चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
About this granth
The Charaka Samhita (चरक-संहिता) is the foundational text of Ayurvedic internal medicine. By tradition, the teachings of Punarvasu Atreya were set down by his disciple Agnivesha, revised by Charaka and later completed by Dridhabala of Kashmir. With eight sections and 120 chapters, it is counted with the Sushruta Samhita and Ashtanga Hridaya among the 'great three' of Ayurveda.
This volume covers the Sutra, Nidana and Vimana sections. It includes chapters such as Dirghanjivitiya, Apamarga-tanduliya, Matrashitiya and Mahachatushpada; the count of purgative formulations made from madana fruit and other drugs; the fifty great groups of herbs, beginning with the digestives; the classes of prepared foods and food sources; abscesses and boils; and the diagnosis of the five kinds of insanity.
As the title page states, this is the first part of the Charaka Samhita with a Hindi translation by Kaviraj Atridev Gupta, Vidyalankar, Bhishagratna, of Gurukul University, published by Bhargava Pustakalaya, Gaighat, Banaras. The preface mentions the Jalpakalpataru of Gangadhar Kaviraj and the Charakopaskara of Yogindranath Sen. This second edition has 639 pages.
अ० १ ] निदानस्थानम् ४१५
अ० १ ] निदानस्थानम् ४१५
घ्राण-मुख-कण्ठोष्ठ-तालु-पाकः, ऊष्मा, तृष्णा, भ्रमः, मदः, मूर्च्छा, पित्तच्छ-
र्दनमतीसारोऽन्नद्वेषः, सदनं, संस्वेदः, प्रलापः, रक्तकोठाभिनिर्वृत्तिः
शरीरे, हरितहारिद्रत्वं नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीष-त्वचामत्यर्थमुष्णत्वस्ती-
व्रभावोऽतिमात्रं दाहः, शीताभिप्रायता, निदानोक्तानामनुपशयो, विप-
रीतोपशयश्चेति पित्तज्वरलिङ्गानि भवन्ति ॥ ११ ॥
पित्त-ज्वर के लक्षण—यथा—सम्पूर्ण शरीर में एक साथ ( सहसा ) ज्वर
का चढ़ना, अथवा ज्वर का बढ़ना; भोजन के पचने के समय, मध्यान्ह में,
आधी रात में, शरद् ऋतु में, विशेष करके ज्वर बढ़ता है; मुख में कड़वापन;
नासिका, मुख, कण्ठ, ओष्ठ, तालु का पकना; गरमी, प्यास का लगना, भ्रम,
मद, मूर्च्छा, पित्त का वमन, अतिसार, अन्न में अनिच्छा, पसीना आना, प्रलाप,
शरीर पर लाल लाल धब्बे वा चक्के, फुन्सियां निकलना, नख-आंख-मुख-मूत्र-
मल-त्वचा इन का रंग हरा या हल्दी के समान हो जाना; गरमी बहुत बढ़
जाना, बहुत अधिक जलन होना, शीत वस्तुओं की चाह रहना और पित्त
ज्वर के कारण रूप पदार्थों का अनुकूल न आना एवं विपरीत गुण वाले पदार्थों-
का अनुकूल आना ये पित्तज्वर के लक्षण हैं ॥ ११ ॥
स्निग्ध-गुरु-मधुर-पिच्छिल-शीताम्ल-लवण-दिवास्वप्र-हर्षाऽव्यायामे-
भ्योऽतिसेवितेभ्यः श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते ।
कफ प्रकोप के कारण—चिकनास, मीठे, भारी, शीतल, पिच्छिल, खट्टे
नमकीन पदार्थों के अतिसेवन से, दिन में सोने से, हर्ष वा आनन्द के अति
सेवन तथा व्यायाम के न करने से कफ प्रकुपित होता है ।
स यदा प्रकुपितः प्रविश्याऽऽमाशयमूष्मणा सह मिश्रीभूयाऽऽममाहा-
रपरिणामधातुं रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधाया-
ग्निमुपहत्य पक्तिस्थानादूष्माणं बहिर्निरस्य प्रपीडयन् केवलं शरीरमनु-
प्रपद्यते, तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति; तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति ।
कफज्वर की सम्प्राप्ति—कुपित कफ आमाशय में जाकर उष्णिमा के साथ
मिलकर, अन्न के परिणाम भूत रस नामक धातु से मिल कर, रसवह और
स्वेदवह स्रोतों को बन्द करके अग्नि को मन्द कर देता है । पक्वाशय से अग्नि
को बाहर निकाल कर सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करता है । इस प्रकार से कफ
ज्वर को उत्पन्न करता है । कफ ज्वर के लक्षण ये होते हैं ।
तद्यथा—युगपदेव केवले शरीरे ज्वरस्याभ्यागमनमभिवृद्धिर्वा ।
भुक्तमात्रे पूर्वाह्ने पूर्वरात्रे वसन्तकाले वा विशेषेण गुरुगात्रत्वमनन्ना-
४१६ चरकसंहिता [ अ० १
मिलाषः, श्लेष्मप्रसेको, मुखस्य च माधुर्यं, हृल्लासो, हृदयोपलेपस्ति-
मितत्वं, छर्दिर्मेन्दूग्निता, निद्राधिक्यं, स्तम्भस्तन्द्रा, श्वासः, कासः,
प्रतिश्यायः, शैत्यं, शैत्यं च नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीष-त्वचामत्यर्थं, शीत-
पिडकाश्च भृशमङ्गेभ्य उत्तिष्ठन्ति, उष्णाभिप्रायता, निदानोक्तानाम-
नुपशयो विपरीतोपशयश्चेति श्लेष्मज्वरलिङ्गानि भवन्ति ॥ १२ ॥
कफज्वर के लक्षण—यथा—सम्पूर्ण शरीर में ज्वर एक साथ आता है, या
बढ़ता है। भोजन करने के समय (या खा चुकने पर ही) पूर्वाह्न में, रात्रि
के प्रथम भाग में, या वसन्त ऋतु में ज्वर का वेग बढ़ा होता है ↓ शरीर में
भारीपन, भोजन में अरुचि, मुख से लार बहना, मुख में मिठास, वमन की
रुचि, बेचैनी, हृदय का रुकना, हृदय (आमाशय) प्रदेश पर कफ का लगा
रहना, आलस्य (तन्द्रा), वमन, अग्नि का मन्द होना, नींद का अधिक आना,
जड़ता सुस्ती, खांसी, श्वास, जुकाम, शीत लगना, नख, आंख, मुख, मूत्र, मल
और त्वचा में सफेदी; शरीर पर बहुतसी पिडिकाओं, फुन्सियों का निकल
आना, इन पिडकाओं का स्पर्श शीतल होता है। उष्ण पदार्थों की चाह
रहती है, कफज्वर के कारण वाले पदार्थों का अनुकूल न आना और विपरीत
गुण वाले पदार्थों का अनुकूल आना होता है। ये कफज्वर के लक्षण हैं ॥१२॥
विषमाशनादनशनादन्नपरिवर्त्तादृतुव्यापत्तेरसात्म्यगन्धोपघ्राणाद्
विषोपहतस्योदकस्य चोपयोगाद् गरेभ्यो गिरीणां चोपश्लेषात् स्नेह-स्वेद-
वमन-विरेचनाऽऽस्थापनानुवासन-शिरोविरेचनानामयथावत्प्रयोगात् मि-
थ्यासंसर्जनाद्वा स्त्रीणां च विषमप्रजननात् प्रजातानां च मिथ्योपचाराद्य-
थोक्तानां च हेतूनां मिश्रीभावाद्यथानिदानं द्वन्द्वनामन्यतमः सर्वे वा
त्रयो दोषा युगपत्प्रकोपमापद्यन्ते, ते प्रकुपितास्तयैवाऽऽनुपूर्व्या ज्वरम-
भिनिर्वर्तयन्ति ।
तीन दोषों के प्रकोप के कारण ज्वर—विषम भोजन से, भोजन के न करने
