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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1058 of 1098

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Page 1058

९०४८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तन्मध्ये तोरणं कुर्यात् सारदारुमयं बुधः।<br>कुर्यात् कुण्डानि चत्वारि चतुर्दिक्षु विचक्षणः॥ २७वेदी बनाये। उसके मध्यभागमें बुद्धिमान् पुरुष साल काष्ठकी बनी हुई तोरण लगवाये। विचक्षण पुरुष चारों दिशाओंमें चार कुण्डोंकी रचना करे॥ १८-२७॥
समेखलायोनियुतानि कुर्यात्<br>सम्पूर्णकुम्भानि महासनानि।<br>सुताम्रपात्रद्वयसंयुतानि<br>सुयज्ञपात्राणि सुविष्टराणि॥ २८<br>हस्तप्रमाणानि तिलाज्यधूप-<br>पुष्पोपहाराणि सुशोभनानि।<br>पूर्वोत्तरे हस्तमिताथ वेदी<br>ग्रहादिदेवेश्वरपूजनाय ॥ २९<br>अत्रार्चनं ब्रह्मशिवाच्युतानां<br>तत्रैव कार्यं फलमाल्यवस्त्रैः।<br>लोकेशवर्णाः परितः पताका<br>मध्ये ध्वजः किङ्किणिकायुतः स्यात्॥ ३०<br>द्वारेषु कार्याणि च तोरणानि<br>चत्वार्यपि क्षीरवनस्पतीनाम्।<br>द्वारेषु कुम्भद्वयमत्र कार्यं<br>स्रग्गन्धधूपाम्बररत्नयुक्तम् ॥ ३१<br>शालेङ्गुदीचन्दनदेवदारु-<br>श्रीपर्णिबिल्वप्रियकाञ्चनोत्थम् ।<br>स्तम्भद्वयं हस्तयुगावखातं<br>कृत्वा दृढं पञ्चकरोच्छ्रितं च॥ ३२<br>तदन्तरं हस्तचतुष्टयं स्या-<br>दथोत्तराङ्गं च तदीयमेव।<br>समानजातिश्च तुलावलम्ब्या<br>हैमेन मध्ये पुरुषेण युक्ता॥ ३३<br>दैर्घ्येण सा हस्तचतुष्टयं स्यात्<br>पृथुत्वमस्यास्तु दशाङ्गुलानि।<br>सुवर्णपट्टाभरणा च कार्या<br>सलोहपाशद्वयश्रृङ्खलाभिः ॥ ३४<br>युता सुवर्णेन तु रत्नमाला<br>विभूषिता माल्यविलेपनाभ्याम्।<br>चक्रं लिखेद् वारिजगर्भयुक्तं<br>नानारजोभिर्भुवि पुष्पकीर्णम्॥ ३५<br>वितानकं चोपरि पञ्चवर्णं<br>संस्थापयेत् पुष्पफलोपशोभम्।उन कुण्डोंको मेखला और योनिसे युक्त बनाना चाहिये। उनके समीप जलसे भरे हुए कलश, बड़े-बड़े आसन, सुन्दर ताँबेके बने हुए दो पात्र, यज्ञके सुन्दर पात्र तथा सुन्दर विष्टर रखना चाहिये। कुण्ड एक हाथ लंबा-चौड़ा हो तथा तिल, घृत, धूप, पुष्प और अन्य उपहारोंसे सुशोभित हो। तदनन्तर पूर्व तथा उत्तर दिशाके कोणमें ग्रहादि तथा देवेश्वरोंके पूजनके लिये एक हाथ विस्तृत वेदी बनायी जाय। वहीं फलों, मालाओं तथा वस्त्रोंद्वारा ब्रह्मा, शिव और विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। चारों ओर लोकपालोंके वर्णोंके अनुरूप पताकाएँ तथा मध्य भागमें घंटियोंसे युक्त ध्वज होना चाहिये। चारों द्वारोंपर भी दूधवाले वृक्षोंके बने हुए तोरण सुशोभित हों। प्रधान द्वारपर माला, गन्ध, धूप, वस्त्र एवं रत्नोंसे सुशोभित दो कलश रखे जायँ। तदनन्तर साल, इंगुदी, चन्दन, देवदारु, श्रीपर्णी (गम्भारी), बिल्व, बिजौरा अथवा चम्पक वृक्षके काष्ठके बने हुए दो स्तम्भोंको, जो पाँच हाथ ऊँचे हों, दो हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसमें सुदृढ़ कर दे। उन दोनों स्तम्भोंके बीच चार हाथका अन्तर रहे। फिर उन दोनोंसे मिला उत्तराङ्ग-खम्भेके ऊपरके दो सजातीय काष्ठ लगावे, उसीसे सजातीय काष्ठकी बनी सुवर्णनिर्मित पुरुषसे युक्त तुला मध्यभागमें लटकावे। वह तुला चार हाथ लंबी हो तथा उसकी मोटाई दस अंगुल होनी चाहिये, उसमें लोहेकी बनी हुई जंजीरोंको जोड़े तथा उसे सुवर्णजटित वस्त्र, सुवर्णखचित रत्नमाला तथा विविध प्रकारके पुष्प एवं चन्दनादिसे अलंकृत करना चाहिये। फिर पृथ्वीपर विविध रंगके रजोंसे कमलके मध्यके आकारका चक्र बनावे और उसपर पुष्प बिखेर दे। उसके ऊपर पुष्प और फलोंसे सुशोभित पाँचरंगा वितान तनवाये॥ २८-३५½॥
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