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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1044 of 1098

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Page 1044

१०३४ * मत्स्यपुराण *


| क्षयश्च दुर्गतिश्चैव प्रवासः क्षुद्भयं तथा।<br>दौर्भाग्यं बन्धनं रोगो दारिद्र्यं कलहं तथा॥ २७<br>विरोधश्चार्थनाशश्च सर्वं वेधाद् भवेत् क्रमात्।<br>पूर्वेण फलिनो वृक्षाः क्षीरवृक्षास्तु दक्षिणे॥ २८<br>पश्चिमेन जलं श्रेष्ठं पद्मोत्पलविभूषितम्।<br>उत्तरे सरलैस्तालैः शुभा स्यात् पुष्पवाटिका॥ २९<br>सर्वतस्तु जलं श्रेष्ठं स्थिरमस्थिरमेव च।<br>पार्श्वतश्चापि कर्तव्यं परिवारादिकालयम्॥ ३०<br>याम्ये तपोवनस्थानमुत्तरे मातृकागृहम्।<br>महानसं तथाऽऽग्नेये नैर्ऋत्येऽथ विनायकम्॥ ३१<br>वारुणे श्रीनिवासस्तु वायव्ये गृहमालिका।<br>उत्तरे यज्ञशाला तु निर्माल्यस्थानमुत्तरे॥ ३२<br>वारुणे सोमदैवत्ये बलिनिर्वपणं स्मृतम्।<br>पुरतो वृषभस्थानं शेषे स्यात् कुसुमायुधः॥ ३३<br>जलवापी तथेशाने विष्णुस्तु जलशय्यपि।<br>एवमायतनं कुर्यात् कुण्डमण्डपसंयुतम्॥ ३४<br>घण्टावितानकसतोरणचित्रयुक्तं<br>नित्योत्सवप्रमुदितेन जनेन सार्धम्।<br>यः कारयेत् सुरगृहं विविधं ध्वजाङ्कं<br>श्रीस्तं न मुञ्चति सदा दिवि पूज्यते च॥ ३५<br>एवं गृहार्चनविधावपि शक्तितः स्यात्<br>संस्थापनं सकलमन्त्रविधानयुक्तम्।<br>गोवस्त्रकाञ्चनहिरण्यधराप्रदानं<br>देयं गुरुद्विजवरेषु तथान्नदानम्॥ ३६ | होता। इन द्वारवेधसे क्रमशः क्षय, दुर्गति, प्रवास, क्षुधाका भय, दुर्भाग्य, बन्धन, रोग, दरिद्रता, कलह, विरोध, धनहानि—ये सब कुपरिणाम होते हैं। घरके पूर्व दिशामें फलदार वृक्ष, दक्षिण दिशामें दूधवाले वृक्ष, पश्चिम दिशामें विविध भाँतिके कमलोंसे सुशोभित जल तथा उत्तर दिशामें चीड़ और ताड़के वृक्षोंसे युक्त पुष्पवाटिका मङ्गलदायिनी होती है॥ २१—२९॥<br><br>जल सभी दिशाओंमें श्रेष्ठ है, चाहे वह (नदी आदिका) बहता हुआ हो अथवा (कूप, सरोवर आदिका) अचल। मुख्य भवनके दोनों पार्श्वोंमें परिवार-वर्गका निवासस्थान बनाना चाहिये। दक्षिणकी ओर तपोवन अथवा तपस्याका स्थान, उत्तरमें मातृकाओंका भवन, अग्निकोणमें पाकशाला, नैर्ऋत्यकोणमें गणेशका निवास, पश्चिममें लक्ष्मीका निवास, वायव्यकोणमें गृहमालिका, उत्तरमें यज्ञशाला और निर्माल्यका स्थान होना चाहिये। पश्चिमकी ओर चन्द्रादि देवताओंके लिये बलिदान देनेका स्थान, सामनेकी ओर वृषभका स्थान और शेष भागमें कामदेवके स्थानका निर्माण करना चाहिये। ईशानकोणमें जलयुक्त बावली रहे तथा वहीं जलशायी विष्णुभगवान्का भी स्थान रहे। इस प्रकार कुण्ड और मण्डपसे युक्त गृहका निर्माण करना चाहिये। जो मनुष्य घण्टा, वितान, तोरण तथा चित्रसे सुशोभित, नित्य महोत्सवसे प्रमुदित जनसमूहके साथ विविध ध्वजाओंसे विभूषित देव-मन्दिर बनवाता है, उसे लक्ष्मी कभी नहीं छोड़तीं और स्वर्गमें उसकी पूजा होती है। इसी प्रकार गृहपूजनके अवसरपर भी अपनी शक्तिके अनुरूप सभी मन्त्रों और विधानोंसे युक्त स्थापना करनी चाहिये। उस समय गुरु तथा ब्राह्मणोंको गौ, वस्त्र, सुवर्णके आभूषण, सुवर्ण और पृथ्वीका दान देना चाहिये तथा अन्नदान भी करना चाहिये॥ ३०—३६॥ |


इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रासादानुकीर्तनं नाम सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रासाद-अनुकीर्तन नामक दो सौ सत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७०॥