About this granth
The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.
This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.
The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.
९९८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| महावराहं वक्ष्यामि पद्महस्तं गदाधरम्।<br>तीक्ष्णदंष्ट्राग्रघोणास्यं मेदिनी वामकूर्परम्॥ २८<br><br>दंष्ट्राग्रेणोद्धृतां दान्तां धरणीमुत्पलान्विताम्।<br>विस्मयोत्फुल्लवदनामुपरिष्टात् प्रकल्पयेत्॥ २९<br><br>दक्षिणं कटिसंस्थं तु करं तस्याः प्रकल्पयेत्।<br>कूर्मोपरि तथा पादमेकं नागेन्द्रमूर्धनि॥ ३०<br><br>संस्तूयमानं लोकेशैः समन्तात्परिकल्पयेत्। | उत्तम स्वरूपकी कल्पना करनी चाहिये। अब मैं महावराहका वर्णन कर रहा हूँ। उनके हाथोंमें पद्म और गदा हों, उनके दाढ़ोंके अर्धभाग तीक्ष्ण हों, थूथुनवाला मुख हो, बायीं केहुनीपर पृथ्वी हो, वह पृथ्वी दाढ़के अग्रभागपर रखी हुई कमलयुक्त और शान्त हो तथा उसका मुख विस्मयसे उत्फुल्ल हो, ऐसी मूर्तिको ऊपरकी ओर बनाना चाहिये। उस मूर्तिका दाहिना हाथ कटिप्रदेशपर हो। उनका एक पैर शेषनागके मस्तकपर और दूसरा कूर्मपर स्थित हो तथा लोकपालगण चारों ओरसे उनकी स्तुति कर रहे हों, ऐसी मूर्ति बनानी चाहिये॥ २१—३० १/२॥ |
| नारसिंहं तु कर्तव्यं भुजाष्टकसमन्वितम्॥ ३१<br><br>रौद्रं सिंहासनं तद्वद् विदारितमुखेक्षणम्।<br>स्तब्धपीनसटाकर्णं दारयन्तं दितेः सुतम्॥ ३२<br><br>विनिर्गतान्त्रजालं च दानवं परिकल्पयेत्।<br>वमन्तं रुधिरं घोरं भृकुटीवदनेक्षणम्॥ ३३<br><br>युध्यमानश्च कर्तव्यः क्वचित् करणबन्धनैः।<br>परिश्रान्तेन दैत्येन तर्ज्यमानो मुहुर्मुहुः॥ ३४<br><br>दैत्यं प्रदर्शयेत् तत्र खड्गखेटकधारिणम्।<br>स्तूयमानं तथा विष्णुं दर्शयेदमराधिपैः॥ ३५<br><br>तथा त्रिविक्रमं वक्ष्ये ब्रह्माण्डक्रमणोल्वणम्।<br>पादपार्श्वे तथा बाहुमुपरिष्टात् प्रकल्पयेत्॥ ३६<br><br>अधस्ताद् वामनं तद्वत् कल्पयेत् सकमण्डलुम्।<br>दक्षिणे छत्रिकां दद्यान्मुखं दीनं प्रकल्पयेत्॥ ३७<br><br>भृङ्गारधारिणं तद्वद् बलिं तस्य च पार्श्वतः।<br>बन्धनं चास्य कुर्वन्तं गरुडं तस्य दर्शयेत्॥ ३८<br><br>मत्स्यरूपं तथा मत्स्यं कूर्मं कूर्माकृतिं न्यसेत्।<br>एवंरूपस्तु भगवान् कार्यो नारायणो हरिः॥ ३९ | भगवान् नृसिंहकी प्रतिमा आठ भुजाओंसे युक्त बनायी जानी चाहिये। उसी प्रकार उनका सिंहासन भी भयंकर हो, मुख और नेत्र फैले हुए हों, गर्दनके लम्बे बाल कानोंतक बिखरे हों तथा वे नखसे दितिपुत्र हिरण्यकशिपुको फाड़ रहे हों। जिसकी आँतें बाहर निकल गयी हों, मुखसे रुधिर गिर रहा हो, भृकुटी, मुख और नेत्र विकराल हों, ऐसे दानवराज हिरण्यकशिपुकी मूर्ति बनानी चाहिये। कहीं नृसिंह-प्रतिमा युद्धके उपकरणोंसे युक्त दैत्योंसे युद्ध करती हुई बनायी जाती है और कहीं थके हुए दैत्यसे बारंबार धमकायी जाती हुई बनानी चाहिये। वहाँ दैत्यको तलवार और ढाल धारण किये हुए प्रदर्शित करना चाहिये तथा देवेश्वरोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए विष्णुको दिखाना चाहिये। अब मैं वामनका वर्णन कर रहा हूँ। वे ब्रह्माण्डको नापनेके लिये तत्पर दीखते हों। उनके चरणोंके समीपमें ऊपरकी ओर बाहुका निर्माण करे। उसके नीचेकी ओर बायें हाथमें कमण्डलु धारण किये हुए वामनकी रचना करे। दाहिने हाथमें एक छोटी-सी छतरी होनी चाहिये। उनका मुख दीनतासे युक्त हो। उन्हींकी बगलमें जलका गेडुआ लिये हुए बलिको निर्माण होना चाहिये। उसी स्थलपर बलिको बाँधते हुए गरुड़को भी दिखाना चाहिये। इसी प्रकार मत्स्यभगवान्की प्रतिमा मछलीके आकारकी तथा कूर्मभगवान्की प्रतिमा कछुएके समान बनानी चाहिये। इस प्रकार भगवान् विष्णु तथा उनके अवतारोंकी प्रतिमाओंका निर्माण होना चाहिये॥ ३१—३९॥ |
| ब्रह्मा कमण्डलुधरः कर्तव्यः स चतुर्मुखः।<br>हंसारूढः क्वचित् कार्यः क्वचिच्च कमलासनः॥ ४० | ब्रह्माको कमण्डलु लिये हुए चार मुखोंसे युक्त बनावे। उनकी प्रतिमा कहीं हंसपर बैठी हुई तथा कहीं कमलपर विराजमान रहती है। |
| * अध्याय २६० * | ९९९ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| वर्णतः पद्मगर्भाभश्चतुर्बाहुः शुभेक्षणः।<br>कमण्डलुं वामकरे स्रुवं हस्ते तु दक्षिणे॥ ४१<br>वामे दण्डधरं तद्वत् स्रुवञ्चापि प्रदर्शयेत्।<br>मुनिभिर्देवगन्धर्वैः स्तूयमानं समन्ततः॥ ४२<br>कुर्वाणमिव लोकांस्त्रीञ्छुक्लाम्बरधरं विभुम्।<br>मृगचर्मधरं चापि दिव्ययज्ञोपवीतिनम्॥ ४३<br>आज्यस्थालीं न्यसेत् पार्श्वे वेदांश्च चतुरः पुनः।<br>वामपार्श्वेऽस्य सावित्रीं दक्षिणे च सरस्वतीम्॥ ४४<br>अग्रे च ऋषयस्तद्वत् कार्याः पितामहे पदे। | उनकी प्रतिमा कमलके भीतरी भागके समान अरुण, चार भुजाओंसे युक्त और सुन्दर नेत्रवाली हो। उनके नीचेके बायें हाथमें कमण्डलु और दाहिने हाथमें स्रुवा हो। उनके ऊपरके बायें हाथमें दण्ड तथा दाहिने हाथमें भी स्रुवा* धारण किये हुए प्रदर्शित करना चाहिये। उनके चारों ओर देवता, गन्धर्व और मुनिगणोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए दिखाना चाहिये। ऐसी भूमिका भी दिखाये, मानो वे तीनों लोकोंकी रचनामें प्रवृत्त हैं। वे श्वेत वस्त्रधारी, ऐश्वर्यसम्पन्न, मृगचर्म तथा दिव्य यज्ञोपवीतसे युक्त हों। उनके बगलमें आज्यस्थाली रहे और सामने चारों वेदोंकी मूर्तियाँ हों। उनकी बायीं ओर सावित्री, दाहिनी ओर सरस्वती तथा उनके अग्रभागमें मुनियोंके समूह हों॥ ४०—४४ १/२ ॥ |
| कार्तिकेयं प्रवक्ष्यामि तरुणादित्यसप्रभम्॥ ४५<br>कमलोदरवर्णाभं कुमारं सुकुमारकम्।<br>दण्डकैश्चीरकैर्युक्तं मयूरवरवाहनम्॥ ४६<br>स्थापयेत् स्वेष्टनगरे भुजान् द्वादश कारयेत्।<br>चतुर्भुजः खर्वटे स्याद् वने ग्रामे द्विबाहुकः॥ ४७<br>शक्तिः पाशस्तथा खड्गः शरः शूलं तथैव च।<br>वरदश्चैकहस्तः स्यादथ चाभयदो भवेत्॥ ४८<br>एते दक्षिणतो ज्ञेयाः केयूरकटकोज्ज्वलाः।<br>धनुः पताका मुष्टिश्च तर्जनी तु प्रसारिता॥ ४९<br>खेटकं ताम्रचूडं च वामहस्ते तु शस्यते।<br>द्विभुजस्य करे शक्तिर्वामे स्यात् कुक्कुटोपरि॥ ५०<br>चतुर्भुजे शक्तिपाशौ वामतो दक्षिणे त्वसिः।<br>वरदोऽभयदो वापि दक्षिणः स्यात् तुरीयकः॥ ५१ | अब मैं कार्तिकेयकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी प्रतिमाको मध्यकालीन सूर्यकी भाँति परम तेजोमय, कमलके मध्यभागके समान अरुण, मयूरपर आरूढ़, दण्डों और चीरोंसे सुशोभित, सुकुमार शरीरसे युक्त और बारह भुजाओंवाली बनाना चाहिये। उसे अपने इष्ट नगरमें स्थापित करना चाहिये। खर्वट (पर्वतके समीपके ग्राम)-में इनकी चार भुजाओंवाली और वन अथवा ग्राममें दो बाहुवाली प्रतिमा स्थापित करानी चाहिये। (बारह भुजाओंवाली प्रतिमामें) उनकी दाहिनी ओरके छः हाथोंमें शक्ति, पाश, तलवार, बाण और शूल शोभायमान हों। एक हाथमें अभयमुद्रा अथवा वरदमुद्रा बनानी चाहिये। ये सभी केयूर तथा कटकसे विभूषित उज्ज्वल वर्णके होने चाहिये। बायीं ओरके छः हाथ क्रमशः धनुष, पताका, मुष्टि, फैली हुई तर्जनी, ढाल, मुर्गा—इन वस्तुओंसे युक्त और उसी वर्णके होने चाहिये। दो भुजाओंवाली प्रतिमाके बायें हाथमें शक्ति और दाहिना हाथ कुक्कुटपर न्यस्त रहना चाहिये। चतुर्भुज प्रतिमाकी बायीं ओरके दो हाथोंमें शक्ति और पाश तथा दाहिनी ओरके तीसरे हाथमें तलवार हो और चौथा हाथ अभय अथवा वरदमुद्रासे युक्त हो॥ ४५—५१॥ |
| विनायकं प्रवक्ष्यामि गजवक्त्रं त्रिलोचनम्।<br>लम्बोदरं चतुर्बाहुं व्यालयज्ञोपवीतिनम्॥ ५२<br>ध्वस्तकर्णं बृहत्तुण्डमेकदंष्ट्रं पृथूदरम्।<br>स्वदन्तं दक्षिणकरे उत्पलं चापरे तथा॥ ५३ | अब मैं गणेशजीकी प्रतिमाका विधान बता रहा हूँ। उनकी प्रतिमामें हाथी-सा मुख, तीन नेत्र, लम्बा उदर, चार भुजाएँ, सर्पका यज्ञोपवीत, सिमटा हुआ कान, विशाल शुण्ड, एक दाँत और तोंद स्थूल हो। उनके ऊपरके दाहिने हाथमें अपना दाँत और निचले हाथमें कमल होना चाहिये। |
* कहीं-कहीं उनके ऊपरके दाहिने हाथमें वेदग्रन्थ या स्रुक् भी निर्दिष्ट है।
| १००० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मोदकं परशुं चैव वामतः परिकल्पयेत्।<br>बृहत्वात्क्षिप्तवदनं पीनस्कन्धाङ्घ्रियाणिकम्॥ ५४<br>युक्तं तु सिद्धिबुद्धिभ्यामधस्तान्मूषिकान्वितम्।<br>कात्यायन्याः प्रवक्ष्यामि रूपं दशभुजं तथा॥ ५५<br>त्रयाणामपि देवानामनुकारानुकारिणीम्।<br>जटाजूटसमायुक्तमर्धेन्दुकृतशेखरम् ॥ ५६<br>लोचनत्रयसंयुक्तां पूर्णेन्दुसदृशाननाम्।<br>अतसीपुष्पवर्णाभां सुप्रतिष्ठां सुलोचनाम्॥ ५७<br>नवयौवनसम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम्।<br>सुचारुदशनां तद्वत् पीनोन्नतपयोधराम्॥ ५८<br>त्रिभङ्गस्थानसंस्थानां महिषासुरमर्दिनीम्।<br>त्रिशूलं दक्षिणे दद्यात् खड्गं चक्रं क्रमादधः॥ ५९<br>तीक्ष्णवाणं तथा शक्तिं वामतोऽपि निबोधत।<br>खेटकं पूर्णचापं च पाशमङ्कुशमेव च॥ ६०<br>घण्टां वा परशुं वापि वामतः संनिवेशयेत्।<br>अधस्तान्महिषं तद्वद्विशिरस्कं प्रदर्शयेत्॥ ६१<br>शिरश्छेदोद्भवं तद्वद् दानवं खड्गपाणिनम्।<br>हृदि शूलेन निर्भिन्नं निर्यदन्त्रविभूषितम्॥ ६२<br>रक्तरक्तीकृताङ्गं च रक्तविस्फुरितेक्षणम्।<br>वेष्टितं नागपाशेन भ्रुकुटीभीषणाननम्॥ ६३<br>सपाशवामहस्तेन धृतकेशं च दुर्गया। | बायीं ओरके ऊपरके हाथमें मोदक तथा निचले हाथमें परशु हों। बृहत् होनेके कारण मुख नीचेकी ओर विस्तृत तथा स्कन्ध, पाद और हाथ मोटे होने चाहिये। वह सिद्धि-बुद्धिसे युक्त हो, उसके नीचेकी ओर मूषक बना हो। अब मैं भगवती कात्यायनीकी मूर्तिको वर्णन कर रहा हूँ। वह दस भुजाओंसे युक्त, तीनों देवताओंकी आकृतियोंका अनुकरण करनेवाली, जटा-जूटसे विभूषित, सिरपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित, तीन नेत्रोंसे युक्त, पूर्णचन्द्रके समान मुखवाली, अलसी-पुष्पके समान नीलवर्णा, तेजोमय, सुन्दर नेत्रोंसे विभूषित, नवयौवनसम्पन्ना, सभी आभूषणोंसे विभूषित, अत्यन्त सुन्दर दाँतोंसे युक्त, स्थूल एवं उन्नत स्तनोंवाली, त्रिभंगी रूपसे स्थित, महिषासुरनाशिनी आदि चिह्नोंसे युक्त हो। दाहिने हाथोंमें क्रमशः ऊपरसे नीचेकी ओर त्रिशूल, खड्ग, चक्र, तीक्ष्ण बाण और शक्ति तथा बायें हाथोंमें ढाल, धनुष, पाश, अङ्कुश, घण्टा अथवा परशु धारण कराना चाहिये। प्रतिमाके नीचे सिररहित महिषासुरको प्रदर्शित करना चाहिये। वह दानव सिर कटनेपर शरीरसे निकलता हुआ दीख पड़े तथा हाथमें खड्ग, हृदय शूलसे विदीर्ण और बाहर निकलती हुई अँतड़ियोंसे विभूषित हो। वह रक्तसे लथपथ शरीरवाला, विस्फारित लाल नेत्रोंसे युक्त, नागपाशसे परिवेष्टित, टेढ़ी भृकुटीके कारण भीषण मुखाकृति और दुर्गाद्वारा पाशयुक्त बायें हाथसे पकड़ा गया केशवाला हो॥ ५२—६३ १/२॥ |
