदान देनेका स्थान, सामनेकी ओर वृषभका स्थान और शेष भागमें कामदेवके स्थानका निर्माण करना चाहिये। ईशानकोणमें जलयुक्त बावली रहे तथा वहीं जलशायी विष्णुभगवान्का भी स्थान रहे। इस प्रकार कुण्ड और मण्डपसे युक्त गृहका निर्माण करना चाहिये। जो मनुष्य घण्टा, वितान, तोरण तथा चित्रसे सुशोभित, नित्य महोत्सवसे प्रमुदित जनसमूहके साथ विविध ध्वजाओंसे विभूषित देव-मन्दिर बनवाता है, उसे लक्ष्मी कभी नहीं छोड़तीं और स्वर्गमें उसकी पूजा होती है। इसी प्रकार गृहपूजनके अवसरपर भी अपनी शक्तिके अनुरूप सभी मन्त्रों और विधानोंसे युक्त स्थापना करनी चाहिये। उस समय गुरु तथा ब्राह्मणोंको गौ, वस्त्र, सुवर्णके आभूषण, सुवर्ण और पृथ्वीका दान देना चाहिये तथा अन्नदान भी करना चाहिये॥ ३०—३६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रासादानुकीर्तनं नाम सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रासाद-अनुकीर्तन नामक दो सौ सत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७०॥
| * अध्याय २७१ * | १०३५ |
|---|
दो सौ एकहत्तरवाँ अध्याय
राजवंशानुकीर्तन *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>पूरोर्वशस्त्वया सूत सभविष्यो निवेदितः।<br>सूर्यवंशे नृपा ये तु भविष्यन्ति हि तान् वद॥ १<br>तथैव यादवे वंशे राजानः कीर्तिवर्धनाः।<br>कलौ युगे भविष्यन्ति तानपीह वदस्व नः॥ २<br>वंशान्ते ज्ञातयो याश्च राज्यं प्राप्स्यन्ति सुव्रताः।<br>ब्रूहि संक्षेपतस्तासां यथाभव्यमनुक्रमात्॥ ३ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! आप पिछली कथाके प्रसङ्गमें पूरुवंशी राजाओंके वंशका भविष्यसहित वर्णन हमलोगोंको सुना चुके हैं। अब आगे कलियुगमें जो सूर्यवंशी राजा होंगे, उनका वर्णन कीजिये। इसी प्रकार जो कीर्तिशाली यदुवंशी राजा होंगे, उन्हें भी बताइये तथा इन वंशोंके अन्त हो जानेपर जो अन्य शुभ व्रत-परायण जातियाँ राज्य करेंगी, उनका भी संक्षेपमें वर्णन कीजिये। इसीके साथ-साथ क्रमशः यह भी बताइये कि भविष्यमें कौन-सी विशेष घटनाएँ घटित होंगी?॥ १—३॥ |
| सूत उवाच<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि हीक्ष्वाकूणां महात्मनाम्।<br>बृहद्बलस्य दायादो वीरो राजा बृहत्क्षयः।<br>उरुक्षयः सुतस्तस्य वत्सव्यूहो उरुक्षयात्॥ ४<br>वत्सव्यूहात् प्रतिव्योमस्तस्य पुत्रो दिवाकरः।<br>तस्यैव मध्यदेशे तु अयोध्या नगरी शुभा॥ ५<br>दिवाकरस्य भविता सहदेवो महायशाः।<br>सहदेवस्य दायादो बृहदश्वो महामनाः॥ ६<br>तस्य भानुरथो भाव्यः प्रतीपाश्वश्च तत्सुतः।<br>प्रतीपाश्वसुतश्चापि सुप्रतीको भविष्यति॥ ७<br>मरुदेवः सुतस्तस्य सुनक्षत्रस्ततोऽभवत्।<br>किंनराश्वः सुनक्षत्राद् भविष्यति परंतपः॥ ८<br>किंनराश्वादन्तरिक्षो भविष्यति महामनाः।<br>सुषेणश्चान्तरिक्षाच्च सुमित्रश्चाप्यमित्रजित्॥ ९<br>सुमित्रजो बृहद्राजो धर्मी तस्य सुतः स्मृतः।<br>पुत्रः कृतञ्जयो नाम धर्मिणः स भविष्यति॥ १०<br>कृतञ्जयसुतो विद्वान् भविष्यति रणञ्जयः।<br>भविता सञ्जयश्चापि वीरो राजा रणञ्जयात्॥ ११<br>सञ्जयस्य सुतः शाक्यः शाक्याच्छुद्धोदनोऽभवत्।<br>शुद्धोदनस्य भविता सिद्धार्थो राहुलः सुतः॥ १२ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके बाद मैं इक्ष्वाकुवंशी महात्मा राजाओंका वर्णन कर रहा हूँ। सूर्यवंशी राजा बृहद्बलका पुत्र वीरवर राजा बृहत्क्षय होगा तथा बृहत्क्षयका पुत्र उरुक्षय और उरुक्षयका पुत्र वत्सव्यूह होगा। वत्सव्यूहका पुत्र प्रतिव्योम तथा उसका पुत्र दिवाकर होगा। उसीकी राजधानी मध्य देशमें अयोध्या नामक सुन्दर नगरी होगी। दिवाकरका पुत्र महायशस्वी सहदेव होगा तथा सहदेवका पुत्र महामना बृहदश्व होगा। उस बृहदश्वका पुत्र भानुरथ तथा भानुरथका पुत्र प्रतीपाश्व होगा। प्रतीपाश्वका पुत्र सुप्रतीक होगा और उसका पुत्र मरुदेव होगा। मरुदेवका पुत्र सुनक्षत्र उत्पन्न होगा। सुनक्षत्रका पुत्र शत्रुओंको संतप्त करनेवाला किंनराश्व होगा और किंनराश्वका पुत्र महामना अन्तरिक्ष होगा। अन्तरिक्षका पुत्र सुषेण तथा उसका पुत्र शत्रुओंको जीतनेवाला सुमित्र होगा। (प्रथम) सुमित्रका पुत्र बृहद्राज और बृहद्राजका पुत्र धर्मी तथा धर्मीका पुत्र कृतञ्जय होगा। कृतञ्जयका पुत्र विद्वान् रणञ्जय और रणञ्जयका पुत्र वीरराजा सञ्जय उत्पन्न होगा। सञ्जयका पुत्र शाक्य तथा शाक्यका पुत्र राजा शुद्धोदन होगा। शुद्धोदनका पुत्र सिद्धार्थ तथा सिद्धार्थका |
* सभी पुराणोंकी अनेक छपी तथा हस्तलिखित प्रतियोंको एकत्र कर तथा पाठका संशोधनकर विल्सन्, स्मिथ, पार्जीटर आदिने इनका सुन्दर अनुवाद भी प्रस्तुत किया है और पीछे वही मिल, एलिफिंस्टन, स्मिथ, कैम्ब्रिज आदिके भारतके प्राचीन इतिहासोंका आधार बना।
१०३६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रसेनजित् ततो भाव्यः क्षुद्रको भविता ततः।<br>क्षुद्रकात् कुलको भाव्यः कुलकात् सुरथः स्मृतः॥ १३<br>सुमित्रः सुरथाज्जातो ह्यन्त्यस्तु भविता नृपः।<br>एते चैक्ष्वाकवः प्रोक्ता भविष्या ये कलौ युगे॥ १४<br>बृहद्बलान्वये जाता भविष्याः कुलवर्धनाः।<br>अत्रानुवंशश्लोकोऽयं विप्रैर्गीतः पुरातनैः॥ १५<br>शूराश्च कृतविद्याश्च सत्यसंधा जितेन्द्रियाः।<br>निःशेषाः कथिताश्चैव नृपा ये वै पुरातनाः॥ १६<br>इक्ष्वाकूणामयं वंशः सुमित्रान्तो भविष्यति।<br>सुमित्रं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ॥ १७<br>इत्येवं भानवो वंशः प्रागेव समुदाहृतः।<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मागधा ये बृहद्रथाः॥ १८ | पुत्र राहुल होगा। उससे प्रसेनजित उत्पन्न होगा और उससे क्षुद्रककी उत्पत्ति होगी। क्षुद्रकसे कुलक और कुलकसे सुरथ उत्पन्न होगा। सुरथसे सुमित्र (द्वितीय) पैदा होगा, जो इस वंशका अन्तिम राजा होगा। ये इक्ष्वाकुवंशी राजा हैं, जो कलियुगमें उत्पन्न होंगे। ये सभी राजा शूर, विद्वान्, जितेन्द्रिय एवं कुलकी वृद्धि करनेवाले राजा बृहद्बलके वंशमें उत्पन्न होंगे। प्राचीनकालिक ब्राह्मणोंने इस वंशपरम्पराको सूचित करनेवाला इस भावका एक श्लोक कहा है—'इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका यह वंश राजा सुमित्रके राज्यकालतक होगा। कलियुगमें यह वंश राजा सुमित्रको प्राप्त कर विश्राम करेगा।' इस प्रकार यह सूर्यवंश पहले ही कहा जा चुका है॥ ४—१७ १/२॥ |
| जरासंधस्य ये वंशे सहदेवान्वये नृपाः।<br>अतीता वर्तमानाश्च भविष्यांश्च तथा पुनः॥ १९ | अब इसके बाद मैं बृहद्रथके वंशवाले मगधके राजाओंका, जो जरासंधके पुत्र सहदेवके वंशमें भूत, वर्तमान तथा भविष्यकालमें उत्पन्न होंगे, वर्णन कर रहा हूँ। |
| संग्रामे भारते वृत्ते सहदेवे निपातिते।<br>सोमाधिस्तस्य दायादो राजाभूच्च गिरिव्रजे॥ २० | महाभारत-युद्धमें सहदेवके मारे जानेपर उनका पुत्र सोमाधि गिरिव्रजमें राजा हुआ। |
| पञ्चाशतं तथाष्टौ च समा राज्यमकारयत्।<br>श्रुतश्रवाश्चतुःषष्टिं समास्तस्यान्वयेऽभवत्॥ २१ | उसने अठ्ठावन वर्षोंतक राज्य किया। उसीके वंशमें श्रुतश्रवा नामक राजा हुआ, जो चौंसठ वर्षोंतक राज्य करता रहा। |
| अयुतायुस्तु षट्त्रिंशत् समा राज्यमकारयत्।<br>चत्वारिंशत् समास्तस्य निरमित्रो दिवं गतः॥ २२ | उसके बाद उसका पुत्र अयुतायु राजा हुआ, जिसने छत्तीस वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र निरमित्र हुआ, जो चालीस वर्षोंतक राज्य कर स्वर्गवासी हो गया। |
| पञ्चाशतं समाः षट् च सुक्षत्रः प्राप्तवान् महीम्।<br>बृहत्कर्मा त्रयोविंशदब्दं राज्यमकारयत्॥ २३ | उसके बाद राजा सुक्षत्र उत्पन्न हुआ, जिसने छप्पन वर्षोंतक राज्य किया। तदनन्तर बृहत्कर्माने तेईस वर्षोंतक राज्य किया। |
| सेनाजित् सम्प्रयातश्च भुक्त्वा पञ्चाशतं महीम्।<br>श्रुतञ्जयस्तु वर्षाणि चत्वारिंशद् भविष्यति॥ २४ | उसके बाद राजा सेनाजित्ने पचास वर्षोंतक पृथ्वीका पालनकर स्वर्गकी राह ली। तदनन्तर श्रुतञ्जय नामक राजा होगा, जो चालीस वर्षोंतक राज्य करेगा। |
| अष्टाविंशतिवर्षाणि महीं प्राप्स्यति वै विभुः।<br>अष्टपञ्चाशतं षट् च राज्ये स्थास्यति वै शुचिः॥ २५ | उसके बाद विभु अट्ठाईस वर्षोंतक पृथ्वीपर शासक होगा। तत्पश्चात् राजा शुचि चौंसठ वर्षोंतक राज्यपर स्थित रहेगा। |
