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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्न भिन्न लोककी प्राप्ति

( ४४ )

जगजीवनबोध

सारखी-शिष्य होय तनै छिपाइ, ताका कहूँ विचार ।
कहै कबीर निर्भय नहीं, निश्चय यमके द्वार ॥

राजा वचन-चौपाई

राजा कहै सुनो गुरु मोरा । मैं लागत हूँ चरने तोरा ॥
सहस्र अठासी लोक बताओ । भिन्न भिन्न कै मोहि बुझाओ ॥
कौन हंस कहँ करै बसेरा । सब ही हंस कर कहँ २ डेरा ॥
उत्तर समरथ कहो बुझायी । यह सन्देह उठा मन आयी ॥
खेमसरी को कहा संदेशा । द्वादश हंस उन सँग उपदेशा ॥
चारों युगका कहा संदेशा । बहुते हंस बतायो भेशा ॥
बहुते जीवहि बोध बताये । तन छूटे सब कहाँ समाये ॥
बहुत हंस पहुँचे निज ठाई । तिनकर पता कह्यो समझाई ॥
और हंस कहाँको गयऊ । ताका बहुत संदेहा ठयऊ ॥

सतगुरु वचन

हे राजा तोहि कहि समझाऊँ । भिन्न २ कै वरनि बताऊँ ॥
जे जे जीव परवाना पावैं । सो सो जीव सत्यलोक सिधवैं ॥
परवाना की यहि अधिकाई । हंस विगोय ना कबहुँ जाई ॥
जो हंसा नहि देह बनावै । सो सब मानसरोवर जावै ॥
मान सरोवर दीप अमाना । होइ है चार भानु परमाना ॥
परवाना की यह अधिकाई । योनि गरभ बहुरि नहि आई ॥
ताते ताहि वृत्तान्त बतायी । सकल कामना तोर मिटायी ॥
सत्य सत्य सबको समझायी । जब गुरुको चरणामृत पायी ॥
जो कछु करै सुकृत कमाई । सो सब पान पर देहि चढाई ॥
हेत द्वीपमें पहुँचे जाई । तब ही हंसा देह बसाई ॥
ऐसी विधि जो पान चढावै । निज स्वरूप जीव सो पावै ॥
तापर हंस होय असवारा । पचासी पवन परे सरदारा ॥