| वमद्रुधिरवक्त्रं च देव्याः सिंहं प्रदर्शयेत्॥ ६४<br>देव्यास्तु दक्षिणं पादं समं सिंहोपरि स्थितम्।<br>किंचिदूर्ध्वं तथा वाममङ्गुष्ठं महिषोपरि॥ ६५<br>स्तूयमानं च तद्रूपममरैः संनिवेशयेत्। | देवीके सिंहको मुखसे रक्त उगलते हुए प्रदर्शित करना चाहिये। देवीका दाहिना पैर सिंहके ऊपर समानरूपसे स्थित हो तथा बायाँ कुछ ऊपरकी ओर उठा हो, उसका अंगूठा महिषासुरपर लगा हुआ हो। उनकी प्रतिमाको देवगणोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए दिखाना चाहिये। |
| इदानीं सुरराजस्य रूपं वक्ष्ये विशेषतः॥ ६६<br>सहस्रनयनं देवं मत्तवारणसंस्थितम्।<br>पृथूरुवक्षोवदनं सिंहस्कन्धं महाभुजम्॥ ६७ | (यहाँसे अष्टदिक्पाल या लोकपालोंकी प्रतिमाका वर्णन है) अब मैं देवराज इन्द्रके रूपको विशेष रूपसे कह रहा हूँ। हजार नेत्रोंवाले देवेन्द्रको मत्त गयन्दपर विराजमान बनाना चाहिये। उनके ऊरु, वक्षःस्थल और मुख विशाल हों, |
* अध्याय २६१ * । १००१
| किरीटकुण्डलधरं पीवरोरुभुजेक्षणम्।<br>वज्रोत्पलधरं तद्वन्नानाभरणभूषितम्॥ ६८<br>पूजितं देवगन्धर्वैरप्सरोगणसेवितम्।<br>छत्रचामरधारिण्यः स्त्रियः पार्श्वे प्रदर्शयेत्॥ ६९<br>सिंहासनगतं चापि गन्धर्वगणसंयुतम्।<br>इन्द्राणीं वामतश्चास्य कुर्यादुत्पलधारिणीम्॥ ७० | कंधे सिंहके समान हों, उनकी भुजाएँ विशाल हों, वे किरीट और कुण्डल धारण किये हों, उनके जघनस्थल, भुजाएँ तथा आँखें स्थूल हों, वे वज्र और कमल धारण किये हों तथा विविध आभूषणोंसे विभूषित हों, देवता और गन्धर्वोंद्वारा पूजित और अप्सराओंद्वारा सेवित हों। उनके पार्श्वमें छत्र और चामर धारण करनेवाली स्त्रियोंको प्रदर्शित करना चाहिये। वे सिंहासनपर विराजमान हों, उनकी बायीं ओर कमल धारण किये हुए इन्द्राणी स्थित हों, वे गन्धर्वोंसे घिरे हों॥ ६४-७०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रतिमालक्षणे षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रतिमा-लक्षण नामक दो सौ साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६०॥
दो सौ एकसठवाँ अध्याय
सूर्यादि विभिन्न देवताओंकी प्रतिमाके स्वरूप, प्रतिष्ठा और पूजा आदिकी विधि
| सूत उवाच<br>प्रभाकरस्य प्रतिमामिदानीं शृणुत द्विजाः।<br>रथस्थं कारयेद् देवं पद्महस्तं सुलोचनम्॥ १<br>सप्ताश्वं चैकचक्रं च रथं तस्य प्रकल्पयेत्।<br>मुकुटेन विचित्रेण पद्मगर्भसमप्रभम्॥ २<br>नानाभरणभूषाभ्यां भुजाभ्यां धृतपुष्करम्।<br>स्कन्धस्थे पुष्करे ते तु लीलयैव धृते सदा॥ ३<br>चोलकच्छन्नवपुषं क्वचिच्चित्रेषु दर्शयेत्।<br>वस्त्रयुग्मसमोपेतं चरणौ तेजसावृतौ॥ ४<br>प्रतीहारौ च कर्तव्यौ पार्श्वयोर्दण्डिपिङ्गलौ।<br>कर्तव्यौ खड्गहस्तौ तौ पार्श्वयोः पुरुषावुभौ॥ ५<br>लेखनीकृतहस्तं च पार्श्वे धातारमव्ययम्।<br>नानादेवगणैर्युक्तमेवं कुर्याद् दिवाकरम्॥ ६ | सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणगण! अब आपलोग भगवान् सूर्यकी* प्रतिमाके निर्माणकी विधि सुनिये। भगवान् सूर्यदेवको रथपर स्थित, सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित और दोनों हाथोंमें कमल धारण किये हुए बनाना चाहिये। उनके रथमें सात घोड़े और एक पहिया होनी चाहिये। उन्हें विचित्र मुकुटसे युक्त तथा कमलके मध्यवर्ती भागके समान लालवर्णका बनाना चाहिये। वे विविध आभूषणोंसे विभूषित दोनों भुजाओंमें कमल धारण किये हों, वे कमल सदा लीलापूर्वक ऊपर कंधोंतक उठे हुए हों। उनका स्वरूप विशेषकर पैर दो वस्त्रोंसे आवृत हो। प्रायः चित्रोंमें भी उनकी प्रतिमा दो वस्त्रोंसे ढकी हुई प्रदर्शित की जानी चाहिये। उनके दोनों चरण तेजसे आवृत हों। मूर्तिके दोनों ओर दण्डी और पिङ्गल नामक दो प्रतीहारोंको रखना चाहिये। उन दोनों पार्श्ववर्ती पुरुषोंके हाथोंमें तलवार बनायी जानी चाहिये। उनके पार्श्वमें एक हाथमें लेखनी लिये हुए अविनाशी धाताकी मूर्ति हो। भगवान् भास्कर अनेकों देवगणोंसे युक्त हों। इस प्रकार भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका निर्माण करना चाहिये। |
* सूर्यप्रतिमाकी विधि अग्निपुराण, अध्याय ५१, भविष्य, नारद, साम्बादिपुराणों, सुप्रभेदागम, शिल्परत्न, शारदा, विष्णुधर्म तथा टी० गोपीनाथ राव, स्टीलाकमरिश, बनर्जी आदिके ग्रंथोंमें सानुसंधान विस्तारपूर्वक निर्दिष्ट है। तुलनात्मक अध्ययन तथा जिज्ञासाशान्त्यर्थ ये सभी तथा पुराणागमोंके ध्यान-प्रकरण भी द्रष्टव्य हैं। मतान्तरसे सूर्य भी पूर्व दिशाके स्वामी हैं।
| १००२ | * मत्स्यपुराण * |
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| अरुणः सारथिश्चास्य पद्मिनीपत्रसंनिभः।<br>अश्वौ सुवलयग्रीवावन्तस्थौ तस्य पार्श्वयोः॥ ७<br>भुजङ्गरज्जुभिर्बद्धाः सप्ताश्वा रश्मिसंयुताः।<br>पद्मस्थं वाहनस्थं वा पद्महस्तं प्रकल्पयेत्॥ ८<br><br>वह्नेस्तु लक्षणं वक्ष्ये सर्वकामफलप्रदम्।<br>दीप्तं सुवर्णवपुषमर्धचन्द्रासने स्थितम्॥ ९<br>बालार्कसदृशं तस्य वदनं चापि दर्शयेत्।<br>यज्ञोपवीतिनं देवं लम्बकूर्चधरं तथा॥ १०<br>कमण्डलुं वामकरे दक्षिणे त्वक्षसूत्रकम्।<br>ज्वालावितानसंयुक्तमजवाहनमुज्ज्वलम् ॥ ११<br>कुण्डस्थं वापि कुर्वीत मूर्ध्नि सप्तशिखान्वितम्।<br>तथा यमं प्रवक्ष्यामि दण्डपाशधरं विभुम्॥ १२<br>महामहिषमारूढं कृष्णाञ्जनचयोपमम्।<br>सिंहासनगतं चापि दीप्ताग्निसमलोचनम्॥ १३<br>महिषश्चित्रगुप्तश्च करालाः किंकरास्तथा।<br>समन्ताद् दर्शयेत् तस्य सौम्यान्सौम्यान् सुरासुरान्॥ १४<br>राक्षसेन्द्रं तथा वक्ष्ये लोकपालं च नैर्ऋतम्।<br>नरारूढं महाकायं रक्षोभिर्बहुभिर्वृतम्॥ १५<br>खड्गहस्तं महानीलं कज्जलाचलसंनिभम्।<br>नरयुक्तविमानस्थं पीताभरणभूषितम्॥ १६<br>वरुणं च प्रवक्ष्यामि पाशहस्तं महाबलम्।<br>शङ्खस्फटिकवर्णाभं सितहाराम्बरावृतम्॥ १७<br>झषासनगतं शान्तं किरीटाङ्गदधारिणम्।<br>वायुरूपं प्रवक्ष्यामि धूम्रं तु मृगवाहनम्॥ १८<br>चित्राम्बरधरं शान्तं युवानं कुञ्चितभ्रुवम्।<br>मृगाधिरूढं वरदं पताकाध्वजसंयुतम्॥ १९ | सूर्यदेवके सारथि अरुण हैं जो कमलदलके सदृश लाल वर्णके हैं। उनके दोनों बगलमें चलते हुए लंबी गरदनवाले अश्व हों। उन सातों अश्वोंको सर्पकी रस्सीसे बाँधकर लगामयुक्त रखना चाहिये। सूर्य-मूर्तिको हाथोंमें कमल लिये हुए कमलपर या वाहनपर स्थित रखना चाहिये॥ १—८॥<br>अब मैं सभी प्रकारके अभीष्ट फलोंको देनेवाले अग्निकी प्रतिमाका स्वरूप बतला रहा हूँ। अग्निकी प्रतिमा कनकके समान उदीप्त कान्तिवाली बनानी चाहिये। वह अर्धचन्द्राकार आसनपर स्थित हो। उनका मुख उदयकालीन सूर्यकी भाँति दिखाना चाहिये। अग्निदेवको यज्ञोपवीत तथा लम्बी दाढ़ीसे युक्त बनाना चाहिये। उनके बायें हाथमें कमण्डलु और दाहिने हाथमें रुद्राक्षकी माला हो। उनका वाहन बकरा ज्वालामण्डलसे विभूषित और उज्ज्वल होना चाहिये। मस्तकपर (या मुखमें) सात जिह्वारूपिणी ज्वालाओंसे युक्त इस प्रतिमाको देवमन्दिर अथवा अग्निकुण्डके मध्यमें स्थापित करना चाहिये।<br>अब मैं यमराजकी प्रतिमाके निर्माणकी विधि बतला रहा हूँ। उनके शरीरका रंग काले अंजनके समान हो। वे दण्ड और पाश धारण करनेवाले, ऐश्वर्ययुक्त और विशाल महिषपर आरूढ़ हों अथवा सिंहासनासीन हों। उनके नेत्र प्रदीप्त अग्निके समान हों। उनके चारों ओर महिष, चित्रगुप्त, विकराल अनुचरवर्ग, मनोहर आकृतिवाले देवताओं तथा विकृत असुरोंकी प्रतिमाओंको भी प्रदर्शित करना चाहिये।<br>अब मैं लोकपाल राक्षसेन्द्र निर्ऋतिकी प्रतिमाकी निर्माण-विधि बतला रहा हूँ। वे मनुष्यपर आरूढ़, विशालकाय, राक्षससमूहोंसे घिरे हुए और हाथमें तलवार लिये हुए हों। उनका वर्ण अत्यन्त नील और कज्जलगिरिके समान दिखायी पड़ता हो। उन्हें पालकीपर सवार और पीले आभूषणोंसे विभूषित बनाना चाहिये।<br>अब मैं महाबली वरुणकी प्रतिमाका वर्णन करता हूँ। वे हाथमें पाश धारण किये हुए स्फटिकमणि और शङ्खके समान श्वेत कान्तिसे युक्त, उज्ज्वल हार और वस्त्रसे विभूषित, झष* (बड़ी मछली)—पर आसीन, शान्त मुद्रासे सम्पन्न तथा बाजूबन्द और किरीटसे सुशोभित हों।<br>अब मैं वायुदेवकी प्रतिमाका स्वरूप बतला रहा हूँ। उन्हें धूम्र वर्णसे युक्त, मृगपर आसीन, चित्र-विचित्र वस्त्रधारी, शान्त, युवावस्थासे सम्पन्न, तिरछी भौंहोंसे युक्त, वरदमुद्रा और ध्वज-पताकासे विभूषित बनाना चाहिये॥ ९—१९॥ |
* शतपथ १।८।४ आदिके अनुसार बड़ी मछली ही झष है।
* अध्याय २६१ * । १००३