| अष्टाविंशत् समा राजा क्षेमो भोक्ष्यति वै महीम्।<br>सुव्रतस्तु चतुःषष्टिं राज्यं प्राप्स्यति वीर्यवान्॥ २६ | उसके बाद राजा क्षेम अट्ठाईस वर्षोंतक पृथ्वीका उपभोग करेगा। तदुपरान्त पराक्रमी सुव्रत चौंसठ वर्षोंके लिये राज्य प्राप्त करेगा। |
| पञ्चत्रिंशतिवर्षाणि सुनेत्रो भोक्ष्यते महीम्।<br>भोक्ष्यते निर्वृतिश्चेमामष्टपञ्चाशतं समाः॥ २७ | उसके उपरान्त सुनेत्र पचीस वर्षोंतक पृथ्वीका उपभोग करेगा। तदनन्तर निवृत्ति अट्ठावन वर्षोंतक पृथ्वीका उपभोग करेगा। |
| अष्टाविंशत् समा राज्यं त्रिनेत्रो भोक्ष्यते ततः।<br>चत्वारिंशत् तथाष्टौ च द्युमत्सेनो भविष्यति॥ २८ | उसके बाद राजा त्रिनेत्र अट्ठाईस वर्षतक राज्यका भोग करेगा। तदनन्तर अड़तालीस वर्षतक द्युमत्सेन राजा |
| * अध्याय २७२ * | १०३७ |
|---|
| त्रयस्त्रिंशत्तु वर्षाणि महीनेत्रः प्रकाश्यते।<br>द्वात्रिंशत्तु समा राजा चञ्चलस्तु भविष्यति॥ २९<br>रिपुञ्जयस्तु वर्षाणि पञ्चाशत् प्राप्स्यते महीम्।<br>द्वात्रिंशति नृपा ह्येते भवितारो बृहद्रथाः।<br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु तेषां राज्यं भविष्यति॥ ३० | होगा। उसके बाद तैंतीस वर्षोंतक महीनेत्रका राज्य होगा। तदुपरांत बत्तीस वर्षतक चञ्चल राजा होगा। उसके बाद पचास वर्षोंतक पृथ्वी रिपुञ्जयके हाथमें रहेगी। इस प्रकार ये बत्तीस राजा बृहद्रथके वंशमें उत्पन्न होंगे। उनका राज्यकाल पूरा एक सहस्र वर्षका होगा॥ १८-३०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजवंशानुकीर्तने एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजवंशका कीर्तन नामक दो सौ एकहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७१॥
दो सौ बहत्तरवाँ अध्याय
कलियुगके प्रद्योतवंशी आदि राजाओंका वर्णन
| सूत उवाच<br>बृहद्रथेष्वतीतेषु वीतिहोत्रेष्ववन्तिषु।<br>पुलकः स्वामिनं हत्वा स्वपुत्रमभिषेक्ष्यति॥ १<br>मिषतां क्षत्रियाणां च बालकः पुलकोद्भवः।<br>स वै प्रणतसामन्तो भविष्यो नयवर्जितः॥ २<br>त्रयोविंशत् समा राजा भविता स नरोत्तमः।<br>अष्टाविंशतिवर्षाणि पालको भविता ततः॥ ३<br>विशाखयूपो भविता नृपः पञ्चाशतिं तथा समाः।<br>एकविंशत् समा राजा सूर्यकस्तु भविष्यति॥ ४<br>भविष्यति समा त्रिंशत् तत्सुतो नन्दिवर्धनः।<br>द्विपञ्चाशत्ततो भुक्त्वा प्रणष्टाः पञ्चते नृपाः।<br>हत्वा तेषां यशः कृत्स्नं शिशुनागो भविष्यति॥ ५<br>वाराणस्यां सुतं स्थाप्य श्रयिष्यति गिरिव्रजम्।<br>शिशुनागश्च वर्षाणि चत्वारिंशद् भविष्यति॥ ६<br>काकवर्णः सुतस्तस्य षट्त्रिंशत् प्राप्स्यते महीम्।<br>षड्विंशच्चैव वर्षाणि क्षेमधर्मा भविष्यति॥ ७<br>चतुर्विंशत्समाः सोऽपि क्षेमजित्प्राप्स्यते महीम्।<br>अष्टाविंशतिवर्षाणि विम्बसारो भविष्यति॥ ८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (मगधमें) बृहद्रथवंशीय एवं अवन्तिदेशमें वीतिहोत्रवंशीय राजाओंके समाप्त हो जानेपर पुलक अपने स्वामी (रिपुञ्जय)-को मारकर उसके स्थानपर अपने पुत्रको अभिषिक्त करेगा। पुलकसे उत्पन्न हुआ वह बालक क्षत्रियोंके देखते-देखते केवल शक्तिके बलपर सामन्तोंद्वारा वन्दनीय हो जायगा, किंतु उसका शासन नीति-धर्म-पूर्ण न होगा। वह नरोत्तम तेईस वर्षोंतक राज्य करेगा। इसके बाद अट्ठाईस वर्षोंतक पालक राजा होगा। तत्पश्चात् विशाखयूप नामक राजा होगा, जो पचास वर्षोंतक राज्य करेगा। फिर सूर्यक इक्कीस वर्षोंतक राज्य करेगा। उसके बाद उसका पुत्र नन्दिवर्धन राजा होगा, जो तीस वर्षोंतक राज्य करेगा। इस प्रकार ये पाँच राजा बावन वर्षोंतक पृथ्वीका उपभोग करके नष्ट हो जायँगे। तदनन्तर इन राजाओंके सम्पूर्ण यशका अपहरण करके शिशुनाग नामक राजा होगा, जो वाराणसी नगरीमें अपने पुत्रको स्थापित कर स्वयं गिरिव्रज (राजगृह या पाटलिपुत्र)-का आश्रय लेगा। यह शिशुनाग चालीस वर्षोंतक राजा होगा। उसका पुत्र काकवर्ण होगा, जो छब्बीस वर्षोंतक पृथ्वीका राज्य करेगा। उसके बाद छत्तीस वर्षोंतक क्षेमधर्मा नामक राजा होगा। तदनन्तर चौबीस वर्षोंतक क्षेमजित् नामक राजा राज्य करेगा। तत्पश्चात् अट्ठाईस वर्षोंतक |
| १०३८ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| अजातशत्रुर्भविता पञ्चविंशत् समा नृपः।<br>पञ्चविंशत् समा राजा दर्शकस्तु भविष्यति॥ ९<br><br>उदासी* भविता तस्मात् त्रयस्त्रिंशत् समा नृपः।<br>स वै पूर्वपरं राजा दक्षिणयां कुसुमाह्वयम्॥ १०<br><br>गङ्गाया दक्षिणे कूले चतुर्थे तु करिष्यति।<br>चत्वारिंशत् समा भाव्यो राजा वै नन्दिवर्धनः॥ ११ | बिम्बसार राजा होगा। फिर पच्चीस वर्षोंतक अजातशत्रु नामक राजा होगा। तदनन्तर उसका पुत्र दर्शक राजा होगा, जो पैंतीस वर्षोंतक राज्य करेगा। फिर उदासी नामक राजा तैंतीस वर्षोंतक शासन करेगा। वह राज्यके चतुर्थ वर्षमें गङ्गाके दक्षिण तटपर कुसुमपुर या पाटलीपुत्र (पटना) नगर बसायेगा। उसके बाद चालीस वर्षोंतक नन्दिवर्धन राजा होगा॥ ९—११॥ |
| चत्वारिंशत् त्रयश्चैव महानन्दी भविष्यति।<br>इत्येते भवितारो वै शिशुनागाः नृपा दश॥ १२<br><br>शतानि त्रीणि पूर्णानि षष्टिवर्षाधिकानि तु।<br>शिशुनागा भविष्यन्ति राजानः क्षत्रबान्धवाः॥ १३<br><br>एतैः सार्धं भविष्यन्ति यावत् कलिनृपाः परे।<br>तुल्यकालं भविष्यन्ति सर्वे ह्येते महीक्षितः॥ १४<br><br>चतुर्विंशत्तथैक्ष्वाकाः पाञ्चालाः सप्तविंशतिः।<br>काशेयास्तु चतुर्विंशदष्टाविंशत् तु हैहयाः॥ १५<br><br>कलिङ्गाश्चैव द्वात्रिंशदश्मकाः पञ्चविंशतिः।<br>कुरवश्चापि षड्विंशदष्टाविंशास्तु मैथिलाः॥ १६<br><br>शूरसेनास्त्रयोविंशद् वीतिहोत्राश्च विंशतिः।<br>एते सर्वे भविष्यन्ति एककालं महीक्षितः॥ १७<br><br>महानन्दिसुतश्चापि शूद्रायां कलिकांशजः।<br>उत्पत्स्यते महापद्मः सर्वक्षत्रान्तको नृपः॥ १८<br><br>ततः प्रभृति राजानो भविष्याः शूद्रयोनयः।<br>एकराट् स महापद्मो एकछत्रो भविष्यति॥ १९<br><br>अष्टाशीतिस्तु वर्षाणि पृथिव्यां च भविष्यति।<br>सर्वक्षत्रमथोत्साद्य भाविनाथेन चोदितः॥ २० | तदनन्तर तैंतालीस वर्षोंतक महानन्दी राजा होगा। ये दस राजा शिशुनागके बाद इस वंशमें उत्पन्न होंगे। इस प्रकार कुल मिलाकर तीन सौ साठ वर्षोंतक शिशुनागवंशीय राजा राज्य करेंगे, जो क्षत्रियोंमें निम्नकोटिके क्षत्रिय होंगे। इन्हीं राजाओंके साथ कलियुगमें अन्य राजा भी होंगे, जो सभी समसामयिक होंगे। उनमें चौबीस इक्ष्वाकुवंशीय, सत्ताईस पाञ्चालके, चौबीस काशीके, अट्ठाईस हैहयवंशीय, बत्तीस कलिंगदेशीय, पच्चीस अश्मक (महाराष्ट्री), छब्बीस कुरुदेशी, अट्ठाईस मैथिल, तेईस शूरसेन देश (माथुर मण्डल)-के तथा बीस वीतिहोत्रवंशीय—ये सभी राजा एक समयमें ही राज्य करेंगे। महानन्दिका पुत्र महापद्म कलियुगके अंशरूपसे शूद्राके गर्भसे उत्पन्न होगा। यह राजा सम्पूर्ण क्षत्रियोंका विनाशक होगा। तभीसे शूद्राके गर्भसे उत्पन्न होनेवाले लोग राजा होंगे। वह महापद्म एकछत्र सम्राट् होगा, जो अट्ठासी वर्षोंतक पृथ्वीका उपभोग करेगा। वह भावीवश समस्त क्षत्रिय राजाओंका विनाश कर डालेगा॥ १२—२०॥ |
| सुकल्पादिसुता ह्यष्टौ समा द्वादश ते नृपाः।<br>महापद्मस्य पर्याये भविष्यन्ति नृपाः क्रमात्॥ २१<br><br>उद्धरिष्यति तान् सर्वान् कौटिल्योः वैद्विरष्टभिः।<br>भुक्त्वा महीं वर्षशतं ततो मौर्यान् गमिष्यति॥ २२<br><br>भविता शतधन्वा च तस्य पुत्रस्तु षड् समाः।<br>बृहद्रथस्तु वर्षाणि तस्य पुत्रश्च सप्ततिः॥ २३ | तदनन्तर उस महापद्मके वंशमें सुकल्प आदि आठ पुत्र राजा होंगे, जो क्रमशः केवल बारह वर्षोंतक राज्य करेंगे। बारह वर्षोंके बाद कौटिल्य महापद्मके पुत्रोंको उखाड़ देगा। फिर उसके सौ वर्षोंतक राज्य करनेके बाद यह राज्य मौर्यवंशके अधिकारमें चला जायगा। इसके पश्चात् उसका पुत्र शतधन्वा होगा, जो छः वर्षोंतक राज्य करेगा। उसके बाद उसका पुत्र बृहद्रथ सत्तर वर्षोंतक |
* अन्यत्र सर्वत्र 'उदयी' पाठ है
| * अध्याय २७२ * | १०३९ |
