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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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Devanagarihipublished2,136 pages

About this granth

The Kabir Sagar (कबीर सागर) is the large scriptural corpus of the Kabirpanth, especially its Dharamdasi branch, cast mainly as dialogues between Kabir and his disciple Dharamdas. It gathers many works, among them the Gyan Sagar, the Anurag Sagar and the various books of the Bodh Sagar, into eleven parts, and is the main source for the sect's cosmology, lineage and practice.

The sections of the first part, the Gyan Sagar, give a sense of its content: the kinds of liberation and the immortal realm, the True Being, the origin of creation and the islands of the cosmos, Dharmaraya (Niranjan) winning an island and Mansarovar by serving the True Being, his swallowing of Kamini and the curse laid on him, the descent of the Gyani (Kabir) to earth and his pact with Dharmaraya, the founding of Jagannath, the three gods and Adi Maya, the churning of the ocean, the origin of the Vedas and the four classes of birth, and the stories of Bali, the Sanakas and Narada.

This complete eleven-part edition is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai. Its 2,136 pages bring the entire Kabir Sagar together for students of the Kabirpanth.

रानीका सद्गुरुके अधीन होना

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बोधसागर

( ९ )

सोरठा-निज मन सुकुर सुधार, गुरु पदपंकज उर धारिए ॥
मिटै सकल अँधियार, अस्थिर घर तब पाइए ॥

चोपाई

राजा आज्ञा रानी मानी । साहब चरण पखारे आनी ॥
कश्चन झारी ले जल धायी । साहब चरण पखारी आयी ॥
राजा रानी चरण धुवाये । अँचरन रानी तबहि पुछाये ॥
चरण हिये मन्थे पर लायी । चरणाभूत सबही मिलि पायी ॥
कीन्ह दण्डवत पलपल रानी । साहब दरस दीन्ह भल आनी ॥

रानी वचन

साखी-हमहिं जनि भार चढ़ावहु, हमरे नाम कबीर ।
अगम निगम वह पुरुष है, जे गहि लागो तीर ॥

रानी वचन-चोपाई

सुनिके रानी वचन पतियानी । तब साहब सों बिननी ठानी ॥
और पुरुष जानो नहिं नीका । तुम सतपुरुष आहु यहि जीका ॥
तुमहि पुरुष आहु दृढ़ जानी । और पुरुष नाहीं मन मानी ॥
रानी कहै सुनो महाराजा । साहिब आये तुमरे काजा ॥
रानी कहै बेगि गहु चरना । काल अजापी है निज मरना ॥
आये पुरुष हमारे पास । हमरे मनकी पूजी आसा ॥

रानी वचन

सुनहु राय रानी निज वचना । यह तो जाल कालकी रचना ॥
मेटहु काम कोध हंकारा । माया मोह तजौ संसारा ॥
ज्ञान हेतु दृढ़ करनी करई । आवागमन का पूग परई ॥
तजि संसार शब्द कहँ ध्याओ । गुरुगम पुरुष नाम चितलाओ ॥

साखी-ना फिर जन्मे जोइनि ना, स्वर्ग नर्क को जाय ॥
सो हंसा रहित भये, अजर अमर घर पाय ॥

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( १० )

भोपालबोध

यह तो माया जाल है, कठिन बीर झतवाल ॥
जीव शब्द न मानई, यक दिन खेहे काल ॥
मोह नदी विकराल है, कोई न उतारे पार ॥
सतगुरु केवट साथ ले, हंस होय यम न्यार ॥

चौपाई

कोटि जुहार होत नित तोहीं । कैसे कै लौ लावहु मोहीं ॥
कैसे छोड़ो राज गुमाना । किमि छोड़ो पाखण्ड अभिमाना ॥
कैसे छाड़हु राज बड़ाई । कैसे छाड़हु सुख चतुराई ॥
बैठि सभा बोलहु हँसि बाता । कुँवर पचास संग निशि राता ॥
बैठि महल महाँ खेलहु सारी । कामिनि के संग सदा बहारी ॥
छुटे न नाति कुटुम्ब की आशा । छुटे न कश्चन भोग विलासा ॥
सारखी-यह सुख कैसे छोड़िहो, हम तो कथे निरास ॥
सैन चैन जब छोड़हु, चलहु पुरुषके पास ॥

