कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
About this granth
The Kabir Sagar (कबीर सागर) is the large scriptural corpus of the Kabirpanth, especially its Dharamdasi branch, cast mainly as dialogues between Kabir and his disciple Dharamdas. It gathers many works, among them the Gyan Sagar, the Anurag Sagar and the various books of the Bodh Sagar, into eleven parts, and is the main source for the sect's cosmology, lineage and practice.
The sections of the first part, the Gyan Sagar, give a sense of its content: the kinds of liberation and the immortal realm, the True Being, the origin of creation and the islands of the cosmos, Dharmaraya (Niranjan) winning an island and Mansarovar by serving the True Being, his swallowing of Kamini and the curse laid on him, the descent of the Gyani (Kabir) to earth and his pact with Dharmaraya, the founding of Jagannath, the three gods and Adi Maya, the churning of the ocean, the origin of the Vedas and the four classes of birth, and the stories of Bali, the Sanakas and Narada.
This complete eleven-part edition is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai. Its 2,136 pages bring the entire Kabir Sagar together for students of the Kabirpanth.
राजारानीका सत्यलोक जाना
(१०)
अमरसिंह बोध
कालजालते हंस छुडाये । राजा रानी भक्ति मन लाये ॥
सारखी-राजा रानी प्रेमसे, और सकल जिव साथ ॥
नाम पान सबहिन दिये, मस्तक धरिके हाथ ॥
चौपाई
कीन्हा दंडवत् सब बहु भांती । राजा रानि पुत्र औ नाती ॥
पुरेथभाणसा लीनो पाना । रंभा नाम पुरेथनी जाना ॥
तबही दिवान खेमसिंह आये । नर नारी परे गुरुके पाये ॥
आये बखशी लीन्हा पाना । भाव भक्ति मनमाहि समाना ॥
नाम रतनचंद्र कहे कर जोरी । दया करो मम बंधन छोरी ॥
आये चौधरी प्रेमचंद नामा । तन मन अरपी कीन्ह प्रनामा ॥
तबहीं शेष शामजा आये । प्रेमभावसे शीश नवाये ॥
और जीव बहु लीन्हा पाना । सबको चित्त गुरुचरण समाना ॥
छन्द-राजा खडा करे विनती प्रभु दीनबंधु दयाल हो ॥
हंस नायक प्रभू लायक शब्द दीन्हा रसाल हो ॥
जेहि खोज ऋषि मुनि नारद ब्रह्मा हरि हर थक रहे ॥
नहि पार पावत शारदा सोह नाम सतगुरु मोहिं दिये ॥
सोरठा-मोहि अनुग्रह कीन्ह, दास जानि दाया करी ॥
भक्तिदान मोहिं दीन्ह, लेह चलो समरापुरी ॥
ज्ञानी बचन-चौपाई
ज्ञानी कहे सुनो हो राऊ । तुमरी अवध सो सबै रहाऊ ॥
एते दिवस रहो भवसागर । पीछे चलो लोक कहैं नागर ॥
राजा रानी बचन
राजा रानि कहे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥
कठिन दुःख भवसागर मांही । क्षण भर इमपै रहौ न जाही ॥
इकइस लाख जीव तुव शरना । बहुत बरसमें होइ निज मरना ॥
बोधसागर
(११)
जो तुम सतगुरु हंस सहायक । होहु दयाल हंस सुखदायक ॥
अधम उधारन नाम तुम्हारा । अवगुन मोर न करहु विचारा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी वचन कहे गोहराई । राजा सकल हंसा बुलवाई ॥