| कुबेरं च प्रवक्ष्यामि कुण्डलाभ्यामलङ्कृतम्।<br>महोदरं महाकायं निध्यष्टकसमन्वितम्॥ २०<br><br>गुह्यकैर्बहुभिर्युक्तं धनव्ययकरैस्तथा।<br>हारकेयूररचितं सिताम्बरधरं सदा॥ २१<br><br>गदाधरं च कर्तव्यं वरदं मुकुटान्वितम्।<br>नरयुक्तविमानस्थमेवं रीत्या च कारयेत्॥ २२<br><br>तथैवेशं प्रवक्ष्यामि धवलं धवलेक्षणम्।<br>त्रिशूलपाणिनं देवं त्र्यक्षं वृषगतं प्रभुम्॥ २३<br><br>मातृणां लक्षणं वक्ष्ये यथावदनुपूर्वशः।<br>ब्रह्माणी ब्रह्मसदृशी चतुर्वक्त्रा चतुर्भुजा॥ २४<br><br>हंसाधिरूढा कर्तव्या साक्षसूत्रकमण्डलुः।<br>महेश्वरस्य रूपेण तथा माहेश्वरी मता॥ २५<br><br>जटामुकुटसंयुक्ता वृषस्था चन्द्रशेखरा।<br>कपालशूलखट्वाङ्गवरदाढ्या चतुर्भुजा॥ २६<br><br>कुमाररूपा कौमारी मयूरवरवाहना।<br>रक्तवस्त्रधरा तद्वच्छूलशक्तिधरा मता॥ २७<br><br>हारकेयूरसम्पन्ना कृकवाकुधरा तथा।<br>वैष्णवी विष्णुसदृशी गरुडे समुपस्थिता॥ २८<br><br>चतुर्बाहुश्च वरदा शङ्खचक्रगदाधरा।<br>सिंहासनगता वापि बालकेन समन्विता॥ २९<br><br>वाराहीं च प्रवक्ष्यामि महिषोपरि संस्थिताम्।<br>वराहसदृशी देवी शिरश्चामरधारिणी॥ ३०<br><br>गदाचक्रधरा तद्वद् दानवेन्द्रविनाशिनी।<br>इन्द्राणीमिन्द्रसदृशीं वज्रशूलगदाधराम्॥ ३१<br><br>गजासनगतां देवीं लोचनैर्बहुभिर्वृताम्।<br>तप्तकाञ्चनवर्णाभां दिव्याभरणभूषिताम्॥ ३२<br><br>तीक्ष्णखड्गधरां तद्वद् वक्ष्ये योगेश्वरीमिमाम्।<br>दीर्घजिह्वामूर्ध्वकेशीमस्थिखण्डैश्च मण्डिताम्॥ ३३ | अब मैं कुबेरकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। वे दो कुण्डलोंसे अलंकृत, तोंदयुक्त, विशालकाय, आठ निधियोंसे संयुक्त, बहुतेरे गुह्यकोंसे घिरे हुए, धन व्यय करनेके लिये उद्यत करोंसे युक्त, केयूर और हारसे विभूषित, श्वेत वस्त्रधारी, वरदमुद्रा, गदा और मुकुटसे विभूषित तथा पालकीपर सवार हों। इस प्रकार उनकी प्रतिमा निर्मित करानी चाहिये। अब मैं सामर्थ्यशाली ईशानदेवकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। उनके शरीरकी कान्ति तथा नेत्र श्वेत हों। वे सामर्थ्यशाली देव तीन नेत्रोंसे युक्त तथा हाथमें त्रिशूल लिये हुए वृषभपर आरूढ़ हों। अब मैं मातृकाओंकी प्रतिमाओंका लक्षण आनुपूर्वी यथार्थरूपसे बता रहा हूँ। ब्रह्माणीकी प्रतिमाको ब्रह्माजीके समान चार मुख, चार भुजाएँ, अक्षसूत्र और कमण्डलुसे विभूषित तथा हंसपर आसीन बनानी चाहिये। इसी प्रकार भगवान् महेश्वरके अनुरूप माहेश्वरीकी प्रतिमा मानी गयी है। वे जटा-मुकुटसे अलंकृत, वृषभासीन, मस्तकपर चन्द्रमासे विभूषित, क्रमशः कपाल, शूल, खट्वाङ्ग* और वरमुद्रासे सुशोभित चार भुजाओंसे सम्पन्न हों। कौमारीकी प्रतिमा स्वामिकार्तिकेयके समान निर्मित करानी चाहिये। वे श्रेष्ठ मयूरपर सवार, लाल वस्त्रसे सुशोभित, शूल और शक्ति धारण करनेवाली, हार और केयूरसे विभूषित तथा मुर्गा लिये हुए हों। वैष्णवीकी मूर्ति विष्णुभगवान्के समान हो। वे गरुड़पर आसीन हों, उनके चार भुजाएँ हों, जिनमें क्रमशः शङ्ख, चक्र, गदा और वरद-मुद्रा हो। अथवा वे एक बालकसे युक्त सिंहासनपर बैठी हुई हों। अब मैं वाराहीकी प्रतिमाका प्रकार बतलाता हूँ। वे देवी महिषपर बैठी हुई वराहके समान रहती हैं। उनके सिरपर चामर झलता रहना चाहिये। वे हाथोंमें गदा और चक्र लिये हुए बड़े-बड़े दानवोंके विनाशके लिये संनद्ध रहती हैं। इन्द्राणीको इन्द्रके समान वज्र, शूल, गदा धारण किये हुए हाथीपर विराजमान बनाना चाहिये। वे देवी बहुत-से नेत्रोंसे युक्त, तप्त सुवर्णके समान कान्तिमती और दिव्य आभरणोंसे भूषित रहती हैं॥ २०—३२॥<br><br>अब मैं भगवती योगेश्वरी चामुण्डाकी प्रतिमाका वर्णन करता हूँ। वे तीखी तलवार, लम्बी जिह्वा, ऊपर उठे केश तथा हड्डियोंके टुकड़ोंसे विभूषित रहती हैं। |
* खट्वाङ्गका तात्पर्य उस गदासे है, जिसकी आकृति कुछ चारपाईके पायेसे मिलती-जुलती है। इसके सिरपर हड्डी जुड़ी रहती है। यह शिव-शक्तिके आयुधोंमें वर्णित है। (द्र०—वैशम्पायननीतिप्रकाशिका, विश्वामित्रधनुर्वेद आदि)
१००४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दंष्ट्राकरालवदनां कुर्याच्चैव कृशोदरीम्।<br>कपालमालिनीं देवीं मुण्डमालाविभूषिताम्॥ ३४<br>कपालं वामहस्ते तु मांसशोणितपूरितम्।<br>मस्तिष्काक्तं च बिभ्राणां शक्तिकां दक्षिणे करे॥ ३५<br>गृध्रस्था वायसस्था वा निर्मांसा विनतोदरी।<br>करालवदना तद्वत् कर्तव्या सा त्रिलोचना॥ ३६<br>चामुण्डा बद्धघण्टा वा द्वीपिचर्मधरा शुभा।<br>दिग्वासाः कालिका तद्वद् रासभस्था कपालिनी॥ ३७<br>सुरक्तपुष्पाभरणा वर्धनीध्वजसंयुता।<br>विनायकं च कुर्वीत मातृणामन्तिके सदा॥ ३८<br>वीरेश्वरश्च भगवान् वृषारूढो जटाधरः।<br>वीणाहस्तस्त्रिशूली च मातृणामग्रतो भवेत्॥ ३९ | उन्हें विकराल दाढ़ोंसे युक्त मुखवाली, दुर्बल उदरसे युक्त, कपालोंकी माला धारण किये और मुण्ड-मालाओंसे विभूषित बनाना चाहिये। उनके बायें हाथमें खोपड़ीसे युक्त एवं रक्त और मांससे पूर्ण खप्पर और दाहिने हाथमें शक्ति हो। वे गृध्र या काकपर बैठी हों। उनका शरीर मांसरहित, उदर भीतर घुसा और मुख अत्यन्त भीषण हो। उन्हें तीन नेत्रोंसे सम्पन्न घण्टा लिये हुए व्याघ्र-चर्मसे सुशोभित या निर्वस्त्र बनाना चाहिये। उसी प्रकार कालिकाको कपाल धारण किये हुए गधेपर सवार बनाना चाहिये। वे लाल पुष्पोंके आभरणोंसे विभूषित तथा झाडूकी ध्वजासे युक्त हों। इन मातृकाओंके समीप सर्वदा गणेशकी प्रतिमा भी रखनी चाहिये तथा मातृकाओंके आगे जटाधारी, हाथोंमें वीणा और त्रिशूल लिये हुए वृषभारूढ़ भगवान् वीरेश्वरको स्थापित करना चाहिये॥ ३३—३९॥ |
| श्रियं देवीं प्रवक्ष्यामि नवे वयसि संस्थिताम्।<br>सुयौवनां पीनगण्डां रक्तौष्ठीं कुञ्चितभ्रुवम्॥ ४०<br>पीनोन्नतस्तनतटां मणिकुण्डलधारिणीम्।<br>सुमण्डलं मुखं तस्याः शिरः सीमन्तभूषणम्॥ ४१<br>पद्मस्वस्तिकशङ्खैर्वा भूषितां कुन्तलालकैः।<br>कञ्चुकाबद्धगात्री च हारभूषौ पयोधरौ॥ ४२<br>नागहस्तोपमौ बाहू केयूरकटकोज्ज्वलौ।<br>पद्मं हस्ते प्रदातव्यं श्रीफलं दक्षिणे भुजे॥ ४३<br>मेखलाभरणां तद्वत् तप्तकाञ्चनसप्रभाम्।<br>नानाभरणसम्पन्नां शोभनाम्बरधारिणीम्॥ ४४<br>पार्श्वे तस्याः स्त्रियः कार्याश्चामरव्यग्रपाणयः।<br>पद्मासनोपविष्टा तु पद्मसिंहासनस्थिता॥ ४५<br>करिभ्यां स्नाप्यमानासौ भृङ्गाराभ्यामनेकशः।<br>प्रक्षालयन्तौ करिणौ भृङ्गाराभ्यां तथापरौ॥ ४६<br>स्तूयमाना च लोकेशैस्तथा गन्धर्वगुह्यकैः। | अब मैं लक्ष्मीकी प्रतिमाका प्रकार बतला रहा हूँ। वे नवीन अवस्थामें स्थित, नवयौवनसम्पन्न, उन्नत कपोलसे युक्त, लाल ओष्ठोंवाली, तिरछी भौंहोंसे युक्त तथा मणिनिर्मित कुण्डलोंसे विभूषित हों। उनका मुखमण्डल सुन्दर और सिर सिंदूरभरे माँगसे विभूषित हो। वे पद्म, स्वस्तिक और शङ्खसे तथा घुँघराले बालोंसे सुशोभित हों। उनके शरीरमें चोली बँधी हो और दोनों भुजाएँ हाथीके शुण्डादण्डकी भाँति स्थूल तथा केयूर और कङ्कणसे विभूषित हों। उनके बायें हाथमें कमल और दाहिने हाथमें श्रीफल होना चाहिये। उनकी शरीरकान्ति तपाये हुए स्वर्णके समान गौर वर्णकी हो। वे करधनीसे विभूषित, विविध आभूषणोंसे सम्पन्न तथा सुन्दर साड़ीसे सुसज्जित हों। उनके पार्श्वमें चँवर धारण करनेवाली स्त्रियोंकी प्रतिमाएँ निर्मित करनी चाहिये। वे पद्मसिंहासनपर पद्मासनसे स्थित हों। उन्हें दो हाथी शुण्डमें गडुए लिये हुए लगातार स्नान करा रहे हों तथा दो अन्य हाथी भी उनपर घटद्वारा जल छोड़ रहे हों। उस समय लोकेश्वरों, गन्धर्वों और यक्षोंद्वारा उनकी स्तुति की जा रही हो॥ ४०—४६ १/२॥ |
| तथैव यक्षिणी कार्या सिद्धासुरनिषेविता॥ ४७<br>पार्श्वयोः कलशौ तस्यास्तोरणे देवदानवाः।<br>नागाश्चैव तु कर्तव्याः खड्गखेटकधारिणः॥ ४८ | इसी प्रकार यक्षिणीकी प्रतिमा सिद्धों तथा असुरोंद्वारा सेवित बनानी चाहिये। उसके दोनों ओर दो कलश और तोरणमें देवताओं, दानवों और नागोंकी प्रतिमा रखनी चाहिये, जो खड्ग और ढाल धारण किये हुए हों। |
| * अध्याय २६२ * | १००५ |
|---|
| अधस्तात् प्रकृतिस्तेषां नाभेरुर्ध्वं तु पौरुषी ।<br>फणाश्च मूर्ध्नि कर्तव्या द्विजिह्वा बहवः समाः ॥ ४९<br>पिशाचा राक्षसाश्चैव भूतवेतालजातयः ।<br>निर्मांसाश्चैव ते सर्वे रौद्रा विकृतरूपिणः ॥ ५०<br>क्षेत्रपालश्च कर्तव्यो जटिलो विकृताननः ।<br>दिग्वासा जटिलस्तद्वच्छ्वगोमायुनिषेवितः ॥ ५१<br>कपालं वामहस्ते तु शिरः केशसमावृतम् ।<br>दक्षिणे शक्तिकां दद्यादसुरक्षयकारिणीम् ॥ ५२<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि द्विभुजं कुसुमायुधम् ।<br>पार्श्वे चाश्वमुखं तस्य मकरध्वजसंयुतम् ॥ ५३<br>दक्षिणे पुष्पबाणं च वामे पुष्पमयं धनुः ।<br>प्रीतिः स्याद् दक्षिणे तस्य भोजनोपस्करान्विता ॥ ५४<br>रतिश्च वामपार्श्वे तु शयनं सारसान्वितम् ।<br>पटश्च पटहश्चैव खरः कामातुरस्तथा ॥ ५५<br>पार्श्वतो जलवापी च वनं नन्दनमेव च ।<br>सुशोभनश्च कर्तव्यो भगवान् कुसुमायुधः ॥ ५६<br>संस्थानमीषद्वक्त्रं स्याद् विस्मयस्मितवक्त्रकम् ।<br>एतदुद्देशतः प्रोक्तं प्रतिमालक्षणं मया ।<br>विस्तरेण न शक्नोति बृहस्पतिरपि द्विजाः ॥ ५७ | नीचेकी ओर उन नागोंका प्राकृतिक शरीर और नाभिसे ऊपर मनुष्यकी आकृति रहनी चाहिये । सिरपर बराबरीसे दिखायी पड़नेवाले दो जिह्वाओंसे युक्त बहुत-से फण बनाने चाहिये । पिशाच, राक्षस, भूत और बेताल जातियोंके लोगोंको भी बनाना चाहिये, वे सभी मांसरहित, विकृत रूपवाले और भयंकर हों। क्षेत्रपालकी प्रतिमा जटाओंसे युक्त, विकृत मुखवाली, नग्न, शृगालों और कुत्तोंसे सेवित बनानी चाहिये। उसका सिर केशोंसे आच्छादित हो। उसके बायें हाथमें कपाल और दाहिने हाथमें असुर-विनाशिनी शक्ति होनी चाहिये। अब इसके बाद मैं दो भुजाओंवाले कामदेवकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी एक ओर अश्वमुख मकरध्वजकी रचना करनी चाहिये। उसके दाहिने हाथमें पुष्प-बाण और बायें हाथमें पुष्पमय धनुष होना चाहिये। उनकी दाहिनी ओर भोजनकी सामग्रियोंसे युक्त प्रीतिकी तथा बायीं ओर रतिकी प्रतिमा शय्यासन एवं सारस पक्षीसे युक्त होनी चाहिये। उनके बगलमें वस्त्र, नगाड़ा तथा कामलोलुप गधा होना चाहिये। प्रतिमाके एक बगलमें जलसे पूर्ण बावली तथा नन्दनवन हो। इस तरह ऐश्वर्यशाली कामदेवको परम सुन्दर बनाना चाहिये। प्रतिमाकी मुद्रा कुछ वक्र, कुछ विस्मययुक्त और कुछ मुसकराती हुई हो। ब्राह्मणो! मैंने संक्षेपमें यह प्रतिमाओंका लक्षण बतलाया है। इनका विस्तारपूर्वक वर्णन तो बृहस्पति भी नहीं कर सकते ॥ ४९–५७ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे देवतार्चानुकीर्तने प्रतिमालक्षणं नामैकषष्ठ्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६१ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवतार्चानुकीर्तन-प्रसङ्गमें प्रतिमा-लक्षण नामक दो सौ एकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २६१ ॥