राजा भोपाल वचन

कहै राय सुनिये गुरुदेवा । मोकहाँ राखु चरन की सेवा ॥
मस्तक मोर दीजिये हाथा । दम अघ करमी होयँ सनाथा ॥
छोड़ो सहस बीस मैं हाथी । अब मैं चलौं तुम्हारे साथी ॥
अब हम दौलत छोड़ैं तुर्गंगा । छोड़ों सकल कामिनी संगा ॥
देह गर्व औ राज गुमाना । छोड़ैँ सकल भक्ति मनमाना ॥
जब तुम अमृत वचन पुकारा । तेहि क्षण छूटा सकल विकारा ॥
छन्द-दया निधान करूणा विलोकहु महादारुण दुःख दहै ॥
मैं अधम जीव अघोर अकरमी पतित पावन पद गहै ॥
तुम ज्ञान घन विज्ञान आगर धर्म कंटक मर्दन ॥
तुव नाम अमोल समरथ करहु दया निर्धन ॥

राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना

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बोधसागर

( ११ )

सोरठा-अविरल भक्ति तुम्हार, पूरे भागते पाइये ।
विनवों बारम्बार, पुरुष दरश करवावहू ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

नाम पदार्थ देउँ मैं तोहीं । तैं राजा चीन्हा दृढ मोहीं ॥
पुरुष नाम एक यज्ञ कराओं । जेहि नाम ते हंस बचाओं ॥
जरी केर एक चन्दोवा तानो । कञ्चन केर सिंहासन आनो ॥
दिवालगिरी लागे जरकेरा । मोतिन झालर लागु घनेरा ॥
मोतिन लै भर थार धराऊँ । तापर आरति जोति लसाऊँ ॥
कंचन कलसा पाँचो वाती । झारीजल हीर लै पाती ॥
पूंगी फल औ स्वेत मिठाई । चन्दन पान धरो तहैं लाई ॥
कदलीफल उत्तम तहैं जानो । मेवा अष्ट युक्त प्रमानो ॥
कदलीपत्र कपूर सुगन्धा । आमपत्र लै चहु दिशि बन्धा ॥
सात हाथ वस्तर ले स्वेता । पुष्प गुलाब कहौ मरु केता ॥
नौ रतन लै थार धरायी । मनि मानिकके मध्य रहायी ॥
यह सब विधि जब दीनबतायी । राजा सबही लीन सजारी ॥
चौका बैठे सतगुरु जबहीं । रानी गाय चरण गहे तबहीं ॥
सवा लाख दीपक तहैं बारी । बहु आनन्द शब्द विस्तारी ॥
सब मिलि हाथ नारियल लीन्हा । आगे धरा दण्डवत कीन्हा ॥
राजा तृण धरे मुख माँहीं । भये अधीन बांधि कर आहीं ॥

राजा भोपाल वचन

तुम दीननके आहु दयाला । कृपा कीन्ह मोहि प्रतिपाला ॥
अब जनि मोसन करहु दुराई । अपने कर लीजै सुकताई ॥
यहि संसार नाहिं मम काजा । दारुण महा काल है राजा ॥
अब तुम आपन लोकदिखाओ । महा पुरुष के दर्श कराओ ॥

राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना

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( १२ )

