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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 639 में से

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पृष्ठ 451

अ० ३ ] २८ निदानस्थानम् ४३३
तथा कास-श्वास-प्रतिश्यायान् राजयक्ष्माणं चातिप्रवृद्धः,श्वैत्यं च त्वङ्-
नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीषेषूपजनयति । निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते,
तद्विपरीतानि चोपशेरते—इति श्लेष्मगुल्मः ॥ १२ ॥
कफगुल्म की सम्प्राप्ति—इस प्रकार से कुपित कफ और वायु आमाशय
के एक प्रदेश में मिलकर वातगुल्म में कही हुई अनेक प्रकार की तीव्र वेदनायें
उत्पन्न करते हैं । प्रकुपित कफ शीतज्वर, अरुचि अविपाक अंगों में
वेदना, रोमहर्ष, हृदय-रोग, वमन, निद्रा, आलस्य, स्तिमितता ( भारीपन ),
शिर और अंगों में उष्णिमा, ( ताप ) उत्पन्न करता है । इस गुल्म में स्थिरता
( हिलने का अभाव ), भारीपन, कठिनता, स्पर्शज्ञान का एकदम अभाव,
( बधिरता ) रहती है । बहुत बढ़ने पर कास, श्वास, प्रतिश्याय और क्षय रोग
उत्पन्न करता है । त्वचा, नख, आंख, मुख, मल, मूत्र, उनका रंग श्वेत
हो जाता है । इसके निदान के समान गुण वाले आहार-विहार से रोग बढ़ता है
और विपरीत गुणवाली वस्तुओं से कम होता है । यह कफगुल्म का निदान
कह दिया है ॥ १२ ॥
त्रिदोष-हेतु-लिङ्ग-सन्निपातात्तु सान्निपातिकं गुल्ममुपदिशन्ति कु-
शलाः । स विप्रतिषिद्धोपक्रमत्वादसाध्यो निचयगुल्मः ॥ १३ ॥
सान्निपातिक गुल्म—जिस गुल्म में तीनों दोषों के हेतु और तीनों दोषों के
लक्षण मिले होते हैं ; उसको बुद्धिमान् वैद्य 'सान्निपातिक गुल्म' कहते हैं ।
यह सान्निपातिक गुल्म चिकित्सा में विरोधि होने से चिकित्सा कर्म में
असाध्य है ॥ १३ ॥
शोणितगुल्मस्तु खलु स्त्रिया एव भवति; न पुरुषस्य, गर्भकोष्ठार्त-
वागमनवैशेष्यात् ।
पारतन्त्र्याद्वैशारद्यात्सततमुपचारानुरोधाद्वेगानूदीर्णानुपुरुन्धन्त्या
आमगर्भे वाऽप्यचिरात्पतितेऽथवाऽप्यचिरप्रजाताया ऋतौ वा वात-
प्रकोपणान्यासेवमानायाः क्षिप्रं वातः प्रकोपमापद्यते ॥ १४ ॥
रक्तगुल्म—रक्तगुल्म केवल स्त्रियों को ही होता है, पुरुषों में नहीं होता,
क्योंकि स्त्रियों में ही गर्भाशय तथा रजोदर्शन होता है । १स्त्रियां परवश होने से
बेगों को रोकती हैं, अशिक्षित होने से, पति आदि की सेवा में तत्पर रहने से
और मल मूत्रादि के उपस्थित बेगों को रोकने से, इन कारणों स वा अपक्व
१. सामन्यतः रक्त का दूषित होना और दूसरे गुल्मों में भी मिलता है ।
प्रकार आगे कहेंगे ।