चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] २४ विमानस्थानम् ५२६
अ० ५ ] २४ विमानस्थानम् ५२६
व्यायामादतिसंक्षोभादस्थ्नामविविघट्टनात् ।
अस्थिवाहिनी दुष्यन्ति वातलानां च सेवनात् ॥ २३ ॥
उत्पेषणादत्यभिष्यन्दादभिघातात्प्रपीडनात् ।
मज्जवाहीनि दुष्यन्ति विरुद्धानां च सेवनात् ॥ २४ ॥
अकालयोनिगमनान्निग्रहादतिमैथुनात् ।
शुक्रवाहीनि दुष्यन्ति शस्त्रक्षाराग्निभिस्तथा ॥ २५ ॥
मूत्रितोदक-भक्ष्य-स्त्री-सेवनान्मूत्रनिग्रहात् ।
मूत्रवाहीनि दुष्यन्ति क्षीणस्याभिक्षतस्य च ॥ २६ ॥
विधारणादत्यशनादजीर्णाध्यशनात्तथा ।
वर्चोवाहीनि दुष्यन्ति दुर्बलाग्नेः कृशस्य च ॥ २७ ॥
व्यायामादतिसंतापाच्छीतोष्णाक्रमसेवनात् ।
स्वेदवाहीनि दुष्यन्ति क्रोधशोकमयैस्तथा ॥ २८ ॥
प्रकुपित होने के कारण—धातु-क्षय से, उपस्थित वेगों को रोकने से, रूक्षता
से, भूख लगे होने पर व्यायाम करने से और अन्य कठिन कार्यों से प्राणवाही
स्रोत कुपित होते हैं ।
गरमी से, आम-दोष से, भय से, बहुत पानी पीने से, शुष्क अन्न (चने
आदि) के अधिक सेवन से और प्यास को ज़बर्दस्ती रोकने से उदकवाही
स्रोत कुपित होते हैं ।
मात्रा का अतिक्रमण करके भोजन करने से, अप्राप्त या अतीत काल में
भोजन करने से, अपथ्य भोजन के सेवन से और जाठराग्नि के मन्द होने से
अन्नवह स्रोत कुपित होते हैं ।
गुरु, शीत, अतिस्निग्ध पदार्थों के बहुत अकिध सेवन करने से, चिन्ता
करने योग्य वस्तुओं को बहुत अधिक चिन्ता करने से रसग्राही स्रोत दूषित
होते हैं ।
जलन पैदा करने वाले, स्निग्ध, गरम और तरल खान-पान के सेवन और
धूप और वायु का सेवन करनेवाले पुरुषों के रक्तवाही स्रोत दूषित होते हैं ।
दोष, धातु, मल और स्रोतों में कफ बढ़ाने वाले, स्थूल और गुरु (भारी)
पदार्थ खाकर दिन में सोनेवालों के मांसवाही स्रोत दूषित होते हैं ।
व्यायाम के न करने से, दिन में सोने से, चर्बी वाले पशुओं के मांस
(सुअर का मांस) के अधिक सेवन से, मद्य के अधिक पीने से मेदोवाही स्रोत
दूषित होते हैं ।
अधिक व्यायाम से, अति संक्षोभ से, चोट आदि से, अस्थियों के अधिक
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चलाने (मोड़ने माड़ने से) से, वायु वर्धक खान-पान के सेवन से अस्थिवाही
स्रोत दूषित होते हैं।
उत्पेषण (पीसने) से, अभिष्यन्दी पदार्थों के अतिसेवन से, चोट से,
दण्डे की चोट से तथा विरोधी अन्न-पान के सेवन से मज्जावाही स्रोत
दूषित होते हैं।
अकाल (निषिद्ध तिथियों में ऋतुमती आदि से) सम्भोग करने से,
अयोनि (निषिद्ध योनि) में सम्भोग करने से, उपस्थित शुक्र के वेग को रोकने
से, अतिमैथुन से, शस्त्र, क्षार और अग्नि से शुक्रवाही स्रोत दूषित हो जाते हैं।
उपस्थित मूत्र-वेग के समय पानी, भोजन या स्त्री का सेवन करने से,
क्षीण और अतिकृश व्यक्ति के मूत्रवेग को रोकने से मूत्रवाही स्रोत दूषित
हो जाते हैं।
मल के उपस्थित वेग को रोकने से, मन्दाग्नि और निर्बल पुरुष के अति-