शोपालबोध

सत्गुरु वचन

नौ नारी मिलि विन्ती करई । कुवर पचास ठाढ़ तहँ रहई ॥
बेटी एक सुरजकी जोती । ताहि लिलार पुहे जनु मोती ॥
साहब चरण धरा तिन आई । अब हम चरणछोड़ि नहिं जायी ॥
कीन्ह आरती नरयर मोरा । सकल जीवके तिनुका तोरा ॥
सुकृत अंश बुलाये ज्ञानी । पुरुष दरश कर राजा आनी ॥
लै अमरावहु लोक द्वारा । पल महाँ लाय ठाढ़ बैठारा ॥
दिना चार लगी राख्यो काया । वेगी जाय पुरुष पहाँ आया ॥
लिखिलिखिपान सबन कहँदीना । सकलो जीव वन्दन कीना ॥
जेते जीव परवाना पावा । तेते हंसा लोक सिधावा ॥
काया छोड़ि हंस चले आगे । सत्य सुकृत के चरनन लागे ॥
लागी डोर पुरुषके पास । तवै दूत यक कियो तमाशा ॥
सुकृत संग हंस सब जेते । आये दूत कला धरि तेते ॥
छाप तिलक तब विरचि बनायी । मारगमाँहि ठाढ़ भय आयी ॥
आओ हंस पुरुषके पास । नातो होवै ठाट विनाशा ॥
बोले दूत हंस कहँ जायी । हम गुरुज्ञानी तोंहि सहायी ॥
हमरे संग चलो हो राजा । हमरे शरण काल उठि भाजा ॥
हंस रूप तुम धरि बटपारा । हम नहिं फन्दा परै तुम्हारा ॥
सुकृत कहै हंस चलि आज । हमरे संग काल नहिं पाऊ ॥
बाएँ अंग कालका धारा । दहिने पाँजी अहै हमारा ॥
ताहि द्वार होय सुरति लगाओ । बेगि दरश पुरुषके पाओ ॥
सुकृत सागर पहुँचे जायी । अहो हंस तुम लेहु नहायी ॥
सकल हंस मिलि पैठि नहावा । निरखै द्रौप द्रौपका भावा ॥

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बोधसागर

( १३ )

देखहिं लोक लोककी रचना । तब टेके सुकृतके चरना ॥
बैठे लोकमहँ हंस निहारा । जहँवाँ पुरुष आप विस्तारा ॥
सकल हंस तहँ बैठे पांती । सोरह रवि हंसनकी कांती ॥
पुहुप सेज सब हंस विराजा । तहँवाँ बुझाय नहिं रंक औ राजा ॥
कंचन भूमि देख अति शोभा । बरनौ कहा हंस तहँ लोभा ॥
राजा कीन्ह दण्डवत जबहीं । रानी पुत्र कीन्ह पुनि तवहीं ॥
अब नहिं भवमहँ जाऊ लिवायी । अति आनन्द बहुत सुखपायी ॥

सुकृत बचन

सुकृत उत्तर कहै समझायी । चलू राय गहिर जनि लायी ॥
जो तुम गहर लगावहु राजा । विनशे ठाट तब होय अकाजा ॥
तब पछतैहो राय भुपाला । ततक्षण बेगि चलो यहि हाला ॥

राजा भोपाल बचन

विनशे ठाट होय जरि छारा । अब नहिं छोड़ब चरण तुम्हारा ॥
ऐसा लोक छोड़ि नहिं जायब । बार बार तुहि माथ नवायब ॥
छन्द-राजा करै बहु बीन्ती तुम दीन बन्धु दयाल हौ ॥
हंसन नायक परम लायक काटिया फन्दा काल हौ ॥
चरण शरण आधीन समरथ शरण राखो आपनो ॥
दास जानि बन्ध छोरो काल तेहि नहिं पावनो ॥

सोरठा-अब हम शरण तुम्हार, दास जानि दाया करो ॥
आयो पुरुष दरबार, आपन कै प्रतिपालिये ॥

बचन-चौपाई

एती विन्ती राजा ठानी । ज्ञानी देश जलन्धर जानी ॥
भवसागर सो ज्ञानी आये । पुरुष दरश कीन्हा तब जाये ॥
दिना चार ऐसेहि चलि गयऊ । राजा खबरि कोई नहिं दयऊ ॥

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( १४ )

