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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

लड़ाईकी तय्यारी

विवेकसागर

(१०१)

सुमती कहे सुनु पुंगव मतिके आगरा ॥
समर वृद्धिके कीजे जगत उजागरा ॥
प्रथमहीं दूत पठाय नीति बहु विधि कहो ॥
नहि माने सतभाय तबहि आयुध गहो ॥

टीका—विवेक राजाके पूछनेपर सुमतिने कहा कि, हे राजन् ! आप बुद्धिमान हो विग्रह करनेमें जहाँतक हो विचार कर कार्य करना चाहिये । प्रथम दूत भेजकर मोहको बहुत प्रकारसे नीति द्वारा समझाइये यदि वह मान जाय तब तो ठीक ही है और नहीं तो फिर पीछे हथियार उठाकर युद्ध करना चाहिये ॥

शील दूत कहैं बोली शिशुवापन दीनेऊ ॥
चलयो तुरत शिर नाय विदा जब कीनेऊ ॥

टीका—हे धर्मदास ! जब सुमतिने इस प्रकारसे कहकर नीति का मार्ग बताया तब विवेक राजाने शीलको बुलाकर कहा कि, हे शील ! आप दूत बनकर मोहराजाके पास जाओ । और जो कुछ मोह राजासे कहना था वह सब अच्छी प्रकार शीलको सिखाकर विदा किया । फिर तो शीलविवेकके पाससे चल कर मोह राजाके दरबारमें पहुँचा ॥

मोह आदि भ्राता जे सबहि सुनायऊ ॥
बन्धु विमात संदेश सो सबहि बुझायऊ ॥

टीका—शील दूतने मोह राजाकी सभामें जहाँ सब भाइयों सहित मोह राजा बैठा था पहुँच उसके सौतेले भाई विवेकका संदेश सुनाया ॥

कारण कौन विरोधेऊ बोलहु नागरा ॥
बन्धव सम होय कीजे राज उजागरा ॥

(१०२)

विवेकसागर

टीका-शीलने मोहकी सभामें कहा कि, हे चतुर राजा मोह ! किस कारणसे आपने विरोध ठाना है सो कहिये, आपको तो सब भाइयोंके साथ मिलकर पूर्ण शक्तिके साथ राज्य करना चाहिये ! देखिये तो-

मन राजा तुवतात त्रिभुवनपति स्वामिया ॥

शुभ अरु अशुभको कारण अन्तर्यामिया ॥

अनुमादिक अनुगामि अनुज त्रिदशपति ॥

तेहिके सुत कुमति कहा कीनी गति ॥

टीका-आपके पिता मनराजा जो हैं सो स्वर्ग (सत्तेगुण) मृत्युलोक (रजोगुण) और पाताल (तमोगुण) के राजा हैं तीनों लोकमें उनका आन फिरता है । और वही मनराजा शुभ अशुभ दोनोंका कारणस्वरूप हो अन्तर्यामी बना हुआ है ? हे मोह राजा ! आपके पिता आपके पीछे २ सदा आपको मद (काम) देते रहते हैं और जहाँ २ आप जाते हो सदा आपके पीछे वह भी जाते हैं । और आपके पिताका जन्म आपके पश्चात् होकर तेरहों भुवनके राजा बनते हैं । ऐसा समर्थ राजा मन उसके पुत्र होकर आपने यह कुमति क्यों ठानी है ।

अनुमादिक शब्द अनु और मादिक शब्दोंके संयोगसे बना है इसका अर्थ है अनु = पीछे । मादिक = मद करनेवाला अर्थात् पीछे जो मद अर्थात् काम करे उसे कहते हैं अनुमादिका । यहाँ मन जब प्रवृत्तिमें लुब्ध होता है तब मोहकी प्रबलता होती है । मोहकी प्रबलता होने पर मन सदा उसको सहायता देता है ।

अनुगामी शब्दका अर्थ है पीछे चलनेवाला, जब मन प्रवृत्तिमें लुब्ध होता है तब सदा मोहके पीछेही पीछे दौड़ता रहता है अर्थात् जहाँ मोह दृढ़ होता है वहाँही मन भी लुब्ध होता है उससे अलग नहीं होता ।

अन्तर्यामी कहिये सवके अन्तर अर्थात् अन्तःकरण का जाननेवाला हो ।

विवेकसागर

(१०३)