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| षट्त्रिंशत् तु समा राजा भविता शक एव च।<br>सप्तानां दश वर्षाणि तस्य नप्ता भविष्यति ॥ २४<br>राजा दशरथोऽष्टौ तु तस्य पुत्रो भविष्यति।<br>भविता नव वर्षाणि तस्य पुत्रश्च सप्ततिः ॥ २५<br>इत्येते दश मौर्यास्तु ये भोक्ष्यन्ति वसुंधराम्।<br>सप्तत्रिंशच्छतं पूर्णं तेभ्यः शुङ्गान् गमिष्यति ॥ २६<br>पुष्यमित्रस्तु सेनानीरुद्धृत्य स बृहद्रथान्।<br>कारयिष्यति वै राज्यं षट्त्रिंशतिसमा नृपः ॥ २७<br>अग्निमित्रः सुतश्चाष्टौ भविष्यति समा नृपः।<br>भवितापि वसुज्येष्ठः सप्त वर्षाणि वै नृपः।<br>वसुमित्रः सुतो भाव्यो दश वर्षाणि वै ततः ॥ २८<br>ततोऽन्धकः समे द्वे तु तस्य पुत्रो भविष्यति।<br>भविष्यति समास्तस्मात् त्रीण्येवं स पुलिन्दकः ॥ २९<br>भविता वज्रमित्रस्तु समा राजा पुनर्भवः।<br>द्वात्रिंशत् तु समाभागः समाभागात् ततो नृपः ॥ ३०<br>भविष्यति सुतस्तस्य देवभूमिः समा दश।<br>दशैते क्षुद्रराजानो भोक्ष्यन्तीमां वसुंधराम् ॥ ३१<br>शतं पूर्णं शते द्वे च ततः शुङ्गान् गमिष्यति।<br>अमात्यो वसुदेवस्तु प्रसह्य ह्यवनीं नृपः ॥ ३२<br>देवभूमिमथोत्साद्य शौङ्गस्तु भविता नृपः।<br>भविष्यति समा राजा नव काण्वायनो द्विजः ॥ ३३<br>भूमिमित्रः सुतस्तस्य चतुर्दश भविष्यति।<br>नारायणः सुतस्तस्य भविता द्वादशैव तु ॥ ३४<br>सुशर्मा तत्सुतश्चापि भविष्यति दशैव तु।<br>इत्येते शुङ्गभृत्यास्तु स्मृताः काणवायना नृपाः ॥ ३५<br>चत्वारिंशद् द्विजा होते काण्वा भोक्ष्यन्ति वै महीम्।<br>चत्वारिंशत् पञ्च चैव भोक्ष्यन्तीमां वसुंधराम् ॥ ३६<br>एते प्रणतसामन्ता भविष्या धार्मिकाश्च ये।<br>येषां पर्यायकाले तु भूमिरान्ध्रान् गमिष्यति ॥ ३७ | राज्य करेगा। तदनन्तर छत्तीस वर्षोंतक शक राजा रहेगा। शकके बाद उसका नाती सत्तर वर्षोंतक राज्य करेगा। उसका पुत्र राजा दशरथ होगा, जो आठ वर्षोंतक राज्य करेगा। तदनन्तर उसका पुत्र उन्नासी वर्षोंतक राज्य करेगा। ये दस मौर्यवंशीय राजा एक सौ सैंतीस वर्षोंतक पृथ्वीका शासन करेंगे। तदनन्तर यह राज्य शुंगवंशीयोंके हाथमें चला जायगा। उस समय शुंगवंशी सेनापति पुष्यमित्र बृहद्रथवंशज राजाओंका विनाश कर स्वयं राजा बन बैठेगा और छत्तीस वर्षोंतक राज्य करेगा ॥ २१–२७ ॥<br><br>तदनन्तर अग्निमित्र नामक राजा होगा, जो आठ वर्षोंतक राज्य करेगा। उसके बाद वसुज्येष्ठ सात वर्षोंतक राज्य करेगा। तत्पश्चात् वसुमित्र नामक राजा होगा, जो दस वर्षोंतक राज्य करेगा। तदनन्तर अन्धक नामक राजा दो वर्ष, फिर उसका पुत्र पुलिन्दक तीन वर्षतक राज्य करेगा। पुलिन्दकके बाद वज्रमित्र नामक राजा चौदह वर्षोंतक राज्य करेगा। उसके बाद बत्तीस वर्षोंतक समाभाग नामक राजा होगा। समाभागके बाद उसका पुत्र देवभूमि राजा होगा जो दस वर्षोंतक राज्य करेगा। ये दस छोटे-छोटे राजा इस वसुंधराका तीन सौ वर्षोंतक उपभोग करेंगे। इसके बाद राज्य शुंगवंशियोंके हाथमें चला जायगा। राजा देवभूमिका अमात्य शुंगवंशीय वसुदेव राजाको मारकर पृथ्वीका शासक होगा, जो काणवायन नामसे नौ वर्षतक राज्य करेगा। उसका पुत्र भूमिमित्र होगा, जो चौदह वर्षतक राज्य करेगा। उसका पुत्र नारायण बारह वर्षोंतक राजा रहेगा। फिर उसका पुत्र सुशर्मा दस वर्षोंतक राज्य करेगा। ये शुङ्गभृत्य राजा काणवायन नामसे कहे गये हैं। ये काण्व नामक चालीस द्विज पैंतालीस वर्षोंतक इस पृथ्वीका उपभोग करेंगे। सामन्तोंद्वारा प्रणाम किये जानेवाले ये राजा परमधार्मिक होंगे। इनके कार्यकालमें ही पृथ्वी आन्ध्रवंशीय राजाओंके हाथमें चली जायगी ॥ २८–३७ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजवंशानुकीर्तने द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजवंशकीर्तन नामक दो सौ बहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २७२ ॥
| १०४० | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ तिहत्तरवाँ अध्याय
आन्ध्रवंशीय, शकवंशीय एवं यवनादि राजाओंका संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| काणवायनांस्ततो भृत्यान् सुशर्माणं प्रसह्य तम्।<br>शुङ्गानां चैव यच्छेषं क्षपित्वा तु बलीयसः॥ १ | ऋषियो! (गत अध्यायमें कथित) काणवायनवंशमें उत्पन्न होनेवाले क्षत्रियों तथा उनके स्वामी सुशर्मा नामक राजाको, जो शुङ्गभृत्योंका अन्तिम राजा होगा, बलपूर्वक पराजित कर उन्हींका सजातीय शिशुक नामक आन्ध्र राजा इस वसुन्धराको प्राप्त करेगा।* |
| शिशुकोऽन्ध्रः सजातीयः प्राप्स्यतीमां वसुंधराम्।<br>त्रयोविंशत्समा राजा शिशुकस्तु भविष्यति॥ २ | वह शिशुक तेईस वर्षोंतक पृथ्वीका शासन करेगा। |
| कृष्णो भ्राता यवीयस्तु ह्यष्टादश भविष्यति।<br>श्रीशातकर्णिर्भविता तस्य पुत्रस्तु वै दश॥ ३ | उसके बाद उसका छोटा भाई कृष्ण अठारह वर्षतक शासन करेगा। उसका पुत्र श्रीशातकर्णि दस वर्षतक राज्य करेगा। |
| पूर्णोत्सङ्गस्ततो राजा वर्षाण्यष्टादशैव तु।<br>स्कन्धस्तम्भिस्तथा राजा वर्षाण्यष्टादशैव तु॥ ४ | उसका पुत्र पूर्णोत्सङ्ग नामक राजा होगा, जो अठारह वर्षोंतक राज्य करेगा। उसके बाद स्कन्धस्तम्भि नामक राजा अठारह वर्षतक राज्य करेगा। |
| पञ्चाशतं समाः षट् च शान्तकर्णिर्भविष्यति।<br>दश चाष्टौ च वर्षाणि तस्य लम्बोदरः सुतः॥ ५ | फिर शान्तकर्णि नामक राजा छप्पन वर्षतक राज्य करेगा। उसका पुत्र लम्बोदर अठारह वर्षतक राज्य करेगा। |
| आपीतको दश द्वे च तस्य पुत्रो भविष्यति।<br>दश चाष्टौ च वर्षाणि मेघस्वातिर्भविष्यति॥ ६ | उसका पुत्र आपीतक बारह वर्षतक राज्य करेगा। तदनन्तर मेघस्वाति नामक राजा होगा, जो अठारह वर्षतक राज्य करेगा। |
| स्वातिश्च भविता राजा समास्त्वष्टादशैव तु।<br>स्कन्दस्वातिस्तथा राजा सप्तैव तु भविष्यति॥ ७ | इसके बाद स्वाति नामक राजा होगा, वह भी अठारह वर्षतक राज्य करेगा। फिर स्कन्धस्वाति नामक राजा सात वर्षतक राज्य करेगा। |
| मृगेन्द्रः स्वातिकर्णस्तु भविष्यति समास्त्रयः।<br>कुन्तलः स्वातिकर्णस्तु भविताष्टौ समा नृपः।<br>एकसंवत्सरं राजा स्वातिवर्णो भविष्यति॥ ८ | इसके बाद मृगेन्द्र स्वातिकर्ण नामक राजा तीन वर्षोंतक पृथ्वीपर शासन करेगा। तदनन्तर कुन्तल स्वातिकर्ण आठ वर्षोंतक राज्य करेगा। उसके बाद स्वातिवर्ण नामक राजा मात्र एक वर्ष राज्य करेगा। |
| भविता रिक्तवर्णस्तु वर्षाणि पञ्चविंशतिः।<br>ततः संवत्सरान् पञ्च हालो राजा भविष्यति॥ ९ | तदनन्तर रिक्तवर्ण पच्चीस वर्षतक राजा होगा। उसके बाद पाँच वर्षतक हाल राजा होगा। |
| पञ्च मन्तुलको राजा भविष्यति समा नृपः।<br>पुरीन्द्रसेनो भविता तस्मात् सौम्यो भविष्यति॥ १० | इसके बाद मन्तुलक नामक राजा होगा, जो पाँच वर्षतक राज्य करेगा। उसके बाद पुरीन्द्रसेन राजा होगा। |
| सुन्दरः शान्तिकर्णस्तु अब्दमेकं भविष्यति।<br>चकोरः स्वातिकर्णस्तु षण्मासान् वै भविष्यति॥ ११ | फिर इसके बाद सौम्य एवं सुन्दर स्वभाववाला शान्तिकर्ण नामक राजा होगा, जो मात्र एक वर्षतक राज्य करेगा। फिर चकोरस्वातिकर्ण नामक राजा होगा, जो मात्र छः मास ही शासन करेगा। |
* मत्स्यमहापुराणका यह तथा गत २७२ वाँ अध्याय सभी भारतीय इतिहासोंके लिये अत्यन्त प्रामाणिक माने गये हैं। क्रेम्ब्रिज इतिहासके प्रथम भाग, 'स्मिथ' के भारतके प्राचीन इतिहासमें तथा भारतीय विद्याभवनके बृहद् इतिहासके दूसरे भागमें इसका विस्तृत विवरण इसी पुराणके आधारपर विवेचित है। पार्जीटर आदिने अनेक अभिलेखोंसे भी इसकी परीक्षा कर शुद्धता और परम प्रामाणिकता स्वीकार कर ली है।
* अध्याय २७३ * <span style="float: right;">१०४१</span>
| अष्टाविंशतिवर्षाणि शिवस्वातिर्भविष्यति।<br>राजा च गौतमीपुत्रो ह्येकविंशत्ततो नृपः॥ १२<br>अष्टाविंशत्सुतस्तस्य पुलोमा वै भविष्यति।<br>शिवश्रीर्वै पुलोमा तु सप्तैव भविता नृपः॥ १३<br>शिवस्कन्धः शान्तिकर्णाद् भविता ह्यात्मजः समाः।<br>नवविंशतिवर्षाणि यज्ञश्रीः शान्तिकर्णिकः॥ १४<br>षडेव भविता तस्माद् विजयस्तु समास्ततः।<br>चण्डश्रीः शान्तिकर्णिस्तु तस्य पुत्रः समा दश॥ १५ | उसके बाद शिवस्वातिनामक राजा होगा, जो अट्ठाईस वर्षतक राज्य करेगा। उसके बाद गौतमीपुत्र शातकर्णि राजा होगा, जो इक्कीस वर्षोंतक राज्य करेगा। उसका पुत्र पुलोमा अट्ठाईस वर्षतक राज्य करेगा। उसके बाद शिवश्री पुलोमा नामक राजा सात वर्षतक राज्य करेगा। इसके बाद शान्तिकर्णका पुत्र शिवस्कन्ध उन्तीस वर्षोंतक राज्य करेगा। फिर यज्ञश्री शान्तिकर्णिक नामक राजा उन्तीस वर्षतक राज्य करेगा। उसका पुत्र विजय छः वर्षतक राजा होगा। उसका पुत्र चण्डश्री शान्तिकर्ण दस वर्षतक राज्य करेगा॥ १—१५॥ |