से, ऋतु के बदलने से, ऋतु के विकृत (अतियोग, मिथ्यायोग) होने से; प्रति-
कूल-गंधयुक्त पदार्थों के सूंघने से; विषयुक्त पानी के उपयोग से; संयोगजन्य
विष के दोष से; पर्वतों के पास में रहने से; स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन,
आस्थापन, अनुवासन, और शिरोविरेचन के अयोग्य प्रयोग से स्त्रियों के विषम
प्रसव करने से; बालक की उत्पत्ति के पीछे मिथ्या परिचर्या से; और पूर्व कहे
हुए वात, पित्त, कफ इन दोषों के परस्पर मिश्रण से दो दोष या तीनों दोष एक
साथ प्रकुपित हो जाते हैं। औषधिकी गन्ध से ज्वर होता है—यथा "हाई फीवर"।
अ० १] २७ निदानस्थानम् ४१७
अ० १] २७ निदानस्थानम् ४१७
तत्र यथोक्तानां ज्वरलिङ्गानां मिश्रीभावविशेषदर्शनाद् द्वन्द्विक-
मन्यतमं ज्वरं सान्निपातिकं वा विद्यात् ॥ १३ ॥
संसर्गज व सान्निपातिक ज्वर—इस प्रकार से दो दोष या तीन दोष साथ
मिलकर अनुक्रम से-कफ-वातज, कफ-पित्तज और कफ-वात-पित्तज ज्वर को
उत्पन्न करते हैं। द्वन्द्वज ज्वर में दो दोष कुपित होकर दोनों दोषों के
लक्षण उत्पन्न करते हैं, इसी प्रकार तीनों दोषों से उत्पन्न ज्वर में तीनों दोषों
के लक्षण होते हैं। इन लक्षणों को देखकर दो या तीन दोषों से उत्पन्न ज्वरों
को जानना चाहिये ॥ १३ ॥
अभिघाताभिषङ्गाभिचाराभिशापेभ्य आगन्तुर्हि व्यथापूर्वो ज्व-
रोऽष्टमो भवति ।
आगन्तुज ज्वर—अभिघात (चोट आदि के लगना ), अभिषंग (काम
आदि वेग ), अभिचार ( अथर्वमन्त्र आदि से ज्वर पैदा करना ), अभिशाप
( गुरु, सिद्ध आदि पुरुषों का शाप ), इन मुख्य चार कारणों से व्यथापूर्वक
आगन्तुज ज्वर उत्पन्न होता है। यह ज्वर आठवां प्रकार का है।
स किंचित्कालमागन्तुः केवलॊ भूत्वा पश्चाद् दोषैरनुबध्यते ।
तत्राभिघातजो वायुना दुष्टशोणिताधिष्ठानेन, अभिषङ्गः पुनर्व्वातपि-
त्ताभ्यां, अभिचाराभिशापजौ तु सन्निपातेनानुबध्येते । स सप्तविधाज्ज्व-
राद्विशिष्टलिङ्गोपक्रमसमुत्थानत्वाद्विशिष्टो वेदितव्यः, कर्मणा साधारणेन
चोपकर्म्यत इत्यष्टविधा ज्वरप्रकृतिरुक्ता ॥ १४ ॥
आगन्तुज ज्वर की सम्प्राप्ति—आगन्तुज ज्वर उत्पन्न होकर कुछ काल
( सात दिन वा तीन दिन ) तक रहता है, फिर वात आदि दोष के साथ मिल
जाता है। अभिघातज ज्वर में प्रथम चोट आदि से ज्वर उत्पन्न होता है,
पीछे से दोष उत्पन्न होता है। इस ज्वर में वायु दूषित रक्त के साथ मिलकर
इसका आश्रय करके रहता है। अभिसंगज ज्वर वात-पित्त का आश्रय करता
है। अभिचार और अभिशाप से उत्पन्न ज्वर तीनों दोषों का आश्रय करके
रहते हैं। आगन्तुज ज्वर के लक्षण, चिकित्सा और इसका निदान, दूसरे
वात आदि दोषों से उत्पन्न सात प्रकार के ज्वर से सर्वथा भिन्न प्रकार के हैं,
अर्थात् दैवव्यपाश्रय बलि मंगल आदि तथा युक्ति व्यपाश्रय चिकित्सा करनी
चाहिये। इसका साधारण कर्म, सब प्रकार के ज्वरों में सामान्यतः एक ही
१. 'व्यथापूर्वः' आगन्तुज ज्वर में व्यथा ही पूर्वरूप है। इन में प्रथम
ज्वर होकर फिर दोषों का सम्बन्ध होता है।
सप्तविधं चाऽऽहुर्भिषजो वातादिविकल्पात् ॥ १५ ॥
४१८ चरकसंहिता [ अ० १
प्रकार की चिकित्सा की जाती है, क्योंकि ज्वर एक ही प्रकार का है। इस
प्रकार से ज्वर के आठ प्रकार कह दिये हैं ॥१४॥
ज्वरस्त्वेक एव संतापलक्षणः। तमेवाभिप्रायविशेषाद् द्विविधमा-
चक्षते। निजागन्तुविशेषाच्च । तत्र निजं द्विविधं त्रिविधं चतुर्विधं
सप्तविधं चाऽऽहुर्भिषजो वातादिविकल्पात् ॥ १५ ॥
ज्वर तो एक ही प्रकार का है। क्योंकि सब प्रकार के ज्वरों में 'सन्ताप'
(गरमी) पाई जाती है। परन्तु अभिप्राय विशेष को लेकर इसके निज
(शारीरिक) और आगन्तुज ये दो भेद लिये जाते हैं। इसमें निजज्वर को
वातादि दोषों की विकल्पना से (संसृष्ट और असंसृष्ट शीत या उष्णभेद से)
दो प्रकार का, (वात आदि दोष भेद से) तीन प्रकार का, (वात, पित्त, कफ
और सन्निपातज भेद से) चार प्रकार का, (दोष जन्य, मिश्रण सन्निपात
भेद से) सात प्रकार का कहा जाता है ॥१५॥
तस्येमानि पूर्वरूपाणि । तद्यथा—मुखवैरस्यं गुरुगात्रत्वमनन्ना-
भिलाषश्चक्षुषोराकुलत्वमस्रागमनं निद्राया आधिक्यमरतिर्जृम्भा विनामो
वेपथुः श्रम-भ्रम-प्रलाप-जागरण रोमहर्ष-दन्तहर्षाः शब्द-शीत-वातातपा-
सहत्वासहत्वमरोचकाविपाको दौर्बल्यमङ्गमर्दः सदनमल्पप्राणता-दीर्घ-
सूत्रताऽऽलस्यमुचितस्य कर्मणो हानिः प्रतीपता स्वकार्येषु गुरूणां वाक्ये-
ष्वभ्यसूया, बालेषु प्रद्वेषः, स्वधर्मेष्वचिन्ता माल्यानुलेपन-भोजन-परि-
क्लेशनं मधुराेषु भक्ष्येषु प्रद्वेषोऽम्ललवणकटुकप्रियता चेति ज्वरपूर्व-
रूपाणि भवन्ति प्राक्सन्तापात्, अपि चैनं सन्तापार्त्तमन्बध्नन्ति ॥ १६ ॥
इत्येतान्येकैकशो ज्वरलिङ्गानि व्याख्यातानि भवन्ति बिस्तरस-
मासाभ्याम् ।
ज्वर के पूर्वरूप—उस ज्वर के पूर्वरूप ये हैं। जैसे-मुख में विरसता,
शरीर में भारीपन, भोजन में अनिच्छा, आंखों में बेचैनी, आंखो से आंसू
बहना; नींद का अधिक आना, १बेचैनी, जंभाई आना, शरीर का मुड़ना २कम्पन,
श्रम, भ्रम, प्रलाप, नींद का न आना, लोमहर्ष, शब्द, गीत, ३ वायु, धूप की
कभी सहन करने की रुचि और कभी सहने में अरुचि का होना; भोजन में
१. 'असृगागमनम्' इति वा पाठः । अर्थात् आंखे लाल हो जाती हैं।
२. 'विराम' इति पाठान्तरम्, अर्थात् मन की उदासीनता ।
३. गीत के स्थान पर 'गीत' पाठान्तर है, वहां गीत अर्थात् संगीत में अनिच्छा ।
अरुचि, अविपाक, दुर्मनाता, अंगों का टूटना, शक्ति का कम हो जाना; अल्प-
प्राणता, दीर्घसूत्रता (काम में आलस्य), आरम्भ किये हुए कार्य में इच्छा का
न होना, अपने किये हुए काम में प्रतिकूलता, गुरुजनों के वाक्यों में अश्रद्धा,
बालकों से द्वेष, अपने कर्त्तव्य में (धर्मकार्य में) बेपर्वाही; फूलों की माला,
चन्दन का लेपन, और भोजन में दुःख मानना; मधुर वस्तुओं से द्वेष, खट्टे-
नमकीन कडुवे पदार्थों की चाह होना,-ये ज्वर के पूर्व रूप हैं संताप से भी पूर्व,
सन्तापयुक्त रोगी में प्रतीत होने लगते हैं। इस प्रकार से ज्वर के लक्षण अलग
अलग विस्तार एवं संक्षेप में कह दिये हैं ॥ १६ ॥
ज्वरस्तु खलु महेश्वर-कोप-प्रभवः सर्वप्राणिनां प्राणहरो देहेन्द्रि-