सकल हंस सतगुरु संग लागा । इकइस लाख हंस तन त्यागा ॥
पावत पान गये एक ठारा । पहुँचे जाय पुरुष दरबारा ॥
भाव भक्ति भल कीन्ह बनाई । सर्वस अरपि चग्नामृत पाई ॥
काल जालको चिह्न जो पावे । सार शब्दमें सुरति लगावे ॥
मन निरंजन तेज ओंकारा । ये सब चीन्हे काल पसारा ॥
नाभि कमलते सुरति लगावे । मकरतार चढ़ि शब्द समावे ॥
पुरुष दरश पावे जब हंसा । जनम मरणको मेटै संसा ॥
षोडश भानु हंस तेहि रूपा । समझ न परे रंक औ भूपा ॥
एक बरन राजा औ रानी । ताकी भेद सब जाने जानी ॥
पुरुष सज्या हंस तहाँ आये । अमृत भोजन करत अघाये ॥
काया अमर अमरवर पाई । दुःख और द्वंद सबै मिट जाई ॥
एही विधि सकल जीव तहाँ आवा । सबही हंस एक नाम समावा ॥
सोरठा-कहा जीव करनी करे, कहा चलेगा चाल ॥
सतगुरु नाम प्रतापते, कबहुँ न खावे काल ॥
कहन सुननकी है नहीं, देखा देखी नाय ॥
सार सबद जो चिन्ही, सोइ मिलेगा आय ॥
चौपाई
पुरुष हुकुमसे जीव बुलाये । राजा रानी हंस तहाँ आये ॥
हंसन कह तब वचन सुनाये । भाग बडे तुव दर्शन पाये ॥
पुरुष वचन
अहो जीव कस कीन्ह कमाई । हंस सज्जन मोहि कहो सुनाई ॥
(९२)
अमरसिंह बोध
राजा रानी वचन
माथ नवाय कह राजा रानी । बार बार विनती बहु ठानी ॥
करनी चाल हम नहि जाना । परे ते कूपमें अति अज्ञाना ॥
आय जगाये अंध अचेता । सतगुरु शब्दते बांधे हेता ॥
पुरुष हुकुमते ज्ञानी चलि आये । कहो जीव कस करहि कमाये ॥
ज्ञानी वचन कहैं परमाना । इन सम हंस और नहि आना ॥
इनकी डोरी जीव सब आवा । पुरुष सुनी यह आनंद पावा ॥
अंक मिलाई हंस तब लीना । अरध सिंहासन बैठक दीना ॥
सेत छत्र शिर दीन्ह तनाई । सूरज कोटि छबि राजा पाइ ॥
यहिविधि राजा लोक सिधाये । सुनत बोध धर्मनि मन भाये ॥
एक वचनको संशय आई । सो मोहि नाथ कहौं समुझाई ॥
षोडश रवि सब हंस सराई । कैसे रायको दइ अधिकार्ई ॥
कबीर वचन
धर्मदास तोहैं कहि समुझाऊँ । तुमरे मनको धोख मिटाऊँ ॥
राज गुमान उन दिये विसारा । और जीवकी मुक्ति सुधारी ॥
पुरुष रायको पूछ न कीना । निज करनी कर नाम न लीना ॥
अपने मन तजि मान बढाई । ताते पुरुष दया उर आई ॥
धर्मदास सुनो चित लाई । यहिते राजा बढती पाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कहे युग कर जोरी । दया करी तुम बंदीछोरी ॥
दीनदयाल दयाके सागर । अच्छी कथा सुनाये आगर ॥
साखी-धर्मदास आधीन होइ, विनती करै कर जोर ॥
कथा कही अमरसिंहकी, संशय मिटायो मोर ॥
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे राजा अमरसिंहबोध कथा वर्णनो
नाम द्वितीयस्तरंगः ॥ श्री अमरसिंहबोधः समाप्तः
श्री-बीरसिंहबोध
★
भारतपथिक कवीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्द ( विहारी ) द्वारा संशोधित
हेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन,
बम्बई
1947-1948
1947-1948
1947-1948
1947-1948
1947-1948
1947-1948
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
शिवलिंग
A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Shiva, wearing a crown and holding a trident (trishula). The figure is surrounded by a decorative border.
