कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 534, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें(१०)
अमरसिंह बोध
कालजालते हंस छुडाये । राजा रानी भक्ति मन लाये ॥
सारखी-राजा रानी प्रेमसे, और सकल जिव साथ ॥
नाम पान सबहिन दिये, मस्तक धरिके हाथ ॥
चौपाई
कीन्हा दंडवत् सब बहु भांती । राजा रानि पुत्र औ नाती ॥
पुरेथभाणसा लीनो पाना । रंभा नाम पुरेथनी जाना ॥
तबही दिवान खेमसिंह आये । नर नारी परे गुरुके पाये ॥
आये बखशी लीन्हा पाना । भाव भक्ति मनमाहि समाना ॥
नाम रतनचंद्र कहे कर जोरी । दया करो मम बंधन छोरी ॥
आये चौधरी प्रेमचंद नामा । तन मन अरपी कीन्ह प्रनामा ॥
तबहीं शेष शामजा आये । प्रेमभावसे शीश नवाये ॥
और जीव बहु लीन्हा पाना । सबको चित्त गुरुचरण समाना ॥
छन्द-राजा खडा करे विनती प्रभु दीनबंधु दयाल हो ॥
हंस नायक प्रभू लायक शब्द दीन्हा रसाल हो ॥
जेहि खोज ऋषि मुनि नारद ब्रह्मा हरि हर थक रहे ॥
नहि पार पावत शारदा सोह नाम सतगुरु मोहिं दिये ॥
सोरठा-मोहि अनुग्रह कीन्ह, दास जानि दाया करी ॥
भक्तिदान मोहिं दीन्ह, लेह चलो समरापुरी ॥
ज्ञानी बचन-चौपाई
ज्ञानी कहे सुनो हो राऊ । तुमरी अवध सो सबै रहाऊ ॥
एते दिवस रहो भवसागर । पीछे चलो लोक कहैं नागर ॥
राजा रानी बचन
राजा रानि कहे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥
कठिन दुःख भवसागर मांही । क्षण भर इमपै रहौ न जाही ॥
इकइस लाख जीव तुव शरना । बहुत बरसमें होइ निज मरना ॥