भोपालबोध

तबै पौरिया रावपहँ जायी । महल देखि कोइ नाहिँ रहायी ॥
कहँवा राजा कहँवा रानी । कहँवा पुत्र कुवँर रजधानी ॥
कहँवा बेटी है चन्द्रावति । ताकर रूप बरनो कौनी गति ॥
कहँवा रानी कामसुंगगा । परिमल अंग बसत जेहि संगगा ॥
रोवत गयउ पौरिया द्वारा । जाय सबन सों कीन्ह पुकारा ॥
जाति कुटुम्ब सब देखन आये । जिन राजा ते बहु सुख पाये ॥

साखी-देखत अमिहत राजाकी, भयी अचम्भो बात ॥

रोवत कुटुम्ब दीवान मिलि, किन यह कीन निपात ॥

नगर लोग व्याकुल भये, घरघर रोवन लाग ॥

की यहि राजा मारिया, सबहिन केर अभाग ॥

चौपाई

कहै पौरिया सुनो दिवाना । तुम हम बूझो हम सब जाना ॥
जिन्दा एक नगरमें आया । तासों राजा कौन ऊँकाया ॥
कह्यो राय मैं बहुत चिताई । तुरतहिँ जिन्दा कहँ मरवायी ॥
राजा बात नहीं पतियावा । वच सुनि राजा मोहि रिसावा ॥
राजा कहै मुक्तिकरदाता । अस नहिँ जाने करै निपाता ॥
मोर कहा माना नहिँ भाई । जस कीन्हा तस फल नित पाई ॥

साखी-वचन पौरिया सुनतही, विकल भये सब कोय ॥

आज गरासे राय कहँ, काल आसै लोय ॥

चौपाई

नगर लोग तब कीन्ह विचारा । सब मिलि भागौ करौ सम्हारा ॥

भूलि अन्य शब्द नहिँ चीन्हा । मारन काल तिहुँ पुर दीन्हा ॥

साखी-सुकृत अंश न पाइया, अन्धा गये भुलाय ॥

धन्य राम भोपाल है, गहे शब्द चित लाय ॥

मंत्रि आदिका राजाको महलमें न देखकर पश्चात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना

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बोधसागर

( १५ )

छन्द-गये राजा लोक कहैं तजिया सब मान गुमान हो ॥
इमि हंस धर्मनि जो मिले तुम देहु ताको पान हो ॥
कहै कबीर जो शब्द मानै सकल तजि नामे गहै ॥
अपवर्ग निश्चय ताहि कहैं नहि पला पकडत काल है ॥
सोरठा-जो हंसा इमि होय, शब्द सार तासों कहो ॥
काग चाल तिन खोय, हंस चाल गहि लोक लो ॥

इति श्रीप्रबंधभोपालबोध समाप्त

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्वादे भोपालबोधवर्णनो
नाम चतुर्थस्तरंगः


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इति

श्रीबोधसागरान्तर्गत
ग्रन्थभोपालबोध

समाप्त

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भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीगुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-जगजीवनबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदासः,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्गः, बम्बई-४०० ००४

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सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

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श्रीगणेशाय नमः

A faint, stylized illustration of Lord Ganesha seated on a lotus. He is depicted with four arms, holding a small object in his hands. Above him is a traditional umbrella (chhatra). The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a very faded print.

श्रीगणेशाय नमः

धर्मदास साहबका गर्भविषय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर

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सत्यकबीराय नमः

सत्यं शुद्धं गुणातीतं कंजपर्णसमुद्भवम् ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सद्गुरुं प्रणतोऽभ्यहम् ॥

अथ श्रीबोधसागरे

पंचमस्तत्रंगः

ग्रन्थ जगजीवन बोध

( गर्भ चिंतावनी )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कह सुनहु स्वामी । कहो गरभकी अन्तर्यामी ॥
कैसे जीव गरभ में आवे । कैसे जीव जठर दुख पावे ॥
कैसे जीव परवशै भयऊ । कैसे इन्द्री देह बनयऊ ॥
कैसे जीव अपने पद परसे । कैसे जीव समरथ पद परसे ॥
कैसे जीव कौल बँधावे । कैसे साहब दर्शन पावे ॥
सो सब भेद कहो गुरु ज्ञानी । घट भीतरका भेद बखानी ॥