यमनस्तापकरः प्रज्ञा-बल-वर्ण-हर्षोत्साह-सादनः १, श्रम-क्लम-मोहाहारोप-
रोध-संजननो, ज्वरयति शरीराणि इति ज्वरः, नान्ये व्याधयस्तथा
दारुणा बहुपद्रवा दुश्चिकित्स्याश्च यथाऽयमिति, स सर्वरोगाधिपति-
र्नानातिर्यग्योनिशु बहुविधैः शब्दैरभिधीयते, सर्वप्राणभृतश्च सज्ज्वरा
एव जायन्ते सज्ज्वरा एव म्रियन्ते, स महामोहः, तेनाभिभूता देहिनः
प्राग्दैहिकं कर्म किंचिदपि न स्मरन्ति, सर्वप्राणभृतां च ज्वर एवान्ते
प्राणानादत्ते ॥ १७ ॥
ज्वर का परिणाम—ज्वर महेश्वर के क्रोध से उत्पन्न हुआ है। यह ज्वर
सब प्राणियों का प्राण लेने वाला, इन्द्रिय और मन को ताप (दुःख) देने
वाला; बुद्धि, बल, कान्ति, हर्ष, उत्साह का नाश करने वाला, व्याधि, भ्रम,
क्लान्ति, मोह और क्षुधानास को उत्पन्न करने वाला है।
ज्वर शब्द की निरुक्ति—ज्वर शरीरों को पीड़ित करता है, इसलिये इसको
'ज्वर' कहते हैं। इसके समान कठिन, बहुत उपद्रवयुक्त, चिकित्सा करने में
दुःसाध्य और दूसरा रोग नहीं हैं। ज्वर ही सब रोग का अधिपति है। नाना-
प्रकार के पशु पक्षियों में अनेक प्रकार के शब्दों से कहा जाता है। २ सब
प्राणी ज्वर के साथ उत्पन्न होते हैं और ज्वर के साथ ही मरते हैं। ज्वर महा-
मोह स्वरूप है, इसलिये इस ज्वर से आक्रान्त होने से पूर्वजन्म (पूर्व शरीर) के
किसी भी कर्म का स्मरण नहीं करता। यह ज्वर ही सब प्राणियों के प्राणों का
हरण करता है ॥ १७ ॥
१. 'त्साहह्रासकरः' इति पाठः। २. यथा—हाथियों में होने वाले ज्वर को
'पाकल', गायों में होने वाले ज्वर को 'खेरिक', मछलियों के ज्वर को 'इन्द्र-
ताल', पक्षियों के ज्वर को 'भ्रामरक' कहते हैं।
४२० चरकसंहिता [ अ० १
तत्र पूर्वरूपदर्शने ज्वरादौ वा हितं लघ्वशनमतर्पणं वा ज्व-
रस्याऽऽमाशयसमुत्थत्वात् ततः कषायपानाभ्यङ्ग-स्वेद-प्रदेह-परिषेकानुले-
पन-वमन-विरेचनाऽऽस्थापनअनुवासनोपशमन-नस्तःकर्म-धूप-धूमपाना-
ञ्जन-क्षीरभोजन-विधानं च यथास्वं युक्त्या प्रयोज्यम् ।
ज्वर के चिकित्सा सूत्र—ज्वर के पूर्व रूप होने पर अथवा ज्वर के प्रारम्भ
में ही हलका अन्न सेवन करना अथवा लंघन करना चाहिये । क्योंकि ज्वर
आमाशय से उत्पन्न होता है । इसके अनन्तर कषाय ( क्वाथ ) अभ्यंग, स्वेद
प्रदेह ( लेप ), परिषेक, अनुलोमन ( वात को अनुकूल करने की क्रिया ),
वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासनबस्ति, कर्म उपशमन, नस्यकर्म, धूपन,
धूमपान, अंजन और दूध भोजन की कल्पना, यथायोग्य उपयोग करना चाहिये ॥
जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिषः पानं प्रशस्यते, यथास्वौषधसिद्धस्य
सर्पिर्हि स्नेहाद्वातं शमयति, संस्कारात्कफं, शैत्यात्पित्तमूष्माणं च ।
तस्माज्जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिर्हितमुदकमिवाग्निप्लुतेषु द्रव्येष्विति १८
जीर्णज्वर में घृतपान—सब प्रकार के जीर्ण ज्वरों में घी का पान करना
प्रशस्त है । इसके लिये योग्य रीति से ओषधियों द्वारा सिद्ध किया घी काम में
लाना चाहिये । चिकना होने से घी वायु का शमन करता है, भिन्न २ ओष-
धियों के संस्कार से कफ को शीतलता से पित्त और उष्मा को शान्त करता है ।
इसलिये सब प्रकार के जीर्णज्वरो में घी ऐसा ही हितकारक होता है जिस प्रकार
कि आग से जलते हुए पदार्थों के लिये पानी हितकारक है ॥१८॥
भवन्ति चात्र—यथा प्रज्वलितं वेश्म परिषिञ्चन्ति वारिणा ।
नराः शान्तिमभिप्रेत्य तथा जीर्णज्वरे घृतम् ॥ १९ ॥
स्नेहाद्वातं शमयति, शैत्यात्पित्तं नियच्छति ।
घृतं तुल्यगुणं दोषं संस्कारात्तु जयेत्कफम् ॥ २० ॥
नान्यः स्नेहस्तथा कश्चित्संस्कारमनुवर्तते ।
यथा सर्पिरतः सर्पिः सर्वस्नेहोत्तमं मतम् ॥ २१ ॥
संस्कारसिद्ध घृत—जिस प्रकार आग से जलते हुए घर को बुझाने के लिये
मनुष्य पानी डाला करते हैं, उसी प्रकार जीर्णज्वर में घृत का उपयोग उत्तम है
घी स्नेह गुण से वायु को, शीतगुण से पित्त को तथा जिस ओषधि से सिद्ध
किया जाता है उस ओषधि का गुण लेकर कफ को शान्त करता है ।
घृत की श्रेष्ठता—जिस प्रकार घी दूसरी दवाईयों के गुण अपने में ग्रहण
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२१
करके संस्कारयुक्त हो जाता है उस प्रकार और कोई अन्य स्नेह पदार्थों के
गुण ग्रहण नहीं करता। इसलिये सब स्नेहों में घी ही श्रेष्ठ है ॥१६-२१॥
गद्योक्तो यः पुनः श्लोकैरर्थः समनुगीयते ।
तद्व्यक्तिव्यवसायार्थं द्विरुक्तं तन्न गर्ह्यते ॥ २२ ॥
जो अर्थ गद्यरूप में कहा गया है, उसी को श्लोक रूप में कहते हैं।
इसमें पुनरुक्त दोष नहीं है। क्योंकि गद्य में कहे हुए विषय को ही पुनः और
अधिक स्पष्ट और दृढ़ करने के लिये पद्य में कहा जाता है ॥२२॥
तत्र श्लोकाः—त्रिविधं नामपर्यायैर्हेतुं पञ्चविधं गदम् ।
गदलक्षणपर्यायान् न्यायाः पञ्चविधं ग्रहम् ॥ २३ ॥
ज्वरमष्टविधं तस्य प्रकृष्टासन्नकारणम् ।
पूर्वरूपं च रूपं च भेषजं संग्रहेण च ॥ २४ ॥
व्याख्यातवान् १ ज्वरस्याग्रे निदाने विगतज्वरः ।
भगवानग्निवेशाय प्रणताय पुनर्वसुः ॥ २५ ॥
रोगों के तीन प्रकार के हेतु, पर्यायवाचक शब्द, पांच प्रकार के रोग,
इनके लक्षण, पर्यायवाचक शब्द, रोगों के पांच प्रकारों का संग्रह, ज्वर के
आठ भेद, इसके समीप एवं दूरवर्ती कारण, ज्वर के पूर्वरूप, रूप और
औषध का संक्षेप में वर्णन, ये सब विषय 'ज्वर-निदान' नामक अध्याय में
विनीत अग्निवेश को भगवान् पुनर्वसु ने उपदेश किये।
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने ज्वरनिदानं
नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
अथातो रक्तपित्तनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब रक्तपित्त निदान का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने
कहा था ॥ १-२ ॥
पित्तं यथा भूतं लोहितपित्तमिति संज्ञां लभते तथाऽनुव्याख्या-
स्यामः। यदा जन्तुर्यवकोद्दालक-कोरदूषक-प्रायाण्यन्नानि भुङ्क्ते भृशोष्ण-
१. 'व्याजहार' इति पाठः ।
४२२ चरकसंहिता [ अ० २
तीक्ष्णमपि चान्नमजातं निष्पाव-माष-कुलत्थ-क्षार-सूपोपहितं दधि-
मण्डोदश्वित्कट्वराम्ल-काञ्जिकोपसेकं वाराह-माहिषाविक-मात्स्य-गाव-