दो सौ बासठवाँ अध्याय
पीठिकाओंके भेद, लक्षण और फल
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो ! अब मैं आपलोगोंको |
|---|---|
| पीठिकालक्षणं वक्ष्ये यथावदनुपूर्वशः ।<br>पीठोच्छ्रायं यथावच्च भागान् षोडश कारयेत् ॥ १<br>भूमावेकः प्रविष्टः स्याच्चतुर्भिर्जगती मता ।<br>वृत्तो भागस्तथैकः स्याद् वृतः पटलमागतः ॥ २ | पीठिकाओंके लक्षणोंको आनुपूर्वी यथार्थरूपसे बतला रहा हूँ। पीठिकाकी ऊँचाईको सोलह भागोंमें विभक्त करे। उनमें बीचका एक भाग पृथ्वीमें प्रविष्ट रहेगा। ऊपरके शेष चार भाग 'जगती' माने जाते हैं। उनसे ऊपरका एक भाग पटल भागसे घिरा हुआ 'वृत्त' कहलाता है। |
| १००६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भागैस्त्रिभिस्तथा कण्ठः कण्ठपट्टस्तु भागतः।<br>भागाभ्यामूर्ध्वपट्टश्च शेषभागेन पट्टिका॥ ३<br>प्रविष्टं भागमेकैकं जगतीं यावदेव तु।<br>निर्गमस्तु पुनस्तस्य यावद् वै शेषपट्टिका॥ ४<br>वारिनिर्गमनार्थं तु तत्र कार्यः प्रणालकः।<br>पीठिकानां तु सर्वासामेतत्सामान्यलक्षणम्॥ ५<br>विशेषान् देवताभेदाच्छृणुध्वं द्विजसत्तमाः।<br>स्थण्डिला वाथ वापी वा यक्षी वेदी च मण्डला॥ ६<br>पूर्णचन्द्रा च वज्रा च पद्मा वार्धशशी तथा।<br>त्रिकोणा दशमी तासां संस्थानं वा निबोधत॥ ७<br>स्थण्डिला चतुरस्त्रा तु वर्जिता मेखलादिभिः।<br>वापी द्विमेखला ज्ञेया यक्षी चैव त्रिमेखला॥ ८<br>चतुरस्रायता वेदी न तां लिङ्गेषु योजयेत्।<br>मण्डला वर्तुला या तु मेखलाभिर्गणप्रिया॥ ९<br>रक्ता द्विमेखला मध्ये पूर्णचन्द्रा तु सा भवेत्।<br>मेखलात्रयसंयुक्ता षडस्रा वज्रिका भवेत्॥ १० | उसके ऊपर तीन भागोंसे कण्ठ, एक भागसे कण्ठपट्ट, दो भागोंसे ऊर्ध्वपट्ट तथा शेष भागोंसे पट्टिका बनायी जाती है। एक-एक भाग जगतीपर्यन्त एक-दूसरेमें प्रविष्ट रहते हैं। फिर शेषपट्टिका-पर्यन्त सबका निर्गम होता है। पट्टिकामें जल निकलनेके लिये (सोमसूत्रसे मिली) नाली बनानी चाहिये। यह सभी पीठिकाओंका सामान्य लक्षण है। ऋषिगण! अब देवताओंके भेदसे पीठिकाओंके विशेष लक्षण सुनिये। स्थण्डिला, वापी, यक्षी, वेदी, मण्डला, पूर्णचन्द्रा, वज्रा, पद्मा, अर्धशशी तथा दसवीं त्रिकोणा—ये पीठिकाओंके भेद हैं। अब इनकी स्थिति सुनिये। स्थण्डिला-पीठिका चौकोर होती है, इसमें मेखला आदि कुछ नहीं होती। वापीको दो मेखलाओंसे तथा यक्षीको तीन मेखलाओंसे युक्त जानना चाहिये। चार पहलवाली आयताकार पीठिका वेदी कही जाती है, उसे लिङ्गकी स्थापनामें प्रयुक्त नहीं करना चाहिये।<br>मण्डला मेखलाओंसे युक्त गोलाकार होती है, वह प्रमथगणोंको प्रिय होती है। जो पीठिका लाल वर्णवाली तथा मध्यमें दो मेखलाओंसे युक्त होती है, उसे पूर्णचन्द्रा कहते हैं। तीन मेखलाओंसे युक्त छः कोनेवाली पीठिकाको वज्रा कहते हैं॥ १—१०॥ |
| षोडशास्रा भवेत् पद्मा किंचिद्ध्रस्वा तु मूलतः।<br>तथैव धनुषाकारा सार्धचन्द्रा प्रशस्यते॥ ११<br>त्रिशूलसदृशी तद्वत् त्रिकोणा ह्यूर्ध्वतो मता।<br>प्रागुदक्प्रवणा तद्वत् प्रशस्ता लक्षणान्विता॥ १२<br>परिवेषं त्रिभागेन निर्गमं तत्र कारयेत्।<br>विस्तारं तत्प्रमाणं च मूले चाग्रे तथोर्ध्वतः॥ १३<br>जलमार्गश्च कर्तव्यस्त्रिभागेन सुशोभनः।<br>लिङ्गस्यार्धविभागेन स्थौल्येन समधिष्ठिता॥ १४<br>मेखला तत्रिभागेन खातं चैव प्रमाणतः।<br>अथवा पादहीनं तु शोभनं कारयेत् सदा॥ १५<br>उत्तरस्थं प्रणालं च प्रमाणादधिकं भवेत्।<br>स्थण्डिलायामथारोग्यं धनं धान्यं च पुष्कलम्॥ १६<br>गोप्रदा च भवेद् यक्षी वेदी सम्पत्प्रदा भवेत्।<br>मण्डलायां भवेत् कीर्तिवरदा पूर्णचन्द्रिका॥ १७ | मूल भागमें कुछ छोटी (पद्मपत्र-सी) सोलह पहलोंवाली पीठिका पद्मा कही जाती है। उसी प्रकार धनुषके आकारवाली पीठिकाको अर्धचन्द्रा कहते हैं। ऊपरसे त्रिशूलके समान दिखायी पड़नेवाली, पूर्व तथा उत्तरकी ओर कुछ ढालू एवं श्रेष्ठ लक्षणोंसे युक्त पीठिकाको त्रिकोणा कहते हैं। पीठिकाके तीन भाग परिधिके बाहर रहें और मूल, अग्रभाग तथा ऊपर—इन तीनों भागोंके विस्तार अधिक हों। त्रिभागमें जल निकलनेकी सुन्दर नाली (सोमसूत्र) होनी चाहिये। पीठिका लिङ्गके आधे भागकी मोटाईके परिमाणसे बनानी चाहिये। लिङ्गके तीन भागके बराबर मेखलाका खात बनाना चाहिये। अथवा वह चौथाई भागसे कम रहे, किंतु सर्वदा सुन्दर बनाना चाहिये। उत्तरकी ओर स्थित नाली प्रमाणसे कुछ अधिक ही बनानी चाहिये। स्थण्डिला-पीठिकाके स्थापित करनेसे आरोग्य तथा विपुल धन-धान्यादिकी प्राप्ति होती है। यक्षी गौ देनेवाली तथा वेदी सम्पत्तिदायिनी कही गयी है। मण्डलामें कीर्ति प्राप्त होती है और पूर्णचन्द्रिका वरदान देनेवाली कही गयी है। |
| * अध्याय २६३ * | १००७ |
|---|
| आयुष्प्रदा भवेद् वज्रा पद्मा सौभाग्यदा भवेत्।<br>पुत्रप्रदार्थचन्द्रा स्यात् त्रिकोणा शत्रुनाशिनी ॥ १८<br>देवस्य यजनार्थं तु पीठिका दश कीर्तिताः।<br>शैले शैलमयीं दद्यात् पार्थिवे पार्थिवीं तथा ॥ १९<br>दारुजे दारुजां कुर्यान्मिश्रे मिश्रां तथैव च।<br>नान्ययोनिस्तु कर्तव्या सदा शुभफलेप्सुभिः ॥ २०<br>अर्चायामासमं दैर्घ्यं लिङ्गायामसमं तथा।<br>यस्य देवस्य या पत्नी तां पीठे परिकल्पयेत्।<br>एतत् सर्वं समाख्यातं समासात् पीठलक्षणम् ॥ २१ | वज्रा दीर्घायु प्रदान करनेवाली तथा पद्मा सौभाग्यदायिनी कही गयी है। अर्धचन्द्रा पुत्र प्रदान करनेवाली तथा त्रिकोणा शत्रुनाशिनी होती है। इस प्रकार देवताकी पूजाके लिये ये दस पीठिकाएँ कही गयी हैं। पत्थरकी प्रतिमामें पत्थरकी तथा मिट्टीकी मूर्तिमें मिट्टीकी पीठिका देनी चाहिये। इसी प्रकार काष्ठकी मूर्तिमें काष्ठकी तथा मिश्रित धातुओंकी प्रतिमामें धातुमिश्रितकी पीठिका रखनी चाहिये। शुभ फलकी कामना करनेवालोंको दूसरे प्रकारकी पीठिका कभी नहीं देनी चाहिये। पीठिकाकी लम्बाई मूर्तिमें तथा लिङ्गमें बराबर नहीं रखी जाती। जिस देवताकी जो पत्नी हो, उसे उसी पीठपर स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार यह मैंने आपलोगोंको संक्षेपमें पीठिकाका लक्षण बतलाया है॥ ११—२१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवतार्चानुकीर्तने पीठिकानुकीर्तनं नाम द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवतार्चानुकीर्तन-प्रसङ्गमें पीठिका-वर्णन नामक दो सौ बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६२॥
दो सौ तिरसठवाँ अध्याय
शिवलिङ्गके निर्माणकी विधि
| सूत उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि लिङ्गलक्षणमुत्तमम्।<br>सुस्निग्धं च सुवर्णं च लिङ्गं कुर्याद् विचक्षणः॥ १<br>प्रासादस्य प्रमाणेन लिङ्गमानं विधीयते।<br>लिङ्गमानेन वा विद्यात् प्रासादं शुभलक्षणम् ॥ २<br>चतुरस्रे समे गर्ते ब्रह्मसूत्रं निपातयेत्।<br>वामेन ब्रह्मसूत्रस्य अर्चा वा लिङ्गमेव च॥ ३<br>प्रागुत्तरेण लीनं तु दक्षिणापरमाश्रितम्।<br>पुरस्यापरदिग्भागे पूर्वद्वारं प्रकल्पयेत्॥ ४<br>पूर्वेण चापरं द्वारं माहेन्द्रं दक्षिणोत्तरम्।<br>द्वारं विभज्य पूर्वं तु एकविंशतिभागिकम्॥ ५<br>ततो मध्यगतं ज्ञात्वा ब्रह्मसूत्रं प्रकल्पयेत्।<br>तस्यार्धं तु त्रिधा कृत्वा भागं चोत्तरतस्त्यजेत्॥ ६<br>एवं दक्षिणतस्त्यक्त्वा ब्रह्मस्थानं प्रकल्पयेत्।<br>भागार्धेन तु यल्लिङ्गं कार्यं तदिह शस्यते॥ ७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं लिङ्गके उत्तम लक्षणका वर्णन कर रहा हूँ। चतुर पुरुष अत्यन्त चिकने एवं श्रेष्ठ (श्वेत) रंगके शिवलिङ्गका निर्माण करे। मन्दिरके प्रमाणके अनुसार ही शिवलिङ्गका प्रमाण बतलाया गया है। अथवा शिवलिङ्गके प्रमाणानुसार शिव-मन्दिरका निर्माण शुभ जानना चाहिये। सर्वप्रथम चौकोर एवं समतल गर्तमें ब्रह्मसूत्र गिराना चाहिये। ब्रह्मसूत्रकी बायीं ओर अर्चा या लिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। वहाँ पूर्वोत्तर या दक्षिणपूर्वकी ओर पूर्वद्वार बनाना चाहिये। वह द्वार कुछ दक्षिणाश्रित या ईशानमें लीन रहना चाहिये। पूर्वका यह द्वार माहेन्द्रद्वार कहलाता है। प्रथमतः पूर्वद्वारको इक्कीस भागोंमें विभक्तकर मध्य भागमें ब्रह्मसूत्रकी कल्पना करनी चाहिये। इसके अर्धभागको तीन भागोंमें विभक्तकर उत्तरकी ओर तथा दक्षिणकी ओर एक-एक भाग छोड़कर ब्रह्मस्थानकी कल्पना करनी चाहिये। उस अर्धभागमें लिङ्गकी स्थापना प्रशस्त मानी गयी है। |
१००८ * मत्स्यपुराण *
| पञ्चभागविभक्तेषु त्रिभागो ज्येष्ठ उच्यते।<br>भाजिते नवधा गर्भे मध्यमं पाञ्चभागिकम्॥ ८ | उसे पाँच भागोंमें विभक्त कर उनमें तीन भागोंको ज्येष्ठ कहा जाता है। भीतरी मानको नौ भागोंमें विभक्त कर उसके पञ्चम भागको मध्यम कहते हैं। |
| एकस्मिन्नेव नवधा गर्भे लिङ्गानि कारयेत्।<br>समसूत्रं विभज्याथ नवधा गर्भभाजितम्॥ ९ | गर्भके एक ही भागको नौ भागमें विभक्तकर उनमें लिङ्गोंको स्थापित करे। इसी समसूत्रवाले गर्भ-भागको नौ भागमें विभक्त करे। |
| ज्येष्ठमर्धं कनीयोऽर्धं तथा मध्यममध्यमम्।<br>एवं गर्भः समाख्यातस्त्रिभिर्भागैर्विभाजयेत्॥ १० | उनमें आधा ज्येष्ठ, आधा कनिष्ठ और मध्यभाग मध्यम कहलाता है। इस प्रकार गर्भको तीन भागोंमें विभक्त करना चाहिये। |
| ज्येष्ठं तु त्रिविधं ज्ञेयं मध्यमं त्रिविधं तथा।<br>कनीयस्त्रिविधं तद्वल्लिङ्गभेदा नवैव तु॥ ११ | फिर उनमें तीन ज्येष्ठ, तीन मध्यम और तीन कनिष्ठ भेद होते हैं, जिससे लिङ्गोंके कुल नौ भेद होते हैं*॥ १-११॥ |