सतगुरु-वचन

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । तुम घट भली बुद्धि परकासा ॥
प्रथमें सत्य नाम गुण गाऊँ । घट भीतर का भेद बताऊँ ॥
सबही जीव गर्भ में जावैं । कौल बान्ध कै बाहर धावैं ॥
चूके कौल गरभ का भाई । बारम्बार गरभ में जाई ॥
नौ नाथ सिद्धि चौरासी भारी । उनहुँ देह गरभमें धारी ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

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( २२ )

जगजीवनबोध

नौ अवतार विष्णु जो लीन्हा । उनहूँ गरभ वसेरा कीन्हा ॥
तेतिस कोटी देव कहाये । गरभ वास महाँ देह बनाये ॥
जोगी जंगम औ तप धारी । गर्भवास में देह सवारी ॥
गर्भ वास तब छूटे भाई । जब समरथ गुरु बाहँ गहाई ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

नारि पुरुष बांधे संयोगा । कामबाण लगि देहसुख भोगा ॥
सप्त धातुका अंग बनाया । जिह्वा दांत सुख कान उपाया ॥
हाथ पावैं रु शीस निर्माया । सुन्दर रूप बनी बहु काया ॥
नख शिख काहू नर बहु कीन्हा । दशही द्वार युक्ति करि लीन्हा ॥
दश द्वार नौ नाडि बनायी । ऐसे सबतर बन्ध लगायी ॥
दीन्हा ठेक बहतर भारी । नाडी बन्धन बहुत अपारी ॥
नाद विन्दुसों काथ निरमायी । तामैं प्रकृती आन समायी ॥
हृद कारिगर हुन्नर कीन्हा । जैसे दूधमें जामन दीन्हा ॥
तीनसों साठ चार बन्ध लायी । सोलह खाईं तहां बनायी ॥
सोलह खाईं चौदह दर्वाजा । अठहूँ हाथ गढ़ खूब विराजा ॥
छाजे महल अधिकही छाजा । तामैं जीव जो आनि विराजा ॥
अजब महल बहु खूब बनाया । छठे महल हंस चितवन लाया ॥
छठे मांस में सुरती आयी । दुख सुखकी तब पारख पायी ॥
छै मासको भयो जब प्रानी । दुख सुखकी मति सबै पहिचानी ॥
ओंघे सुख झूले लटकंता । मैल बहुत तहाँ कीच रहता ॥
जठर अग्नि तहाँ बहुत सतावै । संकट गर्भ तहाँ अन्त न आवै ॥
बहुत सांकीरी पिंजार पोई । तडफटै बहुत निकसे नहिं जोई ॥
सुखसों बोल निकसि नहिं आवै । करुना करि मन में पछितावै ॥
अरुझे श्वास रोवै मन माहीं । कौन करमगति लागी आहीं ॥
करुणा करि मन में पछितावै । ज्यों करीब कंठ करद बैठावै ॥

जगजीवनका गर्भके कष्टसे व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कौल करना

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बोधसागर

( २३ )

ता दुःखकी गति कासु कहीजै । करम उनमानतहैं दुःख सहीजै॥
यदि आलोच करै मनमाही । संगी मित्र कोइ दीखत नाही ॥
पिछला जनम जब सूझा भाई । तब जिव दिलमा चिता आई ॥
स्त्री मित्र कुटुम्ब परिवारा । सुत नाती औ सैन पियारा ॥
संगी सुजन बन्धु औ भाई । गरभ कि चीन्ह परी नहिं ताई ॥
महा दुःख सो गरभ में पावे । बहुत वैराग हियामें आवे ॥
सूझी सकल बाहरकी बाती । जो जिव पिछली होती जाती ॥
जब जिव गरभमें ज्ञान विचारा । अब मैं सुमरूं सिरजन हारा ॥
सोच मोह जिव कछू न कीजै । अब सदगुरु का शरणा लीजै ॥
जिव अपने दिल माहि विचारे । तब समरथ को कीन पुकारे ॥
सुनु धर्मदास यक कथा सुनाऊँ । यक राजाको जस बने बनाऊँ ॥
राय जगजीवन ताहिकर नामा । जब वह पहुँच्यो एही ठामा ॥
करन विन्ती लागु अधीरू । सतगुरु कहैं तब कीन्ही टेरू ॥