पिशित-पिण्याक-पिण्डालु-शुष्क-शाकोपहितं मूलक-सर्षप-लशुन-करञ्ज-
शिग्रु-मधुशिग्रु-खडयूष-भूस्तृण-सुमुख-सुरस-कुठेर-गण्डीर-कालमानक-
पर्णास-क्षवक-फणिज्जकोपदंशं सुरासौवीरक-तुषोदक-मैरेय-मेदक-मधूल-
क-शुक्त-कुवल-बदराम्ल-प्रायानुपानं पिष्टान्ननोत्तरभूयिष्ठमुष्माभितप्तो
वाऽतिमात्रमतिवेलं पयः पिबति पयसा वा समश्नाति रौहिणीकं काण-
कपोतं वा सर्षपतैलक्षारसिद्धं कुलत्थ-पिण्याक-जाम्बव-लकुच-पक्कैः
शौक्तिकैर्वा सह क्षीरमाममतिमात्रमथवा पिबत्युष्माभितप्तस्तस्यैवमा-
चरतः पित्तं प्रकोपमापद्यते, लोहितं च स्वप्रमाणमतिवर्तते, तस्मिन्
प्रमाणातिप्रवृत्ते पित्तं प्रकुपितं शरीरमनुसर्पद्यदैव यकृत्प्लीहप्रभवाणां
लोहितवहानां स्रोतसां लोहिताभिष्यन्दगुरूणि मुखान्यासाद्य प्रति-
रुन्ध्यात् तदैव लोहितं दूषयति ॥ ३ ॥
जिस प्रकार से पित्त को 'रक्तपित्त' कहते हैं, उसकी व्याख्या करते हैं ।
जब मनुष्य यवक (ब्रीहि-विशेष), उद्दालक (वनकोद्रव) कोरदूष, इनमें
मिले खान-पान के अति सेवन से, अथवा दूसरे कोई अति उष्ण या तीक्ष्ण
गुण वाले अन्न के सेवन करने से, अथवा पूए, उड़द, कुलथी, दालें, क्षारयुक्त
पदार्थों के सेवन से, दही, दधिमण्ड (मस्तु), उदश्वित् (आधा जल मिश्रित
तक्र), कट्वर (बिना पानी का तक्र या खट्टी छाछ), अम्लकांजी (खट्टी
कांजी), सूअर, भैंस, भेड़, मछली और गाय के मांस के सेवन से, पिण्याक
(फेणी) पिण्डालु, कचालु शुष्क शाक (सूखे शाक) से युक्त अन्न पान के
सेवन से, मूली, सरसों, लशुन, करञ्ज, सहजन, मधुशिग्रु (मीठा सहजन),
खडयूष (कढी आदि), भूस्तृण (रोहिष तृण), सुमुख, सुरस, कुठेर,
गण्डीर, कालमानक, पर्णास, क्षवक और फणिज्जक (सब तुलसी के भेद)
इनके सेवन से, सुरा, सौवीर (कांजी), तुषोदक, मैरेय, मेदक, मधूलक
(महुवे की शराब), शुक्त (सिरका आदि), कुवल (बड़ा बेर), बेर अथवा
दूसरे खट्टे पदार्थ मिश्रित वस्तुओं के अत्यन्त उपयोग करने से, अधिक उष्णिमा
में रहने के पीछे अथवा पिष्टी युक्त अन्न के खाने के उपरान्त बार बार पानी
के पीने से, अथवा दूध के साथ रोहतक शाक या कबूतर का मांस, सरसों के
तेल अथवा क्षार में सिद्ध किये हुए पदार्थों के खाने से, अथवा कुलथी, उड़द,
पिण्याक, जामुन, बड़हल आदि पके हुए फलों के साथ कांजी या कच्चा दूध
अ० २] निदानस्थानम् ४२३
अ० २] निदानस्थानम् ४२३
अतिमात्रा में अथवा शरीर की गरम स्थिति में खाने से, मनुष्य का पित्त प्रकु-
पित होजाता है और रक्त अपनी मात्रा से अधिक बढ़ जाता है ।
पित्त प्रकोप से रक्त का दोष—इस प्रकार प्रमाण में अधिक बढ़ा हुआ
रक्त तथा प्रकुपित हुआ पित्त सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है और यकृत् एवं
प्लीहा से उत्पन्न होने वाले रक्तवह स्रोतों के बढ़े हुए रक्तके कारण भरे हुए
मुखों को पहुँचकर बन्द कर देता है। इस प्रकार संसर्ग द्वारा पित्त रक्त को
दूषित कर देता है*॥ ३ ॥
तल्लोहितसंसर्गाल्लोहितप्रदूषणाल्लोहितगन्धवर्णानुविधानाच्च पित्तं
लोहितपित्तमित्याचक्षते ॥ ४ ॥
पित्त का रक्त के साथ संसर्ग होने से एवं शरीरस्थरक्त के पित्त के द्वारा
दूषित होने से तथा पित्त का रक्त के समान गन्ध एवं रंग होने से पित्त को
'रक्तपित्त' कहते हैं ॥ ४ ॥
तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा—अनन्नाभिलाषो भुक्तस्य
विदाहः शुक्ताम्लगन्धरस उद्गारश्छर्देरभीक्ष्णागमनं छर्दितस्य बीभ-
त्सता स्वरभेदो गात्राणां सदनं परिदाहो मुखाद्धूमागम इव लोहलोहि-
तमत्स्यामगन्धित्वमपि चाऽऽस्यस्य रक्त-हरित-हारिद्रवत्वमङ्गावयवशकृ-
न्मूत्र-स्वेद-लाला-सिङ्घाणकास्य-कर्णमल-पिडकोल्लिका-पिडकानामङ्ग-
वेदन-लोहित-नील-पीत-श्यावानामर्चिष्मतां च रूपाणां स्वप्ने दर्शनम-
भीक्ष्णमिति लोहित-पित्त-पूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ५ ॥
रक्तपित्त के पूर्व रूप ये हैं—भोजन में अनिच्छा, खाये हुए अन्न का
न पचना, खट्टे या शुक्त गन्ध अथवा रस की डकार आना, बार २ वमन
की अभिरुचि, वमन में आये रक्त आदि पदार्थ की भयंकरता, स्वरभेद, अंगों
का टूटना, शरीर में दाह, मुख से धुंए के समान श्वास आना, मुख से लोहा,
रक्त, या मछली या कच्चे मांस की गन्ध आना, शरीर के अवयव, मल, मूत्र,
पसीना, लार, नासिका का मल, मुख का मल, कान का मल, और नेत्र का
मल तथा पिडकाओं का, लाल, हरा अथवा हल्दी के समान होना, अंगों में
- रक्त के बढ़ने से रक्तवह स्रोतो के मुख खुल जाते हैं। परन्तु पित्त
के कारण रक्त के दूषित होने से रक्त में घनता बढ़ जाती है। इससे उनका
मुख बन्द हो जाता है। पित्त रक्त को दूषित करता है। रक्तवहस्रोतों का
प्रभाव स्थान यकृत् और प्लीहा हैं।
वेदना, स्वप्न में लाल, नीले, पीले, काले वा जलते हुए पदार्थों का बार बार
दर्शन होना, रक्तपित्त के पूर्वरूप हैं ॥ ५ ॥
उपद्रवास्तु खलु दौर्बल्यारोचकाविपाक-श्वास-कास-ज्वरातीसार-
शोफ-शोष-पाण्डुरोगाः स्वरभेदश्च ॥ ६ ॥
रक्तपित्त के उपद्रव—दुर्बलता, अरुचि, अविपाक, श्वास, कास, ज्वर,
अतिसार, सूजन, शोष, पाण्डुरोग, और स्वरभेद ये रक्तपित्त के उपद्रव हैं ॥६॥
मार्गौ पुनरस्य द्वावूर्ध्वं चाधश्च । तद्बहुश्लेष्मणि शरीरे श्लेष्मस-
सर्गादूर्ध्वं प्रपद्यमानं कर्णनासिकानेत्रास्येभ्यः प्रच्यवते । बहुवाते तु
शरीरे वातसंसर्गादधः प्रपद्यमानं मूत्रपुरीषमार्गाभ्यां प्रच्यवते । बहु-
वातश्लेष्मणि शरीरे श्लेष्मवातसंसर्गाद् द्वावपि मार्गों प्रपद्यते, तौ
मार्गौ प्रपद्यमानं सर्वेभ्य एव यथोक्तेभ्यः खेभ्यः प्रच्यवते
शरीरस्य ॥ ७ ॥
रक्तपित्त के दो मार्ग—रक्तपित्त के बाहर आने के दो मार्ग हैं । एक
ऊर्ध्वमार्ग और दूसरा अधोमार्ग । जिस समय शरीर में कफ की प्रधानता होती
है उस समय शरीर का पित्त कफ से मिलकर ऊर्ध्वगामी बन कर कान, नाक,
नेत्र और मुखद्वार से बाहर निकलता है । वातप्रधान शरीर में पित्त वायु से
मिलकर अधोगामी होता है । इस अवस्था में वह मल मूत्र के रास्ते से बाहर
निकलता है और जब शरीर में वात और कफ दोनों प्रबल होते हैं तब शरीर
में वात और कफ से मिलकर ऊर्ध्वमार्ग एवं अधोमार्ग दोनों से बाहर आता है ।