| पुलोमा सप्त वर्षाणि अन्यस्तेषां भविष्यति।<br>एकोनत्रिंशति ह्येते आन्ध्रा भोक्ष्यन्ति वै महीम्॥ १६<br>तेषां वर्षशतानि स्युश्चत्वारि षष्टिरेव च।<br>आन्ध्राणां संस्थिता राज्ये तेषां भृत्यान्वये नृपाः॥ १७<br>सप्तैवान्ध्रा भविष्यन्ति दशाभीरास्तथा नृपाः।<br>सप्त गर्दभिलाश्चापि शकाश्चाष्टादशैव तु॥ १८<br>यवनाष्टौ भविष्यन्ति तुषारास्तु चतुर्दश।<br>त्रयोदश गुरुण्डाश्च हूणा ह्येकोनविंशतिः॥ १९<br>सप्त गर्दभिला भूयो भोक्ष्यन्तीमां वसुन्धराम्।<br>यवनाष्टौ भविष्यन्ति सप्ताशीतिं महीमिमाम्॥ २०<br>सप्तवर्षसहस्त्राणि तुषाराणां मही स्मृता।<br>शतानि त्रीण्यशीतिं च शतान्यष्टादशैव तु॥ २१<br>शतान्यर्धं चतुष्काणि भवितव्यास्त्रयोदश।<br>गुरुण्डा वृषलैः सार्धं भोक्ष्यन्ते म्लेच्छसम्भवाः॥ २२<br>शतानि त्रीणि भोक्ष्यन्ते वर्षाण्येकादशैव तु।<br>आन्ध्राः श्रीपार्व्वतीयाश्च ते द्विपञ्चाशतं समाः॥ २३<br>सप्तषष्टिस्तु वर्षाणि दशाभीरास्तथैव च।<br>तेषूत्सन्नेषु कालेन ततः किलकिला नृपाः॥ २४<br>भविष्यन्तीह यवना धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>तैर्विमिश्रा जनपदा आर्या म्लेच्छाश्च सर्वशः॥ २५<br>विपर्ययेण वर्तन्ते क्षयमेष्यन्ति वै प्रजाः।<br>लुब्धानृताब्बुवाश्चैव भवितारो नृपास्तथा॥ २६ | तदनन्तर उसके बाद दूसरा पुलोमा नामक राजा होगा, जो सात वर्षतक राज्य करेगा। इस प्रकार ये उन्तीस (मतान्तरसे ३० या ३१) आन्ध्रवंशी राजा पृथ्वीका उपभोग करेंगे, इनका राज्यकाल चार सौ आठ वर्षोंका होगा, भृत्योपनामधारी उन आन्ध्रवंशीय राजाओंके वंशज राज्यके अधिकारी होंगे। उनमें सात आन्ध्रवंशीय, दस आभीरवंशी, सात गर्दभिल,* अठारह शकवंशीय, आठ यवन, चौदह तुषार, तेरह गुरुण्ड तथा उन्नीस हूणवंशीय राजा होंगे। फिर सात गर्दभिलवंशीय राजा इस पृथ्वीका उपभोग करेंगे। आठ यवन राजा सत्तासी वर्षतक राज्य करेंगे। सात सहस्र वर्षोंतक यह पृथ्वी तुषारोंके अधीन रहेगी। फिर एक सौ तिरासी वर्ष, एक सौ अठारह वर्ष तथा चार सौ पचास वर्षतक अर्थात् सात सौ इक्यावन वर्षतक तेरह म्लेच्छवंशज गुरुण्ड राजा शूद्रोंके साथ पृथ्वीका उपभोग करेंगे। तीन सौ ग्यारह वर्षतक आन्ध्रवंशीय राजा राज्य करेंगे तथा श्रीपर्वतीयोंका राज्य बावन वर्षतक रहेगा। उसी प्रकार दस आभीर राजा सड़सठ वर्षतक राज्य करेंगे। कालवश उनके विनष्ट हो जानेपर किलकिला नामक राजा होंगे, जो यवन-जातिके होंगे। धर्म, काम, अर्थ—तीनों दृष्टियोंसे आर्य लोग उनकी संस्कृतिसे विमिश्रित हो म्लेच्छ हो जायेंगे और आश्रमधर्मका विपर्यय करने लगेंगे। परिणामतः प्रजा नष्ट हो जायगी तथा राजालोग लोभी और असत्यवादी हो जायेंगे। |
* महाराज विक्रमादित्यको ऐतिहासिक विद्वान् गर्दभिलका ही पुत्र मानते हैं। उन्हींके बाद शकोंका राज्य हुआ था।
१०४२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कल्किनानुहताः सर्वे आर्या म्लेच्छाश्च सर्वतः।<br>अधार्मिकाश्च येऽत्यर्थं पाषण्डाश्चैव सर्वशः॥ २७<br>प्रनष्टे नृपवंशे तु संध्याशिष्टे कलौ युगे।<br>किंचिच्छिष्टाः प्रजास्ता वै धर्मे नष्टे परिग्रहाः॥ २८ | दम्भ-पाखण्डसे सभी आर्य तथा म्लेच्छ लोग प्रभावहत हो जायँगे। अधार्मिकोंकी वृद्धि होगी, पाखंड बढ़ जायगा। इस प्रकार सन्ध्यामात्र शेष रह जानेपर कलियुगमें जब सभी राजवंश नष्ट हो जायगा तब थोड़ी प्रजा शेष रह जायगी, जो धर्मके विनष्ट हो जानेसे विशृंखलित रहेगी॥ १६—२८॥ |
| असाधवो ह्यसत्त्वाश्च व्याधिशोकेन पीडिताः।<br>अनावृष्टिहताश्चैव परस्परवधेप्सवः॥ २९<br>अशरण्याः परित्रस्ताः सङ्कटं घोरमाश्रिताः।<br>सरित्पर्वतवासिन्यो भविष्यन्त्यखिलाः प्रजाः॥ ३०<br>नृपवंशेषु नष्टेषु प्रजाः सर्वगृहाणि च।<br>नष्टस्नेहा निरापत्रास्त्यक्तभ्रातृसुहृद्गणाः।<br>वर्णाश्रमपरिभ्रष्टा अधर्मनिरताश्च ताः॥ ३१<br>पत्रमूलफलाहाराश्चीरपत्राजिनाम्बराः ।<br>वृत्त्यर्थमभिलिप्सन्त्यश्चरिष्यन्ति वसुन्धराम्॥ ३२<br>एवं कष्टमनुप्राप्ताः प्रजाः काले युगान्तके।<br>निःशेषास्तु भविष्यन्ति सार्धं कलियुगेन तु॥ ३३<br>क्षीणे कलियुगे तस्मिन् दिव्य वर्षसहस्रके।<br>ससन्ध्यांशे सुनिःशेषे कृतं तु प्रतिपत्स्यते ॥ ३४<br>एवं वंशक्रमः कृत्स्नः कीर्त्तितो यो मया क्रमात्।<br>अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये॥ ३५<br>महापद्माभिषेकात् तु यावज्जन्म परीक्षितः।<br>एवं वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पञ्चाशदुत्तरम्॥ ३६<br>पौलोमास्तु तथाऽन्धास्तु महापद्मान्तरे पुनः।<br>अनन्तरं शतान्यष्टौ षट्त्रिंशत् तु समास्तथा॥ ३७ | उस समय सारी प्रजा असत्कर्मपरायण, निर्बल, व्याधि और शोकसे जर्जरित, अनावृष्टिसे पीड़ित, परस्पर एक-दूसरेके संहारके इच्छुक, आश्रयहीन, भयभीत, घोर संकटसे ग्रस्त होकर नदियोंके तटों तथा पर्वतोंपर निवास करेंगी। राजवंशोंके नष्ट हो जानेपर सारी प्रजा घर-द्वारसे विहीन, स्नेहरहित, निर्लज्ज, भाई-मित्र आदिका त्याग कर देनेवाली, वर्णाश्रमधर्मसे भ्रष्ट, अधर्ममें लीन, पत्ते, मूल और फलोंका आहार करनेवाली, पत्तों और मृगचर्मको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाली तथा जीविकाके लोभमें सारी पृथ्वीका चक्कर लगाने लगेगी। इस प्रकार कलियुगके अवसानके समय प्रजाएँ कष्ट झेलेंगी। वे कलियुगके साथ ही समाप्त हो जायँगी। तब संध्यासहित कलियुगके एक हजार दिव्य वर्ष बीत जानेपर कृतयुगकी प्रवृत्ति होगी। इस प्रकार मैंने क्रमशः भूत, वर्तमान और भविष्य-कालीन राजवंशका पूर्णरूपसे वर्णन किया है। यह राज्यकाल परीक्षित्के जन्मसे लेकर महापद्मके राज्याभिषेकतक एक हजार पचास वर्ष* होता है। पुनः पौलोम आन्ध्रसे लेकर महापद्मके राजत्वकालतक आठ सौ छत्तीस वर्ष समझना चाहिये॥ २९-३७॥ |
| तावत्कालान्तरं भाव्यमान्ध्रान्तादापरीक्षितः।<br>भविष्ये ते प्रसंख्याताः पुराणज्ञैः श्रुतर्षिभिः॥ ३८<br><br>सप्तर्षयस्तदा प्रांशुप्रदीप्तेनाग्निना समाः।<br>सप्तविंशतिभाव्यानामान्ध्राणां तु यदा पुनः॥ ३९<br><br>सप्तर्षयस्तु वर्तन्ते यत्र नक्षत्रमण्डले।<br>सप्तर्षयस्तु तिष्ठन्ति पर्यायेण शतं शतम्॥ ४० | परीक्षित्के समयसे लेकर आन्ध्रवंशीय राजाओंके अन्तकालतकका प्रमाण वेदों एवं पुराणोंके जाननेवाले ऋषियोंने भविष्यपुराणमें इस प्रकार परिगणित किया है। जब पुनः सत्ताईस आन्ध्रवंशीय राजाओंका राज्य होगा, तब सप्तर्षिगण प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त रहेंगे। वे सप्तर्षिगण एक-एक सौ वर्षोंतक नक्षत्रमण्डलमें निवास करते हैं। |
* विष्णुपुराणमें इसे १५०० वर्ष कहा है और भागवतमें १११५ वर्ष।
| * अध्याय २७३ * | १०४३ |
|---|---|
| सप्तर्षीणामुपर्येतत् स्मृतं वै दिव्यसंज्ञया ।<br>समा दिव्याः स्मृताः षष्टिर्दिव्याब्दानि तु सप्तभिः ॥ ४१<br><br>एभिः प्रवर्तते कालो दिव्यः सप्तर्षिभिस्तु वै।<br>सप्तर्षीणां च यौ पूर्वौ दृश्येते ह्युदितौ निशि ॥ ४२<br><br>तयोर्मध्ये तु नक्षत्रं दृश्यते यत्समं दिवि।<br>तेन सप्तर्षयो ज्ञेया युक्ता व्योम्नि शतं समाः ॥ ४३<br><br>नक्षत्राणामृषीणां च योगस्यैतन्निदर्शनम्।<br>सप्तर्षयो मघायुक्ताः काले पारिक्षिते शतम् ॥ ४४<br><br>ब्राह्मणास्तु चतुर्विंशा भविष्यन्ति शतं समाः।<br>ततः प्रभृत्ययं सर्वो लोको व्यापत्स्यते भृशम् ॥ ४५<br><br>अनृतोपहता लुब्धा धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>श्रौतस्मार्तेऽतिशिथिले नष्टवर्णाश्रमे तथा ॥ ४६<br><br>संकरं दुर्बलात्मानः प्रतिपत्स्यन्ति मोहिताः।<br>ब्राह्मणाः शूद्रयोनिस्थाः शूद्रा वै मन्त्रयोनयः ॥ ४७<br><br>उपस्थास्यन्ति तान् विप्रास्तदर्थमभिलिप्सवः।<br>क्रमेणैव च दृश्यन्ते स्ववर्णान्तरदायकम् ॥ ४८ | उन सप्तर्षियोंके ऊपर यह दिव्य नामसे कहा गया है। इसका परिमाण सड़सठ दिव्य वर्षोंका है। इस प्रकार इन सप्तर्षियोंका दिव्य काल प्रवृत्त होता है। रात्रिके समय सप्तर्षियोंके जो दो प्रारम्भिक पूर्व दिशामें जिस नक्षत्रके सामने उदित होते हैं, सभी सप्तर्षि उसी नक्षत्रमें स्थित माने जाते हैं। पुनः सौ वर्षोंके बाद आकाशमें उनका दूसरे नक्षत्रके साथ मिलन होता है। नक्षत्रों और उन सप्तर्षियोंके संयोगकी यही गति बतायी जाती है। ये सप्तर्षिगण राजा परीक्षित्के राज्यकालमें मघा नक्षत्रमें स्थित थे। उनके चौबीस सौ वर्ष बाद राज्य करनेवाले शुङ्गवंशीय ब्राह्मण राजा होंगे। उसके बाद यह सारा लोक अत्यन्त पतित हो जायगा। उस समय सारी प्रजाएँ मिथ्या व्यवहारमें लीन, लोभी, धर्म, अर्थ एवं कामसे हीन, वैदिक एवं स्मार्त नियमोंके पालनसे विमुख, वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादासे विहीन और दुर्बलात्मा हो जायँगी। वे मोहित होकर वर्णसंकर संतान उत्पन्न करेंगी। ब्राह्मण शूद्रयोनिमें स्थित हो जायँगे और शूद्र मन्त्रोंके ज्ञाता हो जायँगे। उन्हीं मन्त्रोंको जाननेकी अभिलाषासे ब्राह्मण उन मन्त्रज्ञ शूद्रोंकी उपासना करेंगे। क्रमशः सभी लोग अपने वर्ण-धर्मको छोड़कर अन्य वर्णमें सम्मिलित हो जायँगे ॥ ३८-४८ ॥ |
