कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना
ज्ञानसागर
( ७७ )
पय औ रुधिर चल्योगुरु अंगा । पावक उठी शाह के अंगा ॥
तवै शाह ने सुधि अस पाई । महिमा जान कबीर बुलाई ॥
सारखी-कबीर दर्शन दीन्हा जबै, तपन भई सब दूर ॥
शाह कहा तुम सांच हो, औ अल्लहका नूर ॥
सिक्कन्दरवन-चोपाई
पय औ रुधिर चल्यो गुरु अंगा । शाह कहै यह कौन प्रसंगा ॥
कबीरवन
जेहि तन मान्यो शब्द हमारा । तेहि तैं चले दूध की धारा ॥
कीन्हा कालउ केर विचारा । आधा अङ्ग रुधिर अनुसारा ॥
अगले जन्म मुक्ति जो होई । अंकूरी जीव कहावै सोई ॥
गोको बिलाना
यहै चरित्र तहां पुनि भयऊ । तब नूरी के मंदिर गयऊ ॥
काजी मुह्ता सबै रहाये । गाय आनि के गलो कटाये ॥
देखि दुखित भये सत्त कबीरू । महा व्याधि गाई की पीरू ॥
केहि कारण गाई जो मारा । सो सब मोहि कहो उपचारा ॥
काजी काया देख विचारी । एकहि ब्रह्म गाय क्यों मारी ॥
गाय ज़िवावहु मुर्गा सारू । नातर वेद अथर्वन हारू ॥
सत्त शब्द है जासु शरीरू । व्यापी महा गाय की पीरू ॥
सारखी-उठिके गाय ठाढ़ी भई, आज्ञा जबही कीन्ह ॥
काजी मुह्ता जानि कै, पाव पकर तब लीन्ह ॥
चोपाई
नगर के लोग अचंभो लागा । यह कबीर कर्ता हो जागा ॥
मगध गवन
तब तहैं से पुनि कीन पयाना । उत्तर देश मगध अस्थाना ॥
नूवा नूरी काल बस भयऊ । तिन पुनि जन्म मनुष्य हिलयऊ ॥
( ७८ )
ज्ञानसागर
राजा बीरसिंह देव बड़ राज । ताके गृह अब धारचो पाऊँ ॥
कमलावती तासु नृप नारी । तिन बड़ सेवा कीन्ह हमारी ॥
ताकौ दीन्ह पान परवाना । तिन कछु भेद हमारा जाना ॥
कह्यो तासों मुक्ति प्रभाऊ । सुनत भयो आनंदित चाऊ ॥
विजुलीखां पठान बड़ ज्ञानी । सन्त जान जिन सेवा ठानी ॥
तासों कही मुक्ति परभाऊ । ज्ञान गम्य तिन बहुत कराऊ ॥
साखी-अति आधीन जब देखा, ता कहैं दीन्हहा नाम ॥
प्रीति जानि कै ताकी, कछु दिन किय विश्राम ॥
चोपाई
विजुलीखां कहै पीर हमारे । नृप वीरसिंह शिष्य तुम्हारे ॥
साहिब आप तजो जब देहा । दोह दीन सो कीन्ह सनेहा ॥
सुनि विहंसि अस आज्ञा ठानी । दोह दीन से हम निरवानी ॥
हिन्दू तुरक नहीं हो भाई । सुन पठान संशय उपजाई ॥
जो तुम दोइसों न्यारी रीती । मेरे मन कैसे होय प्रतीती ॥
तुम तो हो अछह के बन्दा । यह तो अहै आदमी गंदा ॥
तुमहि शरीर तजौगे जबही । शरीर उपाय करों क्या तबही ॥
कै पृथिवी कै देहों जारा । करहु हुकम सो पीर हमारा ॥
जो कछु होई लोक व्यवहारा । सोई कहो मम पीर पियारा ॥
जो साहिब हुकम जस करिहौ । मजार तुम्हारा रचिके धरिहौ ॥
साखी-बिहंसि कह्यो तब तिनसैं, मजार करौ सम्हार ॥
हिन्दू तुरक नहीं हौं, ऐसा वचन हमार ॥
चोपाई
दिन कछु गये तासु संबादा । राजा बीरसिंह ने भेजे प्यादा ॥
बन्दीछोर आवैं मम गेहा । रानी विन्ती कीन्ह सनेहा ॥
ताकी प्रीति तहाँ पगुधारा । दुःखद्वन्द्व तिन सबै विसारा ॥
ज्ञानसागर
( ७१ )
तिन पुनि कही सुनौ गुरु ज्ञानी । दुतिया ब्याह लगन में ठानी ॥
ब्याह जो होय बिकट अस्थाना । क्या जाने होवे संग्रामा ॥
कोइ घायल कोइ जाई मारा । खाड़ो आही दुहु दिशि धारा ॥
ताकी आज्ञा करौ गुसाई । तिनहि देह क्या करो उपाई ॥
कै गाड़ौ कै जारौ धूरी । यह संशय मेटो प्रभु मोरी ॥
करौ सोई लोक कुल धर्मा । बिन लागै कोई जानै न मर्मा ॥
साखी-जो गाड़ौ तो माटी, जो जारौ तो छार ॥
करो लोककी जो कृति, बोलता ब्रह्म निनार ॥
चौपाई
हे स्वामी तुम मोहि बताओ । तुम तनतजोतो काहि कराओ ॥
जस प्रभु तस पुन सेवक करई । सेवा युक्ति सदा सो तरई ॥
जो तुम कितहू करहू प्याना । गाड़हि लागै तुमहिं पठाना ॥
हँसै सबै यह देखि परतच्छा । गुरु तुम्हारो आहि मलेच्छा ॥
तस कछु भेद बताओ स्वामी । करो कृपा सो अन्तर्यामी ॥
वास्तव तेहो कहाँ बुझाई । जारौ देह जो क्षार उड़ाई ॥
तातैं लोक मैं नहीं छुड़ाओ । यातैं दोह दीन फरमाओ ॥
गयो नृपति तहैं साज बराती । कौतुक रचो देह तब त्यागी ॥
सुनत साज दल चले पठाना । राना मुर्दा ले बिल खाना ॥
लेकर गाड़ै करै निमाजा । करन बिहानक दूरी काजा ॥
साखी-रानी भेजे प्यादहीं, तन जब तजो कबीर ॥
आयो बिजुली खान तब, सुनि वृत्तान्त गंभीर ॥
चौपाई
राजा पास पठाओ पाती । सुनतहि क्रोध जरी तब छाती ॥
छाड़्यो ब्याह चले दल साजी । हनें निशान सम्हर की बाजी ॥
बाजा गाजी तुरही आवहि । यह बिजुलीखां युक्ति बनावहि ॥
ऐसी भांति सो कीन्ह प्याना । रन के आगे बजै निशाना ॥