अनुज कहते हैं (अनु = पीछे, ज = जन्मना) पीछे जन्म लेनेवा-लेको सो यहाँ मन को अनुज कहनेका तात्पर्य यह है कि जहाँ मोह नहीं हो वहाँ मन भी नहीं होता। इस शरीरमें मोह दृढ़ होनेहीसे मन की विशेष प्रवृत्ति इसमें होती है।

त्रयोदशपति (त्रयोदश = तेरह, पति = राजा) तेरह जो पांच ज्ञानेन्द्री और पांच कर्मेन्द्री तथा बुद्धि, चित्त, अहंकार इन तेरहों का राजा है। अर्थात् जब ये इंद्रियाँ विषयमें प्रवृत्त होती हैं तब मनमें उन विषयोंका राग उत्पन्न होता है। इन तेरहोंको पश्चात् उन विषयोंमें मन प्रगट होने पर भी आप सबका राजा बन जाता है। अर्थात् प्रथम इंद्रियाँ विषय को ग्रहण करती हैं पश्चात् मन उनके ऊपर राज करने लग जाता है, इंद्रियाँ सब मनकी आज्ञाकारिणी बनती हैं और मन उनका शासक राजा बनता है।

छन्द-कुमति कीन्हो अयश दीन्हो बन्धु चित्त धरिबूझिये ॥ अंत गर्व न रहत काहू मिथ्या आश न कीजिये ॥ भुनत मोह राज समाज युत्थप क्रोध दारुण खर भरचो ॥ चाहत संघारन दूतको जिमि आज्य अनिल में परचो ॥

टीका-शीलने कहा है मोहराज ! ऐसे प्रतापी जो आपके पिता मन राजा हैं उनको भी आपने अपने इस विरोधसे अय-शका भागी बनाया है। सब यही कहेंगे कि देखो मनराजा ऐसा हो गया है कि अपने पुत्रोंको भी सम्हाल नहीं ले सकता, उसके पुत्र सब स्वतन्त्र बनकर परस्पर कटे मरते हैं। इस हेतु हे मोह-राजा ! आप कुमतिके कहनेमें न आकर बन्धु विरोधमत कीजिये। और यदि इस बात को नहीं मानते हैं तब इस बातको स्मरण

(१०४)

विवेकसागर

रखिये कि, गर्व किसीको रहा नहीं हैं इस लिये मिथ्या आशा को छोड़कर सब भाई प्रेमपूर्वक राज्य करो ।

हे धर्मदास ! शील दूतके उपर्युक्त शिक्षाप्रद वचन सुनकर मोह राजा सहित उसके सर्व समाज और सेनाभरमें कठिन क्रोधका आविर्भाव हुआ । सब चारों ओरसे लाल र आखें करके शीलको इस प्रकार देखने लगे मानो उसे नाश करनाही चाहते हैं । शीलदूतको विवेक राजाने तो समझा बुझाकर मोहको युद्धसे रोकने और सन्धि कराने के लिये भेजा था, किन्तु दूतके वचनने मोह के समाजमें उल्टाही फल प्रगट किया । जिस प्रकार जलती हुई अग्निमें घृत पडनेसे उसकी ज्वाला और भी बढ़ती है उसी प्रकार मोहकी सेनाका क्रोध अधिक बढ़ गया । मोहराजाने उसी क्रोधके आवेशमें शीलसे कहा ।

जाय कहौ निजनाथही जो उबरन चहै ॥
भागै तजि पितुराज मौनव्रत गहि रहै ॥

टीका-मोहने कहा है शील ! अपने राजा से जाकर कहो कि, यदि वह अपना कुशल चाहता है तो चुपचाप पिता (मन) के राजसे निकल कर अन्यत्र भाग जावे । अथवा यदि राज्यमें रहनाही है तो मौनव्रत धारण करके अपना कालक्षेप करले ।

मोह राजाके ऐसे गर्वित वचन को सुनकर शीलदूत विवेक राजाके पास पहुँचा ।

दूत वचन प्रति उत्तर आय सुनायउ ॥
सुनत विवेक समाज निशान बजायउ ॥

टीका-शीलने विवेक राजाके सम्मुख आकर मोह राजाके दरबारमें जो जो कुछ बीता था सब सुनाय दिया । जब विवेक-