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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पान माहात्म्य

बोधसागर

( ४७ )

यही ज्ञान मैं भेद समझायी । तुम हंसन से कहो बुझायी ॥
हमरो प्रतिहार पान है भाई । पलपल खबर हंसकी लाई ॥
सोई वस्तु लै लोक पहुँचावे । सोई पान संग हंसन आवे ॥
जाका तुमसे कहूँ विचारा । पान लहे सो हंस हमारा ॥
जैसुनि लगन पान जो पावे । निर्भय लोक हमारे आवे ॥
पान परख विन झूठ कडिहारा । धोखे लेइ जिवन कर भारा ॥
धर्मराय माँगि है पाना । जब ही हंसा करे निर्वाना ॥
साखी-सब ही पहुँचे लोकमें, चढै पानपर अंक ।
कटे कर्म सब जन्मके, हंस होय निःशंक ॥

हंस ( राजा ) वचन-बोपाई

हंस कहे सुनो गुरुदेवा । जीवकि अवधि बताओ भेवा ॥
जादिन अंत अवस्था आवे । ताकर भेद हंस किमि पावे ॥
सोम शुक्र दिन औ बुधवारा । ताका कहिये चन्द्र सरदारा ॥
आपनि आपनि चौकी आवै । तौ यह जीव बहुत सुख पावै ॥
चले चूक चौकी कर फेरा । तौ कायानगरमें होय बखेरा ॥
गुरुबारका भेद बताऊँ । दो भावै गुरु दरस दिखाऊँ ॥
एकै आवै एक न आवै । ता दिन जीव बहुत दुःख पावै ॥
बार तिथि चौकी चूक करही । तो निश्चय ना बाचै देही ॥
सरब भेद मैं तोहि बताया । विरले हंस भेद यह पाया ॥
तुम सों हंस कहूँ समझायी । गुप्त भेद ना बाहिर जायी ॥
अब हम पृथ्वी परिक्रमा जावै । भूले हसन करें चितावै ॥
तुम राजा बैठि राज कराओ । सार शब्द जपन चित लाओ ॥

राजा वचन

जब सतगुरु तहाँ ऐसो कहिया । तब राजा मन चिता भइया ॥
राजा चरण धरयो तब आई । तुम विनु कैसे रहूँ गुसाई ॥
हमको राखो चरण लगायी । नहि देहु सत्यलोक पठायी ॥