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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

त्रेतामें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना

( ५८ )

ज्ञानसागर

चोपाई

तब हम मता अस कीन्हा । ताके शीश हाथ जो दीन्हा ॥
परसत शीश ताकर भय भागा । शून्य मंदिरमें सुहरा जागा ॥
देखत सुरति निरति सौ लोका । बिबसीका मेटचो सब धोखा ॥
हे स्वामी अब कीजे दाय। यमके घरसे जीव मुक्ताया ॥
बार अनेक विनय तिन कीन्हा । तब हम नाम लखाई दीन्हा ॥
भक्ति भावसों करै अनंदा । ज्यों चकोर पाये निशि चन्दा ॥
ताके गृह निंदक सब रहई । बिबसी देखत ही पर हरई ॥
साखी-जाके पाछे हंस जो उबरे, तिनहिको जो बताव ॥
हंस ग्यारह आयऊ, गुरुसे कीन्ह भिट्ठाब ॥

चोपाई

तिन कह सत् शब्द जो दीन्हा । परम पुरुषके दर्शन कीन्हा ॥
तब उठि गयो पुरुषके ठाऊँ । सतयुग सत सुकृत मम नाऊँ ॥
आवत जात लखे नहिं कोई । आज्ञा पुरुषकी जापर होई ॥

त्रेतायुगमें कबीर साहबका प्राकट्य

चोपाई

त्रेतायुग आयो पुनि जबही । युग अनुमान चलो मैं तबही ॥
नाम मुनींद्र धरो निःशंका । प्रथम जाय देखेउ गढ़लंका ॥
द्वारपाल सों कहि समुझाई । राजाको ले आव बुलाई ॥
सुन प्रतिहार कह अस वानी । रावन मरम सिद्ध नहिं जानी ॥
महा गर्व कछु गिने न आनो । शिवके बल कछु शंक न मानो ॥
मारहि मोहि कहाँ जो जाई । गर्व प्रहारी है रावन राई ॥

मुनींद्रववन

जाहु तुरत कहा सुन मोरा । बार बंक नहिं होवहिं तोरा ॥
प्रतीहार जब बात सुनाई । सिद्ध एक है ठाढ़ गुसाई ॥
सुनिनुपक्रोध अनल समकीन्हा । प्रतीहार तुम मति अति हीना ॥
भिक्षुक एक जो मोहि बुलावै । शिव सुत मार दरशनहिं पावै ॥

ज्ञानसागर

( ५१ )

साखी-कहा रूप तेहि ऋषीकर, मोहि कहो समझाय ॥
जो मांगे सो देव वहि, लेइ बहुर घर जाय ॥

चौपाई

हे प्रभु आहि सेत जो भाऊ । सेत अंग जैसे शशि गऊ ॥
माला तिलक बदन है सेता । कहै नृपति कोई आहि अजेता ॥
मन्दोदरि कहै सुनो हो राजा । ऐसा रूप और नहि छाजा ॥
सेत रूप महिमा मैं जानौं । निश्चय है कोई पुरुष पुरानो ॥
जार्ई तुरन्त गहौ तुम पाऊ । होऊ अकल सुन रावन राऊ ॥
दस सिर बचन सुनत पर जरेऊ । जगत हुताशन जनु वृत्त परेऊ ॥
चलि भयो असुर अनिल समचीन्हा । बहुत वेग मनमें अस कीन्हा ॥
सत्तरवार खड़ सो चलावा । तब हम ओट तृणकी लावा ॥

साखी-तृण ओट जेहि कारणे, गर्व परिहरौ राव ॥
तृण जवही ना टूटयो, राजहि शोक जनाव ॥

चौपाई

कह मन्दोदरि गहि मम पाऊ । गर्व न छाड़ रावन राऊ ॥
शिवकी सेव करै मन मानी । अटल राज दीन्हा तिन ठानी ॥
तब चलत हम कही अस बाणी । मृदु नृपति तुम मर्म न जानी ॥
सुनु रावण जो लंक मझारा । सब कहैं रामचन्द्र जो मारा ॥
काहू मुक्ति गम्य नहि पाई । ताते मैं कछु कहां बुझाई ॥
तो कहैं भक्षहि काल अन्याई । काचा मास स्वान जिमि खाई ॥
काल भक्ष जिव सबहि निदाना । अधिक तोर कछु मरदै माना ॥
अगिला जन्म तोर होइ जवही । भक्षी कृष्ण देख पुन तबही ॥
उनसे करिहौ बहु अभिमाना । ताकर तोहि कहा परवाना ॥
तृण नहि टूटो बल तुम बूझा । आगै कहा तोह बल सूझा ॥
वालि नाम इक कपि जो होई । रख छह मास तोहि कहैं गोई ॥
तिनकी कांख रहिहौ छै मासा । ऐसा कहैं पग कौन्ह प्रकाशा ॥

( ६० )

ज्ञानसागर

सार्वी-रावणको अपमान करि, अवध नगर चलि आय।
दशा सन्त की जान कै, मधुकर पकरै पाय ॥

प्रसंग-चौपाई

नमस्कार कर गहि लिये पाऊं । बाल गोपाल चरण तर नाऊं ॥
ताकी प्रीति नीक मैं जाना । तासों लोक संदेश बखाना ॥
तिन कीन्ही विन्ती बहुवानी । हे प्रभु देखों लोक सहिदानी ॥
लैकर चले पंथ तेहि जहँवा । पांजी एक रहे धर्म तहँवा ॥
देखि ताहि दौरे यम दूता । कहाँ ले चले विप्रको पूता ॥
कहैं सुनींद्र सुनो यमराई । इनको जिन रोकौ तुम आई ॥
जाकर दूत जाव तेहि पास। पाछे करो वैर की आशा ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव आज्ञा देही । तीन लोक महाँ जिव गहि लेही ॥

सार्वी-छोड़ देव यह मारग, तुम अब आहु कौन ॥
यहां कोई नहीं आवे, तुम कह करत हो गौन ॥

चौपाई

तव सुनींद्र अस बोले लीन्हा । होहु दूत तुम सब बलहीना ॥
शब्द प्रमाण न होई बल थोड़ा । दूतन जीत गये महि ओरा ॥
तिनको दिव्य दृष्टि कर दीन्हा । तहँवा जाय लोक तिन चीन्हा ॥
देखि स्वरूप सुरंग अपारा । झलके जोत जहां उजियारा ॥
देखत मधुकर बहुत प्रतीती । हे स्वामी तुम यम कहैं जीती ॥
मो कहैं दीजै शब्द दृढाई । जेहिते हम परम पद पाई ॥
अति आधीन देखा मैं जबहीं । नाम दृढाय दियो तेहि तबहीं ॥
अति आधीन जो बोलस्वभाऊ । मोरे गृह अब धारो पाऊ ॥
ताके गृह आयो मैं जबहीं । सोरा जीव शरण भये तबहीं ॥

सार्वी-मधुकर जेते जीव सब, लोकहि कीन्ह पयान ॥
तातैं नाम सुनींद्र कहि, जीव सत्त दियो दान ॥