इन दोनों मार्गों से बाहर निकलता हुआ रक्तपित्त शरीर के सम्पूर्ण छिद्रों से
निकलने लगता है ॥ ७ ॥
तत्र यदूर्ध्वभागं तत्साध्यं, विरेचनोपक्रमणीयत्वाद्व बह्वौषधत्वाच्च ।
यदधोभागं तद्याप्यं, वमनोपक्रमणीयत्वादल्पौषधत्वाच्च । यदुभयभागं
तदसाध्यं, वमनविरेचनायोगित्वादनौषधत्वाच्चेति ॥ ८ ॥
साध्य-असाध्य का विचार—इसमें जो रक्तपित्त ऊर्ध्वगामी है, वह साध्य
है, क्योंकि इसकी चिकित्सा विरेचन द्वारा होती है और विरेचन की औषधियाँ
बहुत हैं । जो रक्तपित्त अधोगामी है वह याप्य अर्थात् कष्टसाध्य है, क्योंकि
इस की चिकित्सा वमन द्वारा होती है और वमन की औषधियां कम हैं । जो
रक्तपित्त उभय-मार्गगामी अर्थात् ऊर्ध्व-अधोमार्गगामी है वह असाध्य है,
क्योंकि इसमें वमन और विरेचन दोनों का उपयोग होता है और ऐसी औष-
धियां नहीं हैं ॥ ८ ॥
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२५
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२५
रक्तपित्तप्रकोषस्तु खलु पुरा दक्षयज्ञोद्ध्वंसे रुद्रकोपप्रभवाग्निना १
प्राणिनां परिगतशरीरप्राणानामनु ज्वरमभवत् २ ॥ ६ ॥
तस्याऽऽशुकारिणो दावाग्नेरिवाऽऽपतितस्यात्ययिकस्याऽऽशु प्रशान्तौ
यतितव्यं मात्रां देशं कालं चाभिसमीक्ष्य संतर्पणेन वा मृदु-मधुर-
शिशिर-तिक्त-कषायैरभ्यवहार्यैः प्रदेह-परिषेकावगाह-संस्पर्शनैर्वमना-
द्यैर्वा तत्रावहितेनेति ॥ १० ॥
रक्तपित्त का इतिहास— प्राचीन काल में जिस समय रुद्र के गणों ने दक्ष
के यज्ञ ३ का विध्वंस किया था । उस समय रुद्र के कोप से, सम्पूर्ण देहधारी
प्राणियों को कष्ट देने वाले ज्वर के पीछे, अग्नि के समान उष्णशक्ति (रक्तपित्त)
उत्पन्न हुआ । यह रक्तपित्त शीघ्र कार्य करने वाला, प्राणहारक एवं अग्नि के
समान नाश करने वाला है। इसको शान्त करने का शीघ्र उपाय करना
चाहिये । मात्रा, देश, काल आदि का विचार करके संतर्पण या अपतर्पण क्रिया
द्वारा अथवा मृदु, मधुर, शीत, कटु, कषाय, रसयुक्त-भोजनों से, लेप, परिषेक,
अवगाहन, संस्पर्शन, वमन आदि द्वारा सावधानी से चिकित्सा करनी चाहिये ॥१०॥
भवन्ति चात्र— साध्यं लोहितपित्तं तद्यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते ।
विरेचनस्य योगित्वाद् बहुत्वाद्भेषजस्य च ॥११॥
विरेचनं तु पित्तस्य जयार्थे परमौषधम् ।
यश्च तत्रान्वयः श्लेष्मा तस्य चानघमं स्मृतम् ॥१२॥
भवेद्योगावहं तत्र मधुरं चैव भेषजम् ।
तस्मात्साध्यं मतं रक्तं यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते ॥१३॥
ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त साध्य— जो रक्तपित्त ऊर्ध्वमार्गगामी हो, वह साध्य
है, क्योकि इसमें विरेचन द्वारा चिकित्सा की जाती है और विरेचन की
ओषधियां बहुत हैं। ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त में पित्तदोष प्रधान होता है, और
कफ दोष गौण होता है। पित्तदोष को शान्त करने के लिये विरेचन परम
श्रेष्ठ क्रिया है। और जो कफ इसमें अनुबन्ध रूप में रहता है, इसके लिये
विरेचन मध्यम उपाय है। कषाय और तिक्त रसों के सिवाय मधुर रस भी अन्य
१. 'दक्षयज्ञध्वंसे रुद्रकोषामर्षाग्निना' इति पाठः ।
२. 'मभवज्ज्वरमनु' इति वा पाठः ।
३. यह इतिहास आलंकारिक है । दक्ष का यज्ञ इस देह में ही है। रुद्र
शिव जाठराग्नि है। उसके विकृत होने से ही रोग उत्पन्न होते हैं।
४२६ चरकसंहिता [ अ० २
औषधियो के साथ मिलकर योगवाही हो जाता है । इसलिये ऊर्ध्वगामी रक्त-
पित्त साध्य हैं ॥११-१३॥
रक्तं तु यदधोभागं तद्याप्यमिति निश्चयः ।
वमनस्याल्पयोगित्वादल्पत्वाद्भेषजस्य च ॥ १४ ॥
वमनं हि न पित्तस्य हरणे श्रेष्ठमुच्यते ।
यश्च तत्रानुगो वायुस्तच्छान्तौ चावरं मतम् ॥१५॥
तच्चायोगवहं तत्र कषायं तिक्तकानि च ।
तस्माद्याप्यं समाख्यातं यदुक्तमनुलोमगम् ॥ १६ ॥
अधोगामी रक्तपित्त याप्य—जो रक्तपित्त अधोमार्गगामी है वह याप्य है ।
क्योंकि पित्त को जीतने के लिये 'वमन' पूर्णरूप से पर्याप्त क्रिया नहीं है और
वमन की औषधियां भी कम हैं । कफ दोष के साथ मिश्रित पित्त को निकालने
में वमन पर्याप्त है । परन्तु रक्तपित्त के मूलरूप पित्त को निकालने में वमन श्रेष्ठ
नहीं है । इसमें अनुबन्ध रूप से रहने वाले वायु को शमन करने के लिये वमन
क्रिया निरुपयोगी है । इसी प्रकार कषाय और कटु रस जो रक्तपित्त के नाशक
हैं, वे रस वायु को बढ़ाने वाले हैं इसलिये योगों में इनका उपयोग नहीं किया
जा सकता इसलिये अधोगामी रक्तपित्त याप्य हो जाता है ॥ १४-१६ ॥
रक्तपित्तं तु यन्मार्गौ द्वावपि प्रतिपद्यते ।
असाध्यमिति तज्ज्ञेयं पूर्वोक्तादपि कारणात् ॥१७॥
न हि संशोधनं किंचिदस्त्यस्य प्रतिमार्गगम् ।
प्रतिमार्गं च हरणं रक्तपित्ते विधीयते ॥ १८ ॥
एवमेवोपशमनं सर्वशो नास्य विद्यते ।
उभयमार्गगामी असाध्य रक्तपित्त—दोनों मार्गों से जाने वाला रक्तपित्त,
उपरोक्त कारणों से असाध्य हो जाता है । क्योंकि ( १ ) इसके प्रति-
कूल मार्ग के लिये संशोधन-चिकित्सा किसी प्रकार की भी नहीं है ।
और ( २ ) रक्तपित्त में विरुद्ध मार्ग से संशोधन कार्य गुणकारी होता है ।
इसलिये सब प्रकार की शान्ति करने वाले कोई भी औषध नहीं है ॥ १७-१८ ॥
संसृष्टेषु च दोषेषु सर्वजिच्छमनं मतम् ॥ १६ ॥
इत्युक्तं त्रिविधोदर्कं रक्तं मार्गविशेषतः ।
द्वि-दोषों से व त्रि-दोषज रक्तपित्त की चिकित्सा—संसृष्ट दो दोषों या तीनों
दोषों से मिश्रित रक्तपित्त में सब दोषों को शमन करने वाली औषधि देनी
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२७
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२७
चाहिये । इस प्रकार से रक्तपित्त के तीन प्रकार बाहर आने के मार्गों के भेदा-
नुसार कह दिये ॥ १९ ॥
एभ्यस्तु खलु हेतुभ्यः किंचित्साध्यं न सिध्यति ॥ २० ॥
प्रेष्योपकरणाभावादौरात्म्याद्वैद्यदोषतः ।
अकर्मतश्च साध्यत्वं कश्चिद्रोगोऽतिवर्तते ॥ २१ ॥
तत्रासाध्यत्वमेकं स्यात्साध्यायाप्यपरिक्रमात् ।
रक्तपित्तस्य विज्ञानमिदं तस्योपदेक्ष्यते ॥ २२ ॥
साध्य रोग असाध्य हो जाने के कारण—इन निम्नलिखित कारणों से कोई
