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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1023 of 1098

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Page 1023

* अध्याय २६५ * १०१३


| अष्टभक्तं ततः कृत्वा त्यक्त्वा भागत्रयं बुधः।<br>लम्बयेत् सप्त रेखास्तु पार्श्वयोरुभयोः समाः॥ ३८<br><br>तावत् प्रलम्बयेद् विद्वान् यावद्भागचतुष्टयम्।<br>भ्राम्यते पञ्चभागोर्ध्वं कारयेत् संगतं ततः॥ ३९<br><br>रेखयोः संगमे तद्वत् पृष्ठे भागद्वयं भवेत्।<br>एवमेतत्समाख्यातं समासाल्लक्षणं मया॥ ४० | ऊपर उससे सूक्ष्म रेखा बनाये और मध्यम लिङ्गमें स्थापित करे। फिर बुद्धिमान् पुरुष आठ भाग करके तीन भागोंको छोड़ दे और दोनों पार्श्वोंमें समान अन्तर रखते हुए सात लम्बी रेखाएँ चिह्नित करे। विद्वान् पुरुष चार भागोंतक रेखाएँ चिह्नित करे, पाँचवें भागके ऊपर रेखा घुमानी चाहिये और तदनन्तर मिला देनी चाहिये। यहीं पृष्ठभागमें रेखाओंका संगम होगा। इन दो रेखाओंके संगमस्थलपर पृष्ठदेशमें दो भाग हो जायँगे। इस प्रकार मैंने संक्षेपमें यह लक्षणका वर्णन किया है॥ २९—४०॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रतिष्ठानुकीर्तनं नाम चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रतिष्ठानुकीर्तन नामक दो सौ चौंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६४॥


दो सौ पैंसठवाँ अध्याय

प्रतिमाके अधिवासन आदिकी विधि

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं संक्षेपमें मूर्तियोंकी रक्षा-पूजा करनेवाले पुजारी तथा प्रतिष्ठा करानेवाले ब्राह्मणोंका लक्षण बतला रहा हूँ, सुनिये। जो सम्पूर्ण शारीरिक अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे सम्पन्न, वेदमन्त्रविशारद, पुराणोंका मर्मज्ञ, तत्त्वदर्शी, दम्भ एवं लोभसे रहित, कृष्णसारमृगसे युक्त देशमें उत्पन्न, सुन्दर आकृतिवाला, नित्य शौच एवं आचारमें तत्पर, पाखण्डसमूहसे दूर, मित्र और शत्रुमें सम, ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरका प्रिय, ऊहापोहके अर्थका तत्त्वज्ञ, वास्तुशास्त्रका पारंगत विद्वान् तथा सभी दोषोंसे रहित हो, ऐसा व्यक्ति आचार्य होने योग्य है। इसी प्रकार मूर्तिकी रक्षा करनेवाले ब्राह्मणोंका भी सत्कुलोत्पन्न तथा मृदु स्वभावका होना चाहिये। ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठमूर्तियोंकी प्रतिष्ठामें क्रमशः बत्तीस, सोलह और आठ वेदपारगामी ब्राह्मण मूर्तिरक्षक ऋत्विज् बतलाये गये हैं। तदनन्तर लिङ्ग अथवा मूर्तिको गीत तथा माङ्गलिक शब्दपूर्वक मण्डपके स्नानकक्षमें लाकर स्नान कराना चाहिये। (स्नानकी विधि यह है—) वहाँ पञ्चगव्य, कषाय, मृत्तिका, भस्म, जल—इन सामग्रियोंद्वारा चार वेद-मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए प्रतिमाका मार्जन करना चाहिये।
अतः परं प्रवक्ष्यामि मूर्तिपानां तु लक्षणम्।<br>स्थापकस्य समासेन लक्षणं शृणुत द्विजाः॥ १<br><br>सर्वावयवसम्पूर्णो वेदमन्त्रविशारदः।<br>पुराणवेत्ता तत्त्वज्ञो दम्भलोभविवर्जितः॥ २<br><br>कृष्णसारमये देशे उत्पन्नश्च शुभाकृतिः।<br>शौचाचारपरो नित्यं पाषण्डकुलनिःस्पृहः॥ ३<br><br>समः शत्रौ च मित्रे च ब्रह्मोपेन्द्रहरप्रियः।<br>ऊहापोहार्थतत्त्वज्ञो वास्तुशास्त्रस्य पारगः॥ ४<br><br>आचार्यस्तु भवेन्नित्यं सर्वदोषविवर्जितः।<br>मूर्तिपास्तु द्विजाश्चैव कुलीना ऋजवस्तथा॥ ५<br><br>द्वात्रिंशत्षोडशाथापि अष्टौ वा श्रुतिपारगाः।<br>ज्येष्ठमध्यकनिष्ठेषु मूर्तिपा वः प्रकीर्तिताः॥ ६<br><br>ततो लिङ्गमथार्चां वा नीत्वा स्नपनमण्डपम्।<br>गीतमङ्गलशब्देन स्नपनं तत्र कारयेत्॥ ७<br><br>पञ्चगव्यकषायेण मृद्भिर्भस्मोदकेन वा।<br>शौचं तत्र प्रकुर्वीत वेदमन्त्रचतुष्टयात्॥ ८
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