| क्षयमेव गमिष्यन्ति क्षीणशेषा युगक्षये।<br>यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि ॥ ४९<br><br>प्रतिपन्नं कलियुगं प्रमाणं तस्य मे शृणु।<br>चतुःशतसहस्त्रं तु वर्षाणां वै स्मृतं बुधैः ॥ ५०<br><br>चत्वार्यष्टसहस्राणि संख्यातं मानुषेण तु।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु तदा संध्या प्रवर्तते ॥ ५१<br><br>निःशेषे तु तदा तस्मिन् कृतं वै प्रतिपत्स्यते।<br>ऐलश्चेक्ष्वाकुवंशश्च सहदेवः प्रकीर्तितः ॥ ५२<br><br>इक्ष्वाकोः संस्मृतं क्षत्रं सुमित्रान्तं भविष्यति।<br>ऐलं क्षत्रं समाक्रान्तं सोमवंशविदो विदुः ॥ ५३<br><br>एते विवस्वतः पुत्राः कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः।<br>अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च येः ॥ ५४<br><br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्तथा शूद्राश्च वै स्मृताः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे तस्मिन्निति वंशः समाप्यते ॥ ५५ | फिर नष्ट होनेसे बची हुई प्रजाएँ युगान्तके समय विनष्ट हो जायँगी। जिस दिन श्रीकृष्ण स्वर्ग (गोलोक) गये, उसी दिन कलियुगका प्रारम्भ हुआ। इसका प्रमाण मुझसे सुनिये। बुद्धिमान् लोग उस कलियुगका प्रमाण मानववर्षके अनुसार चार लाख बत्तीस हजार और दिव्यमानके अनुसार एक हजार वर्ष मानते हैं। उसके बाद उसकी संध्या (तथा संध्यांश) प्रवृत्त होती है। उस कलियुगके समाप्त होनेपर कृतयुगका प्रारम्भ होता है। सहदेव ऐल और इक्ष्वाकुवंशीय—दोनों कहा जाता है। इक्ष्वाकुका वंश राजा सुमित्रतक बतलाया जाता है। सोमवंशके ज्ञाता लोग ऐलवंशको चन्द्रवंशमें संक्रान्त मानते हैं। ये ही विवस्वान्के भी कीर्तिशाली पुत्र कहे गये हैं, जो भूत, वर्तमान तथा भविष्यकालमें होनेवाले हैं। उस वैवस्वत मन्वन्तरमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इन सभी वर्णोंके लोग होते हैं। इस प्रकार अब यहाँ यह वंश-वर्णन समाप्त हो जाता है ॥ ४९–५५ ॥ |
| १०४४ | * मत्स्यपुराण * |
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| देवापिः पौरवो राजा ऐक्ष्वाको यश्च ते मतः।<br>महायोगबलोपेतौ कलापग्राममाश्रितौ॥ ५६<br>एतौ क्षत्रप्रणेतारौ नवविंशे चतुर्युगे।<br>सुवर्चा मनुपुत्रस्तु ऐक्ष्वाकाद्यो भविष्यति॥ ५७<br>नवविंशे युगेऽसौ वै वंशस्यादिर्भविष्यति।<br>देवापिपुत्रः सत्यस्तु ऐलानां भविता नृपः॥ ५८<br>क्षत्रप्रवर्तकावेतौ भविष्ये तु चतुर्युगे।<br>एवं सर्वेषु विज्ञेयं संतानार्थं तु लक्षणम्॥ ५९<br>क्षीणे कलियुगे चैव तिष्ठन्तीति कृते युगे।<br>सप्तर्षयस्तु तैः सार्धं मध्ये त्रेतायुगे पुनः॥ ६०<br>बीजार्थं वै भविष्यन्ति ब्रह्मक्षत्रस्तु वै पुनः।<br>एवमेवं तु सर्वेषु तिष्यान्तेष्वन्तरेषु च॥ ६०<br>सप्तर्षयो नृपैः सार्धं सन्तानार्थं युगे युगे।<br>एवं क्षत्रस्य चोत्सेधः सम्बन्धो वै द्विजैः स्मृतः॥ ६१<br>मन्वन्तराणां संताने संतानाश्च श्रुतौ स्मृताः।<br>अतिक्रान्तयुगाश्चैव ब्रह्मक्षत्रस्य सम्भवाः॥ ६२<br>यथा प्रशान्तिस्तेषां वै प्रकृतीनां तथा क्षयः।<br>सप्तर्षयो विदुस्तेषां दीर्घायुष्ट्वं क्षयोदयौ॥ ६३ | पुरुवंशीय राजा देवापि और इक्ष्वाकुवंशीय राजा (सहदेव), जिसे तुम मानते हो—ये दोनों महान् योगबलसे सम्पन्न होंगे, जो कलाप ग्राममें निवास करते हैं। उन्तीसवीं चतुर्युगीमें ये दोनों राजा क्षत्रिय जातिके नेता होंगे। मनुका पुत्र सुवर्चा इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंमें प्रथम होगा। वही उन्तीसवें युगमें अपने वंशका मूल पुरुष होगा तथा देवापिका पुत्र सत्य ऐलवंशीयोंका राजा होगा। भविष्यकालीन चतुर्युगमें ये दोनों क्षात्रधर्मके प्रवर्तक होंगे। इसी प्रकार सभी वंशोंमें सन्ततिके लक्षणोंको जानना चाहिये। कलियुगके क्षीण हो जानेपर कृतयुगमें सप्तर्षि उन राजाओंके साथ स्थित रहते हैं। पुनः त्रेताके मध्यमें वे ब्राह्मण और क्षत्रियके बीजके कारण होते हैं। इसी प्रकार सभी कलियुगों एवं अन्य युगोंमें होता है। प्रत्येक युगमें सप्तर्षि राजाओंके साथ प्रजाओंकी उत्पत्तिके लिये अवस्थित रहते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियोंकी उत्पत्तिका सम्बन्ध कहा जाता है। मन्वन्तरोंके विस्तारमें ब्राह्मण और क्षत्रियसे उत्पन्न हुई संतान युगको अतिक्रान्त कर जाती है, ऐसा श्रुतियोंमें कहा गया है। वे सप्तर्षि उन संततियोंकी जिस प्रकार प्रशान्ति होती है तथा जिस प्रकार क्षय-दीर्घायुकी प्राप्ति, उन्नति और अवनति होती है, वह सब जानते हैं॥ ५६—६३॥ |
| एतेन क्रमयोगेन ऐला इक्ष्वाकवो नृपाः।<br>उत्पद्यमानास्त्रेतायां क्षीयमाणाः कलौ युगे॥ ६४<br>अनुयान्ति युगाख्यां तु यावन्मन्वन्तरक्षयम्।<br>जामदग्न्येन रामेण क्षत्रे निरवशेषिते॥ ६५<br>रिक्तेयं वसुधा सर्वा क्षत्रियैर्वसुधाधिपैः।<br>द्विवंशकरणं सर्वं कीर्त्तयिष्ये निबोध मे॥ ६६<br>ऐलं चैक्ष्वाकुवंशं च प्रकृतिं परिचक्षते।<br>राजानः श्रेणिबद्धाश्च तथान्ये क्षत्रिया भुवि॥ ६७<br>ऐलवंशास्तु भूयांसो न तथैक्ष्वाकवो नृपाः।<br>एषामेकशतं पूर्णं कुलानामभिरोचते॥ ६८<br>तावदेव तु भोजानां विस्ताराद् द्विगुणं स्मृतम्।<br>भोजानां द्विगुणं क्षत्रं चतुर्धा तद् यथातथम्॥ ६९<br>ते ह्यतीताः सनामानो ब्रुवतस्तान् निबोध मे।<br>शतं वै प्रतिविन्ध्यानां शतं नागाः शतं हयाः॥ ७० | इस प्रकारके क्रमयोगसे चन्द्रवंशी और इक्ष्वाकुवंशीय राजा त्रेतामें उत्पन्न होकर कलियुगमें विनष्ट हो जाते हैं। एक मन्वन्तरके विनाशक युग संज्ञा कही जाती है। जमदग्निके पुत्र परशुरामद्वारा क्षत्रियोंका संहार हो जानेपर यह सारी पृथ्वी क्षत्रिय राजाओंसे शून्य हो गयी थी। अब मैं राजाओंके सूर्य-चन्द्र—इन दो वंशोंकी उत्पत्ति बता रहा हूँ, उसे मुझसे सुनिये। ऐल और इक्ष्वाकुवंश—क्षत्रियोंकी मूल प्रकृति कहे गये हैं। इन राजाओंके वंशज तथा अन्य क्षत्रियगण पृथ्वीपर प्रचुर परिमाणमें अवस्थित हैं। इनमें ऐलवंशीय राजा तो बहुत हैं, किंतु इक्ष्वाकुवंशीय उतने नहीं हैं। इनके कुलोंकी संख्या पूरी एक सौ बतलायी जाती है। इसी प्रकार भोजवंशीय राजाओंका विस्तार इनसे दूना है। भोजवंशीय राजाओंसे दूने अन्य क्षत्रियगण हैं। वे चार प्रकारके हैं और बीत चुके हैं। मैं उनका नामसहित यथार्थ रूपसे वर्णन कर रहा हूँ, उसे मुझसे सुनिये। इनमें प्रतिविन्ध्योंकी संख्या सौ, नागोंकी संख्या सौ, हयोंकी संख्या सौ |
| * अध्याय २७३ * | १०४५ |
|---|
| शतमेकं धार्तराष्ट्रा ह्यशीतिर्जनमेजयाः ।<br>शतं वै ब्रह्मदत्तानां वीराणां कुरवः शतम् ॥ ७१<br>ततः शतं च पाञ्चालाः शतं काशिकुशादयः ।<br>तथापरे सहस्रे द्वे ये नीपाः शशबिन्दवः ॥ ७२ | और धार्तराष्ट्रोंकी संख्या सौ है। जनमेजयोंकी संख्या अस्सी है। वीरवर ब्रह्मदत्तोंकी संख्या सौ, कुरुओंकी संख्या सौ, पाञ्चालोंकी संख्या सौ और काशि-कुशादिकी संख्या सौ है। इनके अतिरिक्त जो नीप और शशबिन्दु हैं, उनकी संख्या दो हजार है॥ ६४—७२॥ |