शिवलिंग
अथ बोधसागर
तृतीयस्तरंगः
बीरसिंहबोध
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धर्मदास वचन-चोपाई
धर्मदास पूछे चित लायी । साहब मोहि कहो समझायी ॥
बीरसिंहराय किमि कीनी सेवा । करिके दया कहो गुरुदेवा ॥
बीरसिंहदेव बडा अभिमानी । कैसे साहिब सेवा ठानी ॥
सो वृत्तान्त कहो मोहि स्वामी । दया करि कहिये बहु नामी ॥
कबीर वचन
धर्मदास भल पूछहु बाता । तुमसे बरनि कहूँ विरुयाता ॥
तन मन धन अरु मोहन लावे । जो जिव हमरे संग सिधावे ॥
आदि अन्त सुरति हम कीना । तबही पग धरतीपर दीना ॥
और दिशा देख्यो हम जायी । पूरब पश्चिम दृष्टि फैलायी ॥
बीरसिंह देव काशीकर राऊ । हम पहुँचि तहाँ कीन गोहराऊ ॥
प्रथमहिं चले भक्तपर गयऊ । सकल संत जहाँ भक्ति करयऊ ॥
नामदेव भक्ति करन मन लावा । सेना धनाजाट तहाँ आवा ॥
राँका बाँक सदन कसाई । पद्मावती दीपक ले आई ॥
चौहटे तान चँदेवा दीना । ठाडे भक्त सब गायन लीना ॥
नामदेव लोटन करे भाई । हाथ ताल रेदास बजाई ॥
नं. ४ कबीरसागर - ४
कबीर साहबका काशीमें जाना और भक्तोंके साथ वार्तालाप करना
(९८)
बीरसिंह बोध
धना मृदंग पट्ट उजियारा । जुरे भक्त सब संत अपारा ॥
धर्मदास तहँवा हम गयऊ । राम राम सबही मिलि कियऊ ॥
तब हम वचन एक कहि लीना । सकल भक्तके हिये मन दीना ॥
नामदेव केहि पुरुषहि ध्याओ । भक्त करतका कर्म तुम लाओ ॥
नामदेव वचन
नामदेव कहे सन्त भुलाओ । दोसर पुरुष कौन ठहराओ ॥
हरि हर ब्रह्म हैं बड देवा । तिनकी करै सकल जग सेवा ॥
वे जगकर्ता सब कछु अहहीं । वेद शास्त्र सब तिनकहँ कहहीं ॥
है प्रभु आदि मध्य अरु अंता । शीश सुडाय जपो केहि संता ॥
कबीर वचन
हरि ब्रह्मा शिव शक्ति उपायी । इनकी उत्पन्न कहहुँ बुझायी ॥
विना भेद सब फूले ज्ञानी । ताते काल बांधि जिव तानी ॥
अजर अमर है देश सुहेला । सो वे कहहिं पंथ हुहेला ॥
ताका मरम भक्त नहि जाना । किरतम कर्तासे मन माना ॥
हम तो अगम देशसे आये । सत्यनाम सौदा हम लाये ॥
साखी-किरतम रस रंग भेदिया, वह तो पुरुष न्यार ॥
तीन लोकके बाहिरें, पुरुष सो रहत निनार ॥
चौपाई
बीरसिंहदेव बचेला राजा । बैठे आय महलके छाजा ॥
राजा नजर सबन पर कीना । सबकी भाव भक्ति चित दीना ॥
गावै भक्त आनन्द व्यवहारा । एक भक्त बेटा सो न्यारा ॥
टोपी एक अनूपम दीने । माथा तिलक कूबरी लीने ॥
स्वेत स्वरूप भगतकी काया । महा आनन्द पुरुष छबि छाया ॥
राजाबीरसिंह वचन
छरीदार राजा हँकरायी । नामदेवको आजु बुलायी ॥
कबीर साहबका वेष स्वरूप देखकर वीरसिंहका कबीर साहबके पास आना
बोधसागर
(११)
छड़ीदार वचन
बेगहिं छड़ीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥
नामदेव वचन
नामदेव पूछे चित लायी । राव संग को और रहायी ॥
छड़ीदार तब वचन सुनावा । कोउ नहिं साथ रायके भावा ॥
नामदेव छड़ी हाथमें लयऊ । चले चले राजापहैं गयऊ ॥
राजा देखि ठाढ उठि भयऊ । कर गहिके आसन बैठयऊ ॥
राजा वचन
राजा कहै सुनौ हो देवा । कहौ कौनकी करत हो सेवा ॥
नामदेव वचन
सांखी-भक्ति करौं गोविंदकी, एक चित ध्यान लगाय ॥
राजावीरसिंह वचन
श्वेत रूप जो भक्त है, सो कस न्यार रहाय ॥
