Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Report a copyright issue

Devanagarihipublished2,136 pages

About this granth

The Kabir Sagar (कबीर सागर) is the large scriptural corpus of the Kabirpanth, especially its Dharamdasi branch, cast mainly as dialogues between Kabir and his disciple Dharamdas. It gathers many works, among them the Gyan Sagar, the Anurag Sagar and the various books of the Bodh Sagar, into eleven parts, and is the main source for the sect's cosmology, lineage and practice.

The sections of the first part, the Gyan Sagar, give a sense of its content: the kinds of liberation and the immortal realm, the True Being, the origin of creation and the islands of the cosmos, Dharmaraya (Niranjan) winning an island and Mansarovar by serving the True Being, his swallowing of Kamini and the curse laid on him, the descent of the Gyani (Kabir) to earth and his pact with Dharmaraya, the founding of Jagannath, the three gods and Adi Maya, the churning of the ocean, the origin of the Vedas and the four classes of birth, and the stories of Bali, the Sanakas and Narada.

This complete eleven-part edition is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai. Its 2,136 pages bring the entire Kabir Sagar together for students of the Kabirpanth.

Page 583Permalink

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

Page 584Permalink

A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or sage, holding a staff or lotus, with a small figure to the right. The figure is depicted in a meditative or seated posture, wearing robes. Above the figure is a small, triangular, umbrella-like structure. The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a faded print on the page.

विष्णु विष्णु वि

धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तर

Page 585Permalink

सत्यकबीराय तमः

यस्योपदेशमाराध्य नरो मोक्षमवाप्नुयात् ।
तं कबीरमहं वन्दे मनोवाक्यायकर्मभिः ॥

अथ श्रीबोधसागरे

चतुर्थस्तरंगः

श्रीग्रन्थ भोपालबोध प्रारंभः

धर्मदासवचन चौपाई

धर्मदास कहे बन्दी छोरा । कैसे जीवन मारत चोरा ॥
केहि विधि जीवन मारत आई । साहिब सो मोहि भाष सुनायी ॥
कारण कौन मारत यम जीवा । मारन काल कौन है नीवा ॥

सतगुरु वचन

सद्गुरु कहै अंश सुनु वानी । महा कालकी कहौं निशानी ॥
धर्मराय आज्ञा जब करई । तबहीं मीच पृथ्वी पग धरई ॥

धर्मराय वचन

भयी मृष्टि बहुत अधिकार्ई । पृथ्वी भार न जाय सहाई ॥
ताते मीच पृथ्वी तुम जाऊ । जीवन धरि हम पर ले आऊ ॥
आनो जीव हमारे पास । जाहु मीच पृथ्वी करु बासा ॥
पवनरूप घट जाइ समाओ । जीवन जाय बाँधि ले आओ ॥
खांसी जूडी ताप तिजारी । काम क्रोध होउ रोग अपारी ॥

कबीर साहबका जालंधर देशमें राय भोपाल के घर जाना

Page 586Permalink

( ६ )

भोपालबोध

लोभ मोह भ्रम फाँस अपारा । यह नहीं मर्म लखै संसारा ॥
यहि फन्दा जग सबहिं फन्दाओ । विरले हंस सुकृत बन्दाओ ॥
साखी-यहि विधि जगमें जाइके, जीव लाउ हम पास ॥
फन्दा डारहु जीव पै, होहु मीच दुख रास ॥

चौपाई

यहि विधि काल जब आज्ञादीना । चले यमदूत सब साज सजीना ॥
उत पुरुष आज्ञा मोहि दीन्हा । जीव सुक्तावन कहै पठावन लीन्हा
कहे पुरुष सुनु ज्ञानी बाता । काल करे अब जीवन घाता ॥
घात करी सो भक्षण करिहै । बहुरि जीव भौसागर परि है ॥
काल दुष्ट बहु जीव सतावै । सारशब्द विनु मोहि न पावै ॥
याते जगमहँ अब तुम आओ । जीवहिं चिताय लोक कहँ लाओ ॥
आज्ञा मोरि लेहु सहिदाना । जाइ जगत जीव लाओ निदाना ॥
साखी-सुकृत जाहु संसार में, उल्टी राह चलाउ ॥
शब्दसार जीवन कहो, काल हंस सुक्ताउ ॥