| इष्टवन्तश्च ते सर्वे सर्वे नियतदक्षिणाः ।<br>एवं राजर्षयोऽतीताः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७३<br>मनोर्वैवस्वतस्यासन् वर्तमानेऽन्तरे विभोः ।<br>तेषां तु निधनोत्पत्तौ लोकसंस्थितयः स्थिताः ॥ ७४<br>न शक्यो विस्तरस्तेषां सन्तानस्य परस्परम् ।<br>तत्पूर्वापरयोगेन वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ ७५<br>अष्टाविंशसमाख्याता गता वैवस्वतेऽन्तरे ।<br>एते देवगणैः सार्धं शिष्टा ये तान् निबोधत ॥ ७६<br>चत्वारिंशत् त्रयश्चैव भविष्यास्ते महात्मनः ।<br>अवशिष्टा युगाख्यास्ते ततो वैवस्वतो ह्ययम् ॥ ७७<br>एतद्वः कीर्तितं सम्यक् समासव्यासयोगतः ।<br>पुनर्वक्तुं बहुत्वात् तु न शक्यं विस्तरेण तु ॥ ७८<br>उक्ता राजर्षयो ये तु अतीतास्ते युगैः सह ।<br>ये ते ययातिवंश्यानां ये च वंशा विशाम्पते ॥ ७९<br>कीर्तिता द्युतिमन्तस्ते य एतान् धारयेन्नरः ।<br>लभते स वरान् पञ्च दुर्लभानिह लौकिकान् ॥ ८०<br>आयुः कीर्तिं धनं स्वर्गं पुत्रांश्चाभिजायते ।<br>धारणाच्छ्रवणाच्चैव परं स्वर्गस्य धीमतः ॥ ८१ | वे सभी यज्ञ करनेवाले तथा अत्यधिक दक्षिणा प्रदान करनेवाले थे। इस प्रकार सैकड़ों-हजारों राजर्षिगण बीत चुके हैं, जो प्रभावशाली वैवस्वत मनुके वर्तमान अन्तरमें जन्म ग्रहण कर चुके हैं। उनके मरण और उत्पत्तिमें अब लोककी स्थिति ही प्रमाणभूत है। उनकी संतानका विस्तार तो परस्पर पूर्वापर-सम्बन्धसे सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं बताया जा सकता। इस वैवस्वत मन्वन्तरमें वे नृपतिगण अपने वंशदेवताओंके साथ अट्ठाईस पीढ़ी तक बीत चुके हैं। जो शेष हैं, उन्हें सुनिये। वे महात्मा राजा तैंतालीस होंगे। उन अवशिष्ट वैवस्वत महात्माओंकी संज्ञा उनके युगोंके साथ है। इस प्रकार मैंने इन वंशोंका विस्तार और संक्षेपसे वर्णन कर दिया। उनकी संख्या बहुत होनेके कारण मैं विस्तारपूर्वक बतलानेमें असमर्थ हूँ। राजन्! मैंने जिन ययातिवंशीय राजाओंके वंशधर राजर्षियोंकी चर्चा की है, वे सभी युगोंके साथ समाप्त हो चुके हैं। वे सभी कान्तिमान् एवं यशस्वी थे। जो मनुष्य उनके नामोंको स्मरण रखता है, वह इस लोकमें पाँच दुर्लभ लौकिक वरदानोंको प्राप्त कर लेता है, अर्थात् वह आयु, कीर्ति, धन, स्वर्ग और पुत्रसे सम्पन्न होकर उत्पन्न होता है तथा उस बुद्धिमान्को इनके स्मरण एवं श्रवण करनेसे परमस्वर्गकी प्राप्ति होती है॥ ७३—८१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भविष्यराजानुकीर्तनं नाम त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें भविष्यकालिक राजाओंका वर्णन नामक दो सौ तिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २७३ ॥
| १०४६ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय
षोडश दानान्तर्गत तुलादानका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>न्यायेनार्जनमर्थानां वर्धनं चाभिरक्षणम्।<br>सत्पात्रप्रतिपत्तिश्च सर्वशास्त्रेषु पठ्यते॥ १<br>कृतकृत्यो भवेत् केन मनस्वी धनवान् बुधः।<br>महादानेन दत्तेन तन्मो विस्तरतो वद॥ २ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी ! सभी शास्त्रोंमें न्यायपूर्वक धनार्जन, उसकी वृद्धि और रक्षा करना तथा उसे सत्पात्रको दान करना आदि बातें पढ़ी जाती हैं, किंतु मनस्वी बुद्धिमान् धनी पुरुष किस महादानके करनेसे कृतार्थ हो सकता है, आप मुझे इसे विस्तारपूर्वक बताइये॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानानुकीर्तनम्।<br>दानधर्मेऽपि यन्नोक्तं विष्णुना प्रभविष्णुना॥ ३<br>तदहं सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>सर्वपापक्षयकरं नृणां दुःस्वप्ननाशनम्॥ ४<br>यत्तत्षोडशधा प्रोक्तं वासुदेवेन भूतले।<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापहरं शुभम्॥ ५<br>पूजितं देवताभिश्च ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः।<br>आद्यं तु सर्वदानानां तुलापुरुषसंज्ञकम्॥ ६<br>हिरण्यगर्भदानं च ब्रह्माण्डं तदनन्तरम्।<br>कल्पपादपदानं च गोसहस्त्रं च पञ्चमम्॥ ७<br>हिरण्यकामधेनुश्च हिरण्याश्वस्तथैव च।<br>हिरण्याश्वरथस्तद्वद्धेमहस्तिरथस्तथा ॥ ८<br>पञ्चलाङ्गलकं तद्वद् धरादानं तथैव च।<br>द्वादशं विश्वचक्रं तु ततः कल्पलतात्मकम्॥ ९<br>सप्तसागरदानं च रत्नधेनुस्तथैव च।<br>महाभूतघटस्तद्वत् षोडशं परिकीर्तितम्॥ १० | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! अब इसके बाद मैं आपलोगोंको महादानकी विधि बतला रहा हूँ। जिसे महातेजस्वी विष्णुने भी (विष्णुधर्मोत्तरपुराणके) दान-धर्म-प्रकरणमें नहीं बतलाया है, उस सर्वश्रेष्ठ महादानका वर्णन मैं कर रहा हूँ। वह मनुष्योंके सभी पापोंको नष्ट करनेवाला तथा दुःस्वप्नोंका विनाशक है। उस दानको पृथ्वीतलपर भगवान् वासुदेवने सोलह प्रकारका बतलाया है। वे सभी पुण्यप्रद, पवित्र, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाले, सभी पापोंके विनाशक, मङ्गलकारी तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवताओंद्धारा पूजित हैं। उन सभी दानोंमें सबसे प्रथम तुलापुरुषका दान है। तत्पश्चात् (दूसरा) हिरण्यगर्भदान, (तीसरा) ब्रह्माण्डदान, (चौथा) कल्पवृक्षदान, पाँचवाँ एक हजार गो-दान, फिर सुवर्ण-निर्मित कामधेनुका दान, स्वर्णमय अश्वका दान, हिरण्याश्वरथ-दान, हेम-हस्ति-रथ-दान, पञ्चलाङ्गलक-दान, धरादान, (बारहवाँ) विश्वचक्र-दान, कल्पलता-दान, सप्तसागर-दान, रत्नधेनु-दान तथा (सोलहवाँ) महाभूतघट-दान—ये सोलह दान कहे गये हैं॥ ३—१०॥ |
| सर्वाण्येतानि कृतवान् पुरा शम्बरसूदनः।<br>वासुदेवस्तु भगवानम्बरीषोऽथ भार्गवः॥ ११<br>कार्तवीर्यार्जुनो नाम प्रह्लादः पृथुरेव च।<br>कुर्यु रन्ये महीपालाः केचिच्च भरतादयः॥ १२<br>यस्माद् विघ्नसहस्रेण महादानानि सर्वदा।<br>रक्षन्ते देवताः सर्वा एकैकमपि भूतले॥ १३ | प्राचीनकालमें इन सभी दानोंको शम्बरासुरके शत्रु भगवान् वासुदेवने किया था। उसके बाद अम्बरीष, भार्गव (परशुराम), कार्तवीर्यार्जुन, प्रह्लाद, पृथु तथा भरत आदि अन्यान्य राजाओंने किया था। चूँकि इस पृथ्वीतलपर इन सब दानोंमें एक-एक दानकी सर्वदा सभी देवता हजारों विघ्नोंसे रक्षा करते हैं; इनमेंसे भूतलपर यदि |
| * अध्याय २७४ * | १०४७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एषामन्यतमं कुर्याद् वासुदेवप्रसादतः।<br>न शक्यमन्यथा कर्तुमपि शक्रेण भूतले ॥ १४<br>तस्मादाराध्य गोविन्दमुमापतिविनायकौ।<br>महादानमखं कुर्याद् विप्रैश्चैवानुमोदितः ॥ १५<br>एतदेवाह मनवे परिपृष्टो जनार्दनः।<br>यथावदनुवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः ॥ १६ | एक दान भी वासुदेव भगवान्की कृपासे विघ्नरहित सम्पन्न हो जाय तो उसके सत्फलको देवराज इन्द्र भी अन्यथा करनेमें समर्थ नहीं हैं, इसलिये मनुष्यको भगवान् वासुदेव, शंकर और विनायककी आराधना कर तथा विप्रोंका अनुमोदन प्राप्तकर यह महादान-यज्ञ करना चाहिये। ऋषिवर्य! इसी विषयको मनुके पूछनेपर भगवान् जनार्दनने उन्हें बताया था, वह मैं आपलोगोंको यथार्थरूपमें बतला रहा हूँ, सुनिये ॥ ११—१६॥ |
| मनुरुवाच<br>महादानानि यानीह पवित्राणि शुभानि च।<br>रहस्यानि प्रदेयानि तानि मे कथयाच्युत ॥ १७ | **मनुजीने पूछा—**अच्युत! इस पृथ्वीतलपर जितने पुनीत मङ्गलदायी, गोपनीय और देनेयोग्य महादान हैं, उन्हें मुझे बतलाइये ॥ १७ ॥ |
