Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1043 of 1098

Read in context
Page 1043

* अध्याय २७० * । १०३३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चत्वारिंशद्यज्ञभद्रस्तद्विहीनो विशालकः।<br>षट्त्रिंशच्चैव सुश्लिष्टो द्विहीनः शत्रुमर्दनः ॥ ११<br>द्वात्रिंशद्भागपञ्चस्तु त्रिंशद्भिन्नन्दनः स्मृतः।<br>अष्टाविंशन्मानवस्तु मानभद्रो द्विहीनकः ॥ १२<br>चतुर्विंशस्तु सुग्रीवो द्वाविंशो हरितो मतः।<br>विंशतिः कर्णिकारः स्यादाष्टादश शतर्धिकः ॥ १३<br>सिंहो भवेद् द्विहीनश्च श्यामभद्रो द्विहीनकः।<br>सुभद्रस्तु तथा प्रोक्तो द्वादशस्तम्भसंयुतः ॥ १४<br>मण्डपाः कथितास्तुभ्यं यथावल्लक्षणान्विताः।<br>त्रिकोणं वृत्तमर्धेन्दुमष्टकोणं द्विरष्टकम् ॥ १५<br>चतुष्कोणं तु कर्तव्यं संस्थानं मण्डपस्य तु।<br>राज्यं च विजयश्चैव आयुर्वर्धनमेव च ॥ १६<br>पुत्रलाभः श्रियः पुष्टिस्त्रिकोणादिक्रमाद् भवेत्।<br>एवं तु शुभदाः प्रोक्ताश्चान्यथा त्वशुभावहाः ॥ १७<br>चतुःषष्टिपदं कृत्वा मध्ये द्वारं प्रकल्पयेत्।<br>विस्ताराद् द्विगुणोच्छ्रायं तत्रिभागः कटिर्भवेत् ॥ १८<br>विस्तार्धो भवेद् गर्भो भित्तयोऽन्याः समन्ततः।<br>गर्भपादेन विस्तीर्णं द्वारं त्रिगुणमायतम् ॥ १९<br>तथा द्विगुणविस्तीर्णमुखस्तद्वदुदुम्बरः।<br>विस्तारपादप्रतिमं बाहुल्यं शाखयोः स्मृतम् ॥ २०'यज्ञभद्र'-मण्डपमें चालीस, विशालकमें उससे दो स्तम्भ न्यून अर्थात् अड़तीस, 'सुश्लिष्ट' में छत्तीस और 'शत्रुमर्दन' में उससे दो स्तम्भ न्यून अर्थात् चौंतीस, 'भागपञ्च' में बत्तीस और 'नन्दन' में तीस स्तम्भ माने गये हैं। अट्ठाईस स्तम्भोंका 'मानव', छब्बीसका 'मानभद्र', चौबीसका 'सुग्रीव', बाईसका 'हरित', बीसकी 'कर्णिका', अठारहका 'शतधिक', सोलहका 'सिंह', चौदहका 'श्यामभद्र' और बारहका 'सुभद्र' कहा गया है। इस प्रकार मैंने लक्षणोंसहित मण्डपोंके नाम तुम्हें बतला दिया। इन मण्डपोंकी स्थापना त्रिकोण, गोलाकार, अर्धचन्द्राकार, अष्टकोण, दशकोण अथवा चतुष्कोणरूपमें करनी चाहिये। इन त्रिकोणादिकोंकी स्थापनासे क्रमशः राज्य, विजय, आयुकी वृद्धि, पुत्र-लाभ, लक्ष्मी और पुष्टिकी प्राप्ति होती है। इस प्रकारके मण्डप मङ्गलदायक तथा इनसे विपरीत अमङ्गलकारक होते हैं। गृहके मध्यमें चौंसठ पदोंकी कल्पनाकर मध्यमें द्वार बनाना चाहिये। चौड़ाईसे ऊँचाई दुगुनी होनी चाहिये और उसके कटिभागको तृतीयांशके बराबर बनाना चाहिये। चौड़ाईका आधा मध्यभाग होना चाहिये। उसके चारों ओर दूसरी दीवारें रहेंगी। मध्यभागके चतुर्थांशसे तिगुना लम्बा और दूना विस्तृत द्वार होना चाहिये, जो गूलरका बना हुआ हो। दोनों शाखाओंका विस्तार द्वारके विस्तारका चतुर्थांश हो॥ ११-२०॥
त्रिप्रञ्चसप्तनवभिः शाखाभिर्द्वारमिष्यते।<br>कनिष्ठमध्यमं ज्येष्ठं यथायोगं प्रकल्पयेत् ॥ २१<br>अङ्गुलानां शतं सार्धं चत्वारिंशत्तथोन्नतम्।<br>त्रिंशद्विंशोत्तरं चान्यद्वान्यमुत्तममेव च ॥ २२<br>शतं चाशीतिसहितं वातनिर्गमने भवेत्।<br>अधिकं दशभिस्तद्वत् तथा षोडशभिः शतम् ॥ २३<br>शतमानं तृतीयं च नवत्याशीतिभिस्तथा।<br>दश द्वाराणि चैतानि क्रमेणोक्तानि सर्वदा ॥ २४<br>अन्यानि वर्जनीयानि मानसोद्वेगदानि तु।<br>द्वारवेधं प्रयत्नेन सर्ववास्तुषु वर्जयेत् ॥ २५<br>वृक्षकोणभ्रमिद्वारस्तम्भकूपध्वजादिभिः ।<br>कुड्यश्वभ्रेण वा विद्धं द्वारं न शुभदं भवेत् ॥ २६मण्डप-द्वार, तीन, पाँच, सात अथवा नौ शाखाओंसे युक्त बनते हैं, जो क्रमशः कनिष्ठ, मध्यम और ज्येष्ठ कहलाते हैं। एक सौ साढ़े चालीस अंगुल ऊँचा द्वार धनप्रद एवं उत्तम होता है। अन्य दो एक सौ तीस तथा एक सौ बीस अंगुलके होते हैं। शुद्ध वायुके आने-जानेके लिये एक सौ अस्सी अंगुल ऊँचा द्वार होना चाहिये। उसी प्रकार एक सौ दस, एक सौ सोलह, एक सौ नब्बे तथा अस्सी अंगुलके द्वार होने चाहिये। सर्वदा क्रमशः ये दस प्रकारके द्वार कहे गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्य प्रकारके द्वार वर्जित हैं; क्योंकि वे चित्तको उद्विग्न करनेवाले होते हैं। सभी वास्तुओंमें प्रयत्नपूर्वक द्वारवेधसे बचना चाहिये। सामनेकी ओर वृक्ष, कोण, भ्रमि, द्वार, स्तम्भ, कूप, ध्वज, दीवाल और गङ्ढा—इन सबसे विद्ध किया हुआ द्वार मंगलकारी नहीं