नामदेव वचन
राजा सुनो वचन यक मोरा । हम तुम हरि हर ब्रह्मा दोरा ॥
ताकर भक्ति करे वह हांसी । कहै पुरुष यक और अविनासी ॥
माला मेखली श्याम शरीरा । मिली जुलाहा सत्य कबीरा ॥
किरतन कहे सकल सब देवा । कहे साँछु देख नहिं सेवा ॥
मूर्ति कूटि पाथर का लाई । कारीगर छाती दे पाई ॥
काँसा ताँबा मूर्ति बनावा । तामें कैसे ब्रह्म समावा ॥
ऐसे कहे कबीर जुलाहा । झूठे देवन हमैं मनाहा ॥
वह तो कहे हम पुरुष अभेवा । नहिं कोइ जाने हमरो भेवा ॥
आप अपनपौ बहु विधि थापै । आपै देव सेवक पुनि आपै ॥
भक्ति ज्ञान योग को भेवा । तीरथ व्रत तप अरु सब देवा ॥
सबको काल जाल बतलावे । एकोको नहिं मनमें लावे ॥
हम सन बहु विधि वाद विवादा । नहि माने वह अनहद नादा ॥
राजा वीरसिंह और कबीर साहबकी वार्तालाप
(१००)
बोरसिंह बोध
साखी-जोलहा निंदत सबनको, बन्दत काहू नाहिं ॥
झूठ कहत हरि ब्रह्महीं, कहे निर्गुण एकै आहिं ॥
राजाबीरसिंह वचन
राजा नामदेव कह बानी । अगम ज्ञान वह करत बखानी ॥
नामदेव वचन
कह नामदेव सुनो हो राजा । बहु विधि कहै शब्द को साजा ॥
जो को निर्गुण नामहिं धावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥
राजा छरीदार पठवाई । जाय कबीरहिं आनु बुलाई ॥
राजाबीरसिंह वचन
परम खुशी हमरे मन आवै । जो कोइ निर्गुण नाम सुनावै ॥
अस्तुति वेद करत है जाको । पार न पावत हरि हर ताको ॥
अहिंपति अस्तुति करै जो ताही । कोउ विधि पार न पावत जाही ॥
तेहिकर भजन करै जो कोई । तब विधिसे पूरा है सोई ॥
नाम देव सुनु संत सुजाना । वह निन्दक नहि संत प्रमाना ॥
छडीदार भेजि तुरत बुलवाऊँ । निर्गुण भेद अबहि खुलवाऊँ ॥
रूप संत हृदय मम भावै । शांत रूप वह भजन प्रभावै ॥
देखो अबहीं आवत सोई । सब कहिहै तेहि भावत जोई ॥
छडीदार तुरते चलि आयऊँ । जहंवा हम वहाँ बैठे रहेऊँ ॥
छडीदार वचन
छडीदार तब विन्ती लावा । अहो कबीर तोहि राय बुलावा ॥
विन्ती राय कीन कर जोरी । लावा कबीर वेगि तैं दोरी ॥
कबीर वचन
कहे कबीर वचन अरथाई । केहि कारण मोहि राय बुलाई ॥
ना हम पण्डित ना परधाना । ना ठाकुर चाकर तेहि जाना ॥
ना हम विराना देश बसावैं । ना हम नाटक चेटक लावैं ॥
बोधसागर
(१०१)
पैसा दमरी नाहिं हमारे । केहि कारणे मोहि राय हंकारे ॥
गरज होय तो यहाँ चलि आवै । हम तो बैठे भजन करावै ॥
साखी—छडीदार तुम जायके, कहो रायके पास ॥
महा प्रचण्ड बघेल है, हम नहिं मानत त्रास ॥
चौपाई
छडीदार अति कोधित भयऊ । तुरतहिं चलि रायपहँ गयऊ ॥
छडीदार वचन
छडीदार कहै कर जोरी । महाराज एक विनती मोरी ॥
भक्त न आवै मोर हँकारे । कुछ भयभीरन राखु तुम्हारे ॥
कहैं हमारे कौन है काजा । तृणहि समान गिनत हौं राजा ॥
एता वचन राय सुनि लीन्हा । अगम बात कछु घटमो चीन्हा ॥
वह तो परमपुरुष है सोई । और होय तो आवै कोई ॥
सत्य भाव जाके उर आवे । मान बढाई लोभ सब जावे ॥
निर्गुण भक्ति जोई लवलीना । ताहि न उपजे भाव मलीना ॥
आशा तृष्णा जेहि घट व्यापै । धनवन्ता सो चाह मिलापै ॥
यहतो संत अविकल अविकारी । केहि कारण आवै केहु दुआरी ॥
