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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1019 of 1098

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Page 1019
* अध्याय २६३ *१००९

| आयामं तस्य देवस्य नाभ्यां वै कुण्डलीकृतम्।<br>माहेश्वरं त्रिभागं तु ऊर्ध्ववृत्तं त्ववस्थितम्॥ १५<br>अधस्ताद् ब्रह्मभागस्तु चतुरस्रो विधीयते।<br>अष्टाग्रो वैष्णवो भागो मध्यस्तस्य उदाहृतः॥ १६<br>एवं प्रमाणसंयुक्तं लिङ्गं वृद्धिप्रदं भवेत्।<br>तथान्यदपि वक्ष्यामि गर्भमानं प्रमाणतः॥ १७<br>गर्भमानप्रमाणेण यल्लिङ्गमुचितं भवेत्।<br>चतुर्धा तद् विभज्याथ विष्कम्भं तु प्रकल्पयेत्॥ १८<br>देवतायतनं सूत्रं भागत्रयविकल्पितम्।<br>अधस्ताच्चतुरस्रं तु अष्टास्रं मध्यभागतः॥ १९<br>पूज्यभागस्ततोऽर्धं तु नाभिभागस्तथोच्यते।<br>आयामे यद् भवेत् सूत्रं नाहस्य चतुरस्रके॥ २०<br>चतुरस्रं परित्यज्य अष्टास्रस्य तु यद् भवेत्।<br>तस्याप्यर्धं परित्यज्य ततो वृत्तं तु कारयेत्॥ २१<br>शिरः प्रदक्षिणं तस्य संक्षिप्तं मूलतो न्यसेत्।<br>भ्रष्टपूजं भवेल्लिङ्गमधस्ताद् विपुलं च यत्॥ २२ | उस देवताकी नाभिमें लम्बाई कुण्डलीकृत माहेश्वर भागका होगी। लिङ्गमें भाग ऊर्ध्व-वृत्तरूपसे स्थित त्रिभाग होगा। उसके नीचे ब्रह्मभाग होगा, जो चौकोर बनाया जाता है। मध्यभाग, जो आठ कोणोंवाला होता है, वैष्णवभाग कहा जाता है। इन प्रमाणोंसे निर्मित लिङ्ग समृद्धि देनेवाला होता है। अब गर्भमानके प्रमाणसे बननेवाले लिङ्गका वर्णन कर रहा हूँ। जो लिङ्ग गर्भमानके प्रमाणसे निर्मित होता है, वह उचित होता है। उसे चार भागोंमें विभक्तकर विष्कम्भकी कल्पना करे। देवतायतनको सूत्रद्वारा नापकर उसे तीन भागोंमें विभक्त करे। जिसमें नीचेका भाग चार कोणवाला और मध्यभाग आठ कोणवाला हो। इसके ऊपर पूज्यभाग और नाभिभाग कहा जाता है। लम्बाईका विस्तार चौकोर प्रमाणका होना चाहिये। उस चौकोर भागको छोड़कर आठ कोणवाला जो भाग हो, उसके आधे भागको छोड़कर वृत्ताकार बनाना चाहिये॥ १२–२१॥<br><br>उसके मङ्गलमय सिरको मूलदेशसे बिलकुल सीधे रूपमें स्थापित करे। जिस लिङ्गके नीचेका भाग बहुत |


हाथ^१०, साढ़े तीन हाथ^११, पौने चार हाथ^१२, चार हाथ^१३, सवा चार हाथ^१४, साढ़े चार हाथ^१५, पौने पाँच हाथ^१६, पाँच हाथ^१७, सवा पाँच हाथ^१८, साढ़े पाँच हाथ^१९, पौने छः हाथ^२०, छः हाथ^२१, सवा छः हाथ^२२, साढ़े छः हाथ^२३, पौने सात हाथ^२४, सात हाथ^२५, सवा सात हाथ^२६, साढ़े सात हाथ^२७, पौने आठ हाथ^२८, आठ हाथ^२९, सवा आठ हाथ^३०, साढ़े आठ हाथ^३१, पौने नौ हाथ^३२, नौ हाथ^३३।

इन तैंतीसोंके नाम विश्वकर्माने क्रमशः इस प्रकार बताये हैं—१. भव, २. भवोद्भव, ३. भाव, ४. संसारभयनाशन, ५. पाशयुक्त, ६. महातेज, ७. महादेव, ८. परात्पर, ९. ईश्वर, १०. शेखर, ११. शिव, १२. शान्त, १३. मनोह्लादक, १४. रुद्रतेज, १५. सदात्मक (सद्योजात), १६. वामदेव, १७. अघोर, १८. तत्पुरुष, १९. ईशान, २०. मृत्युंजय, २१. विजय, २२. किरणाक्ष, २३. अघोरास्त्र, २४. श्रीकण्ठ, २५. पुण्यवर्धन, २६. पुण्डरीक, २७. सुवक्त्र, २८. उमातेजः, २९. विश्वेश्वर, ३०. त्रिनेत्र, ३१. त्र्यम्बक, ३२. घोर, ३३. महाकाल।

पूर्वोक्त क्रमसे पादार्धवृद्धि करनेपर६५तक संख्या पहुँचेगी।
'' '' दो अङ्गुल वृद्धि करनेपर९७'' '' ''
'' '' एक '' '' ''१९३'' '' ''
'' '' अर्द्धाङ्गुल '' ''३८५'' '' ''
'' '' अङ्गुलका चतुर्थांश बढ़ानेपर७६९'' '' ''
'' '' एक-एक मूँगके मानकी वृद्धि करनेपर१४४२'' '' ''
'' '' मुद्ग-प्रमाण लिङ्गोंमें प्रत्येकके दस भेद करनेपर१४४२०पहुँचेगी।

'देवमूर्तिप्रकरणम्' नामक ग्रन्थके छठे अध्यायमें शिवजीकी चौबीस मूर्तियाँ बतायी गयी हैं। उनके लिङ्ग धातु, रत्न, काष्ठ और शिलाके बनाये जाते हैं। इनमें नागरलिङ्ग, द्राविड़लिङ्ग, वेसरलिङ्ग, स्फाटिकलिङ्ग तथा बाणलिङ्गका विशेष महत्त्व है। वहाँ इन लिङ्गोंके पृथक्-पृथक् नाम और निर्माणकी विधि दी गयी है। साथ ही प्रासाद, पीठिका और प्रणाल आदिका विशेषरूपसे निरूपण किया गया है। इस विषयपर सर्वाधिक विस्तार 'अंशुमद्भेदागम' (काश्यपशिल्प) तथा 'वीरमित्रोदय लक्षणप्रकाश' में है। विशेष जानकारीके लिये उन्हीं प्रकरणोंको देखना चाहिये।