भोजन करने से, अजीर्ण में भोजन करने से, अध्यशन से मलवाही स्रोतः
दूषित होते हैं।
व्यायाम से, अति संक्षोभ से, शीत और उष्ण को बिना क्रम के सेवन करने
से, क्रोध, शोक एवं भय से स्वेदवाही स्रोत दूषित होते हैं ॥ १६-२८ ॥
आहारश्च विहारश्च यः स्याद्दोषगुणैः समः।
धातुभिर्विगुणश्चापि स्रोतसां स प्रदूषकः ॥ २९ ॥
जो आहार विहार और कर्म वातादि दोषों के पृथक् अथवा समष्टि रूप में
गुणों के समान होता है, वह समान गुण के कारण इन को बढ़ाता है और
जो धातुओं से विपरीत गुणवाला हो वह आहार-विहार स्रोतों को दूषित
करता है ॥ २९ ॥
अतिप्रवृत्तिः सङ्गो वा सिराणां ग्रन्थयोऽपि वा।
विमार्गगमनं वापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम् ॥ ३० ॥
स्रोतों के दूषित होने के सामान्य लक्षण—स्रोतों से रस आदि की अधिक
प्रवृत्ति अर्थात् अधिक निकलना अथवा एकदम से रुक जाना, सिराओं में
गांठ पड़ जाना, विमार्ग अर्थात् विपरीत, उल्टे मार्ग से जाने लगना, ये सब
स्रोतों के दूषित होने के सामान्य लक्षण हैं ॥ ३० ॥
स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यणूनि च।
स्रोतांसि दीर्घाण्याकृत्या प्रतानसदृशानि च ॥ ३१ ॥
स्रोतों के प्रकृतिसिद्ध रूप—अपने धातु के समान रंग वाले (रक्तवाही
स्रोत रक्त के समान और मांसवाही स्रोत मांस के समान), वृत्त (गोल),
स्थूल और अणु (सूक्ष्म), दीर्घ और लता के समान फैले (कोई गोल, कोई
लम्बे, कोई स्थूल और कोई सूक्ष्म) होते हैं ॥ ३१ ॥
प्राणोदकान्नवाहानां दुष्टानां श्वासिकी क्रिया।
कार्या तृष्णोपशमनी तथैवाऽऽमप्रदोषिकी ॥ ३२ ॥
विविधाशितपीतीये रसादीनां यदौषधम्।
रसादिस्रोतसां कुर्यात्तच्चथास्वमुपक्रमम्॥ ३३ ॥
मूत्र-विट्-स्वेद-वाहानां चिकित्सा मौत्रकृच्छ्रिकी।
तथाऽतिसारिकी कार्या तथा ज्वरचिकित्सिकी॥ ३४॥ इति।
प्राण, उदक और अन्नवाही स्रोतों के दुष्ट होने पर क्रम से श्वासिकी
(अर्थात् हिक्का कास रोग में ही), श्वास को सुधारने वाली, तृष्णा-रोग
नाशक और आम-दोषनाशक चिकित्सा करनी चाहिये। प्राणवाही स्रोतों में
श्वासिकी उदकवाही में तृष्णाशमन और अन्नवाही में आम-प्रदोष नाशक
चिकित्सा करनी चाहिये। 'विविधाशितपीतीय' अध्याय में रस से लेकर
शुक्र तक दूषित धातुओं की जो चिकित्सा कही है, वही रसवह आदि दुष्ट
स्रोतों की भी समझनी चाहिये। उनकी उसी प्रकार चिकित्सा करनी चाहिये।
मूत्रवाही, मलवाही और स्वेदवाही स्रोतों के दूषित होने पर क्रमशः मूत्रकृच्छ्र
रोग की, अतिसार रोग की तथा ज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ३२-३४॥
तत्र श्लोकाः-त्रयोदशानां मूलानि स्रोतसां दृष्टिलक्षणम्।
सामान्यं नाम पर्यायाः कोपनानि परस्परम् ॥ ३५॥
दोषहेतुः पृथक्त्वेन भेषजोद्देश एव च।
स्रोतोविमाने निर्दिष्टस्तथा चाऽऽदौ विनिश्चयः ॥ ३६॥
केवलं विदितं यस्य शरीरं सर्वभावतः।
शारीराः सर्वरोगाश्च स कर्मसु न मुह्यति ॥ ३७ ॥