चौपाई

पुरुष आज्ञा हम शिर मानी । करि प्रणाम तब जगत पयानी ॥
देश जलंधर राय भोपाला । गयउ तहां जिन्दाके हाला ॥
जाई पौरिमें ठाढ रहायी । कह्यो पौरिया बहुत चितायी ॥
राजहिं लाउ हमारे पास । दर्शन करै कर्म नृप नासा ॥
लागे कुंजी कुलुफ किवौरा । बहुत लोग बैठे शठिहारा ॥
कोइ कहै न्याय जिन्द चाहै । कोइ कहै बटपार यह आहै ॥
कोई कहै मारि यहि खेदो । निर्गुण भेद तिन्है नहिं भेदो ॥
चारि पहर तब रैन बितावा । भयो भिनसार भोर हो आवा ॥
तब हम चरित दिखावन लागे । फूटि कपाट भये दोह भागे ॥

राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करना

Page 587Permalink

बोधसागर

( ७ )

सबै कँगूरा भुइ खसि परेऊ । ज्ञानी चली राय पहुँ गयऊ ॥

साखी-चकित सकल पौरिय, पाछे लगि सब धाय ॥

जहाँ राय भोपाल हैं, तहाँ पोरिया जाय ॥

चौपाई

करत गोहार पौरिया जाई । मार मार बहुत हकराई ॥

राय भोपाल बैठि जहाँ राजे । गये पौरिया तहाँ सब भाजे ॥

कीन्ह सलाम दोई कर जोरी । यह जिन्दा बटपार बडचोरी ॥

कहैं पौरिया पौर उचारो । तुरत बुलाओ राय यहि बारो ॥

जिन्दा वचन नहीं हम माना । बीत रैन भये भोर सुजाना ॥

मंत्र एक जिन्दा तब करिया । फूट कपाट कँगूरा गिरिया ॥

तब जिन्दा आयो महाराजा । हम आये तेहि पीछे भाजा ॥

ना जानौ कौन यह आही । होय बटपार धसा घर माही ॥

साखी-हो राजा महाराज मम, कहचो सत्य हम बात ॥

तत्क्षण जिन्दा मारहु, नातौ सब पर घात ॥

चौपाई

सुनो पौरिया कहे अस राजा । सुनिये वेद करौ तव काजा ॥

विप्र बुलाय सुनो मतिमाना । करिये तबै विवेक सुजाना ॥

आज्ञा वेद होय तब मारा । नहिं तो जिन्दा कहा बिगारा ॥

एतिक वचन राय सुख बोला । साहब आसन तवहीं डोला ॥

तत्क्षण हम अस लीला कीन्हा । रायमहल सोने करि दीन्हा ॥

कंचन कपाट रतनकी पांती । विपरीत बने खम्भ बहु भांती ॥

बने कँगूरा रतन रसाला । चकित राजा भये भोपाला ॥

साखी-भयो विवेक मन रायके, देखत मन पतियाय ॥

कौन पुरुष तुम समरथ, मोहैं कहैं दरश दिखाय ॥

राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकटना

Page 588Permalink

( ८ )

भोपालबोध

ज्ञानीवचन चौपाई

सत्य पुरुषके हम शठिहारा । जीवन काज आये संसारा ॥
पुरुष लोक सत्य परवाना । ताका मरम कोई नहि जाना ॥