शोचत राजा मनमें गूने । नामदेव मन रहे अलूने ॥
मान बढाई जो नर पागे । करत खुशामद नृपती आगे ॥
साखी—नामदेव राजा कहे, जुलहा यहाँ न आव ॥
है अभिमानी बहुत सो, बहु अहँकार जनाव ॥
चौपाई
कीन विवेक राय दिल माहीं । नहिं आये कवीर हम जाहीं ॥
वह तो सत्य भक्ति चित दीन्हा । कारण कौन त्रास मम कीन्हा ॥
यहि विधि कीन विवेक विचारा । तबहीं राजा आप सिधारा ॥
१ नामदेवजीने राजाके विचारका भाव नहीं समझा ॥
(१०२)
बीरसिंह बोध
हुकम पाय आय असवारा । गज औ तुरंग सु साज सँवारा ॥
आवत देखा जब हम भाई । तब हम लीला एक बनाई ॥
आसन अधर कीन तेहि वारा । सवा हाथ धरतीसे न्यारा ॥
माला तिलक औ टोप विराजै । हाथ स्वेत कुवरी सो छाजै ॥
नृपति देखि अचरज मन कीन्हा । यह तो पुरुष अगम कछु चीन्हा ॥
कीन अवलोकन जग हम सबहीं । ऐसे पुरुष न देखे कबहीं ॥
धन्य धन्य अस्तुति सब गावैं । धन्य कवीर चरण सब ध्यावैं ॥
राजा चरण पकड़ि दोउ भाई । धन्य धन्य नृप करई बडाई ॥
कहे राय धन भाग हमारा । दर्शन दीन्ह आय करतारा ॥
राजा बीरसिंह वचन
छन्द-अस्तुति करत नृपति भाषेउ तुम ब्रह्म निर्गुण आप हो ॥
अनाथ नाथ सनाथ करि दिये माथ हाथ अनाथ हो ॥
अपनो दास करि जानि साहब दरश दीनेउ आयकै ॥
कीजै कृपा यहि दासपै चलि भवन दरस दिखायकै ॥
सोरठा-कृपा कीन जस मोहिं, तस मन्दिर पग दीजिये ॥
विनय करौं प्रभु तोहिं, वेगि विलम्ब न कीजिये ॥
कवीर वचन-चोपाई
कहैं कवीर तहाँ नहिं काजा । तुम परचण्ड बघेला राजा ॥
काम क्रोध मद लोभ बडाई । रोम रोम अभिमान समाई ॥
तुरी सवा लक्ष सँग तोरे । लक्ष सवा दो प्यादा दोरे ॥
हस्ती चलत सहस तव संगा । निश्चिदिन भूले कामिनि रंगा ॥
कंचन कलसा महल अटारी । कैसे शब्द गहै नर नारी ॥
हम भिक्षुक जाने संसारा । कौन काज है तहाँ हमारा ॥
राजा बीरसिंह वचन
तुम सतगुरु हो दीन दयाला । करमवश्य हम अहैं विहाला ॥
माया तिमिर नैन पट लागी । दर्शन पाय भये अनुरागी ॥
राजाका रानीसे कबीर साहबको गुरु बनानेकी बात चलाना और रानीका राजाको नीति समझाना
बोधसागर
(१०३)
करो दया अपनो करि लीजै । दास जानि आयसु प्रभु दीजै ॥
दीन जानि मन्दिर पगु धारो । भक्तराज तुम वेगि पधारो ॥
हम हैं पापी अधम अजाना । तव विनु कृपा काल धरि ताना ॥
देह उपदेश प्रभु मोहि बचावो । पाप जालते वेगि छुडाओ ॥
तुमरी कृपा सुनहु हो साहब । अंस विश्वास भवहितरि जायब ॥
अब जनि लावहु बार गुसाई । चलहु कृपा करि हंसन राई ॥
साखी-भक्तराज दाता अहो, कीजै मोह सनाथ ॥
मैं आधीन शरण तुव, चलो हमारे साथ ॥
चोपाई
बहुत अधीन तेहि जब देखा । चलन विचार कीन तब लेखा ॥
ततक्षण राजा हस्ति मँगावा । लै हमहीं तब हस्ती बैठावा ॥
गजते आसन अधरहिं धारा । चले राय तब बजे नगारा ॥
जबै राय मन्दिर लै गयऊ । तबै रानि कहैं तुरत बोलेऊ ॥
मानिक देहरानी चलि आयी । तासे राजा बात सुनाई ॥
राजा बीरसिंह वचन
हम रानी गुरु कीन कबीरा । आदि ब्रह्म हैं मतिके धीरा ॥
चरण धोय चरणाभूत लीजै । सतगुरु दया करम सब छीजै ॥
तब सो रानी कहैं सुनु बाता । ओढे चीर सुभग निज गाता ॥
रानी मानिकदेवी वचन
राजा विन्ती सुनो हमारा । समुझि बूझि गुरु करो भुवारा ॥