| मत्स्य उवाच<br>यानि नोक्तानि गुह्यानि महादानानि षोडश।<br>तानि ते कथयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ १८<br>तुलापुरुषयोगोऽयं येषामादौ विधीयते।<br>अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये ॥ १९<br>युगादिषूपरागेषु तथा मन्वन्तरादिषु।<br>संक्रान्तौ वैधृतिदिने चतुर्दश्यष्टमीषु च ॥ २०<br>सितपञ्चदशीपर्वद्वादशीष्वष्टकासु च।<br>यज्ञोत्सवविवाहेषु दुःस्वप्नाद्भुतदर्शने ॥ २१<br>द्रव्यब्राह्मणलाभे वा श्रद्धा वा यत्र जायते।<br>तीर्थे वायतने गोष्ठे कूपारामसरित्सु वा ॥ २२<br>गृहे वाथ वने वापि तडागे रुचिरे तथा।<br>महादानानि देयानि संसारभयभीरुणा ॥ २३<br>अनित्यं जीवितं यस्माद् वसु चातीव चञ्चलम्।<br>केशेष्वेव गृहीतः सन्मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥ २४<br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>षोडशारत्निमात्रं तु दश द्वादश वा करान् ॥ २५<br>मण्डपं कारयेद् विद्वांश्चतुर्द्वाराननं बुधः।<br>सप्तहस्ता भवेद् वेदी मध्ये पञ्चकराश्रया ॥ २६ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! जिन सोलह गुह्य महादानोंको आजतक मैंने किसीसे नहीं बतलाया था, उन्हींको यथार्थ रूपमें आनुपूर्वी तुम्हें बतला रहा हूँ। इनमें तुलापुरुषका दान सर्वप्रथम कहा गया है। संसार-भयसे भीत मनुष्यको अयन-परिवर्तनके समय, विषुवयोगमें, पुण्यदिनों, व्यतीपात, दिनक्षय तथा युगादि तिथियोंमें सूर्य-चन्द्रके ग्रहणके अवसरपर, मन्वन्तरके प्रारम्भमें, संक्रान्तिके दिन, वैधृतियोगमें, चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णिमा, पर्वके दिन, द्वादशी तथा अष्टका¹ तिथियोंमें, यज्ञ-उत्सव अथवा विवाहके अवसरपर, दुःस्वप्नके देखने या किसी अद्भुत उत्पातादिके होनेपर, यथेष्ट द्रव्य या ब्राह्मणके मिल जानेपर, या जब जहाँ श्रद्धा उत्पन्न हो जाय, किसी तीर्थ, मन्दिर या गोशालामें, कूप, बगीचा या नदीके तटपर, अपने घरपर या पवित्र वनमें अथवा पवित्र तालाबके किनारे इन महादानोंको देना चाहिये। चूँकि यह जीवन अस्थिर है, सम्पत्ति अत्यन्त चञ्चल है, मृत्यु सर्वदा केश पकड़े खड़ी है, इसलिये धर्माचरण करना चाहिये। किसी पुण्यतिथिके आनेपर विद्वान् पुरुष ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर सोलह हाथोंका या दस अथवा बारह हाथोंका² चौकोर मण्डप निर्मित करवाये, जिसमें चार सुन्दर प्रवेशद्वार बनवाये जायें। उसके भीतर सात हाथकी वेदी बनाकर मध्यमें पाँच हाथकी एक दूसरी |
१. हेमन्त-शिशिर ऋतुओंके कृष्णपक्षकी चारों अष्टमी तिथियाँ अष्टका कही गयी हैं।
२. ये मण्डप दस, बारह या सोलह हाथोंके वर्गाकार होंगे। ये जितने लम्बे होंगे, उतनी ही इनकी चौड़ाई होगी।
९०४८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तन्मध्ये तोरणं कुर्यात् सारदारुमयं बुधः।<br>कुर्यात् कुण्डानि चत्वारि चतुर्दिक्षु विचक्षणः॥ २७ | वेदी बनाये। उसके मध्यभागमें बुद्धिमान् पुरुष साल काष्ठकी बनी हुई तोरण लगवाये। विचक्षण पुरुष चारों दिशाओंमें चार कुण्डोंकी रचना करे॥ १८-२७॥ |
| समेखलायोनियुतानि कुर्यात्<br>सम्पूर्णकुम्भानि महासनानि।<br>सुताम्रपात्रद्वयसंयुतानि<br>सुयज्ञपात्राणि सुविष्टराणि॥ २८<br>हस्तप्रमाणानि तिलाज्यधूप-<br>पुष्पोपहाराणि सुशोभनानि।<br>पूर्वोत्तरे हस्तमिताथ वेदी<br>ग्रहादिदेवेश्वरपूजनाय ॥ २९<br>अत्रार्चनं ब्रह्मशिवाच्युतानां<br>तत्रैव कार्यं फलमाल्यवस्त्रैः।<br>लोकेशवर्णाः परितः पताका<br>मध्ये ध्वजः किङ्किणिकायुतः स्यात्॥ ३०<br>द्वारेषु कार्याणि च तोरणानि<br>चत्वार्यपि क्षीरवनस्पतीनाम्।<br>द्वारेषु कुम्भद्वयमत्र कार्यं<br>स्रग्गन्धधूपाम्बररत्नयुक्तम् ॥ ३१<br>शालेङ्गुदीचन्दनदेवदारु-<br>श्रीपर्णिबिल्वप्रियकाञ्चनोत्थम् ।<br>स्तम्भद्वयं हस्तयुगावखातं<br>कृत्वा दृढं पञ्चकरोच्छ्रितं च॥ ३२<br>तदन्तरं हस्तचतुष्टयं स्या-<br>दथोत्तराङ्गं च तदीयमेव।<br>समानजातिश्च तुलावलम्ब्या<br>हैमेन मध्ये पुरुषेण युक्ता॥ ३३<br>दैर्घ्येण सा हस्तचतुष्टयं स्यात्<br>पृथुत्वमस्यास्तु दशाङ्गुलानि।<br>सुवर्णपट्टाभरणा च कार्या<br>सलोहपाशद्वयश्रृङ्खलाभिः ॥ ३४<br>युता सुवर्णेन तु रत्नमाला<br>विभूषिता माल्यविलेपनाभ्याम्।<br>चक्रं लिखेद् वारिजगर्भयुक्तं<br>नानारजोभिर्भुवि पुष्पकीर्णम्॥ ३५<br>वितानकं चोपरि पञ्चवर्णं<br>संस्थापयेत् पुष्पफलोपशोभम्। | उन कुण्डोंको मेखला और योनिसे युक्त बनाना चाहिये। उनके समीप जलसे भरे हुए कलश, बड़े-बड़े आसन, सुन्दर ताँबेके बने हुए दो पात्र, यज्ञके सुन्दर पात्र तथा सुन्दर विष्टर रखना चाहिये। कुण्ड एक हाथ लंबा-चौड़ा हो तथा तिल, घृत, धूप, पुष्प और अन्य उपहारोंसे सुशोभित हो। तदनन्तर पूर्व तथा उत्तर दिशाके कोणमें ग्रहादि तथा देवेश्वरोंके पूजनके लिये एक हाथ विस्तृत वेदी बनायी जाय। वहीं फलों, मालाओं तथा वस्त्रोंद्वारा ब्रह्मा, शिव और विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। चारों ओर लोकपालोंके वर्णोंके अनुरूप पताकाएँ तथा मध्य भागमें घंटियोंसे युक्त ध्वज होना चाहिये। चारों द्वारोंपर भी दूधवाले वृक्षोंके बने हुए तोरण सुशोभित हों। प्रधान द्वारपर माला, गन्ध, धूप, वस्त्र एवं रत्नोंसे सुशोभित दो कलश रखे जायँ। तदनन्तर साल, इंगुदी, चन्दन, देवदारु, श्रीपर्णी (गम्भारी), बिल्व, बिजौरा अथवा चम्पक वृक्षके काष्ठके बने हुए दो स्तम्भोंको, जो पाँच हाथ ऊँचे हों, दो हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसमें सुदृढ़ कर दे। उन दोनों स्तम्भोंके बीच चार हाथका अन्तर रहे। फिर उन दोनोंसे मिला उत्तराङ्ग-खम्भेके ऊपरके दो सजातीय काष्ठ लगावे, उसीसे सजातीय काष्ठकी बनी सुवर्णनिर्मित पुरुषसे युक्त तुला मध्यभागमें लटकावे। वह तुला चार हाथ लंबी हो तथा उसकी मोटाई दस अंगुल होनी चाहिये, उसमें लोहेकी बनी हुई जंजीरोंको जोड़े तथा उसे सुवर्णजटित वस्त्र, सुवर्णखचित रत्नमाला तथा विविध प्रकारके पुष्प एवं चन्दनादिसे अलंकृत करना चाहिये। फिर पृथ्वीपर विविध रंगके रजोंसे कमलके मध्यके आकारका चक्र बनावे और उसपर पुष्प बिखेर दे। उसके ऊपर पुष्प और फलोंसे सुशोभित पाँचरंगा वितान तनवाये॥ २८-३५½॥ |
| * अध्याय २७४ * | १०४९ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| अथर्त्विजो वेदविदश्च कार्याः<br>सुरूपवेशान्वयशीलयुक्ताः ॥ ३६<br>विधानदक्षाः पटवोऽनुकूला<br>ये चार्यदेशप्रभवा द्विजेन्द्राः । | तदनन्तर वेदवेत्ता, सुन्दर रूप, वेश, वंश और शीलसे युक्त, विधिके ज्ञाता, पटु, अपने अनुकूल, आर्यदेशोत्पन्न द्विजवरोंको ऋत्विजके पदपर नियुक्त करे। |
| गुरुश्च वेदान्तविदार्यवंश-<br>समुद्भवः शीलकुलाभिरूपः ॥ ३७ | गुरु (आचार्य), वेदान्तवेत्ता, आर्यवंशमें समुत्पन्न, शीलवान्, कुलीन, सुन्दर, |
| पुराणशास्त्राभिरतोऽतिदक्षः<br>प्रसन्नगम्भीरसरस्वतीकः ।<br>सिताम्बरः कुण्डलहेमसूत्र-<br>केयूरकण्ठाभरणाभिरामः ॥ ३८ | पुराणों एवं शास्त्रोंमें निरत रहनेवाला, अत्यन्त पटु, सरल एवं गम्भीर वाणी बोलनेवाला, श्वेत वस्त्रधारी, कुण्डल, जंजीर, केयूर तथा कण्ठाभरणसे सुशोभित हो। |
| पूर्वेण ऋग्वेदविदौ भवेतां<br>यजुर्विदौ दक्षिणतश्च शस्तौ ।<br>स्थाप्यौ द्विजौ सामविदौ तु पश्चा-<br>दाथर्वणावुत्तरतस्तु कार्यों ॥ ३९ | मण्डपमें पूर्व दिशामें दो ऋग्वेदी ऋत्विजोंको, दक्षिण दिशामें दो यजुर्वेदी अध्वर्यु ब्राह्मणोंको, पश्चिम दिशामें दो सामवेदी उद्गाता ब्राह्मणोंको तथा उत्तर दिशामें दो अथर्ववेदी विद्वानोंको नियुक्त करना चाहिये। |
| विनायकादिग्रहलोकपाल-<br>वस्वष्टकादित्यमरुद्गणानाम् ।<br>ब्रह्माच्युतेशार्कवनस्पतीनां<br>स्वमन्त्रतो होमचतुष्टयं स्यात् ॥ ४० | विनायक आदि ग्रह, लोकपाल, आठों वसुगण, आदित्यगण, मरुद्गण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य एवं वनस्पतियोंके लिये उनके मन्त्रोंद्वारा चार-चार आहुतियाँ देनी चाहिये तथा इनके सूक्तोंका |
| जप्यानि सूक्तानि तथैव चैषा-<br>मनुक्रमेणापि यथास्वरूपम् ।<br>होमावसाने कृततूर्यनादो<br>गुरुर्गृहीत्वा बलिपुष्पधूपम् ।<br>आवाहयेल्लोकपतीन् क्रमेण<br>मन्त्रैरमीभिर्यजमानयुक्तः ॥ ४१ | क्रमानुरूप शुद्ध-शुद्ध जप करवाना चाहिये। हवनकी समाप्तिके बाद यजमानसहित आचार्य तुरहीका शब्द करते हुए बलि, पुष्प और धूप लेकर क्रमशः सभी लोकपालोंका उनके मन्त्रोंद्वारा इस प्रकार आवाहन करे। |
| एहोहि सर्वामरसिद्धसाध्यै-<br>रभिष्टुतो वज्रधरोऽमरेशः ।<br>संवीज्यमानोऽप्सरसां गणेन<br>रक्षाध्वरं नो भगवन् नमस्ते ॥ ४२<br>ॐ इन्द्राय नमः। | भगवन् ! आप देवताओंके स्वामी और वज्र धारण करनेवाले हैं, सभी अमर, सिद्ध और साध्य आपकी स्तुति करते हैं तथा अप्सराओंके समूह आपपर पंखा झलते हैं, आपको नमस्कार है। आप यहाँ आइये, अवश्य आइये, हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। 'ॐ इन्द्रको नमस्कार है'—ऐसा कहकर इन्द्रका आवाहन करना चाहिये। |