जगजीवन वचन

साहिब संकट दूर निवारो । मैं निज खानाजाद तुम्हारो ॥
दिल मैं करूणा करै अतिभारी । अब मोहि साहब लेहु उबारी ॥
करै अस्तुति बहुते सुधिलावै । तुम वितु खाविन्द कौन छुडावै ॥
अब दुःख दूर निवारो स्वामी । कौल कहूँ प्रभु अन्तरयामी ॥
बाहर निकारो आदि सनेही । बहु दुःख पावै मेरी देही ॥
मैं जन प्रभुको दास कहाऊँ । आन देव के निकट न जाऊँ ॥
सतगुरुका होय रहों चेरा । दम दम नाम उचारूँ तेरा ॥
नित उठि गुरु चरणामृत लेऊँ । तन मन धने निछावर देऊँ ॥
जो मैं तन सों कहूँ कमाई । अर्थमाल मैं गुरुहि चढाई ॥
कुबुद्धि सीख काहु नहिं मानूं । हराम माल जहर करिजानूं ॥
कुलकी त्यागूं मान बढाई । निर्मल ज्ञान एक संत सगाई ॥

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( २४ )

जगजीवनबोध

रात दिवस ऐसे लव लाऊँ । करत फुरत भक्ति गुरु कराऊँ ॥
दुःख सुख परे सो तनसे सहूँ । भक्ति दृढ़े गुरु चरणै रहूँ ॥
परत्रिया ताकूँ नहिं कोई । जननी बहन करि देखूँ सोई ॥
दुष्ट बैन कबहुँ नहिं खोलूँ । शीतल बैन सदा सुख बोलूँ ॥
स्वास उस्वासमों रटना लाऊँ । आन उपाय एको नहिं चाऊँ ॥
तन मन धन निछावर देखूँ । सतगुरु का चरणामृत लेऊँ ॥
सतगुरु कहैं सोई अब करिहौँ । आज्ञा लोप पाओं नहिं धरिहौँ ॥
और सकल बैरी कर जानूँ । सद्गुरु कहैं मित्र कर मानूँ ॥
ज्ञान बतावै सोई गुरुदाता । तन मन धन अरपूँ उन ताता ॥
तन मन धन मैं उनको देखूँ । नित उठि गुरुचरणामृत लेऊँ ॥
यहि गर्भवासमें कौल बधाऊँ । बाहर निकारो धुर निबाऊँ ॥
जो मैं छूटूँ गरभ सबेही । तन मन अरपूँ औ गुरु देही ॥
एक नाम सांचा कर मानूँ । और सबै मिथ्या कर जानूँ ॥
कहा अस्तुति करें गुसाई । बहुत दुःख पावत हूँ या ठाई ॥
यहां कोई मित्र नहिं भाई । मातु पिता नहिं लोग लुगाई ॥
देवी देवका कछु न चालै । गुरु विन कौन करै प्रतिपालै ॥
अब तो खबर परी यहि ठाहीं । और कोईका चालै नाहीं ॥
पिछली बात मैं हृदय जानी । कोई काहूँका नहीं रे प्राणी ॥
अपने साथ चलेगा सोई । जो कछु सुकृत करे सो होई ॥
मद माया में जीव भरमाया । सो तो कोई काम न आया ॥
बहुत विचार किया मैं सोई । अन्तकाल अपनो नहिं कोई ॥
ऐसी करुणा करै विचारा । दया करो दुःख भंजन हारा ॥

साहिब वचन

तब साहिब यों कहै पुकारा । कहि समझाया तोहि बारम्बारा ॥
अनेक बार गरभमें आया । तैं रतीकर्म भरम नहिं पाया ॥

साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर गर्भसे मुक्त करना

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बोधसागर

( २५ )

कई बेर तैं कौल बँधावा । कई बार तैं गर्भ में आवा ॥
गर्भ में ज्ञान उपजा है तोही । संकटमें सुमिरे सब कोही ॥
बाहर निकसि नहिं उपजे ज्ञाना । अंधकार अहंकार समाना ॥
बार अनेक भुलाना भाई । नहिं सतगुरु की दीक्षा पाई ॥
गरभ त्रास तब छूटै भाई । जब सतगुरु कहैं बाँह समार्ई ॥

जगजीवन वचन

बोलत वचन कहो गुरु देवा । जीवकी अवधि बताओ भेवा ॥
दीन दयाल दया गुरु कीजै । बूडत जीव आपन करि लीजै ॥
दयावंत गुरु दीन दयाला । मुक्तिरूप जीवन प्रतिपाला ॥
मोको अभय दान गुरु दीजै । अन्दर ज्ञान उजालो कीजै ॥

सतगुरु वचन

गरभ बासमें कौल बन्धावा । सो कैसे तैं न बाहर निर्वावा ॥
बडु संकट तोहि उपजे ज्ञाना । बाहर निकसत सब विसराना ॥
जोई जीव कौल निर्वाहै । सोई नहिं गरभवास मईं आहै ॥

जगजीवन वचन

अब नाहीं भूलें गुरु देवा । तन मन लाय कहूं गुरु सेवा ॥
मोकैं बाहिर काढो स्वामी । कौल न चूकैं अन्तर्यामी ॥

सतगुरु वचन

कौल बोल सब चौकस कीना । तबहीं गर्भ सों बाहर लीना ॥
नौवे मास जो बाहर आया । लोग कुटुम्ब सबही सुख पाया ॥
सबही हरष करें मन माई । पुत्र हेतु सब करें बधाई ॥
बाजा बाजे करै उछावा । गीत नाद आधिके चितआवा ॥
सबै सजन मिलि गूड़ बँटावा । रैन समय तिय मंगल गावा ॥
नगरलोक सब करें बधाई । घर घर साजे देह लुगाई ॥
घर राजाके जनम सो पढ़या । कौल किया सो सब विसरैया ॥
पीसुन मिले सबहिं धुतारा । सबहीं ज्ञान भुलावन हारा ॥

पिशुन कर्म वर्णन

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( २६ )

जगजीवन बोध

ताका नाम सुनो रे भाई । महा जालके फन्द फँदाई ॥
झूठे झूठ मिले संसारा । नरक कुण्ड में नाखन हारा ॥

पिसुन कर्म वर्णन

प्रथम माता

माता मनमें करै बखाना । यह भल उग्यो आजुको भाना ॥
बालक जन्मा मोरे कोखा । जन्म भरे की भागी धोखा ॥

नाइन

नाइन एक बधार्ई लायी । तीन तो एकै बात जनायी ॥
मेरा कहा करो तुम कामा । नाक छेदि कहो नाथू नामा ॥
नाल औवल पीसो गाढो । दिहली को तब बालक काढो ॥
यह तो बात मैं गुप्त सुनायी । सुवा जिवाका तो सुहि दायी ॥

पिता

पिताके मनमें ऐसी आवैं । उमगे हरष हिय नाहि समावैं ॥
बाटे पान मिठाइ बहुत । धन्य भाग्य मोर जनम्यो पूता ॥

काका

काका कहै मैं उतरूं पारा । बालक खेले घरके द्वारा ॥
कर्म जोर मोरें बड कीन्हा । क्षेत्रपाल मोहि बालक दीन्हा ॥

दादा

दादा सुनिकै दौरे आये । पोता देख बहुत सुख पाये ॥
दासी हाथे कुवैर मैगाया । हेतु प्रीति से कण्ठ लगाया ॥