तुम राजा हौ बहुतै ज्ञानी । विनय हमार लेहु सुनि मानी ॥
राजा बीरसिंह वचन
इतना सुनत राय मुसुकाये । रानी ज्ञान कौन बहुराये ॥
तुम हौ नारि भक्ति कहैं मानौ । साहबकी गति नहिं तुम जानौ ॥
कर्ता आप देह धरि लीना । भक्तरूप होय दर्शन दीना ॥
नामदेव आदि भक्तोंका कबीर साहबसे ईर्षा करना और उनका समाधान
(१०४)
बीरसिंह बोध
हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनि सो वार घरे दोय थारा ॥
कंचन थारी झारी पानी । कंचनवटुकी व्यंजन आनी ॥
अधरसु थार भुईं ते न्यारा । महाप्रसाद राय चित धारा ॥
पाय प्रसाद राय जब लीन्हा । हम अरु राय बाहर पगु दीन्हा ॥
एकहि आसन बैठे दोई । नामदेव तब ठाढे होई ॥
नामदेव कह आसन दीन्हा । बहु सन्मान ताहिकर कीना ॥
नामदेव बैठे जब जायी । प्रश्न करन तिन चित तब लाई ॥
नामदेव वचन
कहहु कवीर मोहि समुझाई । कहैं तव गुरु शब्द कित पायी ॥
साहिब कौन सबनके पारा । मोसे कहहु वचन विचारा ॥
साहिब कौन जाहि तुम ध्याओ । कहैवा सुक्ति सुरति कित लाओ ॥
कौन भाँति यमसे जिव बाँचे । भिन्न भिन्न कहहु मोहि साँचे ॥
आप न समझो बोधो राजा । राम विना होय जीव अकाजा ॥
केतो पढे गुने अरु गावै । विनु हरि भक्ति पार नहीं पावै ॥
कवीर वचन
नामदेव भूले तुम जैसे । हमको मति जानहु तुम तैसे ॥
निर्गुण पुरुष आहि यक आना । अस्तुति ताकर वेद बखाना ॥
शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा । और जीव है कौन विचारा ॥
छन्द-नित्य निगम अस्तुति अराघै हारि थके विरंच महेश हो ॥
सबै ऋषिदेव अस्तुति अराधई तेहि गावत सुरपति शेष हो ॥
जेहि गावत नारद शारदादि पार कोई ना लहे ॥
सो भेद सतगुरु गावही कोइ संत ज्ञानी चित गहे ॥
सोरठा-पूजहि हरि हर देव, जड मूर्ति पूजत बहै ॥
निशिदिन लावत सेव, जो रक्षक भक्षक अहै ॥
नामदेव तब सुनत लजाने । नहीं पाये भेद मनहिं पछताने ॥
सुनि लजायके उठि सो गयऊ । राजा तबहिं कहत अस भयऊ ॥
राजाका शिकार खेलने जाना - पानी न मिलनेसे व्याकुल होना और कबीर साहबका बाग प्रगट करके राजाका सेनासहित प्राण बचाना
बोधसागर
(१०५)
राजा वीरसिंह वचन
तब राजा अस वचन उच्चार । हम सँग साहिब चलो शिकारा ॥
आगे सेना सबही ठाडे । हस्ती घोडा बाहर काटे ॥
आगे चले निशान नगारा । सवा लक्ष सँग चले असवारा ॥
सवा लक्ष द्रव्य प्यादा दौरा । ठाडे भौंट करत बड शोरा ॥
हरनी स्वान लीन सँग चीता । कोइ सचान वाज कर लीता ॥
बहु दल हस्ती लीनी साथा । यहि विधि चले शिकार नरनाथा
भौंतिन भौंति खिलौना लीना । आयसु सकल लोक कहँ दीना ॥
आगे सेन चली सब साजा । हस्ती बैठि चले गुरु राजा ॥
कवीर वचन
जबही राजा चले रिगायी । तब हम तासों बात सुनायी ॥
राजा संग मोहि ले जाओ । जीव एक मारन नहि पाओ ॥
कोटिक यतन करो तुम राजा । जीवन मिलै होय तोहि लाजा ॥
राजा वीरसिंह वचन
तत्क्षण राजा वचन सुनावें । मारन कहौ तोहि जाइ चुकावें ॥
तब हम कहा हमका कहहीं । यह नहि धर्म मनुषकर अहहीं ॥
यह सुनि राजा घोड कुदावा । शेर शिकारी रूप बतावा ॥
एको जीव फन्द ना परई । क्रोध अग्नि घट भूपति जरई ॥