| एहोहि सर्वामरहव्यवाह<br>मुनिप्रवीरैरभितोऽभिजुष्टः ।<br>तेजस्विना लोकगणेन सार्धं<br>ममाध्वरं रक्ष कवे नमस्ते ॥ ४३ | अग्निदेव ! आप सभी देवताओंके हव्यवाहक हैं, मुनिवरगण सब ओरसे आपकी सेवा करते हैं, आप अपने तेजस्वी लोकगणोंके साथ वहाँ आयें, अवश्य आयें और मेरे यज्ञकी रक्षा करें, आपको प्रणाम है। |
१०५० * मत्स्यपुराण *
| ॐ अग्नये नमः।<br>एह्येहि वैवस्वत धर्मराज सर्वौमरैरर्चित दिव्यमूर्ते।<br>शुभाशुभानन्दशुचामधीश शिवाय नः पाहि मखं नमस्ते॥ ४४<br>ॐ यमाय नमः। | 'ॐ अग्निको नमस्कार है।'—ऐसा कहकर अग्निका आवाहन करना चाहिये। सूर्यपुत्र धर्मराज! आप सभी देवताओंद्वारा पूजित, दिव्य शरीरधारी और शुभ एवं अशुभ तथा आनन्द एवं शोकके अधीश्वर हैं, हमारे कल्याणके लिये हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको अभिवादन है। 'ॐ यमराजको नमस्कार है।'—ऐसा कहकर यमका आवाहन करना चाहिये॥ ३६—४४॥ |
| एह्येहि रक्षोगणनायकस्त्वं सर्वैस्तु वेतालपिशाचसंघैः।<br>ममाध्वरं पाहि शुभादिनाथ लोकेश्वरस्त्वं भगवन् नमस्ते॥ ४५<br>ॐ निर्ऋतये नमः। | भगवन्! आप लोकोंके अधीश्वर तथा राक्षसमूहके नायक हैं। शुभादिनाथ! आप वेतालों और पिशाचोंके विशाल समूहके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको प्रणाम है। ॐ निर्ऋतिको नमस्कार है, ऐसा कहकर निर्ऋतिका आवाहन करना चाहिये। |
| एह्येहि यादोगणवारिधीनां गणेन पर्जन्यमहाप्सरोभिः।<br>विद्याधरेन्द्रामरगीयमान पाहि त्वमस्मान् भगवन् नमस्ते॥ ४६<br>ॐ वरुणाय नमः। | भगवन्! विद्याधर और इन्द्र आदि देवता आपका गुण-गान करते हैं, आप समस्त जलचरों, समुद्रों, बादलों और अप्सराओंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और हमारी रक्षा कीजिये। आपको अभिवादन है। 'ॐ वरुणको नमस्कार है।' ऐसा कहकर वरुणका आवाहन करना चाहिये। |
| एह्येहि यज्ञे मम रक्षणाय मृगाधिरूढः सह सिद्धसंघैः।<br>प्राणाधिपः कालकवेः सहायो गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥ ४७<br>ॐ वायवे नमः। | भगवन्! आप कालाग्निके सहायक और प्राणोंके अधीश्वर हैं, आप मृग (हिरन)-पर आरूढ़ हो सिद्ध-समूहोंके साथ मेरी रक्षा करनेके लिये यज्ञमें पधारिये, अवश्य पधारिये और मेरी पूजा स्वीकार कीजिये। आपको नमस्कार है। 'ॐ वायुको नमस्कार है।'—ऐसा कहकर वायुका आवाहन करना चाहिये। |
| एह्येहि यज्ञेश्वर यज्ञरक्षां विधत्स्व नक्षत्रगणेन सार्धम्।<br>सर्वौषधीभिः पितृभिः सहैव गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥ ४८<br>ॐ सोमाय नमः। | यज्ञेश्वर! आप नक्षत्रगणों, सभी ओषधियों तथा पितरोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। भगवन्! आप मेरी पूजा स्वीकार कीजिये, आपको प्रणाम है। 'ॐ सोमको नमस्कार है'—ऐसा कहकर सोमका आवाहन करना चाहिये। |
| एह्येहि विश्वेश्वर नस्त्रिशूल-कपालखट्वाङ्गधरेण सार्धम्।<br>लोकेश यज्ञेश्वर यज्ञसिद्धयै गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥ ४९<br>ॐ ईशानाय नमः। | यज्ञोंके स्वामी विश्वेश्वर! आप त्रिशूल, कपाल, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले अपने गणोंके साथ हमारे यज्ञमें सिद्धि प्रदान करनेके लिये उपस्थित होइये, अवश्य आइये और लोकेश! मेरी पूजा ग्रहण कीजिये। भगवन्! आपको अभिवादन है। 'ॐ ईशानको नमस्कार है।'—ऐसा कहकर ईशानका आवाहन करना चाहिये। |
| एह्येहि पातालधराधरेन्द्र नागाङ्गनाकिन्नरगीयमान ।<br>यक्षोरगेन्द्रामरलोकसार्ध-मनन्त रक्षाध्वरमस्मदीयम्॥ ५० | अनन्त! आप पाताल एवं पृथ्वीको धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं तथा नागाङ्गनाएँ और किंनर आपका गुण-गान करते हैं, आप यक्षों, नागेन्द्रों और देवगणोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये |
| * अध्याय २७४ * | १०५१ |
|---|
| ॐ अनन्ताय नमः। <br><br> एहोहि विश्वाधिपते मुनीन्द्र <br> लोकेन सार्धं पितृदेवताभिः। <br> सर्वस्य धातास्यमितप्रभाव <br> विशाध्वरं नो भगवन् नमस्ते॥ ५१ <br><br> ॐ ब्रह्मणे नमः। <br><br> त्रैलोक्ये यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च। <br> ब्रह्मविष्णुशिवैः सार्धं रक्षां कुर्वन्तु तानि मे॥ ५२ <br> देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः। <br> ऋषयो मदनो गावो देवमातर एव च॥ ५३ <br> सर्वे ममाध्वरे रक्षां प्रकुर्वन्तु मुदान्विताः। <br> इत्यावाह्य सुरान् दद्याद् ऋत्विग्भ्यो हेमभूषणम्॥ ५४ <br> कुण्डलानि च हैमानि सूत्राणि कटकानि च। <br> अङ्गुलीयपवित्राणि वासांसि शयनानि च॥ ५५ <br> द्विगुणं गुरवे दद्याद् भूषणाच्छादनानि च। <br> जपेयुः शान्तिकाध्यायं जापकाः सर्वतोदिशम्॥ ५६ <br> तत्रोषितास्तु ते सर्वे कृत्वैवमधिवासनम्। <br> आदावन्ते च मध्ये च कुर्याद् ब्राह्मणवाचनम्॥ ५७ <br> ततो मङ्गलशब्देन स्नापितो वेदपुङ्गवैः। <br> त्रिःप्रदक्षिणामावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ ५८ <br> शुक्लमाल्याम्बरो भूत्वा तां तुलामभिमन्त्रयेत्। <br> नमस्ते सर्वदेवानां शक्तिस्त्वं सत्यमास्थिता॥ ५९ <br> साक्षिभूता जगद्धात्री निर्मिता विश्वयोनिना। <br> एकतः सर्वसत्यानि तथानृतशतानि च॥ ६० <br> धर्माधर्मकृतां मध्ये स्थापितासि जगद्धिते। <br> त्वं तुले सर्वभूतानां प्रमाणमिह कीर्तिता॥ ६१ <br> मां तोलयन्ती संसारादुद्धरस्व नमोऽस्तु ते। <br> योऽसौ तत्त्वाधिपो देवः पुरुषः पञ्चविंशकः॥ ६२ <br> स एकोऽधिष्ठितो देवि त्वयि तस्मान्नमो नमः। <br> नमो नमस्ते गोविन्द तुलापुरुषसंज्ञक॥ ६३ <br> त्वं हरे तारयस्वास्मानस्मात् संसारकर्दमात्। <br> पुण्यकालं समासाद्य कृत्वैवमधिवासनम्॥ ६४ | और हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। 'ॐ अनन्तको नमस्कार है'—ऐसा कहकर अनन्तका आवाहन करना चाहिये। विश्वाधिपति! आप समस्त जगत्के विधाता हैं। मुनीन्द्र! आप पितर, देवता एवं लोकपालोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये। अमित प्रभावशाली! आप हमारे यज्ञमें प्रविष्ट होइये। भगवन्! आपको प्रणाम है। 'ॐ ब्रह्माको नमस्कार है'—ऐसा कहकर ब्रह्माका आवाहन करना चाहिये। त्रिलोकीमें जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सभी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके साथ मेरी रक्षा करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषिगण, कामदेव, गौएँ, देव-माताएँ—ये सभी हर्षपूर्वक मेरे यज्ञकी रक्षा करें॥ ४५—५३ १/२॥ <br><br> इस प्रकार देवताओंका आवाहन कर ऋत्विजोंको सुवर्णका आभूषण, कुण्डल, जंजीर, कङ्कण, पवित्र अँगूठी, वस्त्र तथा शय्याका दान करना चाहिये। ये भूषण और वस्त्र गुरुके लिये दूना देना चाहिये। उस समय सभी दिशाओंमें जापक शान्तिकाध्यायका जप करते रहें। उन सभी ब्राह्मणोंको वहाँ उपस्थित रहना चाहिये और इस प्रकार अधिवासन कर प्रत्येक कार्यके प्रारम्भ, मध्य तथा अन्तमें स्वस्तिवाचन करना चाहिये। तत्पश्चात् माङ्गलिक शब्दोंका उच्चारण करते हुए वेदज्ञोंद्वारा अभिषिक्त यजमान श्वेत वस्त्र धारणकर अञ्जलिमें पुष्प ले उस तुलाकी तीन बार प्रदक्षिणा कर उसे इस प्रकार अभिमन्त्रित करे। तुले! तुम सभी देवताओंकी शक्तिस्वरूपा हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम सत्यकी आश्रयभूता, साक्षिस्वरूपा, जगत्को धारण करनेवाली और विश्वयोनि ब्रह्माद्वारा निर्मित की गयी हो, जगत्की कल्याणकारिणी! तुम्हारी एक तुलापर सभी सत्य हैं, दूसरीपर सौ असत्य हैं। धर्मात्मा और पापियोंके बीच तुम्हारी स्थापना हुई है। तुम भूतलपर सभी जीवोंके लिये प्रमाणरूप बतलायी गयी हो। मुझे तोलती हुई तुम इस संसारसे मेरा उद्धार कर दो, तुम्हें नमस्कार है। देवि! जो ये तत्त्वोंके अधीश्वर पचीसवें पुरुष भगवान् हैं, वे एकमात्र तुम्हींमें अधिष्ठित हैं, इसलिये तुम्हें बारंबार प्रणाम है। तुला-पुरुष नामधारी गोविन्द! आपको बारंबार अभिवादन है। हरे! आप इस संसाररूपी पङ्कसे हमारा उद्धार कीजिये। इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष पुण्यकालमें अधिवासन |