ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
वर्णन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६७९
सुस्वप्न-दर्शनके फलका विचार
नन्दजीने पूछा- प्रभो! किस स्वप्नसे कौन-
सा पुण्य होता है और किससे मोक्ष एवं सुखकी
सूचना मिलती है? कौन-कौन-सा स्वप्न शुभ
बताया गया है?
श्रीभगवान् बोले-तात! वेदोंमें सामवेद
समस्त कर्मोंके लिये श्रेष्ठ बताया गया है। इसी
प्रकार कण्वशाखाके मनोहर पुण्यकाण्डमें भी
इस विषयका वर्णन है। जो दुःस्वप्न है और जो
सदा पुण्यफल देनेवाला सुस्वप्न है, वह सब
जैसा पूर्वोक्त कण्वशाखामें बताया गया है; उसका
वर्णन करता हूँ, सुनो। यह स्वप्नाध्याय अधिक
पुण्य-फल देनेवाला है। अतः इसका वर्णन
करता हूँ। इसका श्रवण करनेसे मनुष्यको गङ्गास्नानके
फलकी प्राप्ति होती है। रातके पहले पहरमें
देखा गया स्वप्न एक वर्षमें फल देता है। दूसरे
पहरका स्वप्न आठ महीनोंमें, तीसरे पहरका
स्वप्न तीन महीनोंमें और चौथे पहरका स्वप्न एक
पक्षमें अपना फल प्रकट करता है। अरुणोदयकी
बेलामें देखा गया स्वप्न दस दिनमें फलद होता
है। प्रातःकालका स्वप्न यदि तुरंत नींद टूट जाय
तो तत्काल फल देनेवाला होता है। दिनको
मनमें जो कुछ देखा और समझा गया है, वह
सब अवश्य सपनेमें लक्षित होता है। तात!
चिन्ता या रोगसे युक्त मनुष्य जो स्वप्न देखता है,
वह सब निःसंदेह निष्फल होता है। जो जडतुल्य
है, मल-मूत्रके वेगसे पीड़ित है, भयसे व्याकुल
है, नग्न है और बाल खोले हुए है, उसे अपने
देखे हुए स्वप्नका कोई फल नहीं मिलता।
निद्रालु मनुष्य स्वप्न देखकर यदि पुनः नींद लेने
लग जाता है अथवा मूढ़तावश रातमें ही किसी
दूसरेसे कह देता है; तब उसे उस स्वप्नका फल
नहीं मिलता। किसी नीच पुरुषसे, शत्रुसे, मूर्ख
मनुष्यसे, स्त्रीसे अथवा रातमें ही किसी दूसरेसे
स्वप्नकी बात कह देनेपर मनुष्यको विपत्ति,
दुर्गति, रोग, भय, कलह, धनहानि एवं चोर-
भयका सामना करना पड़ता है।
व्रजेश्वर ! स्वप्नमें गौ, हाथी, अश्व, महल,
पर्वत और वृक्षोंपर चढ़ना, भोजन करना तथा
रोना धनप्रद कहा गया है। हाथमें वीणा लेकर
गीत गाना खेतीसे भरी हुई भूमिकी प्राप्तिका
सूचक होता है। यदि स्वप्नमें शरीर अस्त्र-शस्त्रसे
विद्ध हो जाय, उसमें घाव हों, कीड़े हो जायें,
विष्ठा अथवा खूनसे शरीर लिस हो जाय तो यह
धनकी प्राप्तिका सूचक है। स्वप्नमें अगम्या स्त्रीके
साथ समागम भार्याप्राप्तिकी सूचना देनेवाला है।
जो स्वप्नमें मूत्रसे भीग जाता, वीर्यपात करता,
नरकमें प्रवेश करता, नगर या लाल समुद्रमें
घुसता अथवा अमृत पान करता है; वह जगनेपर
शुभ समाचार पाता है और उसे प्रचुर धनराशिका
लाभ होता है। स्वप्नमें हाथी, राजा, सुवर्ण, वृषभ,
धेनु, दीपक, अन्न, फल, पुष्प, कन्या, छत्र, ध्वज
और रथका दर्शन करके मनुष्य कुटुम्ब, कीर्ति
और विपुल सम्पत्तिका भागी होता है। भरे हुए
घड़े, ब्राह्मण, अग्नि, फूल, पान, मन्दिर, श्वेत
धान्य, नट एवं नर्तकीको स्वप्नमें देखनेसे लक्ष्मीकी
प्राप्ति होती है। गोदुग्ध और घीके दर्शनका भी
यही फल है। सपनेमें कमलके पत्तेपर खीर,
दही, दूध, घी, मधु और स्वस्तिक नामक
मिष्टान्न खानेवाला मनुष्य भविष्यमें अवश्य ही
राजा होता है। छत्र, पादुका और निर्मल एवं
तीखे खड्गकी प्राप्ति धान्य-लाभकी सूचना देती
है। खेल-खेलमें ही पानीके ऊपर तैरनेवाला
मनुष्य प्रधान होता है। फलवान् वृक्षका दर्शन और
सर्पका दंशन धन-प्राप्तिका सूचक है। स्वप्नमें सूर्य
