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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1026 of 1098

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Page 1026

१०१६ * मत्स्यपुराण *


| वसुधा वसुरेताश्च यजमानो दिवाकरः॥ ३८<br>जलं वायुस्तथा सोम आकाशश्चाष्टमः स्मृतः।<br>देवस्य मूर्तयस्त्वष्टावेताः कुण्डेषु संस्मरेत् ॥ ३९<br>एतासामधिपान् वक्ष्ये पवित्रान् मूर्त्तिनामतः।<br>पृथ्वीं पाति च शर्वश्च पशुपश्चाग्निमेव च ॥ ४०<br>यजमानं तथैवोग्रो रुद्रश्चादित्यमेव च।<br>भवो जलं सदा पाति वायुमीशान एव च ॥ ४१<br>महादेवस्तथा चन्द्रं भीमश्चाकाशमेव च।<br>सर्वदेवप्रतिष्ठासु मूर्त्तिपा हूयेत एव च ॥ ४२<br>एतेभ्यो वैदिकैर्मन्त्रैर्यथास्वं होममाचरेत्।<br>तथा शान्तिघटं कुर्यात् प्रतिकुण्डेषु सर्वदा ॥ ४३<br>शतान्ते वा सहस्रान्ते सम्पूर्णाहुतिरिष्यते।<br>समपादः पृथिव्यां तु प्रशान्तात्मा विनिक्षिपेत् ॥ ४४<br>आहुतीनां तु सम्पातं पूर्णकुम्भेषु वै न्यसेत्।<br>मूलमध्योत्तमाङ्गेषु देवं तेनावसेचयेत् ॥ ४५<br>स्थितं च स्नापयेत् तेन सम्पाताहुतिवारिणा।<br>प्रतियामेषु धूपं तु नैवेद्यं चन्दनादिकम् ॥ ४६<br>पुनः पुनः प्रकुर्वीत होमः कार्यः पुनः पुनः।<br>पुनः पुनश्च दातव्या यजमानेन दक्षिणा ॥ ४७<br>सितवस्त्रैश्च वै सर्वे पूजनीयाः समन्ततः।<br>विचित्रैर्हेमकटकैर्हेमसूत्राङ्गुलीयकैः ॥ ४८<br>वासोभिः शयनीयैश्च प्रतियामे च शक्तितः।<br>भोजनं चापि दातव्यं यावत् स्यादधिवासनम् ॥ ४९<br>बलिस्त्रिसन्ध्यं दातव्यो भूतेभ्यः सर्वतोदिशम्।<br>ब्राह्मणान् भोजयेत् पूर्वं शेषान् वर्णांस्तु कामतः ॥ ५०<br>रात्रौ महोत्सवः कार्यो नृत्यगीतकमङ्गलैः।<br>सदा पूज्याः प्रयत्नेन चतुर्थीकर्म यावता ॥ ५१<br>त्रिरात्रमेकरात्रं वा पञ्चरात्रमथापि वा।<br>सप्तरात्रमथो कुर्यात् क्वचित् सद्योऽधिवासनम्।<br>सर्वयज्ञफलो यस्मादधिवासोत्सवः सदा ॥ ५२ | हवन करे। भूमि, अग्नि, यजमान, दिवाकर (सूर्य), जल, वायु, सोम तथा आठवाँ आकाश—ये आठ भगवान् शंकर (महादेव)-की मूर्तियाँ हैं, हवनके समय इनका कुण्डमें स्मरण करना चाहिये। अब मैं मूर्तिके नामानुसार इनके रक्षक अधिपतियोंका वर्णन कर रहा हूँ। इनमें शर्व वसुधाकी, पशुपति वसुरेता (अग्नि)-की, उग्र यजमानकी, रुद्र दिवाकरकी, भव जलकी, ईशान वायुकी, महादेव सोमकी और भीम आकाशकी मूर्तिरूपमें उनकी रक्षा करते हैं। सभी देवताओंकी प्रतिष्ठामें ये ही मूर्तिप माने गये हैं। इनके लिये अपनी सम्पत्तिके अनुकूल वैदिक मन्त्रोंद्वारा हवन करना चाहिये॥ ३३-४२ १/२ ॥<br><br>प्रत्येक कुण्डपर सदा शान्तिघटकी स्थापना करनी चाहिये। सौ या सहस्र आहुतिके बाद सम्पूर्णाहुति मानी गयी है। उस समय पृथ्वीपर समानभावसे पैर रखे हुए होता शान्तचित्तसे सम्पूर्णाहुति छोड़ें। इन सभी आहुतियोंके सम्पातको पूर्ण कलशोंमें रखें। फिर उसीके जलसे प्रतिमाके पैर, मध्य एवं सिरका सेचन करे और उसी आहुतिके जलद्वारा वहाँके कल्पित देवतागणोंको स्नान कराये। प्रत्येक प्रहरमें पुनः-पुनः धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन आदि द्वारा पूजा करे तथा उसी प्रकार हवन भी बारंबार करना चाहिये। इसी प्रकार यजमानद्वारा पुनः-पुनः दक्षिणा भी प्रदान करनी चाहिये और उन सबको श्वेत वस्त्रद्वारा पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक प्रहरमें यथाशक्ति अधिवासनपर्यन्त विचित्र प्रकारके बने हुए सुवर्णके कङ्कण, सुवर्णकी जंजीर, अंगूठी, वस्त्र, शय्या और भोजन भी देना चाहिये। सामान्य जीवोंके लिये भी सभी दिशाओंमें तीनों संध्याओंके समय बलि भी देनी चाहिये। पहले ब्राह्मणोंको भोजन कराये, फिर अन्य वर्णवालोंको स्वेच्छानुसार भोजन कराना चाहिये। रातमें नाच-गान आदि मङ्गल-कार्योंद्वारा महोत्सव मनाना चाहिये। इस प्रकार चतुर्थीकर्मपर्यन्त सदा प्रयत्नपूर्वक पूजा करते रहना चाहिये। यह अधिवासन तीन रात, एक रात, पाँच रात या सात रातोंतक होता है। पर जहाँ अत्यन्त शीघ्रता हो, वहाँ तुरंत भी कर दिया जाता है। यह अधिवासोत्सव सर्वदा सम्पूर्ण यज्ञोंके फलोंको प्रदान करनेवाला है॥ ४३-५२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽधिवासनविधिर्नाम पञ्चषष्ठ्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अधिवासनविधि नामक दो सौ पैंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६५॥