| नाभ्यर्धमष्टभागेन विभज्याथ समं बुधैः।<br>भागत्रयं परित्यज्य विष्कम्भं चतुरस्रकम्॥ १२ | बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि नाभिके आधे भागके बराबर आठ भाग करे, फिर उनमें तीन भागोंको छोड़कर चौकोर विष्कम्भ बनाये। |
| अष्टास्रं मध्यमं ज्ञेयं भागं लिङ्गस्य वै ध्रुवम्।<br>विकीर्णे चेत् ततो गृह्य कोणाभ्यां लाञ्छयेद् बुधः॥ १३ | लिङ्गके मध्यभागमें आठ कोण रहना चाहिये। तदनन्तर बुद्धिमानोंको बचे हुए भागको दो कोणोंसे लाञ्छित करना चाहिये। |
| अष्टास्रं कारयेत् तद्वदूर्ध्वमप्येवमेव तु।<br>षोडशास्त्रीकृतं पश्चाद् वर्तुलं कारयेत् ततः॥ १४ | उसी प्रकार ऊपरका भाग भी आठ कोणोंवाला बनाये। सोलह कोणोंवाले भागको गोलाकारमें परिणत कर दे। |
* श्रीविद्यार्णवतन्त्रके ११वें श्वासमें लिङ्ग-निर्माणकी साधारण विधि इस प्रकार दी गयी है—
अपनी रुचिके अनुसार लिङ्ग कल्पित करके उसके मस्तकका विस्तार उतना ही रखे, जितनी पूजित लिङ्गभागकी ऊँचाई हो। शैवागमका भी वचन है—'लिङ्गमस्तकविस्तारो लिङ्गोच्छ्रायसमो भवेत्।' लिङ्गके मस्तकका विस्तार जितना हो, उससे तिगुने सूत्रसे वेष्टित होने योग्य लिङ्गकी स्थूलता (मोटाई) रखे। शिवलिङ्गकी जो स्थूलता या मोटाई है, उसके सूत्रके बराबर पीठका विस्तार रखे। तत्पश्चात् पूज्य लिङ्गका जो उच्च अंश है, उससे दुगुनी ऊँचाईसे युक्त वृत्ताकार या चतुरस्र पीठ बनावे। पीठके मध्यभागमें लिङ्गके स्थूलतामात्रसूचक नाहसूत्रसे द्विगुण सूत्रसे वेष्टित होने योग्य स्थूल कण्ठका निर्माण करे। कण्ठके ऊपर और नीचे समभागसे तीन या दो मेखलाओंकी रचना करे। तदनन्तर लिङ्गके मस्तकका जो विस्तार है, उसको छः भागोंमें विभक्त करे। उनमेंसे एक अंशके मानके अनुसार पीठके ऊपरी भागमें सबसे बाहरी अंशके द्वारा मेखला बनावे। उसके भीतर उसी मानके अनुसार उससे संलग्न अंशके द्वारा खात (गर्त)-की रचना करे। पीठसे बाह्यभागमें लिङ्गके समान ही बड़ी अथवा पीठमानके आधे मानके बराबर बड़ी, मूलदेशमें मानके समान विस्तारवाली और अग्रभागमें उसके आधे मानके तुल्य विस्तारवाली नाली बनावे। इसीको 'प्रणाल' कहते हैं। प्रणालके मध्यमें मूलसे अग्रभागपर्यन्त जलमार्ग बनावे। प्रणालका जो विस्तार है, उसके एक तिहाई विस्तारवाले खातरूप जलमार्गसे युक्त पीठसदृश मेखलायुक्त प्रणाल बनाना चाहिये। यह स्फटिक आदि रत्नविशेषों अथवा पाषाण आदिके द्वारा शिवलिङ्ग-निर्माणकी साधारण विधि है। तथा—
लिङ्गमस्तकविस्तारं पूज्यभागसमं नयेत्। ...............लक्षणमाचरेत्॥ (१-८)
'समराङ्गणसूत्रधार' में कहा है कि दो-दो अंशकी वृद्धि करते हुए तीन हाथकी लंबाईतक पहुँचते-पहुँचते नौ लिङ्ग निर्मित हो सकते हैं—'द्व्यंशवृद्ध्या नवैवं स्युराहत्तत्रितयावधेः।' सूर्यप्रोक्त 'अंशुमद्भेदागम' तथा अग्निपुराण अध्याय ५४के २८वें श्लोकमें एवं विश्वकर्माके 'शिल्पप्रकाश' ग्रन्थमें लिङ्ग-भेदोंकी परिगणना की गयी है और सब मिलाकर चौदह हजार चौदह सौ भेद कहे गये हैं। विश्वकर्माके ही एक-दूसरे शास्त्र 'अपराजित-पृच्छा' के अवलोकनसे इन भेदोंपर विशेष प्रकाश पड़ता है। उसके अनुसार समस्त लिङ्गभेद १४४२० होते हैं। इसका प्रकार बताया जाता है—प्रस्तरमय लिङ्ग कम-से-कम एक हाथका होता है, उससे कम नहीं। उसका अन्तिम आयाम नौ हाथका बताया गया है। इस प्रकार एक हाथसे लेकर नौ हाथतकके बनाये जायें तो उनकी संख्या नौ होती है। इनका प्रस्तार यों समझना चाहिये—
एक हाथसे तीन हाथतकके शिवलिङ्ग 'कनिष्ठ' कहे गये हैं। चारसे छः हाथतकके 'मध्यम' माने गये हैं और सातसे नौ हाथतकके 'उत्तम' या 'ज्येष्ठ' कहे गये हैं। इन तीनोंके प्रमाणमें पादवृद्धि करनेसे कुल ३३ शिवलिङ्ग होते हैं। यथा—
एक हाथ^१, सवा हाथ^२, डेढ़ हाथ^३, पौने दो हाथ^४, दो हाथ^५, सवा दो हाथ^६, ढाई हाथ^७, पौने तीन हाथ^८, तीन हाथ^९, सवा तीन
| * अध्याय २६३ * | १००९ |
|---|
| आयामं तस्य देवस्य नाभ्यां वै कुण्डलीकृतम्।<br>माहेश्वरं त्रिभागं तु ऊर्ध्ववृत्तं त्ववस्थितम्॥ १५<br>अधस्ताद् ब्रह्मभागस्तु चतुरस्रो विधीयते।<br>अष्टाग्रो वैष्णवो भागो मध्यस्तस्य उदाहृतः॥ १६<br>एवं प्रमाणसंयुक्तं लिङ्गं वृद्धिप्रदं भवेत्।<br>तथान्यदपि वक्ष्यामि गर्भमानं प्रमाणतः॥ १७<br>गर्भमानप्रमाणेण यल्लिङ्गमुचितं भवेत्।<br>चतुर्धा तद् विभज्याथ विष्कम्भं तु प्रकल्पयेत्॥ १८<br>देवतायतनं सूत्रं भागत्रयविकल्पितम्।<br>अधस्ताच्चतुरस्रं तु अष्टास्रं मध्यभागतः॥ १९<br>पूज्यभागस्ततोऽर्धं तु नाभिभागस्तथोच्यते।<br>आयामे यद् भवेत् सूत्रं नाहस्य चतुरस्रके॥ २०<br>चतुरस्रं परित्यज्य अष्टास्रस्य तु यद् भवेत्।<br>तस्याप्यर्धं परित्यज्य ततो वृत्तं तु कारयेत्॥ २१<br>शिरः प्रदक्षिणं तस्य संक्षिप्तं मूलतो न्यसेत्।<br>भ्रष्टपूजं भवेल्लिङ्गमधस्ताद् विपुलं च यत्॥ २२ | उस देवताकी नाभिमें लम्बाई कुण्डलीकृत माहेश्वर भागका होगी। लिङ्गमें भाग ऊर्ध्व-वृत्तरूपसे स्थित त्रिभाग होगा। उसके नीचे ब्रह्मभाग होगा, जो चौकोर बनाया जाता है। मध्यभाग, जो आठ कोणोंवाला होता है, वैष्णवभाग कहा जाता है। इन प्रमाणोंसे निर्मित लिङ्ग समृद्धि देनेवाला होता है। अब गर्भमानके प्रमाणसे बननेवाले लिङ्गका वर्णन कर रहा हूँ। जो लिङ्ग गर्भमानके प्रमाणसे निर्मित होता है, वह उचित होता है। उसे चार भागोंमें विभक्तकर विष्कम्भकी कल्पना करे। देवतायतनको सूत्रद्वारा नापकर उसे तीन भागोंमें विभक्त करे। जिसमें नीचेका भाग चार कोणवाला और मध्यभाग आठ कोणवाला हो। इसके ऊपर पूज्यभाग और नाभिभाग कहा जाता है। लम्बाईका विस्तार चौकोर प्रमाणका होना चाहिये। उस चौकोर भागको छोड़कर आठ कोणवाला जो भाग हो, उसके आधे भागको छोड़कर वृत्ताकार बनाना चाहिये॥ १२–२१॥<br><br>उसके मङ्गलमय सिरको मूलदेशसे बिलकुल सीधे रूपमें स्थापित करे। जिस लिङ्गके नीचेका भाग बहुत |
हाथ^१०, साढ़े तीन हाथ^११, पौने चार हाथ^१२, चार हाथ^१३, सवा चार हाथ^१४, साढ़े चार हाथ^१५, पौने पाँच हाथ^१६, पाँच हाथ^१७, सवा पाँच हाथ^१८, साढ़े पाँच हाथ^१९, पौने छः हाथ^२०, छः हाथ^२१, सवा छः हाथ^२२, साढ़े छः हाथ^२३, पौने सात हाथ^२४, सात हाथ^२५, सवा सात हाथ^२६, साढ़े सात हाथ^२७, पौने आठ हाथ^२८, आठ हाथ^२९, सवा आठ हाथ^३०, साढ़े आठ हाथ^३१, पौने नौ हाथ^३२, नौ हाथ^३३।
इन तैंतीसोंके नाम विश्वकर्माने क्रमशः इस प्रकार बताये हैं—१. भव, २. भवोद्भव, ३. भाव, ४. संसारभयनाशन, ५. पाशयुक्त, ६. महातेज, ७. महादेव, ८. परात्पर, ९. ईश्वर, १०. शेखर, ११. शिव, १२. शान्त, १३. मनोह्लादक, १४. रुद्रतेज, १५. सदात्मक (सद्योजात), १६. वामदेव, १७. अघोर, १८. तत्पुरुष, १९. ईशान, २०. मृत्युंजय, २१. विजय, २२. किरणाक्ष, २३. अघोरास्त्र, २४. श्रीकण्ठ, २५. पुण्यवर्धन, २६. पुण्डरीक, २७. सुवक्त्र, २८. उमातेजः, २९. विश्वेश्वर, ३०. त्रिनेत्र, ३१. त्र्यम्बक, ३२. घोर, ३३. महाकाल।
| पूर्वोक्त क्रमसे पादार्धवृद्धि करनेपर | ६५ | तक संख्या पहुँचेगी। |
|---|---|---|
| '' '' दो अङ्गुल वृद्धि करनेपर | ९७ | '' '' '' |
| '' '' एक '' '' '' | १९३ | '' '' '' |
| '' '' अर्द्धाङ्गुल '' '' | ३८५ | '' '' '' |
| '' '' अङ्गुलका चतुर्थांश बढ़ानेपर | ७६९ | '' '' '' |
| '' '' एक-एक मूँगके मानकी वृद्धि करनेपर | १४४२ | '' '' '' |
| '' '' मुद्ग-प्रमाण लिङ्गोंमें प्रत्येकके दस भेद करनेपर | १४४२० | पहुँचेगी। |
'देवमूर्तिप्रकरणम्' नामक ग्रन्थके छठे अध्यायमें शिवजीकी चौबीस मूर्तियाँ बतायी गयी हैं। उनके लिङ्ग धातु, रत्न, काष्ठ और शिलाके बनाये जाते हैं। इनमें नागरलिङ्ग, द्राविड़लिङ्ग, वेसरलिङ्ग, स्फाटिकलिङ्ग तथा बाणलिङ्गका विशेष महत्त्व है। वहाँ इन लिङ्गोंके पृथक्-पृथक् नाम और निर्माणकी विधि दी गयी है। साथ ही प्रासाद, पीठिका और प्रणाल आदिका विशेषरूपसे निरूपण किया गया है। इस विषयपर सर्वाधिक विस्तार 'अंशुमद्भेदागम' (काश्यपशिल्प) तथा 'वीरमित्रोदय लक्षणप्रकाश' में है। विशेष जानकारीके लिये उन्हीं प्रकरणोंको देखना चाहिये।
१०१० | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शिरसा च सदा निम्नं मनोज्ञं लक्षणान्वितम्।<br>सौम्यं तु दृश्यते यत्तु लिङ्गं तद् वृद्धिदं भवेत्॥ २३<br><br>अथ मूले च मध्ये तु प्रमाणे सर्वतः समम्।<br>एवंविधं तु यल्लिङ्गं भवेत् तत् सार्वकामिकम्॥ २४<br><br>अन्यथा यद् भवेल्लिङ्गं तदसत् सम्प्रचक्षते।<br>एवं रत्नमयं कुर्यात् स्फाटिकं पार्थिवं तथा।<br>शुभं दारुमयं चापि यद् वा मनसि रोचते॥ २५ | चौड़ा होता है, वह पूजनीय नहीं रह जाता। जो लिङ्ग सिरकी ओरसे सदा निम्न, मनोहर, उत्तम लक्षणोंसे युक्त तथा सौम्य दिखायी पड़ता है, वह समृद्धिको देनेवाला होता है। जो लिङ्ग मूल तथा मध्यभागमें एक समान रहता है, वह सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला होता है। जो लिङ्ग इन उपर्युक्त लक्षणोंसे भिन्न होते हैं, वे असत् कहे जाते हैं अर्थात् वे अपूज्यनीय लिङ्ग हैं। इस प्रकार ऊपर बताये गये प्रमाणोंके अनुसार रत्न, स्फटिक, मिट्टी अथवा शुभ काष्ठका लिङ्ग अपनी रुचिके अनुकूल स्थापित करना चाहिये॥ २२—२५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवतार्चानुकीर्तनं नाम त्रिषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवतार्चानुकीर्तन नामक दो सौ तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६३॥
दो सौ चौंसठवाँ अध्याय
प्रतिमा-प्रतिष्ठाके प्रसङ्गमें यज्ञाङ्गरूप कुण्डादिके निर्माणकी विधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>देवतानामथैतासां प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम्।<br>वद सूत यथान्यायं सर्वेषामप्यशेषतः॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! अब आप इन सभी देवताओंकी प्रतिमाके स्थापनकी उत्तम विधि यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक बतलाइये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम्।<br>कुण्डमण्डपवेदीनां प्रमाणं च यथाक्रमम्॥ २ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अब मैं क्रमशः देवप्रतिमाकी प्रतिष्ठाकी उत्तम विधि तथा मण्डप, कुण्ड और वेदीके प्रमाणको बतला रहा हूँ। |
