कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 662 of 2136
Read in context( ८२ )
गरुडबोध
सारखी-कौन सरूपी कृष्ण है, कौन धरे अनुमानु ।
देह धरे नहीं चीन्हहूँ, निर्गुण कैसे जानु ॥
चोपाई
निरगुणको गुण है बड भारी । जिन उत्पन्न कियो सब सारी ॥
वह तो पुरुष मूल है माथा । गति प्रतीति ताहीके साथा ॥
नहीं महात्म पुरुष की पूजा । जप तप संयम नाम विनु दूजा ॥
वार पार नाम नर सेई । अजर नामको सुमिरन देई ॥
बारहिं बार नाम लौ लावे । अजर अमर होय लोक सिधावे ॥
नाम सिखापन बदन सो खोले । विना नाम विनु महात्म डोले ॥
सतगुरु विना मर्म नहीं जाने । हमैं तुम्हैं सब जगत बखाने ॥
ब्रह्मा वचन
सुनो महादेव साँच बखाना । निर्गुणके गुण हमहूँ नहीं जाना ॥
अविगतिकी गति हम ना जानी । योगी जंगम सेविं हम जानी ॥
सुर नर मुनि सब हमको ध्यावें । हम उपजावें हमही विनशावें ॥
साखी-मैं उपजावों मैं विनसावों, मैं खरचों मैं खाऊँ ।
तीन लोक पैदा करें, मोर ब्रह्म है नाऊँ ॥
गरुड वचन चोपाई
ममताते नर नरकें जायी । ताते बहुरि बहुरि जन्मायी ॥
तुहि अब ब्रह्मा बहुत विचारा । ताते काया विनसे सब सारा ॥
तू ब्रह्मा अस जो धरे हँकारा । तेहिते काल भया वटपारा ॥
सुनु ब्रह्मा अविगति की बाता । एकै पुरुष एक है माता ॥
सुनहू सब सभा विचारो । यक मैं निरखिकहौं निरुआरो ॥
वहि साहबकी खबरि न पावा । तुव अस ब्रह्मा बहुत उपावा ॥
वही हम निरखि परखिके जानी । साहब शब्द लेहु पहिचानी ॥
१ ब्रह्मा शिवकी बातकी व्यंगसे हँसी करते हैं ।