कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सब हंसोंको लेकर ज्ञानीजीका सत्यपुरुषके सन्मुख जाना और सत्यपुरुषकी प्रसन्नता
( ५४ )
जगजीवनबोध
तन मन धनकी कौन चलायी । तुम तो आपा दिय विसरायी॥
इन सब हंसन देह बनायी । तुम तो देही गुन विसरायी ॥
जो तुम कहो करौं मैं सोई । तुमरी सरवर नाहीं कोई ॥
सुरति तुम्हारी अधिक सहाई । सतगुरु तुमरे प्राण समायी ॥
यह वस्तु तुम कैसे चीन्हा । कैसे गुरुको वश करि लीन्हा ॥
कैसे तन आशा विसरायी । कैसे इल्म फकीरी पायी ॥
सब हंसनकी देह बनाऊँ । ताको तैसो दीप मिलाऊँ ॥
सतगुरु वशि करि राखे पासा । सुनो हंस मुँहि तुमरी आशा ॥
सदा सतगुरु हंस सनेही । तुम आर्पित सतगुरुकी देही ॥
सदा करै सतगुरु की पूजा । तुमसा हंस न देखा दूजा ॥
हंस वचन
हंस कहे सुन पुरुष पुराना । हम कहैं जानै जीव अजाना ॥
हम तो हते भवजल के माहीं । महा अन्ध कछु सूझत नाहीं ॥
तब समरथ गुरु आनिचिताया । बूढत देखि उबारन आया ॥
जो गुरु कहा सोई हम कीन्हा । एक गुरु विलु और न चीन्हा ॥
तिनसों पूछ कीन कर जोरी । समरथ मानो विन्ती मोरी ॥
हम नहीं चाहें लोक औ द्रीपा । सदा रहैं गुरु चरण समीपा ॥
तब गुरु कहो सुनो रे भाई । सर्व ज्ञान का मूल बताई ॥
हमरे संग रहा जो चाहो । नौतम सुरति कि देह बनाओ ॥
और सकल झूठ कर जानो । एक गुरु हम सांचे मानो ॥
तन मन धन सो बदला कीना । तब गुरु इल्म फकीरी दीना ॥
तब गुरु आपा दिया मिटायी । देहीको गुण दियो विसरायी ॥
पान इकोत्तर से हम पाये । पानपान हम देह बनाये ॥
लोक द्रीप हम कछु न चाहा । हमको सतगुरु दर्शक लाहा ॥
हंसा सुरति गुरुकी कीन्हा । स्वरूप सहित गुरुदर्शन दीन्हा ॥
सब ही हंस धरेउ गुरु पाऊ । करि बन्दगि सब सीस नवाऊ ॥
बोधसागर
( ५५ )
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै हंस सुनु बाता । कहाँ वे जीव तुम्हारे साथा ॥
हंस सुजनजन वचन
हंस सुजन मिलि अंक लगाये । कहो हंस कस कीन कमाये ॥
सतगुरु वचन
इनकी मैं का कहूं बड़ाई । ये तो सब निज हंसा आई ॥
निश्चय बात हमारी मानी । काया माया खाकै जानी ॥
सतगुरु हंसको लोक चढ़ायी । सहस्र अठासी द्रौप दिखायी ॥
जेहि जेहि हंस सवारी काया । द्रौप द्रौप सब दृष्टि बताया ॥
देखो हंस कह सब अस्थाना । देखो द्रौप सबही मन माना ॥
सबहीं हंस करे पछतावा । यह गतिहम वहां नाही पावा ॥
लै हंसनको पहुँचे तहँवा । महापुरुष विराजे जहँवा ॥
साखी-द्रौप वर्नन कह कहौं, सबै मनोरथ काज ।
सब द्रौपनते न्यार है, सत्यपुरुष को राज ॥
चौपाई
जब हंसनको ले पहुँचाये । तब सतपुरुष उठि कंठ लगाये ॥
जब ही पुरुष अंक भरि लीना । पारस देह सब हंसन कीना ॥
पुरुष वचन
कहै पुरुष ज्ञानी भल आये । इतने हंस कवन विधि लाये ॥
ज्ञानी वचन
ये तब जानो पुरुष पुराना । मैं केहि मुख सों करौं बखाना ॥
चार हजार सातसों बावन पाये । एते हंस दरश तुव आये ॥
सबही आये लोक मैझारा । दुइ सै रोके धरम वटपारा ॥
कौल किया पुनि गये भुलायी । पांजी द्वार धरम पर जायी ॥
मान सरोवर केते रहाये । उनको देही नाहि बनाये ॥