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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

विद्रधि, पिड़का । विद्रधि का निदान

( ५ )

मधुमेह के कारण । सात पिडकाएं ।
विद्रधि, पिड़का । विद्रधि का निदान
स्राव के लक्षण । साध्य-असाध्य विद्रधि
के लक्षण । भेद के दोष से उत्पन्न पिड़-
काएं-शराविका, कच्छपिका, जालिनी ।
सर्षपी, अलजी, विनता आदि-इनके
उपद्रव दोषों की तीन प्रकार की गति ।
तीन प्रकार की और गति, संचय, प्रकोप
और शमन-संचय के दो भेद-प्राकृत
और वैकृत । उपसंहार ।
अष्टादशोऽध्यायः (पृ० २२१-२३१)
त्रिशोथीयः—तीन प्रकार का
शोथ ( सूजन )-उसके पुनः दो प्रकार
निज और आगन्तु । आगन्तु शोथ का
निदान-चिकित्सा । निज शोथ के कारण
और सामान्य लक्षण । वातजन्य शोथ
के लक्षण । शोथ के दो, तीन, चार,
और सात प्रकार । वात, पित्त, कफ
और सन्निपात आदि से उत्पन्न शोथों
के लक्षण । कष्टसाध्य शोथ । शोथ के
उपद्रव । उपजिह्विका, गलगुण्डिका,
गलगण्ड, गलग्रह, विसर्प, पिड़का और
शंखक के लक्षण । गुल्म, प्लीहा, उदर,
आनाह, का लक्षण । रोहिणी रोग, ।
मृदु, दारुण भेद से साध्य-असाध्य रोग
के लक्षण । पीड़ा, वर्ण, समुत्थान,
कारण, स्थान, संस्थान नाम भेद आदि
के कारण रोग के असंख्य भेद । दोषों के
प्राकृत और विकृत के लक्षण । उपसंहार ।
ऊनविंशोऽध्यायः (पृ० २३१-२३७)
अष्टादरीतः—उदर रोग आदि
४८ प्रकार के रोगों की गणना और
उनके भेदों के नाम से निर्देश । आठ
प्रकार के उदर रोग । सात प्रकार के
कुष्ठ । छः प्रकार के अतीसार ।
पांच प्रकार के गुल्म । चार प्रकार का
अपस्मार । तीन प्रकार का शोथ । दो
प्रकार का ज्वर । दो प्रकार के व्रण-दो
आयाम—दो प्रकार की गृध्रसी—दो
प्रकार का कामला—दो प्रकारका आम
दो प्रकार का वातरक्त—एक प्रकार का
ऊरुस्तम्भ—एक प्रकार का संन्यास—
एक प्रकार का महागद । तीन प्रकार की
क्रिमि जातियां-बीस प्रकार के प्रमेह-
बीस प्रकार के योनिरोग । उपसंहार ।
विंशोऽध्यायः ( पृ० २३७-२४६ )
महारोगाः—चार प्रकार के रोग,
इनकी समानता, लिंग और आयतन
भेद से असंख्य रोग—उनका भेदक
कारण। दो प्रकार के विकार—सामान्य
और नानात्मज । अस्सी प्रकार के वात-
विकार । चालीस पित्तविकार । उनके
लक्षण । बीस कफजन्य रोग । उनके
लक्षण । उपसंहार ।
एकविंशोऽध्यायः (पृ० २४६-२५५)
अष्टौनिन्दित्तीयः—आठ निन्दित
पुरुष । विशेष रूप से निन्दित दो, अति-
स्थूल और अतिकृश स्थूल पुरुष के दोष,
कारण और लक्षण । अतिकृश के दोष,
कारण और लक्षण । आदर्श पुरुष । स्थूल
को कृश बनाने के लिये उपाय । कृश
रोग की चिकित्सा । निद्रा के उचित सेवन
से लाभ । दिन में सोने के योग्य व्यक्ति,

( ६ )