और चन्द्रमाके दर्शनसे रोग दूर होता है। घोड़ी, मुर्गी
और क्रौञ्चीको देखनेसे भार्याका लाभ होता है।
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
स्वप्नमें जिसके पैरोंमें बेड़ी पड़ गयी, उसे प्रतिष्ठा
और पुत्रकी प्राप्ति होती है। जो सपनेमें नदीके
किनारे नये अथवा फटे-पुराने कमलके पत्तेपर
दही मिला हुआ अन्न और खीर खाता है; वह
भविष्यमें राजा होता है। जलौका (जोंक), बिच्छू
और साँप यदि स्वप्नमें दिखायी दें तो धन, पुत्र,
विजय एवं प्रतिष्ठाकी प्राप्ति होती है। सींग और
बड़ी-बड़ी दाढ़वाले पशुओं, सूअरों और वानरोंसे
यदि स्वप्नमें पीडा प्राप्त हो तो मनुष्य निश्चय ही
राजा होता और प्रचुर धन-राशि प्राप्त कर लेता है।
जो स्वप्नमें मत्स्य, मांस, मोती, शङ्ख, चन्दन,
हीरा, शराब, खून, सुवर्ण, विष्ठा तथा फले-फूले
बेल और आमको देखता है; उसे धन मिलता है।
प्रतिमा और शिवलिङ्गके दर्शनसे विजय और
धनकी प्राप्ति होती है। प्रज्वलित अग्निको देखकर
मनुष्य धन, बुद्धि और लक्ष्मी पाता है। आँवला
और कमल धनप्राप्तिका सूचक है। देवता, द्विज,
गौ, पितर और साम्प्रदायिक चिह्नधारी पुरुष स्वप्नमें
परस्पर जिस वस्तुको देते हैं; उसका फल भी वैसा
ही होता है। श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत पुष्पोंकी
माला और श्वेत अनुलेपनसे सुसज्जित सुन्दरियाँ
स्वप्नमें जिस पुरुषका आलिङ्गन करती हैं, उसे
सुख और सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है। जो पुरुष
स्वप्नमें पीत वस्त्र, पीले पुष्पोंकी माला और पीले
रंगका अनुलेपन धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन
करता है; उसे कल्याणकी प्राप्ति होती है। स्वप्नमें
भस्म, रूई और हड्डीको छोड़कर शेष सभी श्वेत
वस्तुएँ प्रशंसित हैं और कृष्णा गौ, हाथी, घोड़े,
ब्राह्मण तथा देवताको छोड़कर शेष सभी काली
वस्तुएँ अत्यन्त निन्दित हैं।
रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित दिव्य
ब्राह्मणजातीय स्त्री मुस्कराती हुई जिसके घरमें
आती है; उसे निश्चय ही प्रिय पदार्थकी प्राप्ति
होती है। स्वप्नमें ब्राह्मण देवताका स्वरूप है और
ब्राह्मणी देवकन्याका। ब्राह्मण और ब्राह्मणी संतुष्ट
हो मुस्कराते हुए स्वप्नमें जिसको कोई फल दें,
उसे पुत्र होता है। पिताजी! ब्राह्मण स्वप्नमें जिसे
शुभाशीर्वाद देते हैं, उसे अवश्य ऐश्वर्य प्राप्त होता
है। सपनेमें संतुष्ट ब्राह्मण जिसके घर आ जाय;
उसके यहाँ नारायण, शिव और ब्रह्माका प्रवेश
होता है; उसे सम्पत्ति, महान् सुयश, पग-पगपर
सुख, सम्मान और गौरवकी प्राप्ति होती है। यदि
स्वप्नमें अकस्मात् गौ मिल जाय तो भूमि और
पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है। स्वप्नमें जिस पुरुषको
हाथी सूँड़से उठाकर अपने माथेपर बिठा ले; उसे
निश्चय ही राज्य-लाभ होगा। स्वप्नमें संतुष्ट
ब्राह्मण जिसे हृदयसे लगाये और फूल हाथमें दे;
वह निश्चय ही सम्पत्तिशाली, विजयी, यशस्वी
और सुखी होता है। साथ ही उसे तीर्थस्नानका
पुण्य प्राप्त होता है।
स्वप्नमें तीर्थ, अट्टालिका और रत्नमय गृहका
दर्शन हो तो उससे भी पूर्वोक्त फलकी ही प्राप्ति
होती है। स्वप्नमें यदि कोई भरा हुआ कलश दे
तो पुत्र और सम्पत्तिका लाभ होता है। हाथमें
कुडव या आढक लेकर स्वप्नमें कोई वाराङ्गना
जिसके घर आती है; उसे निश्चय ही लक्ष्मीकी
प्राप्ति होती है। जिसके घर पत्नीके साथ ब्राह्मण