खेलेत रमत दूर होय गयऊ । कितहुँ न भेंट जीवसे भयऊ ॥
फिरत अहेरे परे भुलाई । कतहुँ न ठौर नीर कहँ पाई ॥
विना नीर सो तडपे राजा । व्यापी तृषा बने नहि काजा ॥
साखी-बहुत दूर राजा गये, पीछे फिरे भुआर ॥
कटक सकल सबही फिरे, व्याकुल सबै अपार ॥
ग्रंथकर्ता अथवा परचात् के लेखक महाशयकी बलिहारी है, शिकारके लिये इतनी तैयारी
बतलायी है ।
(१०६)
बीरसिंह बोध
पानी पानी सबहीं गोहरावैं । विनु पानी सबहीं मरि जावैं ॥
राजा कहै देखो सब जायी । बडो धूप जिव गयो ढरायी ॥
बहुत लोग जल दूँढन लागे । बहुतक लोग भाग चले आगे ॥
ठावैं ठावैं सब गये झुलाई । हस्ती घोरा सबहिं नशायी ॥
राजा तब कहन अस लागा । संशय बहुत तेहि मन पागा ॥
राजा बीरसिंह वचन
आज अहेर एको नहिं आवा । एको जीव जन्तु नहिं पावा ॥
पाना कतहुँ न पावा भाई । कैसी कर्ता कीन गुसाई ॥
जो जनितों अस होइहैं बाता । करन अहेर न आइत ताता ॥
सेना हमार प्राण सम प्यारी । सोऊ मरत प्यासकी मारी ॥
अब कहाँ जाइ केहि विधि करिहैं । विना नीर सब इतही मरिहैं ॥
व्याकुलता बहुतै मन बाढी । बहुत करौं सकौं नहिं काढी ॥
तेहि अवसर चर बहुतक आये । खोजिथके नहिं जलकतहुँ पाये ॥
साखी-सेना सकल मरत है, पानि पानि गोहराय ॥
छाँह छाँह सब दूँढहीं, राजा रहे शिर नाय ॥
चौपाई
तेहि अवसर हम कीन विचारा । राय प्रतीति देखों यहि वारा ॥
बीरसिंहदेव बघेला राजा । देइ प्रतीति करों यहि काजा ॥
विना प्रतीति भक्ति नहिं होई । विना भक्ति जिव जाय विगोई ॥
विनु भक्ती गुरु नाहीं भेटे । विनु गुरु संशय नाहीं भेटे ॥
विनु भेटे हिय संशय भाई । काल दयाल कहु को विलगाई ॥
मन परतीति होय जेहि प्रानी । होय तुरत चौरासी हानी ॥
करे प्रतीति नर सो पावैं । पाइ श्रद्धा गुरु शरणहिं जावैं ॥
गुरुके वचन जाहि विश्वासा । फिर नहिं होय नरकमें बासा ॥
बोधसागर
(१०७)
गुरु विनु मुक्ति न पावत कोई । चौरासी भय मिटत न लोई ॥
याते हम सब कीन्ह उपाई । राजा मन प्रतीति जेहि आई ॥
सरवर रच्यो अनूपम ठामा । बाग बगीचा औ लखेरामा ॥
नाना भांति फूली फुलवागी । बहु मेवा लागे तेहि बारी ॥
नाना भांति फूल तहैं फूले । बास सुवास पाइ मन भूले ॥
नाना पक्षी करत कलोल। जहैं तहैं उड़ैं सो टोलम टोला ॥
छन्द-फूल नाना भांति फूले, केतकी जूही आदि है ॥
चम्पा चमेली मोगरा तहैं फूल दाख गुलाब है ॥
खम्भा कदली खडे तहाँ सेबती दवना बहु अहे ॥
कदम्ब जाही मालती चमेली बहुत सुखदा लहैं ॥
सोरठा-नारियल अम्ब बदाम, कटहर बडहर पीसता ॥
बहुविधि कहे सुनाम, फल लागे चहु ओर सो ॥
चौपाई
ऐसो बाग बनी फुलवारी । बनी सो तुरत लगी नहिं वारी ॥
इहवाँ सैन रही कुम्हलायी । पानी पानी सबै गोहरायी ॥
तब हम कहे राय सुनु बाता । सत्य वचन भाखूं विख्याता ॥
उत्तर दिशा राय पगु धारो । थोडहि दूर जल बहे अपारो ॥
कहे मरत ससैन कुम्हलाई । सेना सकल चलो तहैं भाई ॥
यह सुनि राय ठाढ़ तब भयऊ । दौय कर जोरि सुविन्ती कियऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
सतगुरु वचन कहो जनि ऐसो । पाहन ऊपर जल बह कैसो ॥