[बायाँ स्तम्भ]
उनको दिन में सोने से लाभ । दिन में
सोने का उचित काल-ग्रीष्म ऋतु-अन्य
ऋतुओं में दिन में सोने से हानियाँ ।
रात्रिजागरण के दोष । निद्रोत्पादक
उपाय । अनुचित निद्रा को रोकने के
उपाय । उपसंहार ।
द्वाविंशतितमोऽध्यायः (पृ०२५६-२६१)
लंघनबृंहणीयः—वैद्य का लक्षण
लंघन, बृंहण, स्नेहन, स्तंभन के सम्ब-
न्ध में अग्निवेश का प्रश्न । आत्रेय
पुनर्वसु का प्रतिवचन । लंघन, बृंहण,
स्वेदन, स्तम्भन के लक्षण । लंघन,
बृंहण आदि कारक द्रव्यों के कारण ।
लंघन के योग्य व्यक्ति । बृंहण के योग्य
द्रव्य और व्यक्ति । विरूक्षण करने योग्य
व्यक्ति और द्रव्य । स्तम्भन द्रव्य और
स्तंभन योग्य व्यक्ति । सम्यक् लंघन
और लंघन के अतियोग के लक्षण ।
सम्यक् बृंहण और बृंहण के अतियोग के
लक्षण । रूक्षण के सम्यकयोग और
अतियोग । स्तम्भन के सम्यकयोग
और अतियोग के लक्षण । लंघन आदि
छः क्रियाओं के अयोग, हीनयोग के
दुष्परिणाम ।
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः पृ० २६१-२६६
सन्तर्पणीयः—सन्तर्पणजन्य रोग
के कारण । रोगों के लक्षण—उनकी
चिकित्सा । अपतर्पण और तज्जन्य रोग—
उनका उपशमन ।
चतुर्विंशतितमोऽध्यायः पृ० २६७-२७४
विधिशोणितीयः—विशुद्ध रक्त
का लाभ । रक्त दूषित होने के कारण


[दायाँ स्तम्भ]
और लक्षण । चिकित्सा । विशुद्ध रक्त
का लक्षण । विशुद्ध रक्त वाले पुरुष का
लक्षण । मद के लक्षण । मूर्च्छा के
लक्षण । अपस्मार और संन्यास के
लक्षण । इन के उपाय । उपसंहार ।
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः पृ०२७५-२८१
यज्जःपुरुषीयः—पुरुष और रोग
की उत्पत्ति पर ऋषियों का संवाद ।
पारीक्षि मौद्गल्य का मत पुरुष और
रोगों का उपादान कारण 'आत्मा' है ।
शरलोमा का मत पुरुष और रोगों का
उत्पादन 'सत्त्व' है । वार्योविद का मत
प्राणियों और रोगों का उत्पत्ति मूल
'रस' है । कुशिक हिरण्याक्ष का मत
पुरुष और रोग ६ धातुओं से उत्पन्न
होते हैं । शौनक का मन रोगों और
पुरुष की उत्पत्ति माता पिता से हुई ।
भद्रकाप्य का मत कर्म से पुरुष और
रोग उत्पन्न होते हैं । भरद्वाज का मत
कर्त्ता से स्वभावतः पुरुष और रोग
उत्पन्न होते हैं । कांकायन का मत सुख
दुःख, चेतन अचेतन का कर्त्ता प्रजापति
हैं । आत्रेय भिक्षु का मत पुरुष और
रोगादि काल से उत्पन्न होते हैं पुनर्वसु
आत्रेय का सिद्धान्त पञ्च महाभूतों से
पुरुष और उनसे ही रोग उत्पन्न हुए ।
इस पर पुरुषों और रोगों की वृद्धि के
कारण के विषय में काशिपतिवामक
का प्रश्न । भगवान् आत्रेय का प्रति-
वचन हिताहित सेवन । अग्निवेश
आत्रेय संवाद हित अहित का लक्षण ।
आहार द्रव्य पर विचार । हित आहार ।