आता है; उसके यहाँ पार्वतीसहित शिव अथवा
लक्ष्मीके साथ नारायणका शुभागमन होता है।
ब्राह्मण और ब्राह्मणी स्वप्नमें जिसे धान्य, पुष्पाञ्जलि,
मोतीका हार, पुष्पमाला और चन्दन देते हैं तथा
जिसे स्वप्नमें गोरोचन, पताका, हल्दी, ईख और
सिद्धान्नका लाभ होता है; उसे सब ओरसे
लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। ब्राह्मण और ब्राह्मणी
स्वप्नावस्थामें जिसके मस्तकपर छत्र लगाते
अथवा श्वेत धान्य बिखेरते हैं या अमृत, दही
और उत्तम पात्र अर्पित करते हैं अथवा जो
स्वप्नमें श्वेत माला और चन्दनसे अलंकृत हो
रथपर बैठकर दही या खीर खाता है; वह
निश्चय ही राजा होता है। स्वप्नमें रत्नमय
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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आभूषणोंसे विभूषित आठ वर्षकी कुमारी कन्या जिसपर संतुष्ट हो जाती है और जिस पुण्यात्माको पुस्तक देती है; वह विश्वविख्यात कवीश्वर एवं पण्डितराज होता है। जिसे स्वप्नमें माताकी भाँति वह पढ़ाती है; वह सरस्वती-पुत्र होता है और अपने समयका सबसे बड़ा पण्डित माना जाता है। यदि विद्वान् ब्राह्मण किसीको पिताकी भाँति यत्नपूर्वक पढ़ावे या प्रसन्नतापूर्वक पुस्तक दे तो वह भी उसीके समान विद्वान् होता है। जो स्वप्नमें मार्गपर या जहाँ कहीं भी पड़ी हुई पुस्तक पाता है; वह भूतलपर विख्यात एवं यशस्वी पण्डित होता है। जिसे ब्राह्मण-ब्राह्मणी स्वप्नमें महामन्त्र दें; वह पुरुष विद्वान्, धनवान् और गुणवान् होता है। ब्राह्मण स्वप्नमें जिसे मन्त्र अथवा शिलामयी प्रतिमा देता है; उसे मन्त्रसिद्धि प्राप्त होती है। यदि ब्राह्मण स्वप्नमें ब्राह्मणसमूहका दर्शन एवं वन्दन करके आशीर्वाद पाता है तो वह राजाधिराज अथवा महान् कवि एवं पण्डित होता है। स्वप्नमें ब्राह्मण जिसे संतुष्ट होकर श्वेत धान्ययुक्त भूमि देता है; वह राजा होता है। ब्राह्मण जिसे स्वप्नमें रथपर बिठाकर नाना प्रकारके स्वर्ग दिखाता है; वह चिरंजीवी होता है तथा उसकी आयु एवं सम्पत्तिकी निश्चय ही वृद्धि होती है। सपनेमें संतुष्ट ब्राह्मण जिस ब्राह्मणको अपनी कन्या देता है; वह सदा धनाढ्य राजा होता है। स्वप्नमें सरोवर, समुद्र, नदी, नद, श्वेत सर्प और श्वेत पर्वतका दर्शन करनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जो स्वप्नमें अपनेको मरा हुआ देखता है, वह चिरंजीवी होता है। रोगी देखनेपर नीरोग होता है और सुखी देखनेपर निश्चय ही दुःखी होता है। दिव्य नारी जिससे स्वप्नमें कहती है कि आप मेरे स्वामी हैं और वह उस स्वप्नको देखकर तत्काल जाग उठता है तो अवश्य राजा होता है। स्वप्नमें कालिकाका दर्शन करके और स्फटिककी माला, इन्द्र-धनुष एवं वज्रको पाकर मनुष्य अवश्य ही प्रतिष्ठाका भागी होता है। स्वप्नमें ब्राह्मण जिससे कहे कि तुम मेरे दास हो जाओ, वह मेरी दास्यभक्ति पाकर वैष्णव हो जाता है। स्वप्नावस्थामें ब्राह्मण शिव और विष्णुका स्वरूप है। ब्राह्मणी लक्ष्मी एवं पार्वतीका प्रतीक है तथा श्वेतवर्णा स्त्री वेदमाता सावित्री, गङ्गा एवं सरस्वतीका रूप है। ग्वालिनका वेष धारण करनेवाली बालिका मेरी राधिका है और बालक बाल-गोपालका स्वरूप है। स्वप्नविज्ञानके जाननेवाले विद्वानोंने इस रहस्यको प्रकाशित किया है। पिताजी ! यह मैंने पुण्यदायक उत्तम स्वप्नोंका वर्णन किया है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ?