साखी-हो राजा भोपाल सुनु, चीन्हौं यमका जाल ॥

शब्द हमारा परखहु, नातो पैहो काल ॥

चौपाई

छोडहु राम नाम हित जाना । सद्गुरु बचन गहो मतिमाना ॥

अलख निरञ्जन छाडो देवा । भ्रम तजिकरु सतगुरुकी सेवा ॥

सुमता होय करो दृढ करनी । पहुँचो लोक पुरुषकी शरनी ॥

आवागमन रहित होय जाऊँ । जो प्राणी सत्यगुरु कहैं पाऊँ ॥

पुरुष अवाज जाव उबराई । ताते दर्शन दीन्ह तोहि भाई ॥

छन्द-करहु राजा भक्ति दृढ होय छोडु राजा गुमान रे ॥

नारि पुरुष पुत्र पुत्री लेहु हिलिमिलि पान रे ॥

पुरुष नाम ले करहु आरती जीव तृण तुराय के ॥

पुरुष अंक ले पाव वीरा काल गहे नहि आयके ॥

राजा भोपाल वचन चौपाई

तब राजा बन्दे दोनों पाई । करगहि महलन लैं जाई ॥

धन्य भाग मोहि दर्शन दीना । अधमजीव आपनकरि लीना ॥

कुटिल कठोर अधम अघपापी । दर्शन दीन छुटै त्रयतापी ॥

महामोह तम पुञ्ज अपारा । वचन तुम्हार कीन रविधारा ॥

उठो सुधर्मा मन चित लायी । साहब चरण पखारहु आयी ॥

छन्द-गुरु ब्रह्म रूप प्रकाश अघहर पुंज तमहिं विदारनं ॥

मुक्ति दाता अखिल ज्ञाता कोटरवि छवि वारणं ॥

सोई रूप धरि जगत प्रगट होय जिन दीन पतितन दुख हरे ॥

भवसिन्धु ताप बुझाय शीतल जीव गहि आपन करै ॥

रानीका सद्गुरुके अधीन होना

Page 589Permalink

बोधसागर

( ९ )

सोरठा-निज मन सुकुर सुधार, गुरु पदपंकज उर धारिए ॥
मिटै सकल अँधियार, अस्थिर घर तब पाइए ॥

चोपाई

राजा आज्ञा रानी मानी । साहब चरण पखारे आनी ॥
कश्चन झारी ले जल धायी । साहब चरण पखारी आयी ॥
राजा रानी चरण धुवाये । अँचरन रानी तबहि पुछाये ॥
चरण हिये मन्थे पर लायी । चरणाभूत सबही मिलि पायी ॥
कीन्ह दण्डवत पलपल रानी । साहब दरस दीन्ह भल आनी ॥

रानी वचन

साखी-हमहिं जनि भार चढ़ावहु, हमरे नाम कबीर ।
अगम निगम वह पुरुष है, जे गहि लागो तीर ॥

रानी वचन-चोपाई

सुनिके रानी वचन पतियानी । तब साहब सों बिननी ठानी ॥
और पुरुष जानो नहिं नीका । तुम सतपुरुष आहु यहि जीका ॥
तुमहि पुरुष आहु दृढ़ जानी । और पुरुष नाहीं मन मानी ॥
रानी कहै सुनो महाराजा । साहिब आये तुमरे काजा ॥
रानी कहै बेगि गहु चरना । काल अजापी है निज मरना ॥
आये पुरुष हमारे पास । हमरे मनकी पूजी आसा ॥

रानी वचन

सुनहु राय रानी निज वचना । यह तो जाल कालकी रचना ॥
मेटहु काम कोध हंकारा । माया मोह तजौ संसारा ॥
ज्ञान हेतु दृढ़ करनी करई । आवागमन का पूग परई ॥
तजि संसार शब्द कहँ ध्याओ । गुरुगम पुरुष नाम चितलाओ ॥

साखी-ना फिर जन्मे जोइनि ना, स्वर्ग नर्क को जाय ॥
सो हंसा रहित भये, अजर अमर घर पाय ॥

Page 590Permalink

( १० )

भोपालबोध

यह तो माया जाल है, कठिन बीर झतवाल ॥
जीव शब्द न मानई, यक दिन खेहे काल ॥
मोह नदी विकराल है, कोई न उतारे पार ॥
सतगुरु केवट साथ ले, हंस होय यम न्यार ॥