साध्य रोग असाध्य बन जाता है । जैसे भृत्य आदि के अभाव से, अन्य आव-
श्यक सामग्री के अभाव से, आत्मसंयम के अभाव से रोगी के दुष्ट आहार-
विहार के कारण; वैद्य के दोष से, तथा चिकित्सा न करने से साध्य रोग भी
असाध्य हो जाता है ।
उभय मार्ग से जाने वाला रक्तपित्त असाध्य है। इसी प्रकार साध्य रक्तपित्त
का याप्य हो जाना, या याप्य रक्तपित्त का असाध्य हो जाना दोनों ही असाध्य
हैं । इसके आगे रक्तपित्त विषयक विज्ञान और अधिक कहते हैं ॥ २०–२२ ॥
यत्कृष्णमथवा नीलं यद्वा शक्रधनुषप्रभम् ।
रक्तपित्तमसाध्यं तद्वाससो रञ्जनं च यत् ॥ २३ ॥
भृशं पूत्यतिमात्रं च सर्वोपद्रववच्च यत् ।
बलमांसक्षये यच्च तच्च रक्तमसिद्धिमत् ॥ २४ ॥
येन चोपहतो रक्तं रक्तपित्तेन मानवः ।
पश्येद् दृश्यं वियच्चैव तच्चासाध्यमसंशयम् ॥ २५ ॥
तत्रासाध्यं परित्यज्य याप्यं यत्नेन यापयेत् ।
साध्यं चावहितः सिद्धैर्भेषजैः साधयेद्भिषक् ॥ २६ ॥
असाध्य रक्तपित्त के लक्षण—जो रक्तपित्त काला, नीला, अथवा इन्द्र
धनुष के समान नाना प्रकार के रंगों वाला हो, और जिसमें वस्त्र पर लगा
रक्त का दाग धोने से न मिटे और अतिशय दुर्गन्ध वाला हो, जिसमें सब उप-
द्रव हों, जिस के कारण रोगी का बल और मांस क्षीण होगया हो, ये असाध्य
रक्तपित्त के लक्षण हैं । रक्तपित्त का रोगी जब सब पदार्थों को लाल लाल ही
देखने लगे तब रक्तपित्त निःसंशय असाध्य समझना चाहिये । असाध्य अव-
स्था की चिकित्सा आरम्भ ही नहीं करनी चाहिये, दुःसाध्य या याप्यसाध्य रोग
कारी ओषधियों से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २३-२६ ॥
४२८ चरकसंहिता [ अ० ३
की प्रयत्नपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिये । साध्य रोग की सावधान होकर गुण-
कारी ओषधियों से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २३-२६ ॥
तत्र श्लोकौ—कारणं नामनिर्वृत्तिं पूर्वरूपाण्युपद्रवान्।
मार्गौ दोषानुबन्धं च साध्यत्वं न च हेतुमत् ॥ २७ ॥
निदाने रक्तपित्तस्य व्याजहार पुनर्वसुः ।
वीत-मोह-रजोदोष-लोभ-मान-मद-स्पृहः ॥ २८ ॥ इति ॥
मोह, रजोगुण, दोष, लोभ, अभिमान, मद, और स्पृहा से रहित पुनर्वसु ने
इस अध्याय में, रक्तपित्त की उत्पत्ति का कारण, पूर्वरूप, उपद्रव, इसके दोनों
मार्ग, वात आदि दोषों का अनुबन्ध, साध्यासाध्यत्व, हेतु इत्यादि सब विषय
वर्णन कर दिये हैं ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने रक्तपित्तनिदानं
नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः।
अथातो गुल्मनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'गुल्मनिदान' का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान्
आत्रेय ने कहा था १ ॥ १-२ ॥
इह खलु पञ्च गुल्मा भवन्ति । तद्यथा-वातगुल्मः, पित्तगुल्मः,
श्लेष्मगुल्मो, निचयगुल्मः, शोणितगुल्मश्चेति ॥ ३ ॥
एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—कथमिह भगवन् !
पञ्चानां गुल्मानां विशेषमभिजानीयाम् नह्यविशेषविद्रोगाणामौष-
धविद्पि भिषक् प्रशमनसमर्थो भवतीति ॥ ४ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—समुत्थान-पूर्वरूप-लिङ्ग-वेदनोपशय-विशे-
षेभ्यो विशेषविज्ञानं गुल्मानां भवत्यन्येषां च रोगाणामग्निवेश ! तत्र
खलु गुल्मेषूच्यमानं निबोध ॥ ५ ॥
१. शरीर के भीतर दोष संचित होकर पिण्डाकार होजाते हैं । इससे ये
'गुल्म' कहाते हैं ।
कुपितानिलमूलत्वाद् गूढमूलोदयादपि ।
गुल्मवद्वा विशाखत्वाद् गुल्म इत्यभिधीयते ॥ सुश्रुत ॥
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४२६
गुल्म के भेद—गुल्म पांच प्रकार के होते हैं। जैसे ( १ ) वातगुल्म, (२)
पित्तगुल्म, ( ३ ) कफगुल्म, ( ४ ) निचयगुल्म और ( ५ ) रक्तगुल्म १ ।
इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने पूछा कि इन पांच
प्रकार के गुल्मों के विषय में विशेष (भेद-ज्ञान) ज्ञान किस प्रकार करूं ?
क्योंकि इनके भेदों को सम्पूर्णरूप से जाने बिना, सम्पूर्ण औषध-ज्ञान होने पर
भी वैद्य रोगों के शमन करने में समर्थ नहीं होता ।
भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया—हे अग्निवेश ! उत्पत्ति, पूर्वरूप, लक्षण,
वेदना और उपशय इनके भेद से भिन्न-भिन्न गुल्मों का विशेष ज्ञान होता है
और इन्हीं साधनों से दूसरे अन्य रोगों का भी पता चलता है। इसलिये गुल्म के
लक्षण आदि का वर्णन करते हैं, इसको ध्यान से सुनो और समझो ॥३-५॥
यदा पुरुषो वातलो विशेषेण ज्वर-वमन-विरेचनातीसाराणामन्य-
तमेन कर्शनेन कर्शितो वातलमाहारमाहरति शीतं वा विशेषेणातिमात्र-
मस्नेहपूर्वं वा वमनविरेचने पिबत्यनुदीर्णां वा छर्दिमुदीरयत्युदीर्णान्
वात-मूत्र-पुरीष-वेगान्निरुणद्धत्यत्यशितो वा पिबति नवोदकमतिमात्र-
मतिमात्रसंक्षोभिणा वा यानेन यात्यतिव्यवाय-व्यायाम-मद्यरुचिर्वाऽ-
भिघातमृच्छति वा विषममशन-शयनासन-स्थान-चङ्क्रमण-सेवी भवत्य-
न्यद्वा किंचिदेवंविधं विष२ममतिमात्रं व्यायामजाउमारभते, तस्याप-
चाराद्वातः प्रकोपमापद्यते ॥ ६ ॥
वातगुल्म—जब वातप्रकृति का मनुष्य विशेष कर ज्वर, वमन, विरेचन
और अतिसार इनमें से किसी एक के कारण कृश हो जाता है, इस स्थिति में
जब वह वायुकारक आहार या अति शीतल पदार्थों का सेवन करता है, वा
स्नेहन कर्म किये बिना विरेचन का उपयोग करता है, वमन की इच्छा न रहने
पर भी बलात्कार से वमन करता है, अधोवायु, मल, मूत्र के उपस्थित वेगों
को रोकता है, अधिक भोजन करके नवीन पानी ( बरसात में कुएं आदि का
पानी ) अधिक पीता है, बहुत अधिक झकोले वाली गाड़ी वा सवारी से यात्रा
करता है, स्त्री-सम्भोग और मद्य के अति उपयोग से, रुचि के अभिघात होने
से, विषम स्थिति में बैठने, सोने, चलने या रहने से, इसी प्रकार के अन्य
१. इन पांच गुल्मों के सिवाय तीन और भी गुल्म हैं जैसा कि आगे
चिकित्सा में कहेंगे—"व्यामिश्रलिङ्गान्परांस्तु गुल्माञ्छीनादिशेद्दोषबकलरनार्थम्' ।
अर्थात् वातपित्तज, पित्तकफज और वातकफज । इस प्रकार से आठ प्रकार के
गुल्म हैं । २. 'विषममतिमात्रं' इति च पाठः ।
४३० चरकसंहिता [ अ० ३
व्यायाम आदि श्रमजनक कार्यों को अधिक मात्रा में करने-से, वायु प्रकुपित