तेरह प्रकार के स्रोतों के मूल, प्रत्येक के दूषित लक्षण, सब स्रोतों के
सामान्य दूषित लक्षण, नाम, पर्याय, परस्पर कोपन, दोष का कारण, पृथक् २
औषध और उपक्रम ये सब बातें इस स्रोतो-विमान अध्याय में भगवान् आत्रेय
ने कह दी हैं। जो भिषक् सम्पूर्ण शरीर के स्रोतों आदि को भली प्रकार
जानता है और जिस को शारीरिक और मानसिक सब प्रकार के रोग ज्ञात हैं,
वह चिकित्सा में कभी मोह को प्राप्त नहीं होता ॥ ३५-३७॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने
स्रोतोविमानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
५३२ चरकसंहिता [ अ० ६
षष्ठोऽध्यायः।
अथातो रोगानीकं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः॥ २ ॥
अब इसके आगे 'रोगानीक' नामक विमान का व्याख्यान करेंगे। जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२॥
द्वे रोगानीके भवतः प्रभावभेदेन साध्यं चासाध्यं च, द्वे रोगानीके
बलभेदेन मृदु च दारुणं च, द्वे रोगानीकेऽधिष्ठानभेदेन—मनोऽधिष्ठानं
शरीराधिष्ठानं च, द्वे रोगानीके निमित्तभेदेन स्वधातुवैषम्यनिमित्तं
चाऽऽगन्तुनिमित्तं च, द्वे रोगानीके आशयभेदेन—आमाशयसमुत्थं च
पक्वाशयसमुत्थं च। एवमेतत्प्रभाव-बलाधिष्ठान-निमित्ताशय-भेदाद् द्वैधं
सङ्गेदप्रकृत्यन्तरेण भिद्यमानमथवा संधीयमानं स्यादेकत्वं वा बहुत्वं
वा। एकत्वं तावदेकमेव रोगानीकं दुःखसामान्यात्, बहुत्वं तु दश
रोगानीकानि प्रभावभेदादिना भवन्ति। बहुत्वमपि संख्येयं स्यादसं-
ख्येयं वा स्यात्। तत्र संख्येयं तावद्यथोक्तमष्टोदरीये। अपरिसंख्येयं पुन-
र्यथा महारोगाध्याये, रुग्वर्णसमुत्थानादीनामसंख्येयत्वात् ॥ ३ ॥
प्रभाव के भेद से रोगों के समूह दो प्रकार के हैं, (१) साध्य और (२)
असाध्य। बल के भेद से रोग समूह दो प्रकार के हैं (१) मृदु (अल्पबल) और
(२) दारुण (महाबल)। अधिष्ठान अर्थात् आश्रय के भेद से रोग दो प्रकार के हैं
(१) मानस, मन जिनका अधिष्ठान है और शारीरिक जिनका शरीर अधिष्ठान है।
कारण के भेद से रोग दो प्रकार के हैं, (१) धातुओं (वात, पित्त, कफ) की विष-
मता से होने वाले और (२) आगन्तुक कारण से होने वाले। आमाशय के भेद
से रोग दो प्रकार के हैं। (१) आमाशय से उत्पन्न होने वाले और (२) पक्वा-
शय से उत्पन्न होने वाले। (आमाशय पित्त और कफ का स्थान है और पक्वाशय
वायु का स्थान है।) इस प्रकार प्रभाव, बल, अधिष्ठान, निमित्त और आश्रय
के भेद से रोग दो प्रकार के होने पर भी प्रकृति आदि भेदों के कारण अनेक
प्रकार के हो जाते हैं। रोग का रूप एक प्रकार का ही है। रुजा, दुःख,
पीड़ा यह सब प्रकार के रोगों में सामान्य धर्म है। रोग बहुत हैं, क्योंकि प्रभाव,
बल आदि के भेद से रोग बहुत प्रकार के हो जाते हैं। यह बहुत होना भी दो
प्रकार का है। संख्येय अर्थात् गिनने के योग्य एवं असंख्येय
अर्थात् गणना के अयोग्य । गिनने के योग्य जैसे अष्टोदरीय रोगाध्याय में