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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

जहाँ आशा तहाँ वासा

अनुरागसागर

( ६७ )

जहां आशा तहां वासा

जहाँ आशा तहाँ वासा होई । मन वच करम सुमिर जो कोई ॥
देह धारि कीन्है जिहि आसा । अंत आय लीन्हैउ तहाँ वासा ॥
जब तुम देह धरो जग जाई । विसरचो पुरुषकाल धरिखाई ॥

जीवन वचन कबीर प्रति

कहे जीव सुनु पुरुष पुराना । देह धरी विसरचो यह ज्ञाना ॥
पुरुष जान सुमरेउ यमराई । वेद पुराण कहे ससुझाई ॥
वेद पुराण कहे पति एहा । निराकार ते कीजे नेहा ॥
सुर नर मुनि तैतीस करोरी । बांधे सबै निरंजन डोरी ॥
ताके मते कीन्ह मै आसा । अब मोहि चीन्ह परे यम फांसा ॥

कबीर वचन जीवोंप्रति

सुनो जीव यह छल मम केरा । यह यम फंदा कीन्ह घनेरा ॥

छन्द

काल कला अनेक कीन्हौं, जीव कारण ठाट हो ॥
तीर्थव्रत जग योग फन्दे, कोइ न पावत बाट हो ॥
आप तन धरि प्रगट हँके सिफत आपन कीन्हैऊ ॥
नानागुणनमन कर्म कीन्है, जीव बंधन दीन्हैऊ ॥ ४२ ॥
सोरठा-कालकराल प्रचण्ड, जीवपरे वश ताहिके ॥
जनम जनमभे दण्ड, सत्यनाम चीन्है विना ॥ ४४ ॥

१ यह छन्द कई ग्रंथोंमें कई प्रकारसे लिखा है दूसरे प्रकारसे जो दो सौ वर्षसे भी अधिकके लिखे पुराने ग्रंथ में इस प्रकार है—

छन्द-काल कन्या अनेक कीन्है जीव कारण जाल हो ।

वेद शास्त्र पुरान स्मृति ते रुधै काल कराल हो ।

देव धरि नर प्रगट हो फिरे, ताहि आशा कीन्हैऊ,

अमृत इत उत काल वसि, बहुपंथमें चित दीन्हैऊ ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति