कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
निरंजनका अद्याको निगल जाना और सत्यपुरुषका उसे शाप देना
( २२ )
अनुरागसागर
निरंजनका मानसरोवरमें अद्याको पाकर मोहवश हो उसे निगल
जाना और सत्यपुरुषका शाप पाना
पुरुष वचन सुन तबही गाजा । मानसरोवर आन विराजा ॥
आवत कामिनी देख्यो जबही । धर्मराय मन हरष्यो तबही॥
कहा देखि अष्टंगी केरी । धर्मराय इतरान्यो हेरी ॥
कहा अनन्त अंत कछु नाहीं । काल मगन है निरखत ताहीं॥
निरखत धर्मसु भयो अधीरा । अंग अंग सब निरख शरीरा॥
धर्मराय कन्या कहै ग्रासा । कालस्वभाव सुनो धर्मदासा॥
कीन्हों ग्रास काल अन्याई । तब कन्या चित विस्मय लाई॥
तत छण कन्या कीन्ह पुकारा । कालनिरंजन कीन्ह अहारा॥
तबही धर्म सहज लग आई । सहज शून्य तब लीन्ह छुड़ाई॥
पुरुष ध्यान कूर्म अनुसार । मोसनकाल कीन्ह अधिकारा॥
तानशीश मम भच्छण कीन्ह्यो । हो सत पुरुष दया भल चीन्ह्यो॥
यही चरित्र पुरुष भल जानी । दीन्ह शापसो कहों बखानी ॥
पुरुषका शाप निरंजनप्रति
लच्छ जीव नि ग्रासन करहू । सवालच्छ नितप्रति विस्तरहू॥
छन्द
पुनिकीन्हपुरुषतियानतिही, किमिमेटिडारोकालहो
कठिन काल कराल जीवन, बहुत करइ बिहाल हो॥
यहि मेटत अबना बनै मुहि, नालाइक सुत षोडसा॥
एक मेटत सबै मिटिहै, वचन डोल अडोलसा॥१६॥
सोरठा-डोल वचन हमार, जो अब मेटा धरमका॥
वचन करो प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहैं॥१६॥