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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

तीनों देवका मानुषी सृष्टिकी उत्पत्ति करना । मनुष्य की अधिकतासे पीड़ित होकर पृथ्वीका गौरूपधरके विष्णुके समीप जाना और विष्णुका अवतार लेनेका वचन देना

ज्ञानसागर

( २५ )

अहो पुरुष का करब उपाई । पृथ्वी भार बहुत अकुलाई ॥
ततक्षण भई अकाश ते वाणी । सुनहु विष्णु कर सबकी हानी॥
शिव विहाय चौदह सुत मोरा । इन्हें छांडकर शंकर ओरा ॥

सारखी-जाहु पृथ्वी घर अपने, करौं चरित अब सोय ॥
भार उतारो मही को, आज्ञा अस जो होय ॥

चौपाई

चली आय वसुधा निज गेहा । जमन विष्णु तब कीन्ह सनेहा॥
मारहु जारहु अब जिव जन्तू । सुन अन्तक सुन भयो अनंतू॥
आई पावक तब रखना लीन्हा । सबजिवमार विष्णु कहदीन्हा॥
मारे देव तैंतीस करोरी । ब्रह्मा मार मही सब घोरी ॥
कीन्हो युग निकंद भयो जबही । जुग निकंद विष्णु कियौ तबही॥
सब जीव घाल आप में लीन्हा । प्रथम स्वभाव जमन तब कीन्हा॥

सारखी-सवा लक्ष जीव विष्णु ते, चले जात नित नेम ॥
जस अनाज की कोठरी, करि कृषानु बहु प्रेम ॥

चौपाई

ले अनाज कोठी वहरावै । खरच लेइ पुन फेर सुदावै ॥
अस चरित्र कियो अन्त कराऊ । अबकछु भाखौ अगिल स्वभाऊ॥
विष्णुहिं सैं सतभाव जो देखा । छांडो अंश करौं सृष्टि उरेहा ॥
सतगुण भाव विष्णु कौ जानी । नाभि कमल ब्रह्मा उत्पानी ॥
ततक्षण ब्रह्मा गयो अकाशा । विष्णु ध्यान अस वचन प्रकाशा॥
येहो स्वामि निरंजन राया । वसुधा कैसे करौं उपाया ॥
बारी सहित मही जो बोरी । प्रकट करन की युक्ति है थोरी ॥
रजगुन भयो जो ब्रह्मा निवासा । ताकी नाभि से पवन प्रकाशा॥
तीनौं गुन तिय अंड जो भयऊ । दैत्य देह तिन दोनों धरेऊ ॥
उठि ठाढे नहिं पावहिं थाहा । गये जहां तहैं प्रभु अवगाहा ॥

( २६ )

ज्ञानसागर

करहिं युद्ध बहु भुजा पसारी । वे दोई बांह विष्णु भुजचारी ॥
बहुतक दिवस युद्ध जो कीन्हा । तिनपुनि ऐसोबोलहि लीन्हा ॥
मांगहु विष्णु देव मोहि सोई । मैं भय छल भाखौ अब सोई ॥
मधु कैंटभ तुम दैत्य अपारा । अवश्य होहु तुम वध्य हमारा ॥
होउ वध्य जहँवा जल नाहीं । दोनों गये विष्णु के ठाहीं ॥
यह चरित्र विधाता कीन्हा । तेजयजलसबसिन्धुमहँदीन्हा ॥
तबहि कियो पुन सप्त पतारा । मीन रूप वसुधा अनुसारा ॥
तेजय वल सब सिंधुमें दएऊ । उनचास कोट मेदनी ठएऊ ॥

साखी-तहां बैठ जो देवत, जब भयो पृथ्वि प्रचार ॥
तीन देव विन्ती करें, कीजै सृष्टि विचार ॥

चौपाई

प्रथमहिं सतयुग कीन्हौ थाना । कीन्हौ जीव जन्तु उत्पाना ॥
सत्यदेह पुनि भयल कुमारी । यह प्रकार रचना अनुसारी ॥
वडवा नाल अग्नि प्रकाशा । सो तीनों पुर कीन्ह निवासा ॥
कीन्होऋषिसबसहस्रअठासी । नौई नाथ सिद्ध चौरासी ॥
कीन्हौ देव प्रथम परगाशा । ये सब कीन्है अपने आशा ॥
और अनेक राजा सब कीन्हा । यह चरित्र काहू नहिं चीन्हा ॥
यहि कारण मारहिं उपजावहिं । आप स्वारथी जीव हतावहिं ॥

छंद

नहिं बूझ परत अपार महिमा सुरत ऐसी विधि कियो ।
बाज लगावहिं भावहु सब जीव जम के वश रह्यो ॥
तुम बूझि देखो चरित्र वाको जन न कोई बूझई ।
सेवा करत सब स्तुति यम जीव को अटकावई ॥
सोरठा-सुनु धर्मदास सुजान, नाम गहौ चितलाय कै ।
शब्द गहौ परवान, विना नाम नहिं मुक्ति फल ॥