चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] निदानस्थानम् ४२७
चाहिये । इस प्रकार से रक्तपित्त के तीन प्रकार बाहर आने के मार्गों के भेदा-
नुसार कह दिये ॥ १९ ॥
एभ्यस्तु खलु हेतुभ्यः किंचित्साध्यं न सिध्यति ॥ २० ॥
प्रेष्योपकरणाभावादौरात्म्याद्वैद्यदोषतः ।
अकर्मतश्च साध्यत्वं कश्चिद्रोगोऽतिवर्तते ॥ २१ ॥
तत्रासाध्यत्वमेकं स्यात्साध्यायाप्यपरिक्रमात् ।
रक्तपित्तस्य विज्ञानमिदं तस्योपदेक्ष्यते ॥ २२ ॥
साध्य रोग असाध्य हो जाने के कारण—इन निम्नलिखित कारणों से कोई
साध्य रोग असाध्य बन जाता है । जैसे भृत्य आदि के अभाव से, अन्य आव-
श्यक सामग्री के अभाव से, आत्मसंयम के अभाव से रोगी के दुष्ट आहार-
विहार के कारण; वैद्य के दोष से, तथा चिकित्सा न करने से साध्य रोग भी
असाध्य हो जाता है ।
उभय मार्ग से जाने वाला रक्तपित्त असाध्य है। इसी प्रकार साध्य रक्तपित्त
का याप्य हो जाना, या याप्य रक्तपित्त का असाध्य हो जाना दोनों ही असाध्य
हैं । इसके आगे रक्तपित्त विषयक विज्ञान और अधिक कहते हैं ॥ २०–२२ ॥
यत्कृष्णमथवा नीलं यद्वा शक्रधनुषप्रभम् ।
रक्तपित्तमसाध्यं तद्वाससो रञ्जनं च यत् ॥ २३ ॥
भृशं पूत्यतिमात्रं च सर्वोपद्रववच्च यत् ।
बलमांसक्षये यच्च तच्च रक्तमसिद्धिमत् ॥ २४ ॥
येन चोपहतो रक्तं रक्तपित्तेन मानवः ।
पश्येद् दृश्यं वियच्चैव तच्चासाध्यमसंशयम् ॥ २५ ॥
तत्रासाध्यं परित्यज्य याप्यं यत्नेन यापयेत् ।
साध्यं चावहितः सिद्धैर्भेषजैः साधयेद्भिषक् ॥ २६ ॥
असाध्य रक्तपित्त के लक्षण—जो रक्तपित्त काला, नीला, अथवा इन्द्र
धनुष के समान नाना प्रकार के रंगों वाला हो, और जिसमें वस्त्र पर लगा
रक्त का दाग धोने से न मिटे और अतिशय दुर्गन्ध वाला हो, जिसमें सब उप-
द्रव हों, जिस के कारण रोगी का बल और मांस क्षीण होगया हो, ये असाध्य
रक्तपित्त के लक्षण हैं । रक्तपित्त का रोगी जब सब पदार्थों को लाल लाल ही
देखने लगे तब रक्तपित्त निःसंशय असाध्य समझना चाहिये । असाध्य अव-
स्था की चिकित्सा आरम्भ ही नहीं करनी चाहिये, दुःसाध्य या याप्यसाध्य रोग