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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

सद्गुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखे बागमें ठहरना, उसका हरा हो जाना और राजाका खबर पाकर बाग देखने आना फिर कबीर साहबसे मिलना

( ३२ )

जगजीवनबोध

मता विषय रस कछू न सूझे । भैरों भूत शीतला पूजै ॥
भूलै कौल गरभकी बांधी । अब चकचौंध आई आंधी ॥
सबही जीव कौलकरि आवै । बाहर निकसि सब बिसरावै ॥

सतगुरुके आगमन

ऐसे जीव भूल रहे सारे । तब सतगुरु आइ पगु धारे ॥
जीव चितावन सतगुरु आये । अलीदास धोबी समझाये ॥
और हंस बहुत चेताये । फिरत फिरत पाटनपुर आये ॥

सतगुरुका पाटनपुरमें पहुँचना

सतगुरु आये पाटन ठाऊँ । जगजीवन राय बसै तेहि गाऊँ ॥
राय न मानै भक्ति विचारा । हँसे भक्तको बारम्बारा ॥
भक्त रूप सब शहर निहारा । कोउ न मानै कहा हमारा ॥
तब आपन मन कीन विचारा । कैसे मानै शब्द हमारा ॥
जाइ बाग में आसन कीन्हा । गुप्त रहे काहू नहिँ चीन्हा ॥
द्रादश वर्ष भये बाग सुखाने । सुलगे काछ होय पुराने ॥
चार कोस तेहि बाग लम्बाई । तीन कोसकी है चकलाई ॥
तहाँ जाय आसन हम कीन्हा । रहौं गुप्त काहू नहिँ चीन्हा ॥
तहवाँ मैं कौतुक अस कीया । सूखे बाग हरा कर दीया ॥
विकसे पुढुप जीव सब जागे । सबने हरियर देखा बागे ॥
माली जाय कै दीन बधाई । जागा भाग तुम्हारा भाई ॥
देखा बाग जाय तेहि वारा । फल फूलनका अन्त न पारा ॥
हर्षा माली बाहर आया । देखा बाग बहुत सुख पाया ॥
फूलन छाब भरी दुइ चारी । नाना विधिके फूल अपारी ॥
नाना विधिके मेवा लाया । ले माली दरबारि आया ॥
बैठा राजा सभा मैझारा । उमरावनको तहाँ न पारा ॥
माली सब ले धरी रसाला । राजा पूछ करे ततकाला ॥

बोधसागर

( ३३ )

राजा जगजीवन बचन

कौन देश तैं माली आया । फूल अन्नप कहाँसे लाया ॥
कौन बाग के फलन विशेषा । कानो सुनी न आँख न देखा ॥

माली बचन

नौ लखा बाग रहा होय आया । फल प्रसून सब नये बनाया ॥
सुनिके राजा हरषा भारी । संग उठी चली परजा सारी ॥

राजा बचन

कहु दिवान यह कौन प्रकारा । समझि बूझिके करो विचारा ॥
ज्योतिषी पण्डित सवैं बुलाये । पत्रा पोथी सबहीं लाये ॥

ज्योतिषी बचन

लगन सोधि सब ऐसी कही । कोइ पुरुष यहाँ आये सही ॥
है कोइ नर कै कोइ पखेहू । सोधो जाय बाग सब हेहू ॥
हेरे राय बागके माहीं । बैठे संत यक ध्यान लगाहीं ॥
राजा जाय धरा तब पाई । नगर भरेकी परजा आई ॥
कहे राजा धन मेरो भागा । दर्शन पाय अमर होय लागा ॥
आलसी घर गंगा आयी । मिटि गई गर्मी भयी शितलायी ॥

सतगुरु बचन

तब राजासों कही पुकारी । सुन राजा एक बात हमारी ॥
हम जनि भार चढाओ भाई । काहे को तुम देहु बड़ाई ॥
अच्छा बाग विमल हम चीन्हा । तासो आये आसन कीन्हा ॥
ऐसा तुमहीं बाग बनाया । नाना विध के रख लगाया ॥
आसन किया देखि हम ठारी । बहुत फूल फलकी अधिकारी ॥

राजा बचन

फिर कै राजा शीस नवाया । द्वादश वर्ष भये बाग सुखाया ॥
सूखा बाग भये बहु बारा । नहिं कोइ लोक आहे संसारा ॥

नं. ५ कबीरसागर - ३