| चैत्रे वा फाल्गुने वापि ज्येष्ठे वा माधवे तथा।<br>माघे वा सर्वदेवानां प्रतिष्ठा शुभदा भवेत्॥ ३ | फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ अथवा माघमासमें सभी देवताओंकी प्रतिष्ठा शुभदायिनी होती है। |
| प्राप्य पक्षं शुभं शुक्लमतीते दक्षिणायने।<br>पञ्चमी च द्वितीया च तृतीया सप्तमी तथा॥ ४<br>दशमी पौर्णमासी च तथा श्रेष्ठा त्रयोदशी।<br>आसु प्रतिष्ठा विधिवत् कृता बहुफला भवेत्॥ ५ | दक्षिणायन बीत जानेपर अर्थात् उत्तरायणमें शुभकारी शुक्लपक्षमें द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी, पूर्णमासी तिथियोंमें विधिपूर्वक की गयी प्रतिष्ठा बहुत फल देनेवाली होती है। |
| आषाढे द्वे तथा मूलमुत्तराद्वयमेव च।<br>ज्येष्ठाश्रवणरोहिण्यः पूर्वाभाद्रपदा तथा॥ ६<br>हस्ताश्विनी रेवती च पुष्यो मृगशिरास्तथा।<br>अनुराधा तथा स्वाती प्रतिष्ठादिषु शस्यते॥ ७ | पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, मूल, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद, ज्येष्ठा, श्रवण, रोहिणी, पूर्वाभाद्रपद, हस्त, अश्विनी, रेवती, पुष्य, मृगशिरा, अनुराधा तथा स्वाती—ये नक्षत्र प्रतिष्ठा आदिमें प्रशस्त माने गये हैं। |
| बुधो बृहस्पतिः शुक्रस्त्रयोऽप्येते शुभग्रहाः।<br>एभिर्निरीक्षितं लग्नं नक्षत्रं च प्रशस्यते॥ ८ | बुध, बृहस्पति तथा शुक्र—ये तीनों ग्रह शुभकारक हैं। इन तीनों ग्रहोंसे दृष्ट (एवं युक्त) लग्न तथा नक्षत्र |
- अध्याय २६४ *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ग्रहताराबलं लब्ध्वा ग्रहपूजां विधाय च।<br>निमित्तं शकुनं लब्ध्वा वर्जयित्वाऽद्भुतादिकम्॥ ९<br><br>शुभयोगे शुभस्थाने क्रूरग्रहविवर्जिते।<br>लग्ने ऋक्षे प्रकुर्वीत प्रतिष्ठादिकमुत्तमम्॥ १० | प्रशंसनीय हैं। ग्रह और ताराका बल प्राप्तकर तथा उनकी पूजाकर शुभ शकुनको देखकर, अद्भुत आदि बुरे योगोंको छोड़कर शुभयोगमें शुभस्थानपर क्रूर ग्रहोंसे रहित शुभ लग्न एवं शुभ नक्षत्रमें प्रतिष्ठा आदि उत्तम कार्योंको करना चाहिये॥ २—१०॥ |
| अयने विषुवे तद्वत् षडशीतिमुखे तथा।<br>एतेषु स्थापनं कार्यं विधिदृष्टेन कर्मणा॥ ११<br><br>प्राजापत्ये तु शयनं श्वेते तूत्थापनं तथा।<br>मुहूर्त्ते स्थापनं कुर्यात् पुनर्ब्राह्मे विचक्षणः॥ १२<br><br>प्रासादस्योत्तरे वापि पूर्वे वा मण्डपो भवेत्।<br>हस्तान् षोडश कुर्वीत दश द्वादश वा पुनः॥ १३<br><br>मध्ये वेदिकया युक्तः परिक्षिप्तः समंततः।<br>पञ्च सप्तापि चतुरः करान् कुर्वीत वेदिकाम्॥ १४<br><br>चतुर्भिस्तोरणैर्युक्तो मण्डपः स्याच्चतुर्मुखः।<br>प्लक्षद्वारं भवेत् पूर्वं याम्ये चौदुम्बरं भवेत्॥ १५<br><br>पश्चादश्वत्थघटितं नैग्रोधं तथोत्तरे।<br>भूमौ हस्तप्रविष्टानि चतुर्हस्तानि चोच्छ्रये॥ १६<br><br>सूपलिप्तं तथा श्लक्ष्णं भूतलं स्यात् सुशोभनम्।<br>वस्त्रैर्नानाविधैस्तद्वत् पुष्पपल्लवशोभितम्॥ १७<br><br>कृत्वैवं मण्डपं पूर्वं चतुर्द्वारेषु विन्यसेत्।<br>अव्रणान् कलशानष्टौ ज्वलत्काञ्चनगर्भितान्॥ १८<br><br>चूतपल्लवसंछन्नान् सितवस्त्रयुगान्वितान्।<br>सर्वौषधिफलोपेतांश्चन्दनोदकपूरितान् ॥ १९<br><br>एवं निवेश्य तद्गर्भे गन्धधूपार्चनादिभिः।<br>ध्वजादिरोहणं कार्यं मण्डपस्य समन्ततः॥ २० | अयन (कर्क-मकर), विषुव (तुला-मेष) और षडशीतिमुख (कन्या, मिथुन, धनुर्मीन) संक्रान्तियोंमें विधिपूर्वक अनुष्ठानद्वारा देवस्थापन करना चाहिये। चतुर मनुष्यको चाहिये कि वह प्राजापत्य मुहूर्तमें शयन, श्वेतमें उत्थापन तथा ब्राह्ममें स्थापन करे। अपने महलकी पूर्व अथवा उत्तर दिशामें मण्डप बनवाना चाहिये। उसे सोलह, बारह अथवा दस हाथका बनाना चाहिये। उसके मध्यभागमें वेदी होनी चाहिये, जो चारों ओरसे समान तथा पाँच, सात या चार हाथ विस्तृत हो। चतुर्मुख मण्डपके चारों ओर चार तोरण बने हों। पूर्व दिशामें पाकड़का, दक्षिणमें गूलरका, पश्चिममें पीपलका तथा उत्तरमें बरगदका द्वार होना चाहिये, जो भूमिमें एक हाथ प्रविष्ट हों तथा भूमिसे ऊपर चार हाथ ऊँचे हों। उसका भूतल भलीभाँति लिपा हुआ, चिकना तथा सुन्दर होना चाहिये। इसी प्रकार विविध वस्त्र, पुष्प और पल्लवोंसे सुशोभित करना चाहिये। इस प्रकार मण्डपका निर्माण कर पहले चारों द्वारोंपर छिद्ररहित आठ कलशोंकी स्थापना करनी चाहिये, जो देदीप्यमान सुवर्णकी भाँति कान्तियुक्त, आमके पल्लवोंसे आच्छादित, दो श्वेत वस्त्रोंसे युक्त, सभी ओषधियों एवं फलोंसे सम्पन्न तथा चन्दनमिश्रित जलसे परिपूर्ण हों। इस प्रकार उन कलशोंको स्थापित कर गन्ध, धूप आदि पूजन-सामग्रियोंद्वारा उनके भीतर पूजन करे। फिर मण्डपके चारों ओर ध्वजा आदिकी स्थापना करनी चाहिये॥ ११—२०॥ |
| ध्वजांश्च लोकपालानां सर्वदिक्षु निवेशयेत्।<br>पताका जलदाकारा मध्ये स्यान्मण्डपस्य तु॥ २१<br><br>गन्धधूपादिकं कुर्यात् स्वैः स्वैर्मन्त्रैरनुक्रमात्।<br>बलिं च लोकपालेभ्यः स्वमन्त्रेण निवेदयेत्॥ २२<br><br>ऊर्ध्वं तु ब्रह्मणे देयं त्वधस्ताच्छेषवासुकेः।<br>संहितायां तु ये मन्त्रास्तद्दैवत्याः शुभाः स्मृताः॥ २३ | लोकपालोंकी पताका सभी दिशाओंमें स्थापित करे। मण्डपके मध्यभागमें बादलके रंगकी अथवा बहुत ऊँची पताका स्थापित करनी चाहिये। फिर क्रमशः लोकपालोंके पृथक्-पृथक् मन्त्रोंद्वारा गन्ध-धूपादिसे उनकी पूजा करे तथा उन्हींके मन्त्रोंद्वारा उन्हें बलि प्रदान करे। ब्रह्माजीके लिये ऊपर तथा शेष वासुकिके लिये नीचे पूजाका विधान कहा गया है। संहितामें जो मन्त्र जिस देवताके लिये आये हैं, उसीके लिये प्रयुक्त होनेपर मङ्गलकारी माने गये हैं। |
१०१२ * मत्स्यपुराण *
| तैः पूजा लोकपालानां कर्तव्या च समन्ततः।<br>त्रिरात्रमेकरात्रं वा पञ्चरात्रमथापि वा॥ २४<br>अथवा सप्तरात्रं तु कार्यं स्यादधिवासनम्।<br>एवं सतोरणं कृत्वा अधिवासनमुत्तमम्॥ २५<br>तस्याप्युत्तरतः कुर्यात् स्नानमण्डपमुत्तमम्।<br>तदर्धेन त्रिभागेन चतुर्भागेन वा पुनः॥ २६<br>आनीय लिङ्गमर्चां वा शिल्पिनः पूजयेद् बुधः।<br>वस्त्राभरणरत्नैश्च येऽपि तत्परिचारकाः॥ २७<br>क्षमध्वमिति तान् ब्रूयाद् यजमानोऽप्यतः परम्।<br>देवं प्रस्तरणे कृत्वा नेत्रज्योतिः प्रकल्पयेत्॥ २८ | उन्हीं मन्त्रोंद्वारा चारों ओर लोकपालोंकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् तीन रात, एक रात, पाँच रात अथवा सात राततक उनका अधिवासन करना चाहिये। इस प्रकार तोरण तथा उत्तम अधिवासन कर उक्त मण्डपकी उत्तर दिशामें उसके आधे, तिहाई अथवा चौथाई भागके परिमाणसे उत्तम स्नानमण्डपका निर्माण करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष लिङ्ग या मूर्तिको लाकर कारीगरों तथा उनके सभी अनुचरोंकी वस्त्र, आभूषण और रत्नद्वारा पूजा करे। तदनन्तर यजमान उनसे यह कहे कि 'मेरे अपराधोंको क्षमा कीजिये।' तत्पश्चात् देवताको बिछौनेपर लिटाकर उनकी नेत्रज्योति सम्पादित करे॥ २१—२८॥ |
| अक्षणोरुद्धरणं वक्ष्ये लिङ्गस्यापि समासतः।<br>सर्वतस्तु बलिं दद्यात् सिद्धार्थघृतपायसैः॥ २९<br>शुक्लपुष्पैरलङ्कृत्य घृतगुग्गुलुधूपितम्।<br>विप्राणां चार्चनं कुर्याद् दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्॥ ३०<br>गां महीं कनकं चैव स्थापकाय निवेदयेत्।<br>लक्षणं कारयेद् भक्त्या मन्त्रेणानेन वै द्विजः॥ ३१ | अब मैं संक्षेपमें नेत्रों तथा अन्य चिह्नोंके उद्धारका प्रकार बता रहा हूँ। पहले देवताके चारों ओर पीली सरसों, घृत और खीरद्वारा बलि प्रदान करे। फिर श्वेत पुष्पोंसे अलंकृतकर घृत और गुग्गुलसे धूप करनेके बाद ब्राह्मणोंकी पूजा करे और उन्हें अपनी शक्तिके अनुकूल दक्षिणा दे। स्थापना करानेवाले ब्राह्मणको गौ, पृथ्वी तथा सुवर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये। फिर ब्राह्मण भक्तिपूर्वक इस मन्त्रद्वारा देवप्रतिमामें नेत्र (ज्योति)-की स्थापना करे अथवा करवाये। मन्त्र यों है— |
| ओं नमो भगवते तुभ्यं शिवाय परमात्मने।<br>हिरण्यरेतसे विष्णो विश्वरूपाय ते नमः॥ ३२<br>मन्त्रोऽयं सर्वदेवानां नेत्रज्योतिष्वपि स्मृतः।<br>एवमामन्त्र्य देवेशं काञ्चनेन विलेखयेत्॥ ३३ | 'ॐ नमो भगवते तुभ्यं शिवाय परमात्मने।<br>हिरण्यरेतसे विष्णो विश्वरूपाय ते नमः।'<br>'विष्णो! आप शिव, परमात्मा, हिरण्यरेता, विश्वरूप और ऐश्वर्यशाली हैं, आपको बारंबार नमस्कार है।' यह मन्त्र सभी देवताओंकी प्रतिमाके नेत्रज्योतिसंस्कारमें उपयोगी माना गया है। इस प्रकार देवेशको आमन्त्रित कर सुवर्णकी शलाकाद्वारा उन्हें चिह्नित करे। |
| मङ्गल्यानि च वाद्यानि ब्रह्मघोषं सगीतकम्।<br>वृद्ध्यर्थं कारयेद् विद्वानमङ्गल्यविनाशनम्॥ ३४<br>लक्षणोद्धरणं वक्ष्ये लिङ्गस्य सुसमाहितः।<br>त्रिधा विभज्य पूज्यायां लक्षणं स्याद् विभाजकम्॥ ३५<br>लेखात्रयं तु कर्तव्यं यवाष्टान्तरसंयुतम्।<br>न स्थूलं न कृशं तद्वन्न वक्रं छेदवर्जितम्॥ ३६<br>निम्नं यवप्रमाणेण ज्येष्ठलिङ्गस्य कारयेत्।<br>सूक्ष्मास्ततस्तु कर्तव्या यथा मध्यमके न्यसेत्॥ ३७ | तदुपरान्त विद्वान् पुरुष अपनी समृद्धि तथा अमङ्गलका विनाश करनेके लिये माङ्गलिक वाद्य, गीत और ब्राह्मणोंकी वेदध्वनियोंका समारोह करे। अब मैं स्वस्थचित्त होकर लिङ्गके लक्षणोद्धारणका प्रकार बता रहा हूँ। लिङ्गके तीन भाग करना चाहिये। उसमें विभाजक लक्षण होता है। आठ जौका अन्तर रखते हुए तीन रेखा चिह्नित करनी चाहिये, वे न तो मोटी हों, न सूक्ष्म हों, न टेढ़ी हों और न उनमें छिद्र हो। ज्येष्ठ लिङ्गमें जौके प्रमाणकी निम्न रेखा अंकित करनी चाहिये। उसके |