(अध्याय ७७)
श्रीकृष्णके द्वारा नन्दको आध्यात्मिक ज्ञानका उपदेश, बाईस प्रकारकी सिद्धि, सिद्धमन्त्र तथा अदर्शनीय वस्तुओंका वर्णन
नन्दजी बोले—जगन्नाथ श्रीकृष्ण ! मैंने अच्छे स्वप्नोंका वर्णन सुना। यह वेदोंका सारभाग तथा लौकिक-वैदिक नीतिका सारतत्त्व है। वत्स ! अब मैं उन स्वप्नोंको सुनना चाहता हूँ, जिन्हें देखनेसे पाप होता है। अथवा जिस कर्मके करनेसे पाप होता है, उसका वर्णन करो। वेदका अनुसरण करनेवाले संतस मनुष्य तुम्हारे मुखसे वेद-शास्त्रोंकी बातें सुनना चाहते हैं; क्योंकि तुम वेदोंके जनक हो और वैदिक सत्पुरुषों, ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों तथा तीनों लोकोंके भी जन्मदाता हो। वत्स ! अपने वियोगसे तुमने मेरे हृदयमें दाह उत्पन्न कर दिया है; किंतु इस समय तुम्हारे मुखारविन्दसे जो प्रमाणभूत वचनामृत सुननेको मिला है, उससे मेरा तन, मन अभिषिक्त
६८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
हो उठा है। तुम्हारा जो चरणकमल सम्पूर्ण
मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है तथा ब्रह्मा
आदि देवता स्वप्नमें भी जिसका दर्शन नहीं कर
पाते हैं; वही आज मेरी आँखोंके सामने है।
आजके बाद मुझ पातकीको तुम्हारे चरणारविन्दोंका
दर्शन कहाँ मिलेगा ? मेरा यह मलमूत्रधारी शरीर
अपने कर्मबन्धनसे बँधा हुआ है। बेटा! अब
ऐसा दिन कब प्राप्त होगा, जब कि ब्रह्मा आदि
देवताओंके भी स्वामी तुमसे बातचीत करनेका
शुभ अवसर मुझ-जैसे पापीको सुलभ होगा ?
महेश्वर ! कृपानाथ ! मुझपर कृपा करो। मैंने अपना
बेटा समझकर तुम्हारे साथ जो दुर्नीतिपूर्ण व्यवहार
किया है; मेरे उस अपराधको क्षमा कर दो।
ब्रह्मा, शिव, शेषनाग और मुनि भी तुम्हारे
चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हैं। सरस्वती और
श्रुति भी तुम्हारी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाती
हैं; फिर मेरी क्या बिसात है?
यों कहकर नन्दजी दुःख और शोकसे
व्याकुल हो गये। पुत्रवियोगसे विह्वल हो रोते-
रोते उन्हें मूर्च्छा आ गयी। यह देख जगत्पति
भगवान् श्रीकृष्ण संत्रस्त हो उन्हें यत्नपूर्वक
समझाने-बुझाने लगे। उन्होंने नन्दको परम उत्तम
आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया।
श्रीभगवान्ने कहा- पिताजी ! लोकमें जितने
जन्मदाता पिता हैं, उन सबमें तुम्हारा श्रेष्ठ स्थान
है। सर्वश्रेष्ठ ब्रजेश्वर ! होशमें आओ और उत्तम
कल्याणमय ज्ञान सुनो। यह श्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञान
ज्ञानियोंके लिये भी परम दुर्लभ है। वेद-शास्त्रमें
भी गोपनीय कहा गया है। केवल तुम्हींको इसका
उपदेश दे रहा हूँ। तात! एकाग्रचित्त हो प्रसन्नतापूर्वक
इस ज्ञानको सुनो और इसका मनन करो। इसके
अभ्याससे जन्म, मृत्यु और जरारूपी रोगसे
छुटकारा मिल जाता है। महाराज ब्रजराज !
