सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 550

५३२ चरकसंहिता [ अ० ६
षष्ठोऽध्यायः।
अथातो रोगानीकं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः॥ २ ॥
अब इसके आगे 'रोगानीक' नामक विमान का व्याख्यान करेंगे। जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२॥
द्वे रोगानीके भवतः प्रभावभेदेन साध्यं चासाध्यं च, द्वे रोगानीके
बलभेदेन मृदु च दारुणं च, द्वे रोगानीकेऽधिष्ठानभेदेन—मनोऽधिष्ठानं
शरीराधिष्ठानं च, द्वे रोगानीके निमित्तभेदेन स्वधातुवैषम्यनिमित्तं
चाऽऽगन्तुनिमित्तं च, द्वे रोगानीके आशयभेदेन—आमाशयसमुत्थं च
पक्वाशयसमुत्थं च। एवमेतत्प्रभाव-बलाधिष्ठान-निमित्ताशय-भेदाद् द्वैधं
सङ्गेदप्रकृत्यन्तरेण भिद्यमानमथवा संधीयमानं स्यादेकत्वं वा बहुत्वं
वा। एकत्वं तावदेकमेव रोगानीकं दुःखसामान्यात्, बहुत्वं तु दश
रोगानीकानि प्रभावभेदादिना भवन्ति। बहुत्वमपि संख्येयं स्यादसं-
ख्येयं वा स्यात्। तत्र संख्येयं तावद्यथोक्तमष्टोदरीये। अपरिसंख्येयं पुन-
र्यथा महारोगाध्याये, रुग्वर्णसमुत्थानादीनामसंख्येयत्वात् ॥ ३ ॥
प्रभाव के भेद से रोगों के समूह दो प्रकार के हैं, (१) साध्य और (२)
असाध्य। बल के भेद से रोग समूह दो प्रकार के हैं (१) मृदु (अल्पबल) और
(२) दारुण (महाबल)। अधिष्ठान अर्थात् आश्रय के भेद से रोग दो प्रकार के हैं
(१) मानस, मन जिनका अधिष्ठान है और शारीरिक जिनका शरीर अधिष्ठान है।
कारण के भेद से रोग दो प्रकार के हैं, (१) धातुओं (वात, पित्त, कफ) की विष-
मता से होने वाले और (२) आगन्तुक कारण से होने वाले। आमाशय के भेद
से रोग दो प्रकार के हैं। (१) आमाशय से उत्पन्न होने वाले और (२) पक्वा-
शय से उत्पन्न होने वाले। (आमाशय पित्त और कफ का स्थान है और पक्वाशय
वायु का स्थान है।) इस प्रकार प्रभाव, बल, अधिष्ठान, निमित्त और आश्रय
के भेद से रोग दो प्रकार के होने पर भी प्रकृति आदि भेदों के कारण अनेक
प्रकार के हो जाते हैं। रोग का रूप एक प्रकार का ही है। रुजा, दुःख,
पीड़ा यह सब प्रकार के रोगों में सामान्य धर्म है। रोग बहुत हैं, क्योंकि प्रभाव,
बल आदि के भेद से रोग बहुत प्रकार के हो जाते हैं। यह बहुत होना भी दो
प्रकार का है। संख्येय अर्थात् गिनने के योग्य एवं असंख्येय
अर्थात् गणना के अयोग्य । गिनने के योग्य जैसे अष्टोदरीय रोगाध्याय में