* अध्याय २६५ * १०१३
| अष्टभक्तं ततः कृत्वा त्यक्त्वा भागत्रयं बुधः।<br>लम्बयेत् सप्त रेखास्तु पार्श्वयोरुभयोः समाः॥ ३८<br><br>तावत् प्रलम्बयेद् विद्वान् यावद्भागचतुष्टयम्।<br>भ्राम्यते पञ्चभागोर्ध्वं कारयेत् संगतं ततः॥ ३९<br><br>रेखयोः संगमे तद्वत् पृष्ठे भागद्वयं भवेत्।<br>एवमेतत्समाख्यातं समासाल्लक्षणं मया॥ ४० | ऊपर उससे सूक्ष्म रेखा बनाये और मध्यम लिङ्गमें स्थापित करे। फिर बुद्धिमान् पुरुष आठ भाग करके तीन भागोंको छोड़ दे और दोनों पार्श्वोंमें समान अन्तर रखते हुए सात लम्बी रेखाएँ चिह्नित करे। विद्वान् पुरुष चार भागोंतक रेखाएँ चिह्नित करे, पाँचवें भागके ऊपर रेखा घुमानी चाहिये और तदनन्तर मिला देनी चाहिये। यहीं पृष्ठभागमें रेखाओंका संगम होगा। इन दो रेखाओंके संगमस्थलपर पृष्ठदेशमें दो भाग हो जायँगे। इस प्रकार मैंने संक्षेपमें यह लक्षणका वर्णन किया है॥ २९—४०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रतिष्ठानुकीर्तनं नाम चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रतिष्ठानुकीर्तन नामक दो सौ चौंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६४॥
दो सौ पैंसठवाँ अध्याय
प्रतिमाके अधिवासन आदिकी विधि
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं संक्षेपमें मूर्तियोंकी रक्षा-पूजा करनेवाले पुजारी तथा प्रतिष्ठा करानेवाले ब्राह्मणोंका लक्षण बतला रहा हूँ, सुनिये। जो सम्पूर्ण शारीरिक अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे सम्पन्न, वेदमन्त्रविशारद, पुराणोंका मर्मज्ञ, तत्त्वदर्शी, दम्भ एवं लोभसे रहित, कृष्णसारमृगसे युक्त देशमें उत्पन्न, सुन्दर आकृतिवाला, नित्य शौच एवं आचारमें तत्पर, पाखण्डसमूहसे दूर, मित्र और शत्रुमें सम, ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरका प्रिय, ऊहापोहके अर्थका तत्त्वज्ञ, वास्तुशास्त्रका पारंगत विद्वान् तथा सभी दोषोंसे रहित हो, ऐसा व्यक्ति आचार्य होने योग्य है। इसी प्रकार मूर्तिकी रक्षा करनेवाले ब्राह्मणोंका भी सत्कुलोत्पन्न तथा मृदु स्वभावका होना चाहिये। ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठमूर्तियोंकी प्रतिष्ठामें क्रमशः बत्तीस, सोलह और आठ वेदपारगामी ब्राह्मण मूर्तिरक्षक ऋत्विज् बतलाये गये हैं। तदनन्तर लिङ्ग अथवा मूर्तिको गीत तथा माङ्गलिक शब्दपूर्वक मण्डपके स्नानकक्षमें लाकर स्नान कराना चाहिये। (स्नानकी विधि यह है—) वहाँ पञ्चगव्य, कषाय, मृत्तिका, भस्म, जल—इन सामग्रियोंद्वारा चार वेद-मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए प्रतिमाका मार्जन करना चाहिये। |
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| अतः परं प्रवक्ष्यामि मूर्तिपानां तु लक्षणम्।<br>स्थापकस्य समासेन लक्षणं शृणुत द्विजाः॥ १<br><br>सर्वावयवसम्पूर्णो वेदमन्त्रविशारदः।<br>पुराणवेत्ता तत्त्वज्ञो दम्भलोभविवर्जितः॥ २<br><br>कृष्णसारमये देशे उत्पन्नश्च शुभाकृतिः।<br>शौचाचारपरो नित्यं पाषण्डकुलनिःस्पृहः॥ ३<br><br>समः शत्रौ च मित्रे च ब्रह्मोपेन्द्रहरप्रियः।<br>ऊहापोहार्थतत्त्वज्ञो वास्तुशास्त्रस्य पारगः॥ ४<br><br>आचार्यस्तु भवेन्नित्यं सर्वदोषविवर्जितः।<br>मूर्तिपास्तु द्विजाश्चैव कुलीना ऋजवस्तथा॥ ५<br><br>द्वात्रिंशत्षोडशाथापि अष्टौ वा श्रुतिपारगाः।<br>ज्येष्ठमध्यकनिष्ठेषु मूर्तिपा वः प्रकीर्तिताः॥ ६<br><br>ततो लिङ्गमथार्चां वा नीत्वा स्नपनमण्डपम्।<br>गीतमङ्गलशब्देन स्नपनं तत्र कारयेत्॥ ७<br><br>पञ्चगव्यकषायेण मृद्भिर्भस्मोदकेन वा।<br>शौचं तत्र प्रकुर्वीत वेदमन्त्रचतुष्टयात्॥ ८ |
| १०१४ | * मत्स्यपुराण * |
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| समुद्रज्येष्ठमन्त्रेण आपोदिव्येति चापरः।<br>यासां राजेति मन्त्रस्तु आपोहिष्ठेति चापरः॥ ९<br><br>एवं स्नाप्य ततो देवं पूज्य गन्धानुलेपनैः।<br>प्रच्छाद्य वस्त्रयुग्मेन अभिवस्त्रेत्युदाहृतम्॥ १० | वे चारों मन्त्र इस प्रकार हैं—'समुद्रज्येष्ठाः सलिलस्य०', (ऋक्० सं० ७।४९।१) 'आपो दिव्याः०', (ऋक्० सं० ७।४९।२) 'यासां राजा०' (वही १।३) तथा 'आपो हि ष्ठाः०' (वाजस सं० ११।५०)। इस प्रकार देवताकी प्रतिमाको स्नान कराकर 'गन्धद्वारा' इस मन्त्रसे सुगन्धित द्रव्य-चन्दनादिसे पूजा करे और दो वस्त्रोंसे ढँककर शयन करावे। यह 'अभिवस्त्र' की विधि है॥ ९-१०॥ |
| उत्थापयेत्ततो देवमुत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते।<br>आमूरजेति च तथा रथे तिष्ठेति चापरः॥ ११<br><br>रथे ब्रह्मरथे वापि धृतां शिल्पिगणेन तु।<br>आरोप्य च ततो विद्वानाकृष्णेन प्रवेशयेत्॥ १२<br><br>ततः प्रास्तीर्य शय्यायां स्थापयेच्छनकैर्बुधः।<br>कुशानास्तीर्य पुष्पाणि स्थापयेत्प्राङ्मुखं ततः॥ १३<br><br>ततस्तु निद्राकलशं वस्त्रकाञ्चनसंयुतम्।<br>शिरोभागे तु देवस्य जपन्नेवं निधापयेत्॥ १४<br><br>आपोदेवीति मन्त्रेण आपोऽस्मान् मातरोऽपि च।<br>ततो दुकूलपट्टैश्चाच्छाद्य नेत्रोपधानकम्॥ १५<br><br>दद्याच्छिरसि देवस्य कौशेयं वा विचक्षणः।<br>मधुना सर्पिषाभ्यज्य पूज्य सिद्धार्थकैस्ततः॥ १६<br><br>आप्यायस्वेति मन्त्रेण या ते रुद्र शिवेति च।<br>उपविश्यार्चयेद् देवं गन्धपुष्पैः समन्ततः॥ १७<br><br>सितं प्रतिसरं दद्याद् बार्हस्पत्येति मन्त्रतः।<br>दुकूलपट्टैः कार्पासैर्नानाचित्रैरथापि वा॥ १८<br><br>आच्छाद्य देवं सर्वत्र छत्रचामरदर्पणम्।<br>पार्श्वतः स्थापयेत्तत्र वितानं पुष्पसंयुतम्॥ १९<br><br>रत्नान्योषधयस्तत्र गृहोपकरणानि च।<br>भाजनानि विचित्राणि शयनान्यासनानि च॥ २०<br><br>अभि त्वा शूरमन्त्रेण यथा विभवतो न्यसेत्।<br>क्षीरं क्षौद्रं घृतं तद्वद् भक्ष्यभोज्यान्नपायसैः॥ २१<br><br>षड्विधैश्च रसैस्तद्वत् समन्तात्परिपूजयेत्।<br>बलिं दद्यात् प्रयत्नेन मन्त्रेणानेन भूरिशः॥ २२<br><br>त्र्यम्बकं यजामह इति सर्वतः शनकैर्भुवि। | तदनन्तर विद्वान् पुरुष—'उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते०' इस मन्त्रका उच्चारण कर प्रतिमाको उठाये और 'आमूरजा०', (वाजस० सं०) 'रथे तिष्ठ०'—इन दो मन्त्रोंसे रथपर या ब्रह्मरथपर शिल्पियोंद्वारा रखवाकर ले आवे और 'आकृष्णेन' (वाजस० सं० ३३।४५) मन्त्रद्वारा मूर्तिको मन्दिरमें प्रवेश कराये तथा शय्यापर कुश तथा पुष्पोंको बिछाकर बुद्धिमान् पुरुष उसे पूर्वाभिमुख कर धीरेसे स्थापित करे। तदनन्तर वस्त्र और सुवर्णसहित निद्राकलशको देवताके सिरहानेकी ओर—'आपो देवी०', (वही १२।३५) 'आपोऽस्मान् मातरः०'—(वाज० सं० ४।२) इन मन्त्रोंको जपते हुए स्थापित कराना चाहिये। तत्पश्चात् रेशमी वस्त्रद्वारा नेत्रोंको ढककर तकिया दे अथवा रेशमी वस्त्रको प्रतिमाके सिरके नीचे रख दे। फिर बैठकर मधु और घृतद्वारा स्नान कराकर तथा पीली सरसोंसे पूजाकर 'आप्यायस्व०' (वाजस० १२।११२) तथा 'या ते रुद्र शिवा तनू०' (वाजस० सं० १६।२।४९) इन मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक चारों ओरसे चन्दन तथा पुष्पादिसे देवताकी पूजा करे। फिर 'बार्हस्पत्य०' (वही १७।३६) मन्त्रद्वारा श्वेत वर्णके सूतका बना हुआ कंगन अर्पित करे। तदनन्तर अनेक प्रकारके चित्र-विचित्र रेशमी अथवा सूती वस्त्रोंद्वारा प्रतिमाको भलीभाँति ढककर अगल-बगलमें छत्र, चामर, दर्पण, आदि सामग्रियाँ रखे और पुष्पयुक्त चँदोवा स्थापित करे। वहीं विविध प्रकारसे रत्न, औषध, अन्य घरेलू वस्तुएँ, विचित्र प्रकारके पात्र, शय्या, आसन आदि सामग्रियाँ अपनी आर्थिक शक्तिके अनुरूप 'अभि त्वा शूर०' इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए रखे। फिर दूध, मधु, घृत, छहों प्रकारके रसों (खट्टा, मीठा, तीता, कड़वा, नमकीन तथा कसैला)—से संयुक्त भक्ष्य एवं भोज्य अन्न और खीरको भी चारों ओर रखकर पूजा करनी चाहिये। फिर 'त्र्यम्बकं यजामहे०' (वाजस० सं० ३।६०)—इस मन्त्रसे प्रचुर परिमाणमें प्रयत्नपूर्वक भूतलपर सब ओरसे घीसे बलि देनी चाहिये॥ ११–२२ १/२॥ |
| * अध्याय २६५ * | १०१५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मूर्तिपान् स्थापयेत् पश्चात् सर्वदिक्षु विचक्षणः ॥ २३<br>चतुरो द्वारपालांश्च द्वारेषु विनिवेशयेत् ।<br>श्रीसूक्तं पावमानं च सोमसूक्तं सुमङ्गलम् ॥ २४<br>तथा च शान्तिकाध्यायमिन्द्रसूक्तं तथैव च।<br>रक्षोघ्नं च तथा सूक्तं पूर्वतो बह्वचो जपेत् ॥ २५<br>रौद्रं पुरुषसूक्तं च श्लोकाध्यायं सशुक्रीयम् ।<br>तथैव मण्डलाध्यायमध्वर्युर्दक्षिणे जपेत् ॥ २६<br>वामदेव्यं बृहत्साम ज्येष्ठसाम रथन्तरम् ।<br>तथा पुरुषसूक्तं च रुद्रसूक्तं सशान्तिकम् ॥ २७<br>भारुण्डानि च सामानि छन्दोगः पश्चिमे जपेत् ।<br>अथर्वाङ्गिरसं तद्वन्नीलं रौद्रं तथैव च ॥ २८<br>तथापराजितादेवीसप्तसूक्तं सरौद्रकम् ।<br>तथैव शान्तिकाध्यायमथर्वा चोत्तरे जपेत् ॥ २९<br>शिरःस्थाने तु देवस्य स्थापको होममाचरेत् ।<br>शान्तिकैः पौष्टिकैस्तद्वन्मन्त्रैर्व्याहृतिपूर्वकैः ॥ ३०<br>पलाशोदुम्बराश्वत्था अपामार्गः शमी तथा ।<br>हुत्वा सहस्रमेकैकं देवं पादे तु संस्पृशेत् ॥ ३१<br>ततो होमसहस्रेण हुत्वा हुत्वा ततस्ततः ।<br>नाभिमध्यं तथा वक्षः शिरश्चाप्यालभेत् पुनः ॥ ३२ | तदनन्तर विद्वान् पुरुष सभी दिशाओंमें मूर्तिरक्षकोंको नियुक्त करे तथा चारों द्वारोंपर चार द्वारपालोंको बैठा दे। फिर पूर्व दिशामें बैठकर बह्वृच् नामक ऋत्विज्को श्रीसूक्त पावमान, सुमङ्गलकारी सोमसूक्त, शान्तिकाध्याय, इन्द्रसूक्त तथा रक्षोघ्नसूक्त—इन ऋचाओंका जप करना चाहिये। इसी प्रकार दक्षिण दिशामें बैठकर अध्वर्यु नामक ऋत्विज्को रौद्रसूक्त, पुरुषसूक्त, शुक्रीयसहित श्लोकाध्याय तथा मण्डलाध्यायका जप करना चाहिये। सामग नामक उद्गाता ऋत्विज्को पश्चिम-दिशामें बैठकर वामदेव्य, बृहत्साम, ज्येष्ठसाम, रथन्तर, पुरुषसूक्त, शान्तिसहित रुद्रसूक्त तथा भारुण्ड सामका जप करना चाहिये। इसी प्रकार अथर्वा नामक ऋत्विज्को उत्तर दिशामें बैठकर अथर्वाङ्गिरस, नीलसूक्त, रौद्रसूक्तसहित अपराजिता तथा देवीसूक्तके सात मन्त्र और शान्तिकाध्याय (वा० ३७)-का जप करना चाहिये। देवप्रतिमाके सिरहानेकी ओर स्थापकको व्याहृतिपूर्वक शान्तिक तथा पौष्टिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए हवन करना चाहिये। उस समय पलाश, गूलर, पीपल, अपामार्ग (चिड़चिढ़ा), शमी—इन सबकी एक-एक हजार लकड़ियोंकी अग्निकुण्डमें मन्त्रद्वारा आहुति देते हुए देवताके पैरको स्पर्श किये रहना चाहिये। इसी प्रकार नाभि, वक्षःस्थल और शिरोभागको स्पर्श किये हुए प्रत्येक बार एक-एक सहस्र आहुति प्रदान करनी चाहिये॥ २३—३२॥ |