सुस्थिर होओ और इस ज्ञानको पाकर शोक-
मोहसे रहित एवं परमानन्दमें निमग्न हो अपने
व्रजको पधारो। यह समस्त चराचर जगत् जलके
बुलबुलेकी भाँति नश्वर है; प्रातःकालिक स्वप्नकी
भाँति मिथ्या और मोहका ही कारण है। पाञ्चभौतिक
शरीर एवं संसारके निर्माणका हेतु भी मिथ्या एवं
अनित्य है। मायासे ही मनुष्य इसे सत्य मान रहा
है। वह समस्त कर्मोंमें काम, क्रोध, लोभ और
मोहसे वेष्टित है और मायासे सदा मोहित,
ज्ञानहीन एवं दुर्बल है। निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा,
पिपासा, क्षमा, श्रद्धा, दया, लज्जा, शान्ति, धृति,
पुष्टि और तुष्टि आदिसे भी वह आवृत है। जैसे
वृक्ष काक आदि पक्षियोंका आश्रय है; उसी
प्रकार मन, बुद्धि, चेतना, प्राण, ज्ञान और
आत्मासहित सम्पूर्ण देवता शरीरका आश्रय लेकर
रहते हैं। मैं सर्वेश्वर ही पूर्ण ज्ञानस्वरूप आत्मा
हूँ। ब्रह्मा मन हैं, सनातनी प्रकृति बुद्धि हैं, प्राण
विष्णु हैं तथा चेतना और उसकी अधिष्ठात्री देवी
लक्ष्मी हैं। शरीरमें मेरे रहनेसे ही सबकी स्थिति
है। मेरे चले जानेपर वे भी सब-के-सब चले
जाते हैं। हम सबके त्याग देनेपर शरीर तत्काल
गिर जाता है; इसमें संशय नहीं है। उसके पाँचों
भूत उसी क्षण समष्टिगत पाँचों भूतोंमें विलीन हो
जाते हैं। नाम केवल संकेतरूप है। वह निष्फल
और मोहका कारण है। तात ! अज्ञानियोंको ही
शरीरके लिये शोक होता है; ज्ञानियोंको किञ्चिन्मात्र
भी दुःख नहीं होता। निद्रा आदि जो शक्तियाँ हैं;
वे सब प्रकृतिकी कलाएँ हैं। काम, क्रोध लोभ
और मोहके साथ जो पाँचवाँ अहंकार है; वे सब
अधर्मके अंश हैं। सत्त्व आदि तीन गुण क्रमशः
विष्णु, ब्रह्मा तथा रुद्रके अंश हैं। ज्योतिर्मय शिव
ज्ञानस्वरूप हैं और मैं निर्गुण आत्मा हूँ। जब
प्रकृतिमें प्रवेश करता हूँ तो मैं सगुण कहा जाता
हूँ। विष्णु, ब्रह्मा तथा रुद्र आदि सगुण विषय हैं।
मेरे अंशभूत धर्म, शेषनाग, सूर्य और चन्द्रमा
आदि विषयी कहे गये हैं। इसी प्रकार समस्त
मुनि, मनु तथा देवता आदि मेरे कलांशरूप हैं।
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६८३
मैं समस्त शरीरोंमें व्याप्त हूँ; तथापि उनके द्वारा सम्पादित होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंसे निर्लिप्त हूँ। मेरा भक्त जीवन्मुक्त होता है तथा वह जन्म, मृत्यु और जराका निवारण करनेवाला है। भक्त सम्पूर्ण सिद्धोंका स्वामी, श्रीमान्, कीर्तिमान्, विद्वान्, कवि, बाईस प्रकारका सिद्ध और समस्त कर्मोंका निराकरण करनेवाला है। उस सिद्ध भक्तको मैं स्वयं प्राप्त होता हूँ; क्योंकि वह मेरे सिवा दूसरी किसी वस्तुकी इच्छा ही नहीं करता।