बार अनेक अहेरे आये । पर्वत पर जल नाहिं रहाये ॥
साहिब कछु जनि ऐसी बानी । हँसे लोग गुरु झूठ बखानी ॥
१ महल
(१०८)
बीरसिंह बोध
दीवान वचन
राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥
कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥
का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥
राजा बीरसिंह वचन
करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥
जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥
कबीर वचन
तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥
सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥
राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥
चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥
दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥
राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥
सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥
अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥
भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥
ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥
राजा बीरसिंह वचन
छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥
हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥
बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥
पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥
सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥
अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥
बोधसागर
(१०९)
साखी-सैन सरोवर देखिया, उत्तम वरन सो नीर ॥
गिरिवर पर सरवर रचे, धन धन सत्यकवीर ॥
चौपाई
करी प्रणाम राय गहि पाई । महाप्रसाद देहु गुरुराई ॥
कीन प्रसाद राजा कहैं दीना । राजा बहुत लोक मिलि लीना ॥
मेवा सकल लोक मिली पाये । बहुत भांति सब लीन धराये ॥
राजा प्रजा सब करै बडाई । काहि कहौं कछु कहत न जाई ॥
जैसा मेवा सत्यगुरु दीना । नहि मिल सो सुरलोकहि चीना ॥
खात खात सो जनम सिराई । नहि देख्यो अस मेवा भाई ॥
लेइ प्रसाद जल अचवन कीन्हा । दुख संताप मुलाय सो दीन्हा ॥
फिरन लगे सो बगीचा माहीं । नहि गर्मी नहि शीत तहांहीं ॥
परिमल वास उठे चहुँ ओरा । बहुविधि पक्षी करै कलौरा ॥
ज्यों २ देखै झैल बगीचे । त्यों २ मन आनन्द रस सीचे ॥
साखी-तृषा सबनकी बुझि गयी, ऐसा निर्मल नीर ॥
मेवा पाये सब मिली, तृषित भये शरीर ॥
कबीर वचन-चौपाई
तब मैं कहचो सुनो हो राजा । सेना सकल भयो सब काजा ॥
होय असवार जाहु घर राई । जहँको जल तहँ देखै पठाई ॥
अब हम अपने लोक सिधायब । सत्य पुरुषका दर्शन पायब ॥
वहँकी शोभा अनन्त अपारा । शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा ॥
सुनत बचन राजा भय माना । जानि विछोहै मनहि सँकाना ॥
हाथ जोरि विन्ती सो कीना । बहुत अधीन भयो परवीना ॥
राजा बीरसिंह
राजा चरण परे अकुलायी । अब सतगुरु जनि करहु दुरायी ॥
अब स्वामी मन्दिर पगु दीजै । सकल जीव अपना कर लीजै ॥