चौपाई

कोटि जुहार होत नित तोहीं । कैसे कै लौ लावहु मोहीं ॥
कैसे छोड़ो राज गुमाना । किमि छोड़ो पाखण्ड अभिमाना ॥
कैसे छाड़हु राज बड़ाई । कैसे छाड़हु सुख चतुराई ॥
बैठि सभा बोलहु हँसि बाता । कुँवर पचास संग निशि राता ॥
बैठि महल महाँ खेलहु सारी । कामिनि के संग सदा बहारी ॥
छुटे न नाति कुटुम्ब की आशा । छुटे न कश्चन भोग विलासा ॥
सारखी-यह सुख कैसे छोड़िहो, हम तो कथे निरास ॥
सैन चैन जब छोड़हु, चलहु पुरुषके पास ॥

राजा भोपाल वचन

कहै राय सुनिये गुरुदेवा । मोकहाँ राखु चरन की सेवा ॥
मस्तक मोर दीजिये हाथा । दम अघ करमी होयँ सनाथा ॥
छोड़ो सहस बीस मैं हाथी । अब मैं चलौं तुम्हारे साथी ॥
अब हम दौलत छोड़ैं तुर्गंगा । छोड़ों सकल कामिनी संगा ॥
देह गर्व औ राज गुमाना । छोड़ैँ सकल भक्ति मनमाना ॥
जब तुम अमृत वचन पुकारा । तेहि क्षण छूटा सकल विकारा ॥
छन्द-दया निधान करूणा विलोकहु महादारुण दुःख दहै ॥
मैं अधम जीव अघोर अकरमी पतित पावन पद गहै ॥
तुम ज्ञान घन विज्ञान आगर धर्म कंटक मर्दन ॥
तुव नाम अमोल समरथ करहु दया निर्धन ॥

राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना

Page 591Permalink

बोधसागर

( ११ )

सोरठा-अविरल भक्ति तुम्हार, पूरे भागते पाइये ।
विनवों बारम्बार, पुरुष दरश करवावहू ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

नाम पदार्थ देउँ मैं तोहीं । तैं राजा चीन्हा दृढ मोहीं ॥
पुरुष नाम एक यज्ञ कराओं । जेहि नाम ते हंस बचाओं ॥
जरी केर एक चन्दोवा तानो । कञ्चन केर सिंहासन आनो ॥
दिवालगिरी लागे जरकेरा । मोतिन झालर लागु घनेरा ॥
मोतिन लै भर थार धराऊँ । तापर आरति जोति लसाऊँ ॥
कंचन कलसा पाँचो वाती । झारीजल हीर लै पाती ॥
पूंगी फल औ स्वेत मिठाई । चन्दन पान धरो तहैं लाई ॥
कदलीफल उत्तम तहैं जानो । मेवा अष्ट युक्त प्रमानो ॥
कदलीपत्र कपूर सुगन्धा । आमपत्र लै चहु दिशि बन्धा ॥
सात हाथ वस्तर ले स्वेता । पुष्प गुलाब कहौ मरु केता ॥
नौ रतन लै थार धरायी । मनि मानिकके मध्य रहायी ॥
यह सब विधि जब दीनबतायी । राजा सबही लीन सजारी ॥
चौका बैठे सतगुरु जबहीं । रानी गाय चरण गहे तबहीं ॥
सवा लाख दीपक तहैं बारी । बहु आनन्द शब्द विस्तारी ॥
सब मिलि हाथ नारियल लीन्हा । आगे धरा दण्डवत कीन्हा ॥
राजा तृण धरे मुख माँहीं । भये अधीन बांधि कर आहीं ॥

राजा भोपाल वचन

तुम दीननके आहु दयाला । कृपा कीन्ह मोहि प्रतिपाला ॥
अब जनि मोसन करहु दुराई । अपने कर लीजै सुकताई ॥
यहि संसार नाहिं मम काजा । दारुण महा काल है राजा ॥
अब तुम आपन लोकदिखाओ । महा पुरुष के दर्श कराओ ॥

राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना

Page 592Permalink

( १२ )

शोपालबोध

सत्गुरु वचन

नौ नारी मिलि विन्ती करई । कुवर पचास ठाढ़ तहँ रहई ॥
बेटी एक सुरजकी जोती । ताहि लिलार पुहे जनु मोती ॥
साहब चरण धरा तिन आई । अब हम चरणछोड़ि नहिं जायी ॥
कीन्ह आरती नरयर मोरा । सकल जीवके तिनुका तोरा ॥
सुकृत अंश बुलाये ज्ञानी । पुरुष दरश कर राजा आनी ॥
लै अमरावहु लोक द्वारा । पल महाँ लाय ठाढ़ बैठारा ॥
दिना चार लगी राख्यो काया । वेगी जाय पुरुष पहाँ आया ॥
लिखिलिखिपान सबन कहँदीना । सकलो जीव वन्दन कीना ॥
जेते जीव परवाना पावा । तेते हंसा लोक सिधावा ॥
काया छोड़ि हंस चले आगे । सत्य सुकृत के चरनन लागे ॥
लागी डोर पुरुषके पास । तवै दूत यक कियो तमाशा ॥
सुकृत संग हंस सब जेते । आये दूत कला धरि तेते ॥
छाप तिलक तब विरचि बनायी । मारगमाँहि ठाढ़ भय आयी ॥
आओ हंस पुरुषके पास । नातो होवै ठाट विनाशा ॥
बोले दूत हंस कहँ जायी । हम गुरुज्ञानी तोंहि सहायी ॥
हमरे संग चलो हो राजा । हमरे शरण काल उठि भाजा ॥
हंस रूप तुम धरि बटपारा । हम नहिं फन्दा परै तुम्हारा ॥
सुकृत कहै हंस चलि आज । हमरे संग काल नहिं पाऊ ॥
बाएँ अंग कालका धारा । दहिने पाँजी अहै हमारा ॥
ताहि द्वार होय सुरति लगाओ । बेगि दरश पुरुषके पाओ ॥
सुकृत सागर पहुँचे जायी । अहो हंस तुम लेहु नहायी ॥
सकल हंस मिलि पैठि नहावा । निरखै द्रौप द्रौपका भावा ॥

Page 593Permalink

बोधसागर

( १३ )

देखहिं लोक लोककी रचना । तब टेके सुकृतके चरना ॥
बैठे लोकमहँ हंस निहारा । जहँवाँ पुरुष आप विस्तारा ॥
सकल हंस तहँ बैठे पांती । सोरह रवि हंसनकी कांती ॥
पुहुप सेज सब हंस विराजा । तहँवाँ बुझाय नहिं रंक औ राजा ॥
कंचन भूमि देख अति शोभा । बरनौ कहा हंस तहँ लोभा ॥
राजा कीन्ह दण्डवत जबहीं । रानी पुत्र कीन्ह पुनि तवहीं ॥
अब नहिं भवमहँ जाऊ लिवायी । अति आनन्द बहुत सुखपायी ॥

सुकृत बचन

सुकृत उत्तर कहै समझायी । चलू राय गहिर जनि लायी ॥
जो तुम गहर लगावहु राजा । विनशे ठाट तब होय अकाजा ॥
तब पछतैहो राय भुपाला । ततक्षण बेगि चलो यहि हाला ॥

राजा भोपाल बचन

विनशे ठाट होय जरि छारा । अब नहिं छोड़ब चरण तुम्हारा ॥
ऐसा लोक छोड़ि नहिं जायब । बार बार तुहि माथ नवायब ॥
छन्द-राजा करै बहु बीन्ती तुम दीन बन्धु दयाल हौ ॥
हंसन नायक परम लायक काटिया फन्दा काल हौ ॥
चरण शरण आधीन समरथ शरण राखो आपनो ॥
दास जानि बन्ध छोरो काल तेहि नहिं पावनो ॥