तात! सिद्धियोंका साधन करनेवाला सिद्ध उन सिद्धियोंके ही भेदसे बाईस प्रकारका होता है। मेरे मुखसे उसका परिचय सुनो और सिद्धमन्त्र ग्रहण करो। अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व, कामावसायिता, दूरश्रवण, परकायप्रवेश, मनोयायित्व, सर्वज्ञत्व, अभीष्टसिद्धि, अग्निस्तम्भ, जलस्तम्भ, चिरजीवित्व, वायुस्तम्भ, क्षुत्पिपासानिद्रास्तम्भन (भूख-प्यास तथा नींदका स्तम्भन), वाक्सिद्धि, इच्छानुसार मृत प्राणीको बुला लेना, सृष्टिकरण और प्राणोंका आकर्षण—ये बाईस प्रकारकी सिद्धियाँ हैं। सिद्धमन्त्र इस प्रकार है—'ॐ सर्वेश्वरेश्वराय सर्वविघ्नविनाशिने मधुसूदनाय स्वाहा'। यह मन्त्र अत्यन्त गूढ़ है और सबकी मनोवाञ्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षके समान है। सामवेदमें इसका वर्णन है। यह सिद्धोंकी सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है। इस मन्त्रके जपसे योगी, मुनीन्द्र और देवता सिद्ध होते हैं। सत्पुरुषोंको एक लाख जप करनेसे ही यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है। यदि नारायणक्षेत्रमें हविष्यान्नभोजी होकर इसका जप किया जाय तो शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है। तात! तुम काशीके मणिकर्णिकातीर्थमें जाकर इसका जप करो। मैं तुम्हें नारायणक्षेत्र बतलाता हूँ, सुनो। गङ्गाके जलप्रवाहसे चार हाथतककी भूमिको 'नारायणक्षेत्र' कहा है। उसके नारायण ही स्वामी हैं; दूसरा कोई कदापि नहीं है। वहाँ मनुष्यकी मृत्यु होनेपर उसे ज्ञान एवं मुक्तिकी प्राप्ति होती है। वहाँ व्रतके बिना भी मन्त्र-जप करनेसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। व्रजनाथ! व्रजको जाओ और उसे पवित्र करो।
तात! जिनके दर्शनसे पाप होता है; उन्हें बताता हूँ, सुनो। दुःस्वप्न केवल पापका बीज और विघ्नका कारण होता है। गौ और ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले कृतघ्न, कुटिल, देवमूर्तिनाशक, माता-पिताके हत्यारे, पापी, विश्वासघाती, झूठी गवाही देनेवाले, अतिथिके साथ छल करनेवाले, ग्राम-पुरोहित, देवता तथा ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले, पीपलका पेड़ काटनेवाले, दुष्ट, शिव और विष्णुकी निन्दा करनेवाले, दीक्षारहित, आचारहीन, संध्यारहित द्विज, देवताके चढ़ावेपर गुजारा करनेवाले और बैल जोतनेवाले ब्राह्मणको देखनेसे पाप लगता है। पति-पुत्रसे रहित, कटी नाकवाली, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाली, पतिभक्तिहीना, विष्णुभक्तिशून्या तथा व्यभिचारिणी स्त्रीके दर्शनसे भी पाप होता है। सदा क्रोधी, जारज, चोर, मिथ्यावादी, शरणागतको यातना देनेवाले, मांस चुरानेवाले, शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मण, ब्राह्मणीगामी शूद्र, सूदखोर द्विज और अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले दुष्ट नराधमको भी देखनेसे पाप लगता है। माता, सौतेली माँ, सास, बहिन, गुरुपत्नी, पुत्रवधू, भाईकी स्त्री, मौसी, बूआ, भांजेकी स्त्री, मामी, परायी नवोढा, चाची, रजस्वला, पितामही और नानी—ये सामवेदमें अगम्या बतायी गयी हैं। सत्पुरुषोंको इन सबकी रक्षा करनी चाहिये। कामभावसे इनका दर्शन और स्पर्श करनेपर मनुष्य ब्रह्महत्याका भागी होता है; अतः दैववश यदि इनकी ओर दृष्टि चली जाय तो सूर्यदेवका दर्शन करके श्रीहरिका स्मरण करे। जो कामनापूर्वक इनपर कुदृष्टि डालते हैं, वे निन्दनीय होते हैं। ब्रजेश्वर! इसलिये शापसे डरे हुए साधु पुरुष