हो जाता है ॥ ६ ॥
स प्रकुपितो महास्रोतोऽनुप्रविश्य रौक्ष्यात्कठिनीभूतमाप्लुत्य
पिण्डितोऽवस्थानं करोति हृदि वस्तौ पार्श्वयोर्नाभ्यां वा । स शूलमुप-
जनयति ग्रन्थींश्चानेकविधान्, पिण्डितश्चावतिष्ठते, स पिण्डितत्वाद्
गुल्म इत्युच्यते ॥ ७ ॥
वातगुल्म की सम्प्राप्ति—इस प्रकार से कुपित हुआ वायु महास्रोतों से घुस
कर अपने रूक्ष गुण के कारण कठिन होकर कोष्ठ में फैलकर गोल-पिण्डाकार
बन जाता है और हृदय, वस्तिभाग, दोनों पार्श्वभाग अथवा नाभि भाग में
शूल अथवा अनेक प्रकार की गांठें उत्पन्न कर देता है। वायु गोलाकार बनकर
पिण्डाकार होने से 'गुल्म' कहा जाता है। (इसी को 'वायुगोला' कहते हैं,
जोकि वातगुल्म का अपभ्रंश है । ) ॥७॥
स मुहुराधमति, मुहुरणुत्वमापद्यते, अनियतविपुलाणुवेदनश्च
भवति चलत्वाद्वायोः, पिपीलिकासंप्रचार इवाङ्गेषु, तोद-स्फुरणायाम-
संकोच-सुप्ति-हर्ष-प्रलयोदय-बहुलस्तदातुरश्च सूच्येव शङ्कुनेव चाति-
विद्धमात्मानं मन्यते, अपि च दिवसान्ते ज्वर्यते शुष्यति चाऽऽस्यम्, उ-
च्छ्वासश्चोपरुध्यते । हृष्यन्ति चास्य रोमाणि वेदनायाः प्रादुर्भावे ।
वातगुल्म के लक्षण—यह वातगुल्म क्षण भर में फैलकर बड़ा हो जाता है
और क्षण भर में सिकुड़कर छोटा हो जाता है, इसकी पीड़ा अनिश्चित, कभी
अधिक और कभी कम हो जाती है। इसका कारण वायु का चंचल स्वभाव है,
शरीर के अवयवों में कीड़ियों के चलने की सी प्रतीति होती है, इसमें तोद (चुभने
की सी वेदना), स्फुरण ( धड़कन ), आयाम ( विस्तार ), संकोच (सिकुड़ना),
सुप्ति ( स्पर्शज्ञान का अभाव ), हर्ष ( स्पर्शज्ञानका बढ़ना ), प्रलय ( नाश ),
उदय ( जन्म ) प्रायः होते हैं अर्थात् कभी तो उत्पन्न होते हैं, और कभी
शान्त हो जाते हैं। इस अवस्था में रोगी सुई चुभने या कील आदि से बिंधने
का सा अनुभव करता है। सन्ध्याकालमें पीड़ा होती है, रोगी का मुख सूख
जाता है, श्वास छुटने या बन्द होने लगता है, वेदना के समय शरीर रोमा-
ञ्चित हो जाता है ॥
प्लीहाऽऽटोपान्त्र-कूजनाविपाकोदावर्त्ताङ्गमर्द-मन्या-शिरः-शङ्ख-शूल-
ब्रध्नरोगाश्चैनमुपद्रवन्ति, कृष्णारुण-परुषत्वङ्-नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरी-
षश्च भवति ।
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४२३
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४२३
प्लीहा, आटोप ( वायु का आध्मान ), आंतो में गुड़-गुड़ ध्वनि, अमेचन,
उदावर्त्त, अंगों का टूटना, मन्याशूल, शिरःशूल, शंखशूल, नख-रोग आदि
नाना उपद्रव होने लगते हैं। रोगी की त्वचा, नख, मुख, मूत्र और मल का
रंग काला या अरुण हो जाता है, तथा ये कर्कश हो जाते हैं।
निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विपरीतानि चोपशेरते—इति
वातगुल्मः ॥ ८ ॥
वातगुल्म के कारणानुकूल आहार-विहार करने से रोग शान्त नहीं होता,
परन्तु रोग के कारण के विपरीत गुणवाले आहार-विहार से रोग शान्त हो
जाता है ! वातगुल्म के ये लक्षण हैं ॥८॥
तैरेव तु कर्शनैः कशितस्याम्ल-लवण-कटुक-क्षारोष्ण-तीक्ष्ण-शुक्त-
ऽव्यापन्न-मद्य-हरित-कफलाम्लानां विदाहिनां च शाक-धान्य-मांसादीना-
मुपयोगादजीर्णाध्यशनाद्रौक्ष्यानुगते चाऽऽमाशये वमनविरेचनमतिवेलं
संधारणं वातातपौ चातिसेवमानस्य पित्तं सह मारुतेन प्रकोपमा-
पद्यते ॥ ६ ॥
बात के साथ पित्त प्रकोप के कारण—वातगुल्म में कहे हुए कारणों से
कर्शित हुआ पुरुष जब खट्टे, नमकीन, कड़वे, क्षार, उष्ण, तीक्ष्ण, शुक्त, सड़े,
खराब हुए, मद्य, या हरी सब्जियां और फल खाता या दाहकारक शाक या
मांस का सेवन करता है, अजीर्ण यां अध्यशन ( भोजन के ऊपर फिर भोजन
करने ). से आमाशय में रूक्षता के उत्पन्न होने से वमन, विरेचन के वेगों को
बहुत देर तक रोकने से, वायु या धूप के अतिसेवन करने से वायु के साथ
पित्त भी कुपित होजाता है ॥ ६ ॥
तत्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संमूच्छ्र्य तानेव वेदनाप्रका-
रानुपजनयति य उक्ता वातगुल्मे, पित्तं त्वेनं विदहति कुक्षौ हृद्युरसि
कण्ठे च, स विदह्यमानः सधूममिवोद्गारमुद्गिरत्यम्लान्वितं, गुल्मा-
वकाशाश्चास्य दह्यते दूयते धूप्यते उष्मायते स्विद्यति क्लिद्यते शिथिल
इव च स्पर्शासहोऽल्परोमाञ्चो भवति । ज्वर-भ्रम-दवथु पिपासा-गल-
वदन-तालु-शोष-प्रमोह-विड्भेदाश्चैनमुपद्रवन्ति, हरित-हारिद्रत्वङ्-नख-
⌈ भवति । निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विप-
रीतानि चोपशेरते—इति पित्तगुल्मः ॥ १० ॥
पित्तगुल्म की सम्प्राप्ति—इस प्रकार से कुपित हुआ पित्त और वायु
आमाशय के एक प्रदेश में मिलकर वातगुल्म में कही हुई वेदनाओं को
४३२ चरकसंहिता [ अ० ३
उत्पन्न करते हैं। १पित्तगुल्म में विशेषता यह है कि प्रकुपित पित्त कुक्षि, हृदय,
वक्षःस्थल और कण्ठ इन स्थानों में दाह उत्पन्न करता है। इस दाह के
कारण धुंए के समान और खट्टा डकार रोगी को आता है और गुल्म के स्थान
में दाह होता है, धूं आ निकलता है, गरमी रहती है, पसीना आता है, क्लिन्नता
होती है, शरीर ढीला पड़ा प्रतीत होता है, स्पर्श की असह्यता रहती है
और किञ्चित् रोमांच रहता है। ज्वर, भ्रम, दवथु (धक् धक् स्पन्दन),
पिपासा, गले मुख और तालु में शुष्कता, मूर्च्छा, मल का पतला आना, ये
उपद्रव होजाते हैं। त्वचा, नख, आँख, मूत्र और मल इनका रंग हरा या
हल्दी के समान होजाता है। इसके निदान के समान गुण वाली वस्तुओं के
उपयोग से रोग बढ़ता है और विपरीत गुणवाली वस्तुओं से कम होता है।
यह पित्तगुल्म का वर्णन हुआ ॥ १० ॥
तैरेव तु कर्शनैः कर्शितस्यात्यशनादतिस्निग्ध-गुरु-मधुर-शीताशना-
त्पिष्टेक्षु-क्षीर-माष-तिल-गुड-विकृति-सेवनान्मन्दक-मद्यातिपानाद्धरितका-
तिप्रणयनादानूपौदक-ग्राम्य-मांसातिभक्षणात्संधारणादतिसुहित्यस्य चाति-
ऽवगाढमुदपानात्संक्षोभणाद्वा शरीरस्य श्लेष्मा सह मारुतेन प्रकोप
मापद्यते ॥ ११ ॥
वात के साथ कफ-प्रकोप के कारण—वातगुल्म में कहे हुए कारणों से
कृश हुए व्यक्ति के अत्यन्त भोजन करने से, अतिस्निग्ध, गुरु, मधुर, शीत
पदार्थों के खाने से, पीठी (उड़द आदि को पीसकर), ईख, दूध, उड़द,
