Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1059 of 1098

Read in context
Page 1059
* अध्याय २७४ *१०४९
संस्कृतहिन्दी
अथर्त्विजो वेदविदश्च कार्याः<br>सुरूपवेशान्वयशीलयुक्ताः ॥ ३६<br>विधानदक्षाः पटवोऽनुकूला<br>ये चार्यदेशप्रभवा द्विजेन्द्राः ।तदनन्तर वेदवेत्ता, सुन्दर रूप, वेश, वंश और शीलसे युक्त, विधिके ज्ञाता, पटु, अपने अनुकूल, आर्यदेशोत्पन्न द्विजवरोंको ऋत्विजके पदपर नियुक्त करे।
गुरुश्च वेदान्तविदार्यवंश-<br>समुद्भवः शीलकुलाभिरूपः ॥ ३७गुरु (आचार्य), वेदान्तवेत्ता, आर्यवंशमें समुत्पन्न, शीलवान्, कुलीन, सुन्दर,
पुराणशास्त्राभिरतोऽतिदक्षः<br>प्रसन्नगम्भीरसरस्वतीकः ।<br>सिताम्बरः कुण्डलहेमसूत्र-<br>केयूरकण्ठाभरणाभिरामः ॥ ३८पुराणों एवं शास्त्रोंमें निरत रहनेवाला, अत्यन्त पटु, सरल एवं गम्भीर वाणी बोलनेवाला, श्वेत वस्त्रधारी, कुण्डल, जंजीर, केयूर तथा कण्ठाभरणसे सुशोभित हो।
पूर्वेण ऋग्वेदविदौ भवेतां<br>यजुर्विदौ दक्षिणतश्च शस्तौ ।<br>स्थाप्यौ द्विजौ सामविदौ तु पश्चा-<br>दाथर्वणावुत्तरतस्तु कार्यों ॥ ३९मण्डपमें पूर्व दिशामें दो ऋग्वेदी ऋत्विजोंको, दक्षिण दिशामें दो यजुर्वेदी अध्वर्यु ब्राह्मणोंको, पश्चिम दिशामें दो सामवेदी उद्गाता ब्राह्मणोंको तथा उत्तर दिशामें दो अथर्ववेदी विद्वानोंको नियुक्त करना चाहिये।
विनायकादिग्रहलोकपाल-<br>वस्वष्टकादित्यमरुद्गणानाम् ।<br>ब्रह्माच्युतेशार्कवनस्पतीनां<br>स्वमन्त्रतो होमचतुष्टयं स्यात् ॥ ४०विनायक आदि ग्रह, लोकपाल, आठों वसुगण, आदित्यगण, मरुद्गण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य एवं वनस्पतियोंके लिये उनके मन्त्रोंद्वारा चार-चार आहुतियाँ देनी चाहिये तथा इनके सूक्तोंका
जप्यानि सूक्तानि तथैव चैषा-<br>मनुक्रमेणापि यथास्वरूपम् ।<br>होमावसाने कृततूर्यनादो<br>गुरुर्गृहीत्वा बलिपुष्पधूपम् ।<br>आवाहयेल्लोकपतीन् क्रमेण<br>मन्त्रैरमीभिर्यजमानयुक्तः ॥ ४१क्रमानुरूप शुद्ध-शुद्ध जप करवाना चाहिये। हवनकी समाप्तिके बाद यजमानसहित आचार्य तुरहीका शब्द करते हुए बलि, पुष्प और धूप लेकर क्रमशः सभी लोकपालोंका उनके मन्त्रोंद्वारा इस प्रकार आवाहन करे।
एहोहि सर्वामरसिद्धसाध्यै-<br>रभिष्टुतो वज्रधरोऽमरेशः ।<br>संवीज्यमानोऽप्सरसां गणेन<br>रक्षाध्वरं नो भगवन् नमस्ते ॥ ४२<br>ॐ इन्द्राय नमः।भगवन् ! आप देवताओंके स्वामी और वज्र धारण करनेवाले हैं, सभी अमर, सिद्ध और साध्य आपकी स्तुति करते हैं तथा अप्सराओंके समूह आपपर पंखा झलते हैं, आपको नमस्कार है। आप यहाँ आइये, अवश्य आइये, हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। 'ॐ इन्द्रको नमस्कार है'—ऐसा कहकर इन्द्रका आवाहन करना चाहिये।
एहोहि सर्वामरहव्यवाह<br>मुनिप्रवीरैरभितोऽभिजुष्टः ।<br>तेजस्विना लोकगणेन सार्धं<br>ममाध्वरं रक्ष कवे नमस्ते ॥ ४३अग्निदेव ! आप सभी देवताओंके हव्यवाहक हैं, मुनिवरगण सब ओरसे आपकी सेवा करते हैं, आप अपने तेजस्वी लोकगणोंके साथ वहाँ आयें, अवश्य आयें और मेरे यज्ञकी रक्षा करें, आपको प्रणाम है।