दादी

दादीके मन हर्ष अपारा । लेत बलाई बारंबारा ॥
मैं करी बहुत सतियनकी सेवा । भये प्रसन्न मोर कुलदेवा ॥

नानी

नानी आवत वेगि उठाया । सुख चुम्बा है कण्ठ लगाया ॥
लून ले शिर ऊपर वारा । द्रव्य माल पुनि बहुत उतारा ॥

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बोधसागर

( २७ )

नाना

अब नाना मुख देखन आया । दौहित्रा देखि अधिक मुख पाया ॥
उमँगे हरष हिये न अमायी । कंचन चूरा दिया बधायी ॥

भुआ

बहुत करै हरष भुआ बाई । दिन दिन अधिकी करै बधाई ॥
मुख चुम्बा दै कंठ लगावे । हिये हर्ष उमँग नहिं मावे ॥

मौसी

मौसी मन बहु हर्ष उठावै । धन्य बहिन को कोख तरावै ॥
मुख चूमे अरु कण्ठ लगावै । अतिशय उमँग हिये नहिं मावै ॥

अडोसी पडोसी

बुढिया एक जो बोले आयी । तिन यक बात कही समझायी ॥
बालक तैल लौन सों लीजै । लौना नाम कहे धरि दीजै ॥

दूसरी पडोसिन

दूजी कहै सुनो रे बाई । बालक डारो छीतर माई ॥
सांचो टोना यही कहावों । इनको छीतर कहि बतलावो ॥

तीसरी पडोसिन

तिया तीसरी बोले सयानी । मैं जान्यों सो काडु न जानी ॥
कोदरा बरोबर तौल के लीजै । याकर नाग कोदरसिंह कीजै ॥

चौथी पडोसिन

चमरिन गोद यहीको डारो । मोल लेइ पुनि ताहि उजारो ॥
चमरूसिंह नाम यहि केरा । बालक याते जिवै घनेरा ॥

पांचवी पडोसिन

याको धूर गुनौरे डारो । दूत पराछित या विधि मारो ॥
घूरन सिंहै अरु गेनौ नामा । दीजे ताहि सुधरे सब कामा ॥

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( २८ )

जगजीवनबोध

छठी पडोसिन

यह सब बात बताओ माई । चूल्हे डारो चुल्हन कहाई ॥
जेती नारि आर्यों तेहि बारा । सबहिन आपन मता उचारा ॥
कोह काहू कोह काहु बतावैं । स्यानप आपन सबहि जतावैं ॥

ओझा और स्याने

बुढवै एक जो सीस धुनावैं । वाके शिर पर भैरों आवैं ॥
सो कह हमको बैल बधाओ । भैरोंसिघ कही बतलाओ ॥
देवी पूजक एक तब आया । देवीसिंह तब नाम बताया ॥
गाजी मुर्गी कोह चढ़ावैं । गाजीदीन तब नाम बतावैं ॥
यहि विधि अनेकनहू आये । आपन आपन उक्ति सुनाये ॥

पुरोहित

घरको पुरोहित ऐसी कही । मनको मनोरथ पूरण सही ॥
यह तो बडा सपूत कहावै । इनके तुलै कोह नहीं आवै ॥
पुरोहित कह यजमान है मेरा । कुल देवी भैरोंका चेरा ॥

चारण और भाट

चारण भाट जपै महामाई । भोजक भाट तहां चलि आई ॥
सबही मिलि दीनी आशीशा । महामाइ सुत कीन्ह बरखीशा ॥

मुसलमान फकीर

दवैश एक कहै समुझाई । नाम फकीरा कहो रे भाई ॥
बांधि गांठ गले में दीजे । सब पीरों का चारण लीजे ॥

योगी

जोगी एक तहां चलि आया । मेरी भभूत का परचा पाया ॥
कहा हमारा सुनिकै लीजे । याका नाम सदाशिव दीजे ॥

दिगम्बर

यन्त्र मन्त्र जतीकरि लाये । करि तावीज गले पहराये ॥
व्रत्र वटु सूअरदांत मंगायी । एक सुपारी माहि मढायी ॥