| हस्तमात्रेषु कुण्डेषु मूर्तिपाः सर्वतोदिशम् ।<br>समेखलेषु ते कुर्युर्योनिवक्त्रेषु चादरात् ॥ ३३<br>वितस्तिमात्रा योनिः स्याद् गजोष्ठसदृशी तथा ।<br>आयता छिद्रसंयुक्ता पार्श्वतः कलयोच्छ्रिता ॥ ३४<br>कुण्डात् कलानुसारेण सर्वतश्चतुरङ्गुला ।<br>विस्तारेणोच्छ्रया तद्वच्चतुरस्त्रा समा भवेत् ॥ ३५<br>वेदीभित्तिं परित्यज्य त्रयोदशभिरङ्गुलैः ।<br>एवं नवसु कुण्डेषु लक्षणं चैव दृश्यते ॥ ३६<br>आग्नेयशाक्रयाम्येषु होतव्यमुदगाननैः ।<br>शान्तये लोकपालेभ्यो मूर्तिभ्यः क्रमशस्तथा ॥ ३७<br>तथा मूर्त्यधिदेवानां होमं कुर्यात् समाहितः । | इस प्रकार एक हाथके बने हुए मेखला एवं योनियुक्त कुण्डमें सभी दिशाओंमें बैठे हुए मूर्तिस्थापकगण आदरपूर्वक हवन करें। कुण्डकी योनि एक बित्ता लम्बी, हाथीके ओठ या पीपलके पत्तेके समान आकारवाली होनी चाहिये। वह आयताकार, छिद्रयुक्त, कुण्डकी कलाके अनुसार दोनों बगल ऊँची, चौकोर और समतल होनी चाहिये। वेदीकी दीवालसे तेरह अंगुल दूर हटकर दूसरे अन्य नौ कुण्डोंको बनाना चाहिये। उनका भी लक्षण पूर्वोक्त प्रकारका समझना चाहिये।* होताओंको अग्निकोण, पूर्व दिशा तथा दक्षिण दिशामें उत्तरकी ओर मुखकर हवन करना चाहिये। शान्तिके लिये होता सावधानचित्त हो लोकपालों, मूर्तियों तथा मूर्तियोंके अधिदेवताके लिये क्रमसे |
* मण्डप, कुण्ड, मेखला, योनि, वेदी आदिके निर्माणकी विस्तृत विधि कुण्डोद्योत, कुण्डमण्डपसिद्धि, गायत्रीपुरश्चरण-पद्धतिमें विस्तारसे निर्दिष्ट है।
१०१६ * मत्स्यपुराण *
| वसुधा वसुरेताश्च यजमानो दिवाकरः॥ ३८<br>जलं वायुस्तथा सोम आकाशश्चाष्टमः स्मृतः।<br>देवस्य मूर्तयस्त्वष्टावेताः कुण्डेषु संस्मरेत् ॥ ३९<br>एतासामधिपान् वक्ष्ये पवित्रान् मूर्त्तिनामतः।<br>पृथ्वीं पाति च शर्वश्च पशुपश्चाग्निमेव च ॥ ४०<br>यजमानं तथैवोग्रो रुद्रश्चादित्यमेव च।<br>भवो जलं सदा पाति वायुमीशान एव च ॥ ४१<br>महादेवस्तथा चन्द्रं भीमश्चाकाशमेव च।<br>सर्वदेवप्रतिष्ठासु मूर्त्तिपा हूयेत एव च ॥ ४२<br>एतेभ्यो वैदिकैर्मन्त्रैर्यथास्वं होममाचरेत्।<br>तथा शान्तिघटं कुर्यात् प्रतिकुण्डेषु सर्वदा ॥ ४३<br>शतान्ते वा सहस्रान्ते सम्पूर्णाहुतिरिष्यते।<br>समपादः पृथिव्यां तु प्रशान्तात्मा विनिक्षिपेत् ॥ ४४<br>आहुतीनां तु सम्पातं पूर्णकुम्भेषु वै न्यसेत्।<br>मूलमध्योत्तमाङ्गेषु देवं तेनावसेचयेत् ॥ ४५<br>स्थितं च स्नापयेत् तेन सम्पाताहुतिवारिणा।<br>प्रतियामेषु धूपं तु नैवेद्यं चन्दनादिकम् ॥ ४६<br>पुनः पुनः प्रकुर्वीत होमः कार्यः पुनः पुनः।<br>पुनः पुनश्च दातव्या यजमानेन दक्षिणा ॥ ४७<br>सितवस्त्रैश्च वै सर्वे पूजनीयाः समन्ततः।<br>विचित्रैर्हेमकटकैर्हेमसूत्राङ्गुलीयकैः ॥ ४८<br>वासोभिः शयनीयैश्च प्रतियामे च शक्तितः।<br>भोजनं चापि दातव्यं यावत् स्यादधिवासनम् ॥ ४९<br>बलिस्त्रिसन्ध्यं दातव्यो भूतेभ्यः सर्वतोदिशम्।<br>ब्राह्मणान् भोजयेत् पूर्वं शेषान् वर्णांस्तु कामतः ॥ ५०<br>रात्रौ महोत्सवः कार्यो नृत्यगीतकमङ्गलैः।<br>सदा पूज्याः प्रयत्नेन चतुर्थीकर्म यावता ॥ ५१<br>त्रिरात्रमेकरात्रं वा पञ्चरात्रमथापि वा।<br>सप्तरात्रमथो कुर्यात् क्वचित् सद्योऽधिवासनम्।<br>सर्वयज्ञफलो यस्मादधिवासोत्सवः सदा ॥ ५२ | हवन करे। भूमि, अग्नि, यजमान, दिवाकर (सूर्य), जल, वायु, सोम तथा आठवाँ आकाश—ये आठ भगवान् शंकर (महादेव)-की मूर्तियाँ हैं, हवनके समय इनका कुण्डमें स्मरण करना चाहिये। अब मैं मूर्तिके नामानुसार इनके रक्षक अधिपतियोंका वर्णन कर रहा हूँ। इनमें शर्व वसुधाकी, पशुपति वसुरेता (अग्नि)-की, उग्र यजमानकी, रुद्र दिवाकरकी, भव जलकी, ईशान वायुकी, महादेव सोमकी और भीम आकाशकी मूर्तिरूपमें उनकी रक्षा करते हैं। सभी देवताओंकी प्रतिष्ठामें ये ही मूर्तिप माने गये हैं। इनके लिये अपनी सम्पत्तिके अनुकूल वैदिक मन्त्रोंद्वारा हवन करना चाहिये॥ ३३-४२ १/२ ॥<br><br>प्रत्येक कुण्डपर सदा शान्तिघटकी स्थापना करनी चाहिये। सौ या सहस्र आहुतिके बाद सम्पूर्णाहुति मानी गयी है। उस समय पृथ्वीपर समानभावसे पैर रखे हुए होता शान्तचित्तसे सम्पूर्णाहुति छोड़ें। इन सभी आहुतियोंके सम्पातको पूर्ण कलशोंमें रखें। फिर उसीके जलसे प्रतिमाके पैर, मध्य एवं सिरका सेचन करे और उसी आहुतिके जलद्वारा वहाँके कल्पित देवतागणोंको स्नान कराये। प्रत्येक प्रहरमें पुनः-पुनः धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन आदि द्वारा पूजा करे तथा उसी प्रकार हवन भी बारंबार करना चाहिये। इसी प्रकार यजमानद्वारा पुनः-पुनः दक्षिणा भी प्रदान करनी चाहिये और उन सबको श्वेत वस्त्रद्वारा पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक प्रहरमें यथाशक्ति अधिवासनपर्यन्त विचित्र प्रकारके बने हुए सुवर्णके कङ्कण, सुवर्णकी जंजीर, अंगूठी, वस्त्र, शय्या और भोजन भी देना चाहिये। सामान्य जीवोंके लिये भी सभी दिशाओंमें तीनों संध्याओंके समय बलि भी देनी चाहिये। पहले ब्राह्मणोंको भोजन कराये, फिर अन्य वर्णवालोंको स्वेच्छानुसार भोजन कराना चाहिये। रातमें नाच-गान आदि मङ्गल-कार्योंद्वारा महोत्सव मनाना चाहिये। इस प्रकार चतुर्थीकर्मपर्यन्त सदा प्रयत्नपूर्वक पूजा करते रहना चाहिये। यह अधिवासन तीन रात, एक रात, पाँच रात या सात रातोंतक होता है। पर जहाँ अत्यन्त शीघ्रता हो, वहाँ तुरंत भी कर दिया जाता है। यह अधिवासोत्सव सर्वदा सम्पूर्ण यज्ञोंके फलोंको प्रदान करनेवाला है॥ ४३-५२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽधिवासनविधिर्नाम पञ्चषष्ठ्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अधिवासनविधि नामक दो सौ पैंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६५॥
| * अध्याय २६६ * | १०१७ |
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दो सौ छाछठवाँ अध्याय
प्रतिमा-प्रतिष्ठाकी विधि
| सूत उवाच | |
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| कृत्वाधिवासं देवानां शुभं कुर्यात् समाहितः।<br>प्रासादस्यानुरूपेण मानं लिङ्गस्य वा पुनः॥ १ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार उपर्युक्त विधिसे देवताओंकी प्रतिमाका शुभ अधिवासन करना चाहिये। यजमानको एकाग्रचित्तसे प्रासादके अनुरूप लिङ्ग (प्रतिमा)-का या लिङ्गके अनुरूप प्रासादका मान रखना चाहिये। |
| पुष्पोदकेन प्रासादं प्रोक्ष्य मन्त्रयुतेन तु।<br>पातयेत् पक्षसूत्रं तु द्वारसूत्रं तथैव च॥ २ | लिङ्गस्थापनके पूर्व पुष्पमिश्रित जलसे मन्दिरको धोकर मन्त्रोच्चारण करते हुए पक्षसूत्र तथा द्वारसूत्रको¹ गिराकर नापना चाहिये। |
| आश्रयेत् किञ्चिदीशानीं मध्यं ज्ञात्वा दिशं बुधः।<br>ईशानीमाश्रितं देवं पूजयन्ति दिवौकसः॥ ३ | बुद्धिमान् पुरुषको देवमण्डपकी मध्यभूमिका निश्चय कर कुछ ईशानकोणकी ओर बढ़ना चाहिये; क्योंकि देवतागण ईशानकी दिशामें अवस्थित भगवान् शंकरकी पूजा करते हैं। |
| आयुरारोग्यफलदमथोत्तरसमाश्रितम् ।<br>शुभं स्यादशुभं प्रोक्तमन्यथा स्थापनं बुधैः॥ ४ | उत्तर दिशामें अधिष्ठित देवता आयु तथा आरोग्यरूपी फल देनेवाले और कल्याणकारी कहे गये हैं। बुद्धिमानोंने इनके अतिरिक्त अन्य दिशाओंमें स्थापनाको अशुभकारी बताया है। |
| अधः कूर्मशिला प्रोक्ता सदा ब्रह्मशिलाधिका।<br>उपर्युपस्थिता तस्या ब्रह्मभागाधिका शिला॥ ५ | लिङ्गके नीचे कूर्म-शिलाकी स्थापना करनी चाहिये। यह ब्रह्मशिलाकी अपेक्षा बड़ी तथा भारी होती है। उसके ऊपर ब्रह्मभागसे बड़ी ब्रह्मशिला स्थापित होती है। |
| ततस्तु पिण्डिका कार्या पूर्वोक्तैर्मानलक्षणैः।<br>ततः प्रक्षालितां कृत्वा पञ्चगव्येन पिण्डिकाम्॥ ६ | उसके ऊपर पूर्वोक्त परिमाणोंके अनुसार पिण्डिकाकी स्थापना करनी चाहिये। |
| कषायतोयेन पुनर्मन्त्रयुक्तेन सर्वतः।<br>देवतार्चाश्रयं मन्त्रं पिण्डिकासु नियोजयेत्॥ ७ | तत्पश्चात् पञ्चगव्यद्वारा पिण्डिकाको धोकर पुनः पञ्चकषायके² जलसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक प्रक्षालन करे। पिण्डिकाओंमें भी देव-प्रतिमा-सम्बन्धी मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये। |
| तत उत्थाप्य देवेशमुत्तिष्ठ ब्रह्मणेति च।<br>आनीय गर्भभवनं पीठान्ते स्थापयेत् पुनः॥ ८ | तदुपरान्त 'उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते०' (वाजसने० ३४।५६) इस मन्त्रसे देव-प्रतिमाको उठाकर मण्डपके मध्यमें लाकर पुनः पीठिकापर स्थापित करे। |
| अर्घ्यपाद्यादिकं तत्र मधुपर्कं प्रयोजयेत्।<br>ततो मुहूर्तं विश्रम्य रत्नन्यासं समाचरेत्॥ ९ | वहाँ अर्घ्य, पाद्य और मधुपर्क आदि समर्पित करे। फिर एक मुहूर्ततक विश्रामकर वहाँ रत्नोंकी स्थापना करनी चाहिये। |
| वज्रमौक्तिकवैदूर्यशङ्खस्फटिकमेव च।<br>पुष्परागेन्द्रनीलं च नीलं पूर्वादिदिक्क्रमात्॥ १० | हीरा, मोती, विल्लौर, शङ्ख, स्फटिक, पुखराज, नीलम और महानील—इन रत्नोंको पूर्व दिशाके क्रमसे स्थापित करना चाहिये॥ १—१०॥ |
१. कारीगरका सूत्र। २. जामुन, सेमल, बकुल, बेर और वटबीजके फलोंका क्वाथ पञ्चकषाय कहलाता है।
(सुश्रुतसंहि० न०, मो० वि०)