तिल, गुड़ इनसे बने पदार्थों के अति सेवन से, मन्दक-दही और मद्य के अति-
सेवन से, हरे शाक, आनूप या जलचर प्राणियों के अथवा ग्राम्य मांस के
अति सेवन से, शरीर को बहुत विक्षोभित करने से, वायु कफ के साथ मिलकर
कुपित होजाता है ॥ ११ ॥
तं प्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संमूर्च्छद्य तानेव गाढवेद-
नाप्रकारानुपजनयति य उक्ता वातगुल्मे । श्लेष्मा त्वस्य शीतज्वरारो-
चकाविपाकाङ्गमर्द-हर्ष-हृद्रोग-च्छर्दि-निद्रालस्य-स्तैमित्य-गौरव-शिरोभि-
तापानुपजनयति, अपिच गुल्मस्य स्थैर्य-गौरव-काठिन्यावगाढ-सुप्तताः,
१. आमाशय के एकदेश में मूर्च्छित होने से पित्तगुल्म और कफगुल्म
बस्ति में नहीं होते। क्योंकि नाभि और स्तनों के बीच के स्थान को आमा-
शय कहते हैं। वातगुल्म बस्ति में भी होता है। इसलिये वातगुल्म में
'महास्रोतस्' शब्द पड़ा है। महास्रोतस् शब्द से बस्ति का भी ग्रहण होजाता है।
अ० ३ ] २८ निदानस्थानम् ४३३
अ० ३ ] २८ निदानस्थानम् ४३३
तथा कास-श्वास-प्रतिश्यायान् राजयक्ष्माणं चातिप्रवृद्धः,श्वैत्यं च त्वङ्-
नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीषेषूपजनयति । निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते,
तद्विपरीतानि चोपशेरते—इति श्लेष्मगुल्मः ॥ १२ ॥
कफगुल्म की सम्प्राप्ति—इस प्रकार से कुपित कफ और वायु आमाशय
के एक प्रदेश में मिलकर वातगुल्म में कही हुई अनेक प्रकार की तीव्र वेदनायें
उत्पन्न करते हैं । प्रकुपित कफ शीतज्वर, अरुचि अविपाक अंगों में
वेदना, रोमहर्ष, हृदय-रोग, वमन, निद्रा, आलस्य, स्तिमितता ( भारीपन ),
शिर और अंगों में उष्णिमा, ( ताप ) उत्पन्न करता है । इस गुल्म में स्थिरता
( हिलने का अभाव ), भारीपन, कठिनता, स्पर्शज्ञान का एकदम अभाव,
( बधिरता ) रहती है । बहुत बढ़ने पर कास, श्वास, प्रतिश्याय और क्षय रोग
उत्पन्न करता है । त्वचा, नख, आंख, मुख, मल, मूत्र, उनका रंग श्वेत
हो जाता है । इसके निदान के समान गुण वाले आहार-विहार से रोग बढ़ता है
और विपरीत गुणवाली वस्तुओं से कम होता है । यह कफगुल्म का निदान
कह दिया है ॥ १२ ॥
त्रिदोष-हेतु-लिङ्ग-सन्निपातात्तु सान्निपातिकं गुल्ममुपदिशन्ति कु-
शलाः । स विप्रतिषिद्धोपक्रमत्वादसाध्यो निचयगुल्मः ॥ १३ ॥
सान्निपातिक गुल्म—जिस गुल्म में तीनों दोषों के हेतु और तीनों दोषों के
लक्षण मिले होते हैं ; उसको बुद्धिमान् वैद्य 'सान्निपातिक गुल्म' कहते हैं ।
यह सान्निपातिक गुल्म चिकित्सा में विरोधि होने से चिकित्सा कर्म में
असाध्य है ॥ १३ ॥
शोणितगुल्मस्तु खलु स्त्रिया एव भवति; न पुरुषस्य, गर्भकोष्ठार्त-
वागमनवैशेष्यात् ।
पारतन्त्र्याद्वैशारद्यात्सततमुपचारानुरोधाद्वेगानूदीर्णानुपुरुन्धन्त्या
आमगर्भे वाऽप्यचिरात्पतितेऽथवाऽप्यचिरप्रजाताया ऋतौ वा वात-
प्रकोपणान्यासेवमानायाः क्षिप्रं वातः प्रकोपमापद्यते ॥ १४ ॥
रक्तगुल्म—रक्तगुल्म केवल स्त्रियों को ही होता है, पुरुषों में नहीं होता,
क्योंकि स्त्रियों में ही गर्भाशय तथा रजोदर्शन होता है । १स्त्रियां परवश होने से
बेगों को रोकती हैं, अशिक्षित होने से, पति आदि की सेवा में तत्पर रहने से
और मल मूत्रादि के उपस्थित बेगों को रोकने से, इन कारणों स वा अपक्व
१. सामन्यतः रक्त का दूषित होना और दूसरे गुल्मों में भी मिलता है ।
प्रकार आगे कहेंगे ।
४३४ चरकसंहिता [ अ० ३
गर्भ के गिर जाने से, या बालक प्रसव करने के पीछे अथवा ऋतुकाल में वात-
प्रकोपक वस्तुओं के सेवन करने से वायु शीघ्र ही प्रकुपित हो जाता है ॥१४॥
स प्रकुपितो योनिमुखमनुप्रविश्याऽऽर्तवमुपरुणद्धि, मासि मासि
तदार्तवमुपरुध्यमानं कुक्षिमभिवर्धयति । तस्याः शूल-कासातीसारच्छ-
र्द्यरोचकाविपाकाङ्गमर्द-निद्रालस्य-स्तैमित्य-कफ-प्रसेकाः समुपजायन्ते ।
स्तनयोश्च स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च काष्ण्यं, ग्लानिश्चक्षुषोर्मूर्च्छा,
हृल्लासो, दोहदः, श्वयथुः पादयोरीषदोद्गमो रोमराज्याः, योन्याश्चाटा-
लत्वं, अपि च योन्या दौर्गन्ध्यमास्रावश्चोपजायते, केवलञ्चास्या गुल्मः
पिण्डित एव स्पन्दते, तामगर्भा' गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः ॥ १५ ॥
रक्तगुल्म की सम्प्राप्ति—यह कुपित वायु योनिमुख में प्रविष्ट होकर आर्तव
को रोक देता है। प्रत्येक मास में रुक रुक कर यह आर्तव कोष्ठ को बड़ा कर
देता है । इससे स्त्री को शूल, कास, अतीसार, वमन, अरुचि, अविपाक, अंगों
का टूटना, निद्रा, आलस्य, कफ का (लार का) मुख से आना, स्तनों में दूध
का आना * ओंठ एवं स्तनों के चूचुकों का काला हो जाना, आंखों में ग्लानि,
मूर्च्छा, वमन की अभिरुचि, गर्भ के समान अनेक लक्षण, पांव में सूजन,
रोमराज़ि में विस्फुरण, योनि का फैल जाना, योनि में दुर्गन्ध आना तथा
योनि में से स्राव होना इत्यादि विकार उत्पन्न होजाते हैं। इस प्रकार गुल्म पेट
में हिलता है, अज्ञानी लोग गर्भरहित स्त्री को भी गर्भिणी कहने लगते हैं ॥१५॥
एषां तु खलु पञ्चानां गुल्मानां प्रागभिनिवृत्तेरेमानि पूर्वरूपाणि
भवन्ति । तद्यथा— अनन्नाभिलषणमरोचकाविपाकावग्निर्वैषम्यं विदाहो
भुक्तस्य विपाककाले चायुक्त्या छर्द्युद्गारौ, वातमूत्रपुरीषवेगानाम-
प्रादुर्भावः, प्रादुर्भूतानां चाप्रवृत्तिरीषद्रागमनं वा, वातशूलाटोपान्त्र-
कूजनापरिकर्षणानिप्रवृत्तपुरीषताऽबुभुक्षा, दौर्बल्यं, सौहित्यस्य चासह-
त्वमिति गुल्मपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ १६ ॥
- आर्तव रोग का यह प्रभाव है कि स्तनों में दूध आजाता है। गर्भावस्था
में भी आर्तव के रुकने से स्तनों में दूध आता है। गर्भवती स्त्री में जो रस बनता
है, उसके तीन कार्य होते हैं। (१) माता के शरीर का पोषण, (२) स्तनों में दूध,
(३) बच्चे का पोषण, इसलिये यह आर्तव भी स्तनों में दूध उत्पन्न कर देता है।
१. जो स्त्रियां बच्चों के लिये बहुत लालायित रहती हैं उनमें भी ऋतु-
धर्म के रुक जाने पर ये लक्षण दीखने लगते हैं। इस अवस्था में यदि
सुंघाकर परीक्षा करें तो सिवाय वायु के और कुछ उपलब्ध नहीं होता