सोरठा-अब हम शरण तुम्हार, दास जानि दाया करो ॥
आयो पुरुष दरबार, आपन कै प्रतिपालिये ॥

बचन-चौपाई

एती विन्ती राजा ठानी । ज्ञानी देश जलन्धर जानी ॥
भवसागर सो ज्ञानी आये । पुरुष दरश कीन्हा तब जाये ॥
दिना चार ऐसेहि चलि गयऊ । राजा खबरि कोई नहिं दयऊ ॥

Page 594Permalink

( १४ )

भोपालबोध

तबै पौरिया रावपहँ जायी । महल देखि कोइ नाहिँ रहायी ॥
कहँवा राजा कहँवा रानी । कहँवा पुत्र कुवँर रजधानी ॥
कहँवा बेटी है चन्द्रावति । ताकर रूप बरनो कौनी गति ॥
कहँवा रानी कामसुंगगा । परिमल अंग बसत जेहि संगगा ॥
रोवत गयउ पौरिया द्वारा । जाय सबन सों कीन्ह पुकारा ॥
जाति कुटुम्ब सब देखन आये । जिन राजा ते बहु सुख पाये ॥

साखी-देखत अमिहत राजाकी, भयी अचम्भो बात ॥

रोवत कुटुम्ब दीवान मिलि, किन यह कीन निपात ॥

नगर लोग व्याकुल भये, घरघर रोवन लाग ॥

की यहि राजा मारिया, सबहिन केर अभाग ॥

चौपाई

कहै पौरिया सुनो दिवाना । तुम हम बूझो हम सब जाना ॥
जिन्दा एक नगरमें आया । तासों राजा कौन ऊँकाया ॥
कह्यो राय मैं बहुत चिताई । तुरतहिँ जिन्दा कहँ मरवायी ॥
राजा बात नहीं पतियावा । वच सुनि राजा मोहि रिसावा ॥
राजा कहै मुक्तिकरदाता । अस नहिँ जाने करै निपाता ॥
मोर कहा माना नहिँ भाई । जस कीन्हा तस फल नित पाई ॥

साखी-वचन पौरिया सुनतही, विकल भये सब कोय ॥

आज गरासे राय कहँ, काल आसै लोय ॥

चौपाई

नगर लोग तब कीन्ह विचारा । सब मिलि भागौ करौ सम्हारा ॥

भूलि अन्य शब्द नहिँ चीन्हा । मारन काल तिहुँ पुर दीन्हा ॥

साखी-सुकृत अंश न पाइया, अन्धा गये भुलाय ॥

धन्य राम भोपाल है, गहे शब्द चित लाय ॥

मंत्रि आदिका राजाको महलमें न देखकर पश्चात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना

Page 595Permalink

बोधसागर

( १५ )

छन्द-गये राजा लोक कहैं तजिया सब मान गुमान हो ॥
इमि हंस धर्मनि जो मिले तुम देहु ताको पान हो ॥
कहै कबीर जो शब्द मानै सकल तजि नामे गहै ॥
अपवर्ग निश्चय ताहि कहैं नहि पला पकडत काल है ॥
सोरठा-जो हंसा इमि होय, शब्द सार तासों कहो ॥
काग चाल तिन खोय, हंस चाल गहि लोक लो ॥

इति श्रीप्रबंधभोपालबोध समाप्त

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्वादे भोपालबोधवर्णनो
नाम चतुर्थस्तरंगः


Page 596Permalink

इति

श्रीबोधसागरान्तर्गत
ग्रन्थभोपालबोध

समाप्त

Page 597Permalink

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीगुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-जगजीवनबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदासः,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्गः, बम्बई-४०० ००४

Page 598Permalink

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

Page 599Permalink

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

Page 600Permalink

श्रीगणेशाय नमः

A faint, stylized illustration of Lord Ganesha seated on a lotus. He is depicted with four arms, holding a small object in his hands. Above him is a traditional umbrella (chhatra). The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a very faded print.

श्रीगणेशाय नमः

धर्मदास साहबका गर्भविषय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर

Page 601Permalink

सत्यकबीराय नमः

सत्यं शुद्धं गुणातीतं कंजपर्णसमुद्भवम् ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सद्गुरुं प्रणतोऽभ्यहम् ॥

अथ श्रीबोधसागरे

पंचमस्तत्रंगः

ग्रन्थ जगजीवन बोध

( गर्भ चिंतावनी )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कह सुनहु स्वामी । कहो गरभकी अन्तर्यामी ॥
कैसे जीव गरभ में आवे । कैसे जीव जठर दुख पावे ॥
कैसे जीव परवशै भयऊ । कैसे इन्द्री देह बनयऊ ॥
कैसे जीव अपने पद परसे । कैसे जीव समरथ पद परसे ॥
कैसे जीव कौल बँधावे । कैसे साहब दर्शन पावे ॥
सो सब भेद कहो गुरु ज्ञानी । घट भीतरका भेद बखानी ॥

सतगुरु-वचन

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । तुम घट भली बुद्धि परकासा ॥
प्रथमें सत्य नाम गुण गाऊँ । घट भीतर का भेद बताऊँ ॥
सबही जीव गर्भ में जावैं । कौल बान्ध कै बाहर धावैं ॥
चूके कौल गरभ का भाई । बारम्बार गरभ में जाई ॥
नौ नाथ सिद्धि चौरासी भारी । उनहुँ देह गरभमें धारी ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

Page 602Permalink

( २२ )

जगजीवनबोध

नौ अवतार विष्णु जो लीन्हा । उनहूँ गरभ वसेरा कीन्हा ॥
तेतिस कोटी देव कहाये । गरभ वास महाँ देह बनाये ॥
जोगी जंगम औ तप धारी । गर्भवास में देह सवारी ॥
गर्भ वास तब छूटे भाई । जब समरथ गुरु बाहँ गहाई ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

नारि पुरुष बांधे संयोगा । कामबाण लगि देहसुख भोगा ॥
सप्त धातुका अंग बनाया । जिह्वा दांत सुख कान उपाया ॥
हाथ पावैं रु शीस निर्माया । सुन्दर रूप बनी बहु काया ॥
नख शिख काहू नर बहु कीन्हा । दशही द्वार युक्ति करि लीन्हा ॥
दश द्वार नौ नाडि बनायी । ऐसे सबतर बन्ध लगायी ॥
दीन्हा ठेक बहतर भारी । नाडी बन्धन बहुत अपारी ॥
नाद विन्दुसों काथ निरमायी । तामैं प्रकृती आन समायी ॥
हृद कारिगर हुन्नर कीन्हा । जैसे दूधमें जामन दीन्हा ॥
तीनसों साठ चार बन्ध लायी । सोलह खाईं तहां बनायी ॥
सोलह खाईं चौदह दर्वाजा । अठहूँ हाथ गढ़ खूब विराजा ॥
छाजे महल अधिकही छाजा । तामैं जीव जो आनि विराजा ॥
अजब महल बहु खूब बनाया । छठे महल हंस चितवन लाया ॥
छठे मांस में सुरती आयी । दुख सुखकी तब पारख पायी ॥
छै मासको भयो जब प्रानी । दुख सुखकी मति सबै पहिचानी ॥
ओंघे सुख झूले लटकंता । मैल बहुत तहाँ कीच रहता ॥
जठर अग्नि तहाँ बहुत सतावै । संकट गर्भ तहाँ अन्त न आवै ॥
बहुत सांकीरी पिंजार पोई । तडफटै बहुत निकसे नहिं जोई ॥
सुखसों बोल निकसि नहिं आवै । करुना करि मन में पछितावै ॥
अरुझे श्वास रोवै मन माहीं । कौन करमगति लागी आहीं ॥
करुणा करि मन में पछितावै । ज्यों करीब कंठ करद बैठावै ॥